बुनियाद तो बुनियादी ही बदल दे, बशर्ते…!

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फोटो:विकास कुमार
फोटो:विकास कुमार

वृंदावन का नाम लेते ही स्वाभाविक तौर पर उत्तर प्रदेश में बसा राधा-कृष्ण वाले वृंदावन का ही नजारा सामने होता है. लेकिन एक वृंदावन बिहार में भी है.  पश्चिमी चंपारण के चनपटिया ब्लॉक में. यह वृंदावन भी कुछ मंदिरों की वजह से खास है. शिक्षा के वे मंदिर जो आजादी के पहले ही एक नायाब प्रयोग के तौर पर यहां बने थे. महात्मा गांधी की प्रेरणा से दो दर्जन से अधिक बुनियादी विद्यालय यहां खोले गए थे. 1917 के बाद 1939 में जब गांधी दोबारा बिहार आये थे तो इसी इलाके में पांच दिनों तक रुके थे. बुनियादी विद्यालय यानी ज्ञान और कर्म,  श्रम और विद्यार्जन के बीच के भेद को मिटानेवाला संस्थान. ऐसा स्कूल, जहां बच्चों को किताबी शिक्षा के साथ ही बढ़ईगिरी, लुहारगिरी, किसानी, सब्जी खेती, डेयरी आदि विषयों का भी प्रशिक्षण मिले. जहां बच्चे किताबी पढ़ाई के बाद अपना हुनर भी विकसित करते रहें, जो कमाई हो उससे वे अपने स्लेट-पेंसिल-कॉपी खरीद सकें.

1935 में वर्धा में हुए कांग्रेस सम्मेलन में जब इस तरह के स्कूल की परिकल्पना उभरी थी तो बिहार के लोगों ने इसका तहे दिल से स्वागत किया था. बिहार के ग्रामीणों ने भू और श्रमदान करके ऐसे स्कूल खुलवाए. चंपारण के वृंदावन में ऐसे 28 स्कूल खुले और पूरे बिहार में 391 ऐसे बुनियादी विद्यालय अब भी मौजूद हैं. ज्ञान, कर्म और श्रम का सामंजस्य बिठाने के लिए खोले जा रहे इन स्कूलों के लिए दी गयी अच्छी-खासी जमीनें भी हैं,  लेकिन स्कूल बेहाल हैं.

इन स्कूलों के जरिये ज्ञान के साथ ही स्वावलंबन को बढ़ाने के उद्देश्य 60 के दशक में ही दफन होने शुरू हो गये थे. अब ये विद्यालय भी एक सामान्य विद्यालय भर बनकर रह गये हैं. नाम के आगे पीछे अब भी बुनियादी जरूर दिखता है लेकिन न उस तरह की शिक्षा देनेवाले या उसमें रुचि रखनेवाले शिक्षक हैं और न व्यवस्था. जमीनों पर अवैध कब्जा हो रहा है. इन बुनियादी विद्यालयों वाले गांव में ही सरकार ने सामान्य प्राथमिक, माध्यमिक विद्यालय खोल दिये हैं, जहां स्लेट की जगह प्लेट उठाए बच्चों की फौज जुटती है.

चंपारण के सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता पंकज कहते हैं, ‘उम्मीदें अब भी मरी नहीं है. वृंदावन इलाके के एक गांव में आज भी एक बुनियादी विद्यालय का संचालन गांव वाले करवा रहे हैं, जहां 900 बच्चे पढ़ते हैं. गांव वाले ही चंदा जुटाकर चलाते हैं. उस स्कूल में हेडमास्टर भी है और आठ शिक्षक भी. गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, नई दिल्ली से भी वित्तीय मदद मिलती है.’

पंकज जिस एक स्कूल का हवाला देते हैं, वह एक उम्मीद की लौ की तरह जला हुआ है. लेकिन उसकी एक सीमा है. बिहार के सब गांव इतने संपन्न नहीं कि खुद के बूते इस तरह के स्कूल चला लें. पंकज कहते हैं, ‘सपना तो यह था कि बाद में बुनियादी विश्वविद्यालय भी स्थापित होगा. ठोस खाका भी तैयार हुआ था लेकिन अब तो स्वेच्छा से जो जमीनें बुनियादी विद्यालय के लिए ही दान में मिली थी, उन जमीनों पर कहीं नवोदय विद्यालय खुल चुका है तो कहीं सामान्य विद्यालय और कहीं कुछ और.’

प्राथमिक शिक्षा की स्थिति सुधारने के लिए तमाम किस्म की कवायदों में लगी बिहार सरकार के सामने बुनियादी विद्यालयों को जिंदा करके शिक्षा को पटरी पर लाने का एक बेहतर विकल्प है. संयोग से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसमें रुचि भी दिखायी थी. लेकिन 2010 से शुरु हुई यह पहल बैठकों, सेमिनारों और फाइलों से आगे नहीं बढ़ पा रही. गांधीवादी शिक्षा के दर्शन पर आधारित कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए मई 2009 में नई तालीम केंद्र की स्थापना हुई थी. 2010  में दिल्ली में नई तालीम की बैठक हुई. अगली बैठक 2011 में बिहार में हुई. देश भर से 500 के करीब प्रतिनिधि आये. नीतीश भी इस बैठक में पहुंचे. प्रयोग के तौर पर कुछ बुनियादी विद्यालयों को फिर से शुरू करने की सलाह दी गई. उत्साहित नीतीश ने सभी 391 विद्यालयों को वापस पटरी पर लाने का ऐलान किया. मुख्यमंत्री के आदेश से तीन वरिष्ठ आइएएस अधिकारियों अंजनी कुमार सिंह, अमरजीत सिन्हा और व्यासजी की कमिटी बनी कि वे आज की स्थिति और भावी योजनाओं की रिपोर्ट दिसंबर 2012 तक दें. दिसंबर 2012 तक तो नहीं, लेकिन इससे दो-तीन माह के विलंब से एक रिपोर्ट तैयार हो गई. जो रिपोर्ट आई है वह घालमेल के पुलिंदे जैसी है. कमिटी की रिपोर्ट में सभी 391 बुनियादी विद्यालयों को सुदृढ़ करने, सभी जिलों में एक बुनियादी विद्यालय को मॉडल स्कूल के रूप में विकसित करने, बुनियादी विद्यालयों के शिक्षकों का मानदेय अन्य सरकारी विद्यालयों के बराबर करने, बुनियादी विद्यालय की डिग्री को सरकारी मान्यता देने, विद्यालयों को आवासीय बनाने, शिल्पी एवं कलाकारों को भी शिक्षक बनाने, बुनियादी शिक्षा बोर्ड का पुनर्गठन करने आदि जैसी बातें कही गई हैं.

एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के निदेशक डीएम दिवाकर का मानना है कि बुनियादी शिक्षा बोर्ड को अलग करने की जरूरत है. वे यह भी मानते हैं कि शिक्षकों की बहाली में प्रमुखता से ध्यान दिया जाए तो तभी बात बनेगी. वे कहते हैं, ‘फिलहाल जो स्कूल चल रहे हैं, वे माइग्रेटरी बर्ड पैदा कर रहे हैं. जो गांव छोड़ दे, वह होशियार, जो जिला और राज्य छोड़ दे वह थोड़ा और ज्यादा होशियार और जो देश ही छोड़ दे, वह सबसे काबिल माना जाता है. बुनियादी विद्यालयों को ऐसी शिक्षा प्रणाली की परछाईं से भी बचाकर रखना होगा.’ उनके मुताबिक शिक्षकों की बहाली में सिर्फ शैक्षणिक योग्यता को आधार बनाने से बात नहीं बनेगी. इन विद्यालयों में जो शिक्षक बहाल हों, उनके प्रशिक्षण के पहले केरल के ज्ञानशाला, गुजरात विद्यापीठ, उदयपुर के सेवा मंदिर आदि में जाकर देख लेने की जरूरत है. उससे सहूलियत होगी. बुनियादी विद्यालय कैसे विकसित होंगे, होंगे भी या नहीं, यह देखा जाना अभी बाकी है.

तीन सदस्यीय कमिटी में शामिल रहे आइएएस अधिकारी व फिलवक्त मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह कहते हैं, ‘हमारी कोशिश होगी कि जल्द से जल्द इस पर काम आगे बढ़े और हम इन विद्यालयों में आज की जरूरत के अनुरूप कौशल को बढ़ायेंगे. मोबाइल, कंप्यूटर, आइटी आदि का भी प्रशिक्षण देंगे.’ कमिटी के दूसरे सदस्य व्यासजी कहते हैं, ‘आज के समय के अनुसार तो शिक्षण-प्रशिक्षण तो हो ही लेकिन सबसे पहली जरूरत यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चे के बीच जो हीन भावना आयी है, उसे दूर किया जाए. योग्य शिक्षकों की बहाली जरूरी होगी, जिनमें एक नैतिकता हो और समाज जिनका मान-सम्मान करने को तैयार हो.’ उनका मानना है कि जहां बुनियादी विद्यालय चलेंगे, वहां अगर दूसरे स्कूल भी रहेंगे तो फिर बुनियादी विद्यालय हाशिये की जातियों और समुदायों का स्कूल बनकर रह जाएगा, इसे भी ध्यान में रखने की जरूरत है.

सबके अपने सुझाव हैं, अपनी सहमति-असहमति है. सामाजिक कार्यकर्ता पंकज कहते हैं, ‘बुनियादी विद्यालय केंद्र और राज्य सरकार के बीच फंस गया है. केंद्र सरकार ने 300 करोड़ रुपये इसके नाम पर देकर कह दिया कि यह आपकी जिम्मेवारी है, राज्य सरकार कहती है कि उनकी जिम्मेवारी. नीयत और नीति साफ नहीं लेकिन देर-सबेर ही सही, इसे चलाना तो होगा ही, क्योंकि केंद्र से पैसा मिल चुका है और जो जमीन इन विद्यालयों के नाम पर है, उसके एग्रीमेंट में यह साफ लिखा हुआ है कि अगर बुनियादी विद्यालय नहीं चल सकेंगे तो जमीनें रैयतों को वापस मिल जाएगी. अब अगर राज्य सरकार नहीं चला सकेगी तो उन जमीनों को वापस लेने की मुहिम भी शुरू होगी.’

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