बिल्किस बानो ने जीती न्याय, इज्ज़त और समानता की जंग

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एक हिंदुस्तानी महिला है बिल्किस बानो। ज्य़ादातर हिंदुस्तानियों ने उसका नाम पहली बार  इस सदी की शुरूआत में सुना। जब तीन मार्च 2002 को उसके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ। शुरू में उसकी कहानी सुनने को भी लोग तैयार नहीं थे। क्योंकि वह आदिम जन समुदाय की थी। लेकिन वह 19 साल की एक हिंदुस्तानी थी। उसने लडऩा जारी रखा। उसके परिवार के 14 लोग मार दिए गए। दो साल का बच्चा मारा गया।

उसकी आवाज़ इंदौर, मुंबई, वडोदरा, लखनऊ, दिल्ली आदि में न केवल सुनी गई बल्कि  उसे जन समर्थन भी मिला। दंगा, बलात्कार और हत्याओं में वह न्याय के लिए वह दर-दर भटकती रही। उसकेपरिवार ने उसे सहारा दिया। गुजरात सरकार ने उसे सहारा देने का आश्वासन दिया। उसके लिए वह राजी नहीं हुई। लोकतंत्र में राज्य के नागरिकों की रक्षा की जिम्मेदारी सरकार की होती है।

लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में क्या ऐसा हो रहा है? गुजरात सरकार ने उसे रु पए पांच लाख मात्र 2017 में बतौर मुआवजा देने चाहे। उसने नहीं लिया। राज्य अपने  नागरिकों की चिंता और देख-रेख में भी नाकाम रहा। सुप्रीमकोर्ट ने इस आधार पर एक सरकार को पकड़ा। गुजरात सरकार से कहा कि वे बिल्किस को रु पए 50 लाख दे। उसे उसकी सुरक्षा की पूरी व्यवस्था करने को कहा। रहने के लिए मकान और नौकरी के लिए भी व्यवस्था करने को कहा।

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को निर्देश दिया है कि उसे 50 लाख रु पए दिए जाएं। उसे नौकरी दी जाए। क्योंकि उसकी रक्षा में उसने कोताही बरती, उसे सुरक्षित जगह रहने के लिए नहीं दी। उसे न्याय की लड़ाई लडऩे में सहयोग नहीं किया। उसे राष्ट्रीय मानवधिकार आयोग ने सहयोग दिया। उसकी तकलीफ सुनी। एपेक्स कोर्ट ओर देश के ढेरों नागरिकों का समर्थक उसकी मदद में आगे आया।

अपनी जि़ंदगी में पहली बार उसने गुजरात के एक कस्बे देवगढ़ बरिया में मतदान (23 अप्रैल को) किया। उसने कहा, देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में मेरी आस्था है। मतदान प्रक्रिया में मेरा भरोसा है। मैं सुप्रीम कोर्ट की ऋणी हूं। बिल्किस बानो की जीत आम नागरिक की जीत है।