भाजपा और कांग्रेस को सबक दे रहे हैं चुनावी नतीजे

दो विधानसभाओ के चुनाव नतीजे भाजपा के लिए दिवाली से पहले बहुत खुशी वाले नहीं रहे हैं। यह चुनाव नतीजे नए संकेत भी लेकर आये हैं। संकेत यह है कि मोदी सरकार को देश के मंदी, बेरोजगारी, किसान, रोटी-कपड़ा-मकान जैसे मुद्दों पर ध्यान देना होगा नहीं तो जनता उसे इतिहास बनाने में देर नहीं करेगी। यह नतीजे कांग्रेस के लिए भी संकेत हैं कि उसे जागना होगा नहीं तो वह भी भुला दी जाएगी। तमाम हालत पर विशेष संवाददाता राकेश रॉकी का विश्लेषण।

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महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव नतीजे भाजपा के लिए बड़ा संकेत हैं। महाराष्ट्र में वो पिछले चुनाव के मुकाबले करीब 20 सीट पीछे रह गयी है और हरियाणा में तो इस बार 70 पार का उसका नारा सपना ही बनकर रह गया। भले भाजपा दोनों राज्यों में सरकारें बना ले,लेकिन इस चुनाव के नतीजे उसके लिए जो सबसे बड़ा सबक लेकर आये हैं वह यह कि देश के स्थानीय मुद्दों में वो जनता का समर्थन खो रही है और यह भी की उसकी इन चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दों को भुनाने की कोशिश नाकाम साबित हुई है। हरियाणा में भाजपा की कितनी फजीहत हुई है यह इस तथ्य से समझा जा सकता है कि उसके आठ मंत्री और कुछ बड़े नेता चुनाव में हार गए हैं।

भाजपा विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर ही उतरी थी। दोनों ताकतवर भाजपा नेताओं नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने अपने चुनाव भाषणों में धारा 370 से लेकर पुलवामा-बालाकोट तक को केंद्र में रखा लेकिन हरियाणा में जब स्थानीय मुद्दे हावी हो गए तो भाजपा संकट में आ गई। महाराष्ट्र में भी भाजपा की 20 सीटें घट जाना इस बात का संकेत है कि जनता का उसमें भरोसा कम हो रहा है।

साल 2014 के मुकाबले महाराष्ट्र में भाजपा की 20 सीटें घट गयी हैं। यह उसके लिए बड़ी चोट और चिंता का विषय है। भले नतीजों के बाद कार्यकर्ताओं का मनोबल रखने के लिए पीएम मोदी ने कहा हो कि भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन किया है, सच यह है कि इन चुनाव नतीजों के बाद भाजपा खेमे में गहन निराशा है। उसे जिस बम्पर जीत की आदत पिछले कुछ सालों में पडी है और जैसे वह उम्मीद कर रही थी वैसा नतीजा यह बिलकुल नहीं रहा है।

भाजपा पिछले महीनों में जिस तरह हिन्दू-मुस्लिम राजनीति की तरफ झुकी है उसे लगता था, यह उसे लम्बे समय तक चुनावी लाभ देगा लेकिन इस चुनाव में जनता ने उसका यह भ्रम तोड़ दिया है और उसे संकेत दिया है कि उसे जनता के मुद्दों की कद्र और फिक्र करनी होगी। हिन्दू-मुस्लिम, पाकिस्तान के तनाव को चुनाव में भुनाने और धारा 370जैसे मुद्दों की उसकी कोशिश चुनाव में उसे कोई लाभ नहीं दे पाई है। पाकिस्तान के साथ टकराव को उभार कर जिस ‘राष्ट्रवाद’ को भाजपा ने मई के लोकसभा चुनावों में भुनाया था और इस चुनाव में उसकी पुनरावृत्ति की उम्मीद कर रही थी, उसमें उसे तगड़ा झटका लगा है।

जम्मू कश्मीर में धारा 370 के ज़्यादातर प्रावधानों को खत्म करने से भाजपा को भरोसा था कि इसका चुनाव में उसे लाभ मिलेगा लेकिन यह भी नहीं हुआ है। सच यह है कि भाजपा को धारा 370 के मसले पर इतना भरोसा था कि उसे बम्पर जीत मिलने जा रही है। लेकिन महाराष्ट्र में उसकी सीटें घट गयी और हरियाणा में तो उसे लेने के देने ही पड़ गए हैं।

भाजपा भले अब चेहरा बचाने के लिए कहे कि वह दोनों राज्यों में सबसे बड़ी पार्टी रही है और महाराष्ट्र में शिव सेना के गठबंधन के साथ वह सत्ता में लौट रही है, सच यह है कि सीटों की कमज़ोर संख्या ने दोनों राज्यों में भाजपा को गहरा जख्म दिया है।

भाजपा ने महाराष्ट्र में वीर सावरकर को ‘भारत रत्न’ देने की बात अपने चुनाव घोषणा पत्र में जोड़़ी थी लेकिन इस मसले पर भी उसे जनता का समर्थन नहीं मिला।

राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के नतीजों के बाद यह लगातार दूसरी बार है कि भाजपा को स्थानीय और रोज़गार, किसान, मंदी जैसे मुद्दों पर जनता ने समर्थन देने से गुरेज किया है।

आर्थिक मंदी की इतनी चिंता के बावजूद भाजपा के नेताओं ने इसे एक मज़ाक के विषय के रूप में लिया। वो कभी भी इस मसले पर गम्भीर नहीं दिखे। नौकरियों की हालत खराब है और भाजपा इसे मुद्दा नहीं बनने देना चाहती। इससे जनता के मन में यह सन्देश जा रहा है कि भाजपा उसकी रोजी-रोटी-रोज़गार के लिए गंभीर नहीं है। यह भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। महाराष्ट्र में भाजपा को गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे के हारने से भी बड़ा झटका लगा है।

महाराष्ट्र में भले भाजपा ने शिव सेना के बूते सरकार बनाने की स्थिति पा ली है, लेकिन नतीजों से निश्चित ही उसके खेमे में चिंता पैदा हुई है। यह भी साबित हो गया है कि महज चार महीने पहले लोकसभा के चुनाव में जिन पीएम मोदी की तुती बोल रही थी, वह इस चुनाव में कहीं नहीं दिखी है। भाजपा ने पिछले कुछ सालों में खुद को सिर्फ दो नेताओं -मोदी और शाह- के इर्दगिर्द समेट लिया है। अब इसके खराब नतीजे सामने आ रहे हैं।

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस का कोई फैक्टर नहीं चला है। चला होता तो भाजपा की सीटें इस तरह कम नहीं हुई होती। हरियाणा में पीएम मोदी की करीब आधा दर्जन चुनाव रैलियां हुईं और अमित शाह ने भी काफी रैलियां कीं। सभी में उन्होंने खुद को राष्ट्रीय मुद्दों तक सीमित रखा। महाराष्ट्र और हरियाणा में पीएम मोदी ने कमोवेश हर चुनाव सभा में कांग्रेस को चुनौती दी कि वह धारा 370 को खत्म करने का वादा जनता से करे लेकिन इसका कोई असर जनता पर नहीं पड़ा।

वीर सावरकार को भाजपा महाराष्ट्र में बड़ा मुद्दा बनाना चाहती थी लेकिन वह नहीं चला। भाजपा के बड़े नेताओं ने बहुत कम लोकल मुद्दों को इन चुनावों में एहमियत दी। वे पीएम मोदी और अमित शाह को जिस तरह घारा 370 और बालाकोट का श्रेय देना चाहते थे लेकिन जनता ने इन मुद्दों के आधार पर वोट किया ही नहीं।

यह साफ है कि इन चुनावों में कांग्रेस की निष्क्रियता ने भाजपा को, जो भी उसने हासिल किया, उसका अवसर प्रदान किया। राजनीतिक लिहाज से यह कांग्रेस के बड़ी हार है। नतीजे देखकर लगता है कि कांग्रेस के पास इन दोनों राज्यों में बहुत बेहतर करने का अवसर था लेकिन वह नहीं कर पाई।

चुनाव से पहले ही कांग्रेस सोनिया गांधी और राहुल गांधी के समर्थकों के बीच बंट गयी थी। हां, कांग्रेस ने एक रणनीति के तहत एक समझदारी ज़रूर की। उसने राष्ट्रीय नेताओं को जानबूझकर महाराष्ट्र और हरियाणा में मैदान में नहीं उतारा। पार्टी नहीं चाहती थी कि यह चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों में तब्दील हो जाए। कांग्रेस ने हरियाणा में अपने राज्य प्रभारी गुलाम नबी आजाद तक की जनसभा नहीं रखी, सोनिया गांधी एक बार भी नहीं आईं जबकि राहुल को सोनिया की रद्द की रैली में भेजा गया।

कांग्रेस ने तो कोई बेहतर रणनीति इन चुनावों के लिए नहीं बनाई न उसने जीत की कोई मजबूत इच्छाशक्ति ही दिखाई। ऐसे में भी कांग्रेस और जेजेपी ने भाजपा की हरियाणा में यह हालत कर दी तो समझा जा सकता है कि कांग्रेस एकजुट होती तो क्या नतीजा निकलता। हुड्डा को पहले ही अध्यक्ष का जिम्मा दे दिया गया होता तो भाजपा की क्या हालत होती।

महाराष्ट्र में कांग्रेस एनसीपी से भी पीछे रह गयी है और चैथी पार्टी है। इसलिए इस चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए भी संकेत हैं कि उसे जागना होगा नहीं तो वह इतिहास की चीज हो जाएगी। उसका देश भर में जनाधार है यह इस चुनाव के नतीजे महाराष्ट्र में भी साबित करते हैं। वहां कुछ नहीं करने के बावजूद उसे पिछली बार से दो सीट ज्यादा मिली हैं। लिहाजा कांग्रेस यदि खुद को मुख्यधारा में ला सके तो भाजपा के लिए आज भी वह बहुत बड़ी चुनौती है।

इन चुनाव नतीजों से भाजपा में तो कोई फेरबदल नहीं होगा, कांग्रेस की राजनीति दिसंबर के संगठन के चुनाव में करबट ले सकती है। राहुल गांधी, जिनके अध्यक्ष रहते कांग्रेस ने पिछले दिसंबर में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा के चुनाव जीते थे, फिर कांग्रेस की मुख्य धारा में लौट सकते हैं। और शायद ज़्यादा ताकत के साथ। वैसे प्रियंका गांधी के अध्यक्ष बनने की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता।

हरियाणा में जाट बनाम अन्य

राजनीति पूरी ताकत से चली है लेकिन वहां लोगों ने आज के गंभीर मुद्दों पर भाजपा और उसके राष्ट्रीय नेतृत्व के उदासीन रवैया अपनाने पर भी आक्रोश दिखाया है। हरियाणा में भाजपा बहुमत से दूर रह गयी। उसे वहां आरोपी गोपाल कांडा जैसे नेताओं से सहयोग लेना होगा।

भाजपा जाटों के मामले में कितनी अनिश्चित है, यह तभी साफ हो गया था जब उसने टिकट जारी किये थे। जहां 2014 में भाजपा ने 27 जाट समुदाय के उम्मीदवार उतारे वहीं इस बार सिर्फ 17 टिकट इस समुदाय को दिए। जाट वैसे ही भाजपा से नाराज थे और ऊपर से पिछले कुछ सालों खासकर जाट आंदोलन के दौरान सरकार के मंत्रियों का इस समुदाय के प्रति रवैया भी जाटों को नाराज कर गया।

जाट आरक्षण आंदोलन के बाद ही साफ होने लगा था कि भाजपा को अगले चुनाव में इस समुदाय का समर्थन शायद ही मिले। इसने पार्टी की धारणा भी बदली और टिकट वितरण में यह साफ हो गया कि भाजपा मान चुकी है कि उसे जाटों का समर्थन नहीं मिलेगा लिहाजा उनका प्रतिनिधित्व टिकटों में कम कर दिया।

हरियाणा में हमेशा जाति की राजनीति होती रही है और इस बार के चुनाव नतीजे यह साबित कर रहे हैं कि इस बार भी इसका असर रहा। पिछले विधानसभा और बीते लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को इस वर्ग का खुलकर साथ नहीं मिला था। वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र विद्यालंकार कहते हैं – ‘जब 2016 में जाट आरक्षण आंदोलन हुआ तभी यह साफ हो गया था कि 2019 का विधानसभा चुनाव हरियाणा में जाट बनाम गैर-जाट का चुनाव होगा। आम तौर पर बिरादरियों में खटास पैदा हो गई थी। यह अलग बात है कि भाजपा ने इसके बाद भी जाटों को मनाने की कोशिश जारी रखी लेकिन उसे इसमें सफलता नहीं मिली।’

इस बार भी भाजपा ने पंजाबी चेहरे के रूप में मनोहर लाल खट्टर को चुनाव में आगे किया जिससे यह साफ हो गया कि बहुत कम ही जाट समर्थन भाजपा को मिल पायेगा। इस चुनावमें भाजपा के मंत्रियों की इतनी बड़ी संख्या में हार जाहिर करती है कि स्थानीय मुद्दों के चुनाव में उसे हार मिली है और चुनाव प्रचार में पीएम मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का राष्ट्रीय मुद्दों को ताकत से उभारना भी भाजपा के काम नहीं आया।

रोहतक, सोनीपत, जींद, कैथल, सिरसा, झज्जर, फतेहाबाद और भिवानी जिलों में जाट समुदाय का असर जबरदस्त रहा है और इन नतीजों में यह साफ दिखा है। वहां भाजपा को मार सहनी पड़ी है। करीब 23 सीटों पर जाट ताकतवर हैं। पुलवामा-बालाकोट की हवा के बावजूद लोकसभा चुनाव में जाट भाजपा के साथ नहीं गए और विधानसभा चुनाव में तो जाटों ने भाजपा को कमोवेश नकार ही दिया है।

भाजपा के कई दिग्गज मंत्री इस चुनाव में निपट गए।हरियाणा में दुष्यंत चैटाला नए युवा तुर्क के रूप में उभरे हैं। वहां उनकी नई नवेली पार्टी जेजेपी ने जैसा प्रदर्शन किया है उससे जाहिर हो गया है की हरियाणा की जनता ने चैटाला परिवार की जंग में अजय-दुष्यंत चैटाला की पार्टी को समर्थन दिया है। एक साल से भी कम समय में जेजेपी ने हरियाणा की राजनीति में अच्छी खासी पकड़ बना ली है और इसका श्रेय निश्चित ही दुष्यंत चैटाला की छवि और मेहनत को दिया जायेगा।

आने वाले समय में जेजेपी हरियाणा में एक ताकत के रूप में उभरेगी इसमें कोई दो राय नहीं है। वहां कांग्रेस अभी ताकतवर है यह भी इस चुनाव में साबित हो गया है वह भी उस सूरत में जब कांग्रेस आलाकमान की कोई बड़ी भूमिका चुनाव प्रचार में नहीं दिखी। हरियाणा के नतीजों में कांग्रेस के बड़े नेता और आलाकमान के नजदीक मायने जाने वाले राजनदीप सिंह सुरजेवाला को भी हारने के कारण झटका लगा है। सुरजेवाला कुछ महीने पहले विधानसभा का उपचुनाव भी हार गए थी। हरियाणा में जेजेपी ने खुद को ऐसी स्थिति में ला दिया है कि उसकी मदद के बिना अब सरकार नहीं बन पाएगी।

हरियाणा में भाजपा और कांग्रेस दोनों में कई टिकटों का गलत वितरण हुआ जिससे पार्टी के नेता बागी हो गए। भाजपा ने दूसरी पार्टी के विवादित नेताओं को गले लगा लिया जिससे पार्टी के कार्यकर्ताओं में असंतोष फैला और उन्होंने चुनाव प्रचार में गंभीर भागीदारी नहीं की। मुख्यमंत्री मनोहरलाल ने पूरी ताकत अपने हाथ में रखी, मंत्री भी पूरे पांच साल खुद को उपेक्षित महसूस करते रहे। जाट, यादव और राजपूत वोटर्स पार्टी से छिटक गए जिसका उसे बहुत नुक्सान हुआ। भाजपा के घोषणा पत्र में आम आदमी के लिए कुछ नहीं था। प्रचार में केंद्रीय मुद्दों पर फोकस रखा, आम लोगों की समस्याओं को नहीं उठाया गया जिसका उसे नुक्सान हुआ। पार्टी नेताओं का अहंकार भी उसे नुक्सान कर गया।

उधर कांग्रेस ने हुड्डा को बहुत देर से चुनाव में उतारा। पहले लीडरशिप दी होती तो शायद नतीजे कुछ और होते। कांग्रेस में भी कई टिकटों का गलत वितरण हुआ जिससे कम से काम 10 सीटों पर उसे नुकसान झेलना पड़ा। कई बड़े नेता चुनाव के समय पार्टी छोडक़र दूसरे दलों में चले गए इससे माहौल पार्टी के खिलाफ बना। सबसे बड़ा नुकसान टीवी चैनेलों के सर्वों से हुआ जो बीजीपी को लगातार 70 से ज्यादा सीटें दिखाते रहे इससे जनता में भ्रम बना। इससे कांग्रेस वर्कर का मनोबल भी कमजोर हुआ। घोषणा पत्र का सही से प्रचार नहीं किया, नेताओं ने आम लोगों तक पहुंच नहीं बनाई। भाजपा के खिलाफ जनता के मूड को कांग्रेस पूरी ताकत से कैश नहीं कर पाई। जबकि जेजेपी ने कही ज़्यादा बेहतर तरीके से जनता में जाकर भाजपा विरोध को भुनाया।

महाराष्ट्र में भाजपा का सपना टूटा

महाराष्ट्र में भाजपा का सपना टूट गया। सपना था अपने बूते बहुमत ले लेना। लेकिन भाजपा 2014 के विधानसभा चुनावों के बराबर भी सीटें नहीं ले पाई। बल्कि करीब 20 सीटें पीछे रह गयी। भाजपा के लिए यह बहुत बड़ा झटका है। अब शिव सेना के सहारे के बिना भाजपा की सरकार नहीं बन सकती। शिव सेना ने नतीजे आते ही 50-50 की बात कहनी शुरू कर दी है। यानी ढाई-ढाई साल दोनों का मुख्यमंत्री। भाजपा के अनुमान ही नतीजों ने गलत साबित नहीं किये हैं, टीवी चैनलों के तमाम सर्वे भी फेल हो गए हैं। सामना में नतीजों के बाद शिव सेना ने भाजपा को चाल बदलने की भी नसीहत दी है।

सूबे के नतीजे बताते हैं कि वहां भाजपा और शिव सेना ने अपने साथियों यानी एक-दूसरे का ईमानदारी से साथ नहीं दिया है। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी और अपने बूते बहुमत चाहती थी और शिव सेना ऐसा होते हुए रोकना चाहती थी।

जिस कांग्रेस ने महाराष्ट्र में कुछ काम ही नहीं किया वो भी पिछली बार के मुकाबले एक सीट ज़्यादा जीत गयी पिछली बार से। इससे जाहिर होता है कि यदि वहां कांग्रेस ने खूब म्हणत की होती और एनसीपी-कांग्रेस इ ज़्यादा बेहतर तालमेल से चुनाव लड़ा होता तो नतीजे कुछ और भी हो सकते थे।

महाराष्ट्र में एक मौके पर यह भी विचार आया था कि शरद पवार की एनसीपी का कांग्रेस में विलय कर दिया जाये और एक ताकत के रूप में चुनाव शरद पवार के नेतृत्व में लड़ा जाए जो मराठों के मजबूत नेता हैं। यदि ऐसा हुआ होता तो कांग्रेस भाजपा को इस चुनाव में चैंकाने की स्थिति में होती। वैसे भविष्य में इस तरह के विलय से इंकार नहीं किया जा सकता।

महाराष्ट्र की सियासत में शरद पवार को चाणक्य कहा जाता है। पवार 38 साल की उम्र में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन गए और चार बार सीएम रहे। कांग्रेस से राजनीतिक पारी शुरू करने वाले शरद पवार ने 1999 में एनसीपी का गठन किया। परिवार का सबसे ज़्यादा राजनीतिक प्रभाव मराठवाड़ा इलाके के बारामती और ग्रामीण पुणे के आसपास के इलाकों में है। शरद पवार की राजनीतिक विरासत अब बेटी सुप्रिया सुले और भतीजे अजीत पवार संभाल रहे हैं। सुप्रिया राज्यसभा सदस्य हैं और अजीत पवार भी महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री रह चुके हैं और विधायक हैं।

महाराष्ट्र की सियासत बिना ठाकरे परिवार के पूरी नहीं होती। ठाकरे परिवार का कोई सदस्य पहली बार चुनाव मैदान में उतरा और जीता है। यही नहीं शिव सेना ने महारष्ट्र में अपनी राजनीतिक ताकत इस चुनाव में बढ़ा ली है। पिछली बार से ज्यादा सीटें उसे मिली हैं। बालासाहेब ठाकरे ने 1966 में शिवसेना का गठन किया था और उसके बाद वह महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ी ताकत रही है।

शिवसेना का राजनीतिक प्रभाव सबसे ज्यादा कोकंण और मुंबई और आसपास के इलाकों में है। बाला साहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत अब उनके बेटे उद्धव ठाकरे के हाथों में है और शिवसेना के अध्यक्ष हैं। भतीजे राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) बनाकर ताकत हासिल करने की कोशिश की लेकिन बात कुछ ज़्यादा जमी नहीं है लिहाजा ठाकरे परिवार की विरासत आदित्य ठाकरे चुनावी मैदान में उतरकर संभाल रहे हैं। वैसे महाराष्ट्र परिवारों के इर्दगिर्द घूमती रही है। ठाकरे और पवार परिवार के अलावा मुंडे परिवार, चव्हाण परिवार, भुजबल परिवार और नारायण राणे परिवार का दबदवा रहा है।

टीवी चैनलों के सर्वे फेल

इस बार महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव में टीवी चैनलों के सर्वों की पोल खुल गयी है। कमोवेश सभी सर्वे गलत साबित हुए हैं। महाराष्ट्र में यह सर्वे भाजपा -सेना को 200 पार और हरियाणा में 70 पार बता रहे थे। लेकिन नतीजे इसके विपरीत आये हैं। कुछ चैनलों ने तो महारष्ट्र में भाजपा को अपने बूते बहुमत दिखाया था जो बिलकुल गलत साबित हो गया है। अतीत में कई बार टीवी चैनलों के सर्वे धराशाही हुए हैं। महाराष्ट्र में अधिकतर सर्वे भाजपा को 150 प्लस बता रहे थे लेकिन वह 104 के आसपास सिमट गयी है। हरियाणा में तो कांग्रेस ने भाजपा को चैंका ही दिया है जहाँ भाजपा 41पर सिमट गयी।

हरियाणा में कौन कौन जीता

आदमपुर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस पार्टी के कुलदीप बिश्नोई ने 29471 वोटों से जीत दर्ज की और भारतीय जनता पार्टी की सोनाली फोगाट को हराया। अंबाला कैंट विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी के अनिल विज ने आज़ाद उम्मीदवार चित्रा सिरवारा को हराकर 20165 वोटों से जीत हासिल की। अंबाला शहर से भारतीय जनता पार्टी के असीम गोयल ने आज़ाद उम्मीदवार निर्मल सिंह मोहरा को हराकर 8952 वोटों से जीत दर्ज की। असंध से कांगे्रस के शमशेर सिंह गोगी 1703 वोटों से जीते और बहुजन समाज पार्टी के नरेंद्र सिंह को हराया। बाढडा से जन नायक जनता पार्टी की नैना सिंह 13704 वोटों से जीत दर्ज कर कांग्रेस के रणबीर सिंह महेंद्रा को हराया है। बड़ख़ल से भाजपा की सीमा त्रिखा ने कांग्रेस के विजय प्रताप सिंह को हराकर 2541 वोटों से जीत हासिल की है। बादली से कांग्रेस के कुलदीप वत्स ने भाजपा के ओम प्रकाश धनखड़ को हराकर 11245 वोटों से जीत दर्ज की है। कालका से कांग्रेस के प्रदीप चैधरी ने भाजपा की लतिका शर्मा को हराकर 5931 मतों से जीत दर्ज की। लाडवा से कांग्रेस उम्मीदवार मेवा सिंह ने 12637 वोटों से जीत हासिल की और भाजपा के पावन सैनी को हराया है। शाहबाद से जेजेपी के राम कर्ण ने भाजपा के कृष्ण कुमार को हराकर 37127 वाटों से जीत हासिल की है। थानेसर से बीजेपी के सुभाष सुधा ने कांग्रेस के अशोक कुमार अरोड़ा को हराया और 842 वाटों से जीते हैं। पिहोवा से भाजपा के संदीप सिंह ने कांग्रेस के मनदीप सिंह च_ा को हराकर 5314 वाटों से जीत दर्ज की है। कलायत से बीजेपी के कमलेश ढांडा ने कांग्रेस के जय प्रकाश को हराकर 8974 वोटों से जीते हैं। पानीपत ग्रामीण से भाजपा के महीपाल ढांडा ने 21961 से जीतकर जेेजेपी के देवेन्द्र कादियान को हराया है। पानीपत शहरी से भाजपा के प्रमोद कुमार विज ने कांग्रेस के संजय अग्रवाल को हराकर 39545 वाटों से जीतें हैं। गन्नौर से बीजेपी की निर्मल रानी ने कांग्रेस के कुलदीप शर्मा को हराकर 10280 वाटों से जीत हासिल की है। राई से भाजपा के मोहन लाल बदौली ने कांग्रेस के जयतीर्थ को हराकर 2662 वाटों से जीते हैं।

उन्होंने बताया कि खरखौदा से कांग्रेस के जयवीर सिंह ने जेजेपी के पवन कुमार को हराकर 1544 वाटों से जीत दर्ज की है। गोहाना से कांग्रेस के जगबीर सिंह मालिक ने लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी के राजकुमार सैनी को हराकर 4152 वाटों से जीत हासिल की है। जुलाना से जेजेपी के अमरजीत ढांडा ने बीजेपी के परमिंदर कुमार ढुल को हराकर 24193 वाटों से जीते हैं। जींद से भाजपा के कृष्ण लाल मिड्ढा ने जेजीपी के महाबीर गुप्ता को हराकर 12508 वोटों से जीतें हैं। नरवाना से जेजेपी के राम निवास ने बीजेपी की संतोष रानी को हराकर 30692 वोटों से जीत हासिल की है।

इसी प्रकार, डबवाली से कांग्रेस के अमित सिहाग ने भाजपा के आदित्य को हराकर 15647 वोटों से जीत दर्ज की है। सिरसा से हरियाणा लोकहित पार्टी के गोपाल कांडा ने निर्दलीय उम्मीदवार गोकुल सेतिया को 602 वोटों से हराकर जीत हासिल की। नारनौंद से जेजेपी के राम कुमार गौतम ने बीजेपी के कैप्टन अभिमन्यु को 12029 वोटों से हराकर जीत दर्ज की है। हांसी से बीजेपी के विनोद भ्याना जेजेपी के राहुल मक्कड़ को हराकर 22260 वोटों से जीते हैं। नारनौल से बीजेपी के ओमप्रकाश यादव जेजेपी के कमलेश सैनी को हराकर 14715 वोटों से जीते हैं। पृथला से निर्दलीय उम्मीदवार नयन पल कांग्रेस के रघुबीर तवेतिया को हराकर 16429 वोटों से जीते हैं। फरीदाबाद एनआईटी से कांग्रेस के नीरज शर्मा ने भाजपा के नागेंद्र बडाना को 3242 वोटों से हराकर जीत दर्ज की है। बल्लभगढ़ से मूल चन्द शर्मा ने कांग्रेस के आनंद कौशिक को हराकर 41713 मतों से जीते हैं। पूंडरी से निर्दलीय उम्मीदवार रणधीर सिंह गोलन ने कांग्रेस के अनिल कुमार को हराकर 12824 मतों से जीत दर्ज की है। घरोंडा से जेजेपी के हरविंदर कल्याण ने कांग्रेस के अनिल कुमार को हराकर 17402 वोटों से जीत हासिल की है। बरवाला से जेजेपी के जोगी राम सिहाग ने भाजपा के सुरिंदर पुनिया को हराकर 3908 वोटों से जीत दर्ज की है। लोहारू से भाजपा के जयप्रकाश दलाल 17677 वोटों से जीते और कांग्रेस के सोमवीर सिंह हारे हैं। दादरी से निर्दलीय उम्मीदवार सोमबीर सिंह ने जेजेपी के सतपाल सांगवान को 14272 वोटों से हराकर जीत दर्ज की है। गढ़ी सांपला किलोई से कांग्रेस के भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भाजपा के सतीश नांदल को हराकर 58312 वोटों से जीत हासिल की है।

उन्होंने बताया कि फिरोजपुर झीरका से कांग्रेस के मामन खान ने भाजपा के नसीम अहमद को 37004 मतों से हराकर जीत दर्ज की है। हिसार से भाजपा के डॉ कमल गुप्ता ने कांग्रेस के रामनिवास रारा को हराकर 15832 वोटों से जीते हैं। कालांवाली से कांग्रेस के शीशपाल ने भाजपा के राजेन्द्र सिंह दिसोजदा को हराकर 19243 वोटों से जीत दर्ज की है। खरखौदा से कांग्रेस के जयवीर सिंह ने जेजेपी के पवन कुमार को हराकर 1544 वोटों से जीत हासिल की है। नूंह से कांग्रेस के आफताब अहमद ने भाजपा के जाकिर हुसैन को हराकर 4038 मतों से जीत दर्ज की। रानिया से निर्दलीय रणजीत सिंह ने हरियाणा लोकहित पार्टी के गोबिंद कांडा को हराकर 19431 मतों स जीते हैं। समालखा से कांग्रेस के धर्म सिंह छोकर ने भाजपा के शशिकांत कौशिक को हराकर 14942 मतों से जीते हैं। सोहना से भाजपा के संजय सिंह ने जेजेपी के रोहताश सिंह को हराकर 12453 वोटों से जीते हैं। सोनीपत से कांग्रेस के सुरेन्द्र पंवार ने भाजपा की कविता जैन को हराकर 32878 मतों से जीते हैं। तिगांव से भाजपा के राजेश नागर ने कांग्रेस के ललित नागर को हराकर 33841 मतों से जीत दर्ज की है। टोहाना से जेजेपी के देवेन्द्र सिंह ने भाजपा के सुभाष बराला को हराकर 52302 मतों से जीत दर्ज की है। तोशाम से कांग्रेस की किरण चैधरी ने भाजपा के शशि रंजन परमार ने हराकर 18059 मतों से जीत दर्ज की है। नारायणगढ़ से कांग्रेस की शैली ने भाजपा के सुरेंद्र सिंह को हराकर 20600 वोटों से जीत दर्ज की है। मुलाना से कांग्रेस के वरूण चैधरी भाजपा के राजबीर सिंह को हराकर 1688 मतों से जीतें। साढौरा से कांग्रेस की रेणू बाला ने भाजपा के बलवंत सिंह को हराकर 17020 वोटों से जीत दर्ज की। रादौर से कांग्रेस के बिशल लाल ने भाजपा के डॉ. पवन सैनी को हराकर 2541 वोटों से जीत हासिल की। गुहला से जेजेपी के ईश्वर सिंह ने कांग्रेस के चैधरी दीलू राम को हराकर 4574 वोटों से जीत दर्ज की। कैथल से भाजपा के लील राम ने कांग्रेस के रणदीप सिंह सुरजेवाला को हराकर 1246 वोटों से जीत दर्ज की। नीलोखेड़ी से आजाद उम्मीदवार धर्मपाल गोंदर भाजपा के भगवान दास को हराकर 2222 वोटों से जीते।

करनाल से भाजपा के मनोहर लाल ने कांग्रेस के त्रिलोचन सिंह को हराकर 45188 वोटों से जीत दर्ज की। इसराना से कांग्रेस के बलबीर सिंह ने भाजपा के कृष्ण लाल पंवार को हराकर 20015 वोटों से जीत दर्ज की। बरौदा से कांग्रेस के श्री हरी कृष्ण हुड्डा ने भाजपा के योगेश्वर दत को हराकर 4840 वोटों से जीत दर्ज की। सफीदों से कांग्रेस के सुभाष गांगोली ने भाजपा के बच्चन सिंह आर्य को हराकर 3658 वोटों से दर्ज की। फतेहाबाद से भाजपा के दूरा राम ने जेजेपी के डॉ. वीरेंद्र सिवाच को हराकर 3300 वोटों से जीत दर्ज की। रतिया से भाजपा के लक्ष्मण नापा ने कांग्रेस के जरनैल सिंह को हराकर 1216 वोटों से जीत हासिल की है। ऐलनाबाद से इंडियन नेशनल लोकदल के अभय चैटाला ने भाजपा के पवल बेनीवाल को हराकर 11922 वोटों से जीत दर्ज की। उकलाना से जेजेपी के अनूप धानक ने भाजपा के आशा खेदर को हराकर 23693 वोटों से जीत दर्ज की। नलवा से भाजपा के राणबीर गंगवा ने कांग्रेस के रणधीर पणिहार को हराकर 9672 वोटों से जीत दर्ज की। भिवानी से भाजपा के घनश्यामदास सर्राफ ने जेजेपी के डॉ. शिव शंकर भारद्वाज को हराकर 27884 वोटों से जीत हासिल की।

बवानी खेड़ा से भाजपा के बिशम्बर सिंह ने कांग्रेस के रामकिशन फौजी को हराकर 10895 वोटों से जीत दर्ज की। झज्जर से कांग्रेस की गीता भुक्कल ने भाजपा के राकेश कुमार को हराकर 14999 वोटों से जीत हासिल की। बेरी से कांग्रेस के रघुवीर सिंह कादियान ने भाजपा के विक्रम कादियान को हराकर 12952 वोटों से जीत दर्ज की। नांगल चैधरी से भाजपा के अभय सिंह यादव जेजेपी के मूलाराम को हराकर 20615 वोटों से जीते। पटौदी से भाजपा के सत्यप्रकाश ने आजाद उम्मीदवार नरेंद्र सिंह को हराकर 36579 वोटों से जीते। बादशाहपुर से आजाद उम्मीदवार राकेश दौलताबाद ने भाजपा के मनीष यादव को हराकर 10186 वोटों से जीत दर्ज की। गुडग़ांव से भाजपा के सुधीर सिंगला ने आजाद उम्मीदवार मोहित ग्रोवर को हराकर 33315 वोटों से जीत दर्ज की। फरीदाबाद से भाजपा के नरेंद्र गुप्ता ने कांग्रेस के लख्खन कुमार सिंगला को हराकर 21713 वोटों से जीत हासिल की।

पंचकूला से भाजपा के ज्ञान चंद गुप्ता ने कांग्रेस के चंद्र मोहन को हराकर 5633 वोटों से जीत दर्ज की। महम से आजाद उम्मीदवार बलराज कुंडु ने कांग्रेस के आनंद सिंह को हराकर 12047 वोटों से जीत हासिल की। रोहतक से कांग्रेस के भारत भूषण बतरा ने भाजपा के मनीष कुमार ग्रोवर को हराकर 2735 वोटों से जीत दर्ज की। कलानौर से कांग्रेस के शकुंतला खटक ने रामअवतार वाल्मिीक को हराकर 10624 वोटों से जीत दर्ज की। बहादुरगढ़ से कांग्रेस के राजेंद्र सिंह जून ने भाजपा के नरेश कौशिक को हराकर 15491 वोटों से जीत हासिल की। रेवाड़ी से कांग्रेस के चिरंजीव राव ने भाजपा के सुनील कुमार को हराकर 1317 वोटों से जीत दर्ज की। पुन्हाना से कांग्रेस के मोहम्मद इलियास ने आजाद उम्मीदवार रहिश खान को हराकर 816 वोटों से जीत दर्ज की। पलवल से भाजपा के दीपक मंगला ने कांग्रेस के करण सिंह को हराकर 28296 वोटों से जीत दर्ज की है। इन्द्री से भाजपा के राम कुमार ने आजाद उम्मीदवार रमेश कांबोज को हराकर 7431 वोटों जीत दर्ज की है। बावल से भाजपा के डॉ. बनवारी लाल ने कांग्रेस के डॉ. एम एल रांगा को हराकर 32245 वोटों से जीत दर्ज की। कोसली से भाजपा के लक्ष्मण सिंह यादव ने कांग्रेस के यदुवेंद्र सिंह को हराकर 38624 वोटों से जीत दर्ज की है। हथीन से भाजपा के प्रवीन डागर ने कांग्रेस के मोहम्मद इसरायल को हराकर 2887 वोटों से जीत दर्ज की है। होडल से भाजपा के जगदीश नायर ने कांग्रेस के उदयभान को हराकर 3387 वोटों से जीत दर्ज की है। तोशाम से कांग्रेस की किरण चैधरी ने भाजपा के शशी रंजन परमार को हराकर 18059 वोटों से जीत दर्ज की है। बडख़ल से भाजपा की सीमा त्रीखा ने कांग्रेस के विजय प्रताप सिंह को हराकर 2545 वोटों से जीत दर्ज की है।