बासी कढ़ी में उफान

पंजाब में ड्रग्स कारोबार का जिन्न फिर आया बाहर, बिक्रमजीत सिंह मजीठिया पर मामला दर्ज

पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में ड्रग्स कारोबार का जिन्न बोतल से फिर बाहर आ गया है। राज्य में कांग्रेस की चरणजीत सिंह चन्नी सरकार की हरी झण्डी मिलने के बाद पुलिस ने शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के विधायक और पूर्व राजस्व मंत्री बिक्रमजीत सिंह मजीठिया पर मोहाली में एनडीपीएस एक्ट की संगीन धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है। पंजाब पुलिस के आग्रह पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मजीठिया के ख़िलाफ़ लुक आउट सर्कुलर भी जारी कर दिया है। इसके हिसाब से वह देश छोड़कर बाहर नहीं जा सकते। उनकी देर सबेर गिरफ़्तारी भी हो सकती है। यह बासी कढ़ी में उफान जैसा है, जो चुनाव के बाद ख़त्म हो जाएगा।

मजीठिया विधायक और पूर्व मंत्री होने के साथ पार्टी के वरिष्ठ नेता भी हैं। राज्य में शिअद सरकार के दौरान उनकी तूती बोलती थी और ड्रग्स कारोबार से जुड़े होने के आरोप उसी दौर के हैं। उनकी बहन शिअद सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर शिअद अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल से ब्याही हुई हैं। इस नाते सुखबीर बादल मजीठिया के जीजा हैं। शिअद मजीठिया के ख़िलाफ़ एनडीपीएस एक्ट के दर्ज मामले को राजनीतिक दुश्मनी के नज़रिये से देख रहा है। पूरी पार्टी मजीठिया के साथ खड़ी नजर आ रही है; लेकिन कांग्रेस के पास अब ड्रग्स मामले की तह तक जाने और 6,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा के धन्धे की परतें खोलना मजबूरी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू, तो विधानसभा में खुले तौर पर मजीठिया के ठीक सामने खड़े होकर उन्हें नशे का सौदागर बता चुके हैं। सिद्धू ने राज्य में गुरु ग्रन्थ साहिब की बेअदबी मामलों की साज़िश रचने और आरोपियों को संरक्षण देने वालों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की माँग के अलावा पंजाब में ड्रग्स माफिया को बेनक़ाब करने को पार्टी के एजेंडे में रखा है। कैप्टन से राजनीतिक अदावत होने के बाद वे इन दोनों मुद्दों पर सार्वजनिक सभाओं में उठाते रहे हैं और दोनों मामलों में नरम रूख़ अपनाने का आरोप भी लगाते रहे हैं। अब चन्नी सरकार दोनों ही मामलों में काफ़ी सक्रिय दिख रही है।

एंटी ड्रग्स स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) की पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में दाख़िल स्टेट्स रिपोर्ट के आधार पर मजीठिया की एनडीपीएस एक्ट-1985 के तहत प्राथमिकी दर्ज हुई है। इसके अनुसार, मजीठिया नशा तस्करों को संरक्षण देते रहे हैं और उनके ख़िलाफ़ ठोस सुबूत हैं। सतप्रीत सिंह उर्फ़ सत्ता, परमिंदर सिंह उर्फ़ पिंदी और जगजीत सिंह चहल के बयानों के आधार पर स्पष्ट माना जा सकता है कि मंत्री रहते हुए मजीठिया ने ड्रग्स माफिया को राज्य में पनपने दिया।

एडीजीपी हरप्रीत सिंह सिद्धू की स्टेट्स रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि ड्रग्स कारोबार से मिला पैसा मजीठिया ने पार्टी फंड के लिए लिया। चहल के बयान अनुसार, वर्ष 2007 और 2012 के दौरान 35 लाख रुपये की राशि कई क़िस्तों में उसने मजीठिया को दी। वर्ष 2013 के दौरान पुलिस नशा कारोबार के मामले में तत्कालीन डीएसपी जगदीश सिंह भोला को गिरफ़्तार किया था। भोला ने कहा था कि पंजाब में नशा कारोबार के पीछे बिक्रमजीत सिंह मजीठिया ही हैं। वह इस माफिया को चला रहे हैं। भोला के इस बयान के बाद सरकार की काफ़ी आलोचना हुई थी; लेकिन तब मजीठिया सरकार में ताकतवर मंत्री के तौर पर जाने जाते थे, इसलिए उनका बाल भी बाँका नहीं हुआ। भोला को मोहाली की विशेष सीबीआई अदालत ने सजा सुनायी थी।

मजीठिया पर सत्ता में रहने के दौरान ड्रग्स माफिया को पनाह, सुरक्षा और वाहन मुहैया कराने के आरोप लगे, वहीं हज़ारों करोड़ के रेत खनन में बेनामी बड़ी हिस्सेदारी के आरोप भी हैं। सबसे बड़ा सवाल यह कि मजीठिया के ख़िलाफ़ यह कार्रवाई चुनाव से ठीक पहले क्यों हुई है? स्टेट्स रिपोर्ट तो वर्ष 2018 की है, तीन साल से ज़्यादा हो गये, इसके लिए इतना इंतज़ार क्यों किया गया? आख़िर कैप्टन सरकार ने कार्रवाई क्यों नहीं की? इसके पीछे भी कोई राज है क्या? जानकारों की राय में स्टेट्स रिपोर्ट बयानों पर आधारित है। उनके अनुसार मामला तो दर्ज हो सकता है। सम्भव है उस आधार पर गिरफ़्तारी भी हो जाए; लेकिन अदालत में बिना ठोस साक्ष्य के यह ज़्यादा मज़बूत नहीं दिखता। इसका सुबूत जाँच ब्यूरो के दो प्रमुखों का बदला जाना है। कैप्टन ने इसे भाँप लिया था, इसलिए सिद्धू की माँग को उन्होंने ज़्यादा महत्त्व नहीं दिया था। पंजाब की राजनीति के महारथी माने जाने वाले कैप्टन के मुक़ाबले चन्नी अनुभवहीन कहे जा सकते हैं। पार्टी में बढ़ते दबाव के चलते उनके पास कार्रवाई करने के अलावा कोई चारा नहीं था।

कैप्टन अमरिंदर सिंह मजीठिया पर एनडीपीएस की धाराओं के तहत प्राथमिकी को कमज़ोर बता चुके हैं। उनकी राय में अदालत में यह मामला ज़्यादा टिकने वाला नहीं है और चुनाव में कांग्रेस को इससे कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है। यह सच है कि पंजाब में हज़ारों करोड़ रुपये का नशा कारोबार बिना राजनीतिक संरक्षण के नहीं हुआ; लेकिन राज़ का ख़ुलासा आज तक नहीं हो सका। लगभग एक दशक से पंजाब में ड्रग्स कारोबार का धन्धा करने वाले कई तस्कर पकड़े गये; लेकिन संरक्षण देने वाले ने अपने को बचाये रखा है या उसे बचाया जा रहा है। वर्ष 2017 के चुनाव में कांग्रेस नशा कारोबार जड़ से ख़त्म करने, पूरे माफिया तंत्र को नेस्तानाबूद करने, गुरु ग्रन्थ साहिब की बेअदबी की साज़िश रचने वाले और राज्य में हर घर में रोज़गार देने जैसे वादों पर ही सत्ता नसीब हुई। लेकिन हुआ क्या? नशे का कारोबार आज भी जारी है। बेअमदबी मामलों की जाँच चल रही है। साज़िशकर्ता अभी बेनक़ाब हैं, तो फिर कांग्रेस किस मुँह से वोट माँगेगी? चुनाव से पहले दोनों ही मामलों में कुछ ठोस होने की सम्भावना न के बराबर है। ऐसा न होने पर कांग्रेस मतदाताओं का सीधा सामना नहीं कर सकेगी। दोनों ही मामलों में शिअद की भूमिका मानी जा रही है; लेकिन मौज़ूदा परिप्रेक्ष्य में उसे इससे ज़्यादा नुक़सान होता नहीं दिख रहा है। रही बात पंजाब लोक कांग्रेस और भाजपा के गठजोड़ की, तो उसे इसका फ़ायदा बिल्कुल नहीं मिलेगा। राज्य में प्रमुख विपक्षी पार्टी आम आदमी पार्टी के पास वादे करने को बहुत कुछ है। वह वादा कर सकती है कि सत्ता में आने पर दोनों ही मामलों की तह तक जाकर संरक्षण देने, साज़िश रचने और आरोपियों को सलाख़ों के पीछे पहुँचाएगी। पर सवाल यह कि उसके इन वादों पर भरोसा कौन करेगा? कैप्टन अमरिंदर ने वादा किया; लेकिन जब तक सत्ता में रहे पूरा नहीं कर सके। बेअदबी मामलों में बादल परिवार को फँसाने के आरोप तक लगे। वह मामला उच्च न्यायालय में टिका नहीं, जिससे कैप्टन सरकार की ख़ूब किरकिरी हुई। इसके बाद से सिद्धू पूरी तरह से सक्रिय हो गये। दोनों में 36 का आँकड़ा हो गया, जो अब तक जारी है। अब तो कैप्टन अपनी अलग पार्टी बना चुके हैं। लेकिन वह चुनाव में अप्रत्याशित नतीजे दिखा सकते हैं, इसकी सम्भावना कम ही है।

34 पेज की स्टेट्स रिपोर्ट और 49 पेज की प्राथमिकी दर्ज होने के बाद मजीठिया पर गिरफ़्तारी की तलवार लटक गयी है। उन्हें देश से बाहर भागने या छिपने की कोई ज़रूरत नहीं है। ऐसा करना उनके लिए मुसीबत पैदा करने जैसा होगा। वह जल्द ही सामने आएँगे; क्योंकि उन्हें पता है कि उनके ख़िलाफ़ कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। अगर ऐसी बात होती, तो कैप्टन अमरिंदर सिंह स्टेट्स रिपोर्ट दाख़िल होने के बाद उन पर कार्रवाई करा देते।

यही बात शिअद नेता कह रहे हैं, चुनाव से पहले कांग्रेस इस मुद्दे को राजनीतिक फ़ायदा के लिए उठा रही है। अगर मामले में दम होता और मजीठिया की सीधी भागादारी के ठोस सुबूत होते, तो अब तक वह सलाख़ों के पीछे होते और यह कांग्रेस के लिए तुरुत का इक्का साबित होता। इसे राजनीति से हटकर देखें, तो पंजाब में ड्रग्स माफिया ख़त्म होना चाहिए। लेकिन इसके लिए जिस राजनीतिक इच्छा शक्ति की ज़रूरत है, वह किसी पार्टी के पास दिख नहीं रही है।