बेबसी की दास्तान

दार्जिलिंग से दिल्ली तक फैला है मानव तस्करी का जाल

‘तहलका’ की खोज से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल से लेकर नेपाल तक के बच्चों और किशोरों की देश के विभिन्न हिस्सों में कैसे तस्करी की जाती है। समाज की इस बेहद कड़वी सच्चाई को देखकर रूह काँप जाती है। सरकारों और प्रशासन की नाक तले नाबालिग़ों की खुली ख़रीद-फ़रोख़्त का इतना संगठित और विस्तृत धंधा अचम्भित करने वाला है। इस धंधे में बेबस नाबालिग़ों को पशुओं की तरह इस्तेमाल किया जाता है। उन बेचारों को तो यह भी पता नहीं होता कि जिस काम के बहाने चंद रुपये का लालच देकर उन्हें ले जाया जा रहा है, उसमें उनकी जान भी जा सकती है। लेकिन सामाजिक और आर्थिक बेबसी के शिकार ये लोग इस जाल में फँसकर मूक दास बन जाते हैं। तहलका एसआईटी की विस्तृत रिपोर्ट :-

‘यह मौत का कारण बन सकता है? यह निंदनीय है और जोखिम से भरा है। लेकिन फिर भी मैं नशीली दवाओं के परीक्षण के लिए पाँच नशा करने वालों की व्यवस्था कर सकता हूँ। दरअसल वे किसी काम के नहीं हैं और यहाँ तक कि उनके परिवारों ने उन्हें छोड़ भी दिया है। लेकिन मैं उन्हें यह नहीं बताऊँगा कि उनका इस्तेमाल दिल्ली में दवा परीक्षण के लिए किया जाएगा। इसके बजाय मैं उन्हें बताऊँगा कि उन्हें दिल्ली में 20,000 रुपये प्रति माह के तनख़्वाह वाली नौकरी मिलेगी। साथ ही आपके और मेरे बीच इन पाँच लोगों की आपूर्ति के लिए कोई काग़ज़ी कार्रवाई नहीं होगी। …और उनकी आपूर्ति के बाद न तो मैं तुम्हें जानता हूँ, न ही तुम मुझे जानते हो। चूँकि यह एक ग़ैर-क़ानूनी कार्य है, इसलिए मुझे इस कार्य के लिए पर्याप्त राशि की आवश्यकता है। आपको पाँच लोगों के लिए 2,00,000 रुपये देने होंगे।’ यह एक संजय मंडल नाम के व्यक्ति के शब्द हैं। संजय सिलीगुड़ी, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल का एक मानव तस्कर है।

संजय ने ‘तहलका’ को बताया कि वह दिल्ली में एक दवा फर्म द्वारा ड्रग ट्रायल से गुज़रने के लिए पाँच बेरोज़गार नशेबाज़ों का प्रबन्ध कैसे करेगा, जिन्हें उनके परिवारों ने छोड़ दिया है। संजय के मुताबिक, यह सब उन पाँच लोगों की सहमति के बिना होगा, जिन्हें पता भी नहीं होगा कि उन पर ड्रग ट्रायल किया जाएगा। उन्हें बस इतना पता होगा कि उन्हें दिल्ली में 20,000 रुपये प्रतिमाह की नौकरी मिलेगी। संजय का कहना है- ‘नौकरी का लालच उन्हें दिल्ली जाने के लिए मजबूर करेगा।’

संजय मंडल पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग स्थित बाग़डोगरा के रहने वाला है। वह एक टूर और ट्रैवल एजेंसी में कैब ड्राइवर के रूप में काम करता है। ‘तहलका’ रिपोर्टर ने ख़ुद को एक ग्राहक के रूप में पेश किया, जिन्होंने दिल्ली में दवा परीक्षण और कई अन्य कार्यों के लिए कई नाबालिग़ों और आदमियों की ज़रूरत संजय को बतायी। रिपोर्टर ने संजय से सिलीगुड़ी में मिलकर मुलाक़ात की। यह मुलाक़ात एक अन्य टैक्सी चालक (तस्कर भी) गोपाल के ज़रिये हुई। संजय मंडल से मिलने पर ‘तहलका’ रिपोर्टर ने संजय से कहा कि हमें दिल्ली के लिए निर्माण और घरेलू काम समेत विभिन्न कामों के लिए मज़दूरों की ज़रूरत है। उससे कहा गया कि अधिकांश लोग, जिसमें लड़कियाँ भी शामिल होंगी; कम उम्र के होने चाहिए।

मंडल ने हमें बताया कि अभी तक उसने दिल्ली को कोई मज़दूर नहीं दिया है। लेकिन गंगटोक (सिक्किम) में उसके द्वारा सप्लाई किये गये छ: लडक़े एक होटल में काम करते हैं। संजय ने यह भी ख़ुलासा किया कि उसने अपने गृह क्षेत्र सिलीगुड़ी में श्रमिकों की आपूर्ति की थी।

रिपोर्टर : अभी तक दिल्ली में दिया आपने?
संजय : नहीं, दिल्ली में नहीं दिया। इधर अभी गंगटोक मैं छ: लडक़ा कर रहा है।
रिपोर्टर : आपने दिया है?
संजय : होटल में काम कर रहा है।
रिपोर्टर : होटल में, और कहाँ दिया है?
संजय : और इधर लोकल में रहता है।

मुलाक़ात के दौरान हमने संजय से कहा कि हमें दिल्ली में घरेलू काम के लिए नाबालिग़ लड़कियों की ज़रूरत है। संजय मान गया और हमसे कहा कि वह हमें 12, 14 और 15 साल की चार नाबालिग़ लड़कियाँ मुहैया कराएगा।
रिपोर्टर : लड़कियों की क्या उम्र बतायी आपने?
संजय : वो सर! 14 साल, 12 साल, 15 साल।
रिपोर्टर : कितनी लड़कियाँ हैं, जो हमारे साथ जाएँगी?
संजय : चार।
रिपोर्टर : जो दिल्ली जाएँगी न?
संजय : हाँ।
रिपोर्टर : जिनको तुम भेजोगे?
संजय : हाँ।
रिपोर्टर : घर का काम तो कर लेगी न, जैसा कहेंगे?
संजय : भारी काम तो नहीं? उम्र छोटा है। घर के काम, जैसे- झाड़ू है, पोंछा है।
रिपोर्टर : हर जगह लड़कियों को आप छोड़ आते हो या वो ही लेकर जाते हैं?
संजय : कहीं लोकल हुआ, तो छोड़ आते हैं। गंगटोक हुआ, तो जैसे मेरे पास इनोवा है। मैं ही लेकर चला जाता हूँ।
रिपोर्टर : हाँ, तो बस फिर आप ही लेकर जाना।

इसके बाद संजय मंडल ने हमें बताया कि वह नाबालिग़ कामगारों की आपूर्ति के लिए कितना चार्ज करेगा।
रिपोर्टर : आपका अभी तक का रेट क्या है, एक बच्चे का?
संजय : मेरा क्या महीने का 2,000 रुपये दीजिएगा।
रिपोर्टर : हर महीने 2,000?
संजय : जी।
रिपोर्टर : जैसे हमने 10 बच्चे लिए, तो महीने के 20,000 रुपये और बच्चों की तनख़्वाह (वेतन) अलग?

संजय अब बच्चों को काम पर भेजने में शामिल जोखिम के बारे में बताता है, ताकि वह सेवाओं के लिए माँग की जाने वाली राशि का औचित्य साबित कर सके।
संजय : ये सब काम के लिए भेजेंगे, ये सब पूरा रिस्क (जोखिम) मेरे पर रहता है। एक भी बच्चे के साथ कुछ हो गया तो मेरा…।
रिपोर्टर : नहीं-नहीं। …अभी तक आपने जो बच्चे भेजे हैं, वो सारा जोखिम आप पर रहा है?
संजय : हाँ।
रिपोर्टर : उनके साथ कुछ हुआ तो नहीं?
संजय : नहीं।

संजय ने अब हमारे लिए नाबालिग़ों को दिल्ली भेजने की अपनी योजना का ख़ुलासा किया। उसने कहा कि वह पहले लडक़ों को हमारे साथ दिल्ली भेजेगा। लडक़ों को नये परिवेश में ढलने के बाद ही लड़कियों को भेजा जाएगा।
संजय : ये आपको जो लेडीज था, चार जुगाड़ हुआ ठीक है। लेकिन हमारा नौ लडक़ा भी जा रहा है पहले लॉट में…, ठीक है।
रिपोर्टर : हमारे साथ?
संजय : आप लेकर जाएँगे साथ में?
रिपोर्टर : नहीं-नहीं; आप किसको भेजने की बात कर रहे हो? हमें या किसी और को? हमें देने की बात कर रहे हो?
संजय : जी।
रिपोर्टर : ठीक है बताएँ?
संजय : नौ लडक़ा जो जा रहा है, पहले लॉट (खेप) में। इनको 10 दिन काम करने दीजिए। वहाँ का हालत-सिचुएशन बताएगा, तो चार लेडीज और उनके साथ चार-पाँच लडक़ा और जाएगा।
रिपोर्टर : और बच्चे कितने जा रहे हैं?
संजय : अभी बच्चे जो जा रहे हैं, नौ बच्चे जा रहे हैं।
रिपोर्टर : कितनी उम्र के?
संजय : 20 के ऊपर नहीं हैं। सारा 20 के नीचे के हैं। और सबसे कम 14 साल।
रिपोर्टर : हमें दिखवा दोगे एक बार?
संजय : अभी दो-चार लडक़ा साइट पर काम कर रहा है। देखना चाहे, तो देख सकता है।
रिपोर्टर : अभी हमें सबसे कम उम्र के बच्चे जो दे रहे हैं आप, वो 14 साल के हैं?
संजय : जी।
रिपोर्टर : कितने हैं, वो 14 साल के?
संजय : दो लडक़े हैं। बाक़ी सब उसी के हैं, 14, 15, 18…20 के, ऊपर का नहीं है कोई।

हमें निर्माण और घरेलू काम के लिए लड़कियों और लडक़ों के रूप में नाबालिग़ बच्चे देने की बात करने के बाद संजय मंडल ने अब हमें बताया कि वह दिल्ली में ड्रग ट्रायल के लिए मज़दूरों का प्रबंधन कैसे करेगा।
रिपोर्टर : दवा (फार्मास्युटिकल) कम्पनी ने ट्रायल करना है। दवा कम्पनी को उसके लिए मज़दूर चाहिए।
संजय : जोखिम होता है।
रिपोर्टर : जोखिम तो होता है, पूरा होता है।
संजय : मौत तो नहीं हो जाती?
रिपोर्टर : अब वो तो दवा कम्पनी बताएगी। हम कैसे कह
सकते हैं।
संजय : इसके लिए भी आदमी देना पड़ेगा?
रिपोर्टर : आदमी-औरत चाहिए। जो दवाइयाँ दवा कम्पनी बनाती है, उसके लिए भी मज़दूर चाहिए। दवा का ट्रायल करना है।
संजय : ऐसा जानकर कोई जाना चाहेगा? जैसे आप मेरे को बताते हो। उसे बताकर काम नहीं किया जा सकता।
रिपोर्टर : अगर नहीं बताकर करना चाहते हैं, तो नहीं बताकर करते हैं?
संजय : जो भी है, आपके मेरे बीच में साफ़ होना चाहिए।
रिपोर्टर : मैंने तो क्लियर (स्पष्ट) कर दिया।
संजय : एक दो के साथ बोलोगे, तो दो चार लडक़ा राज़ी न हो तो? उसमें उसको दूसरा काम बोलकर कर सकते हैं। इस टाइप में लडक़ा हैं थोड़ा आवारा टाइप। घर से कोई लेना-देना नहीं है। है, ऐसा लडक़ा भी है न! गार्जियन (अभिभावक) उसको भाव नहीं देता है। थोड़ा आवारा टाइप का लडक़ा है। सर! ऐसा लडक़ा कोई काम का नहीं है। कहीं कोई काम में लग जाएँगे वो ही ठीक है…, इस प्रकार का लडक़ा को थोड़ा पैसे का लालाच-वालच देने से काम हो सकता है। …ये बात सीक्रेट ही रहे सर!
रिपोर्टर : तुम्हारे-हमारे बीच में रहे।
संजय : ये बहुत बड़ा कांड (स्कैंडल) है।
रिपोर्टर : हम नहीं बताएँगे।

क्योंकि इससे मौत भी हो सकती है। इसके बावजूद उन्होंने ड्रग ट्रायल के लिए हमें मज़दूर भी मुहैया कराने पर सहमति जतायी; लेकिन कुछ पूर्व शर्तों के साथ। संजय ने ख़ुलासा किया कि वह पाँच युवा लडक़ों को जानता है, जो नौकरी के लिए नशे के आदी हैं।
संजय : इसके लिए पाँच लडक़ा मिल जाएगा। ऐसा लडक़ा चलेगा, जो नशेड़ी (ड्रग एडिक्ट) हो?
रिपोर्टर : चल जाएगा।
संजय : ऐसा लडक़ा बहुत है। जो सच बात है, थोड़ा ड्रग एडिक्ट है। उन लोगों को थोड़ा पैसे का लालच देने से कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाएगा।
रिपोर्टर : ठीक है।

यह पूछे जाने पर कि वह पाँच नशा करने वालों को क्या नौकरी का प्रस्ताव देगा? संजय ने कहा कि वह उन्हें दिल्ली के एक बार में नौकरी की पेशकश करेगा।
रिपोर्टर : तो उसे क्या काम बताओगे?
संजय : बार-बूर का काम।
रिपोर्टर : बार का?
संजय : बार में दारू देने का।