बाज़ार और राजनीति में अस्तित्व तलाशती हिंन्दी

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भाषा का सवाल इन दिनों बेहद पेंचीदा हो गया है। इसका सबसे बड़ा कारण बाजार और राजनीति का गठजोड़ है। देखने में यह मामूली बात लग सकती है। गंभीरतासे विचार किया जाए तो पता चलेगा कि किस तरह पिछले कुछ दशकों में भाषा पर जबरदस्त हमले हुए हैं। ये हमले सबसे ज्य़ादा हिन्दी पर हुए और इसका परिणामअन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों को भी भुगतना पड़ा। प्रभाकर श्रोत्रिय ने इसी भाषा के मुद्दे पर कभी कहा था कि,’हिन्दी ही तमाम भारतीय भाषाओं और बोलियोंका कवच है। जिस दिन यह खतरे में पड़ेगी उस दिन अन्य भारतीय भाषाओं का बचना भी मुश्किल हो जाएगा।

आज़ादी के बाद 70 साल से ज्य़ादा बीत गए पर भाषा का मसला वहीं का वहीं है। कभी इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया। कई बार विचार करने के बाद भीइस पर कोई अंतिम नतीजा नहीं निकला। क्योंकि इसका समर्थन से ज्य़ादा विरोध हुआ। इस संघर्ष का सबसे बड़ा फायदा अंग्रेज़ी को मिला। वह फलने-फूलने लगी।इसी का नतीजा हुआ कि उसकी जड़ें गहरे तक जम गई और अन्य भारतीय भाषाओं की जड़े सूखने लगी।

आज़ादी के बाद जो अंग्रेज़ी महज कुछ वर्षों के लिए स्वीकृत की गई थी, आज वह भाषा पूरे देश में बोली और उपयोग में लाई जाती है। सरकारी कामकाज की यहएक अनिवार्य भाषा है जिसका इस देश में चार सौ साल पहले तक कोई अस्तित्व नहीं था। जबकि इस बीच हिन्दी और भारतीय भाषाओं की स्थिति लगातार बद सेबदतर होती रही। इसके बावजूद कभी इस पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया। इसका कारण यह है कि  इस पर जब भी बात हुई तो कुछ प्रदेशों ने हिन्दी का पुरज़ोरविरोध किया। उनके अपने राजनीतिक कारण और तर्क थे। लेकिन जब जब विरोध हुआ तब इसका मामला ठंडे बस्ते में चला गया और दब गया। नई शिक्षा नीति केअंतर्गत अभी त्रिभाषा सूत्र के मुद्दे पर तमिलनाडु में प्रदर्शन और विरोध की घटनाएं हुईं, वह इसका सबसे ताजा उदाहरण है।

एक पश्चिमी चिंतक ने कहा था कि ‘अगर हमें भाषा और आज़ादी में किसी एक को चुनना पड़े तो हम भाषा को चुनेंगे। हमारे पास अपनी भाषा होगी तो आज़ादी हमहासिल कर ही लेंगे। पर अगर भाषा नहीं रही तो आज़ादी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।Ó बिना भाषा के आज़ादी भी दरअसल गुलामी का ही दूसरा रूप है।दूसरी तमाम चीजों के विलुप्त होने की तरह भाषा भी धीरे धीरे विलुप्त हो रही है। दुनिया भर में इसके असंय उदाहरण हैं। जो भाषा उपयोग में नहीं लाई जाएगीउसका न तो विकास संभव है न ही वजूद। फि र वह उपेक्षित हो जाती है और धीरे धीरे इतिहास का हिस्सा बन जाती है। अब अगर भाषा नहीं बची तो क्या देश औरक्या संस्कृति!

यह साम्राज्य विस्तार का बिलकुल नया चेहरा है जब गुलाम बनाने के लिए सैनिकों और हथियारों की ज़रूरत नहीं पड़ती। सारा काम महीन तरीके से होता है। पताही नहीं चलता कि हम साथ किसका दे रहे हैं, खुद का या दुश्मन का। भाषा पर किया गया यह हमला जड़ों पर चोट करता है।

जहाँ तक हिन्दी का प्रश्न है तो आमतौर पर लोग कहते हैं कि हिन्दी को कोई खतरा नहीं है।  एक हद तक यह सही भी है। बाज़ार ने अपना हित साधने के लिए इसकापूरा इस्तेमाल करना शुरु कर दिया है। उसे अपना माल बेचना है तो ग्राहक की भाषा में ही समझाना होगा। यह बाजार की मज़बूरी भी है। पर इससे भाषा का भलाकभी नहीं होगा। आज विज्ञापन, सीरियल, सिनेमा और तकनीक में हिन्दी का इस्तेमाल बहुत हो रहा है। यह  सुखद है पर इससे हिन्दी सिर्फ बाजार का एकउपकरण बन कर रह गई है। लोग गाते हिन्दी में हैं पर जो देखकर गाते हैं वह रोमन में लिखा होता है। भाषण हिन्दी में देते हैं पर लिखा वह रोमन में रहता है। इस परकाम करने वाले अधिकांश लोग न तो हिन्दी को जानते हैं न समझते हैं।

मुझे आश्चर्य तब हुआ जब एक बार ट्रेन में मैंने एक लड़के को जो कि नागालैंड का रहने वाला था, उसे फिल्मी गानें गाते देखा। वह मोबाइल से गाने सुनता और उसेउसी लय में दोहराता। मैंने उन गानों के अर्थ और भाषा के बारे में उससे पूछा तो उसने साफ कह दिया कि मुझे कुछ नहीं पता। उसे हिन्दी बिल्कुल नहीं आती थी।बस धुन अच्छी लगी तो सुन सुन कर गाने की कोशिश करता। देखने में यह गर्व करने का विषय हो सकता है, पर यह सोच कर मन सिहर जाता है कि ऐसी भाषाकिस काम की जब उसे बोला जाए पर महसूस नहीं किया जाए। यह एक बड़ी समस्या है जो बताती है कि कैसे किसी मनुष्य को धीरे धीरे कमज़ोर और अपाहिजबनाया जाता है। यह बड़े पैमाने पर की जा रही साजिश है जो भाषा के साथ साथ एक पूरी सयता और संस्कृति को बेसिर पैर करने की जिद्द का नतीजा है।

आज हिन्दी की स्थिति यह है कि इसके कई तह बन गए हैं। सरकारी काम काज की हिंदी अलग है और बोलचाल की हिन्दी अलग। दोनों के बीच बड़ा अंतर है।सरकारी काम काज में प्रयोग की जाने वाली हिन्दी का हश्र यह है कि उसे समझने के लिए शब्दकोश पलटना पड़ जाए। ऐसी लच्छेदार तत्सम युक्त भारी भरकमभाषा कोई सीखे भी तो कैसे! इससे दूरी का एक बड़ा कारण इसकी जटिलता है जो दरअसल निर्मित की गई है। भाषा को नदी की तरह बहती हुई होनी चाहिए।अगर वह ठहर जाती है तो गंदला होने के बाद धीरे धीरे सूख जाती है। संस्कृत इसका सबसे नया उदाहरण है। इतिहास देखें तो पता चलेगा कि यह एक समय में बड़ेपैमाने पर इस्तेमाल की जाने वाली भाषा थी। फि र धीरे धीरे आमजन से यह दूर होती गई और आज वह कुछ ग्रंथों और पाठ्यक्रमों में सिमट कर रह गई है। इसकाकारण भाषाई शुद्धता का आग्रह है। यह किसी भी भाषा के लिए एक बड़ा खतरा है। इसी शुद्धतावादी नज़रिए का शिकार हिन्दी हो रही है। इसकी दूरी अन्य भारतीयभाषाओं और बोलियों से लगातार बढ़ रही है। यही कारण है कि इसकी समृद्धि के तमाम रास्ते बंद पड़ गए हैं।

दूसरी अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों से इसका छत्तीस का आँकड़ा है। जबकि होना यह चाहिए था कि दोनों के बीच कोई एक सेतु होता जो मैत्रीपूर्ण संबंध जोड़सकता। यह भाषाई और शाब्दिक आदान प्रदान से ही संभव हो सकता था। पर यह बहुत पहले ठहर गया। नतीजा हुआ कि हिन्दी के शब्दकोश में अंग्रेज़ी के शब्दज्य़ादा हैं और अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों के शब्द बहुत कम। यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। अपनी भाषाओं और बोलियों से बनाई गई यही दूरी इसकीजड़ों को खोखला कर रही है।

अब समय आ गया है कि इस पर फि र से विचार किया जाए और उन कमियों को दूर किया जाए जिसके कारण भाषाएँ एक दूसरे की दुश्मन बन गई है। भाषा जबतक आमजन के बीच रहती है वह लगातार बदलती है। नए-नए शब्द उसमें जुड़ेंगे तो कुछ न कुछ हटेगा भी। यह एक चलनी की तरह चलने वाली प्रक्रिया है जोकार्यालयों और संस्थानों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। यह देश भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का देश है। जब तक एक दूसरे के प्रति आदर और समान काभाव नहीं रहेगा तब तक टकराव की स्थिति लगातार बनेगी। यह भाषा के स्तर भी होना जरूरी है।

भाषा किसी भी मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी है। यह भाषा ही है जो अपने साथ एक पूरी सयता,साहित्य और संस्कृति को समेटे हुए मनुष्य का साथ देती है। उसकेबिना किसी परंपरा की कल्पना असंभव है। वह भाषा ही है जो मनुष्य की रचनात्मक क्षमता को प्रकट होने के अवसर देती है। यह जितना अपनी भाषा में सहजतापूर्वक संभव है उतना सीखी हुई या अर्जित की हुई भाषा में नहीं। सीखी हुई भाषाओं की अपनी सीमा है। वह उतना ही साथ देती है जितना कि अर्जित की गई।

मातृभाषा के साथ ऐसी बात नहीं है। उसके साथ अथाह स्रोत है। भाषा पर किए गए तमाम ज्ञात और अज्ञात हमले दरअसल उसी मातृभाषा पर किए जाते हैं जोसोचने समझने और चिंतन की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। यह पूंजीवाद का एक नया चेहरा है जब वह सीधे मस्तिष्क पर आघात कर रहा है। उसीयोजना का हिस्सा है वर्चस्व की लड़ाई। जब हिन्दी के साथ की सभी भाषाएँ एक दूसरे से दूर हो रही हैं और संघर्ष कर रही हैं तब अंग्रेज़ी के लिए वे अवसर ही बढ़ारही हैं। यह भयावह भविष्य का सूचक है। कोई भी भाषा तभी तक साथ देती है जब तक कि उसे बोलने वाले उसका साथ दें। नहीं तो अंत में विलुप्त होने के लिए तोअभिशप्त वह है ही।