बांझ

0
549

नमस्कार,

मी राधा बोलतोय,

सुना कि मेरी कहानी में तुम लोग इन्टरेस्ट दिखाता है। चलो हमारे जैसू, आदमी तो इसी में खुस्स कि कोई तो हमको पूछता! पर नई हमको डर भी लगता, कहीं तुम हमको चोर बोला तो! भला मानुस बनने के चक्कर में सब सच बोल के टंगड़ी तुड़ाने जैसा हालात हो गए तो! पर मैं तुमको पहलीच बता दूँ कि मैं चोर नक्को! इसी सरत पर सुनना है तुमको तो सुनो नई तो अपना रास्ता लो! वैसे सच्ची बोलूूँ मेरे मन में भी हौल सा उठ रहा है जो न सुनाऊूँ तो भीतर ही भीतर मरज बन जाएगा! अब तुमही लोकां सुन कर बताना कि मैं सही या गलत! जो गलत हुई तो जो सजा काले चोर की सो मेरी…

कोई आठ महीने पहले की तो बात होगी, जब मेरे घर की घंटी बार-बार कूूँ शोर किए जा रई। मेरे घर मल्ल्ब मेरी मालकिन के घर की। मेरी मालकिन एदकम गुस्से वाली! बस भड़की तो दो घंटे तक बडबडाते रहना उसकी आदत! जो पिघली तो एदकम मक्खन! अब वो तो घर में रहती नक्को तो मैं ही उस टैम पे घर की मालकिन! कपड़े से हाथ पोंछ के जब तक दरवाजे तक जाती तीन चार बार घंटी बज गई। गुस्सा तो इतनी तेज आया मेरे कू कि सर तोड़ दूं घंटी बजाने वाले का पर फिर अपने लिए कोई इत्ता धीरज खोकर कालबेल बजा रिया, यही सोचके सरमा गई मैं तो! दौड़ के गई दरवाजे पे तो एक लड़की खडी दीखी मुझको! इत्ता बड़ा पेट लेके मेरे दरवाजे काएकू आई होगी ये मोड़ी… सोचती ही रह गई मैं तो! उसकी आवाज ने मेरेको धरती पे पटका ‘बाई कोई काम मिलेगा?’ काम? उसकी हालत देेखके तो मैं लेजाके बिस्तर पे पटक देेती उसे और ये काम मांगने कू आई है? मेरेको हैरानी भी हुई और सच बोलूूँ तो तरस भी आया! मालकिन काम देेगी नहीं पर एक बार बात करने में क्या हरज! मैं अंदर आने कू बोलके मुड़ गई।

अंदर आते ही तो $फैल कर पड़ गई मोड़ी! ‘पानी पिला दोगी जरा’ लो काम माँगने आई और गले ही पड गई! मरती क्या न करती, अब अन्दर बुलाया है तो पानी भी देेना ही होता! तो ले आई पानी। पानी पीकर थोड़ा साँस लेके जरा मुस्काई लड़की तो सच कहूूँ मेरेको भी प्यार आ गया उस पे! पर काम काएकू माँगती? काम करेगी कैसे? मेरे मन के अंदर भी तो सवाल पैदा होई रए थे! तभी वो लड़की अपने आप ही बोली ‘आप सोच रहे होंगे कि इस हालत में काम कैसे करेगी! पर बहन काम नहीं करूँगी तो मेरे बाकी बच्चों का क्या होगा?’ लो भला! इत्ती सी लड़की और बोल रई है ‘बाकी बच्चों का क्या होगा?’ इत्ती सा$फ जबान और इत्ती सुंदर लड़की! कहाँ से तो आई होगी! मेरे तो मन में खलबली सी मच गई।

एक गिलास पानी और लाई तो गटगट पी गई वो! बोली ‘बहन दो बच्चे और हैं मेरे। खुद जानती नहीं कि बीस की हूूँ या 22 की पर इतना याद है कि जब रामेसर के साथ आई थी तो 15 की थी। रामेसर घर के पास ही रहता था। सिनेमा का गाना गाता था और बड़ा ही भला लगता था।’ बोलते बोलते भी लड़की की आँख पनीली हो गई। इत्ता तो समझती हूूँ मैं भी! ये सब मरद पहले भले ही लगते हैं बादको सब बदल जाते हैं। मेरा ही मरद हाड तोड़ देता है मेरा जब्ब भी मन करता है साले का!

मैं पूछी ही फिर ‘तो भागके आई तू उसके साथ! सादी बनाया कि नई! री तू लगती तो भले घर की छोकरी है। फिर?’ आँख में आँसू भरे बोली वो ‘हाँ घर भला ही था मेरा और रामेसर भी भला ही था। उम्र ऐसी कि लगता था शरीर ही सच है और कुछ नहीं! रोज प्रेम से गले लगाता तो माँ-बाप के छूटने का दु:ख भी न रहता। दो महीने में ही पेट में पहला बच्चा आ गया। होश आता उससे पहले ही माँ बनने वाली हो गई मैं! रामेसर के सिर से प्रेम का भूत जल्दी ही उतर गया। रोज कहता कि बच्चा गिरा दे, पर मेरी हिम्मत नहीं हुई। पहले ही एक गलती कर चुकी थी, अब दूसरी नहीं कर सकती थी। बस उस दिन पहली बार रामेसर ने हाथ उठाया मुझ पर।’

लो भला! 15 बरस की छोकरी और इत्ती हिम्मत! और उस रमेसरे पर तो जी भर के गुस्सा आया मेरेकू। माँ बनने वाली छोकरी को कोई मारता है! अब क्या बताऊँ इधर 30 बरस की हो गई मैं, पर कोशिश करते करते भी माँ नई बन पाई। मेरेकू पता है सारी खोली वाली क्या बोलती मेरेकू। मेरा तो मर्द मिठाई बाँटता पूरी खोली को जो मैं बन पाती माँ! ‘काम क्या करता तेरा मरद’ पूछी मैं। बोलो, पूछना बनता कि नई!

‘काम तो करता था कुछ रामेसर, पर क्या, ये मुझे कभी पता नहीं चला। मेरी ख़ूबसूरती ही मेरी दुश्मन थी। रामेसर घर के बाहर ताला लगाकर जाता और शाम होने पर ही खोलता! पर रामेसर जब भी लौटता मैं खुश हो जाती क्योंकि जो भी हो वो मेरा मर्द था ना! उसे देखते ही मेरा चेहरा खिल उठता। रामेसर का शक बढ़ता ही गया। उसे लगता कि शायद मैं उसके जाने के बाद ताला खुलवाकर किसी से मिलती हूूँ। तभी तो सारा दिन बंद रहने पर भी मैं खुश ही नजर आती।’

सच पूछो, हैरान कर गई मेरेकू ये छोकरी! ऐसा कैसे? कोई ऐसे मर्द को भी प्यार करने कू सकता! पर चल्लो कोई नई। मेरा भी तो मर्द कूट डालता है मेरेको। किर भी जब प्यार से देखता है तो बंजर जमीन में भी फूल खिलते कि नई बोलो! आलथी.पालथी मारके बैठ गई मैं तो अब! मालकिन दो गाली देेगी तो सुनना माँगता पर इस छोकरी की बात सुने बिना तो मैं उठेगी नई!

बार-बार तो पानी माँगती ये! दो बिस्कुट भी ले आई मैं अब। पूछो भला, लड़की की हालत देेखके भी न पूछूूँ उसे! फिर बोलना शुरू किया उसने तो मेरेको लगा कि मेरेसे ज्य़ादा तो उसे है जल्दी अपनी बात सुनाने की! ‘जब बच्चा हुआ तो रामेसर कुछ समय के लिए फिर मिल गया मुझे। बच्चे को प्यार भी करता पर ध्यान से देखता और पूछता कि मुझसे ही मिलता है ना, किसी और से तो नहीं। न जाने क्यों, रामेसर के मन में शक बढ़ता ही जा रहा था। मैं सच कहती हूूँ दीदी, मैंने रामेसर को ही अपना सब कुछ माना था…पर लो रो पड़ी छोकरी। इत्ता प्यार आया मुझे, गले लगा बैठी उसे मैं। लो भला, मालकिन आ गई न तो पता चलेगा मेरेकू भी। पर जो हो, अब छोड़ तो नई सकती मैं लडकी कू इस तरह!

‘मार-पीट बढती ही गई और धीरे-धीरे लम्बे समय तक वो घर से दूर रहने लगा। कभी लौटता तो बस मेरे शरीर के लिए। इसी में दूसरी बच्ची भी आ गई। कमजोर और एक पैर से लाचार! मैं तड़प गई अपनी बच्ची को देखकर। पर रामेसर नहीं पिघला। दो साल से शरीर को घसीटती मेरी लड़की को मेरा बड़ा बेटा सम्भाल रहा है। रामेसर उस बच्ची के बाद घर छोड़कर चला ही गया था पर फिर भी मुझे उसका इंतजार रहता था।’

लो भला, ऐसी लड़की के कारण ही मर्दों के हाथ खुलते होंगे! मैं तो एक बार पीट दी थी मेरे मर्द को! तब से हिम्मत कम हो गई उसकी! फिस से हँसी छूट गई मेरी। कैसा तो मुँह उतर गया था उसका। पर फिर भी तो हाथ उसी का चलता है। मैं तो एक ही बार हिम्मत कर पाई बस! पर ये छोकरी! बड़ा तरस आया उस पर। पर बार-बार चुप काएकू हो जाती ये! किर पूछी मैं ‘माँ-बाप के पास क्यों नई गई तू?’

पापा क्लर्क हैं मेरे बैंक में! पढती थी दसवीं में मैं भी! दूूसरी बहन भी है। अब तो उसकी भी शादी हो गई होगी! हिम्मत नहीं हुई मेरी। दो महीने पहले लौटा रामेसर और फिर ये तीसरा बच्चा। पता नहीं अब बचूूँगी कि नहीं। मेरे बच्चों का क्या होगा, यही सोचकर घर-घर काम माँगने निकली हूूँ। देखो, दीदी क्या होगा।

लो मेरेको दीदी बोल गई। तीसरे बच्चे की होने वाली माँ और मैं बच्चे की आस में बैठी बाँझ! तुम न मानो पर गाँव भर में शोर है कि मेरा मरद अब दूसरी शादी बनाना माँगता। मैं ऐसे डरी बैठी कि जैसे कबूतर बिल्ली को देखके डरता। बस एक बच्चा होता मेरा तो गाँव भर में इज्जत हो पाती मेरी! और इसे देखो, तीसरा बच्चा पेट में लेके घूमती और कोई पूछने वाला नई इसको!  ‘अब कहाँ है ये रमेसरा? पूछी मैं फिर!

पिछले महीने रामेसर तो नहीं आया बस कुछ फोटो के साथ एक चिट्ठी आई जिसमे लिखा था कि रामेसर ने दूसरी शादी कर ली है। कोई पता नहीं, बस तब से काम की तलाश में भटक रही हूूँ। इस हालत में कोई काम भी तो नहीं देता दीदी।

कित्तू उदास कर गई मेरेको ये लड़की।  मैडम से पूछके देखूूँ क्या पता पिघल ही जाएँ! दीवार से पीठ लगाके बैठी ये तो सोईच गई! मेरेकू तो दिल पे चोट लगा गई। बस डिसाइड कर बैठी मैं, मैडम से बात करके देखूूँ। कुछ काम करेगी तो बच्चों को पाल लेगी छोकरी!

सच्च बोलूूँ तो मन में आस भी घर कर गई मेरे! पूछके देखूूँ क्या करेगी बच्चे का! अब तुम लोकां को लगेगा कि इसी वास्ते मैं छोकरी की कहानी सुनती! पूछो भला, मेरेकू पेल्ले थोड़ी ही पता! अब तीन तीन बच्चां के साथ कहाँ जाएगी छोकरी! पूछी मैं फिर… ‘अब इस बच्चे का क्या करना होता!’ कुछ नहीं दीदी, एक अनाथालय में बात की है, इसे वहीं छोड़ दूूँगी। पहले वालों के लिए ही रोटी-पानी नहीं, फिर इसे कैसे पालूूँगी।

बस यई से मेरे मन में आस आ गई। जो मैं इससे बात करूँ, और बच्चा ये मेरेकू दे दे तो! वो मैडम बोलती है न कई बार, कान्हा को देवकी ने जनम दिया, जसोदा ने पाला! तो मैं भी जसोदा हो सकूँ, मैं कोई उससे कम हूूँ! पर उसके लिए तो इसका ठीक रहना माँगता। मैं बोली, पूछती हूूँ मैडम कू कोई काम दे सकेगी तो करना माँगता। बाद्कू लफड़ा नईं कि काम नई होता मेरेसे!

लड़की हाँ-ना बोलती, उससे पहले ही मैं मैडम को फोन कर दी! लो भला, मैडम किसी की सूनी है, जो अब सुनेगी, सा$फ मना कर दिया। मेरी तो आस हीच्च तोड़ दी! पर तभी मेरेकू ख्याल आया कि ये मैडम लोग वईच्च करेगी, जो मैं मना करेगी। अब इत्ते साल हो गए मेरेकू काम करते, इत्ता तो मैं जानती ही सा$फ-सा$फ! फिर से फोन की ‘मैडम, उसको निकाल रई हूूँ बाहर! इत्ता पेट लेके काम किसू करेगी! हमको क्या, जैसे मर्जी पाले अपने बच्चां कू!’ मैडम फोन पेइ पिघल गई ‘अच्छा रुक, मैं घर पहुंच रही हूूँ, बस पाँच मिनट में!’ पूछो भला, कैसे कते होंगे वो पांच मिनट! बार-बार हौल उठता, मन में, जो मना कर देगी मैडम तो मेरा क्या होने का! घंटी बजी, तो मैं ऐसे दौड़ी जैसे मुर्दे को जान आ गई! लो भला, मैडम मेरेकू क्यों ऐसे देख रई!

वैसे मैडम भली औरत है! जब मेरा मर्द पहली बार मेरेकू मारके निकाल दिया था तो येइच्च रखी थी मेरेकू! इलाज भी कराई और दवा भी दी थी! लगता है मेरे मन की बात पकड़ गई वो! बोली ‘रख लेए कुछ हल्का-फुल्का काम कर लेगी, उसके बच्चे पल जाएँगे!’ ठंड पड़ गई मेरे दिल में! भगवान तुम्हें बनाए रखें बीबीजी! हट, अब मैडम कैसे बोलूूँ! बीबीजी, मालकिन ही अच्छा लगता है…मैडम थोड़ेई …

लड़की में जान पड़ गई। जो मेरेकू दूध-केला मिलता, सब मैं उस लड़की कू खिला देती। मेरा बच्चा पाल रई ना! तो खिलाना तो माँगता न! मर्द मेरा मानने को तैयारइच्च नईं कि किसी और का बच्चा! काहे का किसी और का बच्चा! आदमी की ही जात है न! कोई बिल्ली का बच्चा तो न ला रई मैं! मान जाएगा जब देखेगा बच्चा कू! बड़ी-बड़ी आँख खोलके जब बप्पा कएगा तो अपने आप मानेगा… फिस्स से हंसी निकल गई मेरी! पर तुम लोग जानता आदमी का दिल चूहे जैसा तो होता! सो मेरे मन कू भी $िफकर लग गई, जो ये छोकरी मेरेकू बच्चा न दी तो! काम में तो छोकरी हाड तोडके मेहनत करती! इत्ती कोमल और हर काम कू तैयार! पर एदकम नफरत से भरी छोकरी! अपनी कोई फिकर नई। मैं पूछती कि तू मर गई तो बच्चों का क्या होना होता! जहरीली छोकरी बोलती ‘मर जाएँगे वो भी! नहीं तो अनाथालय वाले ले जाएंगे! बाप के बिना पल रहे तो माँ के बिना नहीं पल सकते दीदी!’

सच में गुस्सा तो इत्ता आता मेरेकू कि दो झापड़ लगादूं पर फिर सोचती कि छोकरी ने इत्ता सहा भी तो! अब तो दिन बस आही रए थे! मेरी गोद में भी नंदलाला खेलेगा, मेरेकू भी कोई माँ बोलेगा! छोकरी कहती ‘क्यों दीदी लड़की हुई तो नहीं लोगी! जो पहली लड़की जैसी ही हुई तो मेरे पल्ले छोड़ दोगी! ऐसे करोगी तो अभी मना करदो! बाद में किया तो मेरा क्या होगा!’

जानो तुम, सीना चीर दिया छोकरी ने मेरा! मन को टटोलूं तो भी इसका जवाब नई जानती मैं! जो सचमुच ऐसा हुआ तो मानेगा मर्द मेरा! पर मैं तो माँ बनना चाहती ना! तो मेरे मन की चलेगी न! मुझे तो बच्चा मांगता! मैं बोली ‘तू ऐसा क्यों सोचती, बच्चा ठीक ही होगा।’ आगे तो हिम्मतइच्च नई हुई मेरी कुछ बोलने की! क्या बोलती मैं… मैं भी तो बंधन में पड़ी औरत हूूँ! कैसे मरद को मनाऊंगी!

लो, इसे तो दरद भी उठ गया। हाथ पकड़ के बोली छोकरी ‘दीदी, तुमने जवाब नहीं दिया! तुम्हारा बच्चा लाने जा रही हूूँ! ले लोगी ना!’ मैं तो खडी ही रह गई! क्या बोलती! बीबीजी भी वहीं खडी थी और मालिक भी! डॉक्टरनी अभी बाहर आई बोली कि कोई फारम-वारम भरना पड़ेगा! तुम जानो आजकल जीने मरने की कोई जिम्मेदारी नई लेते ये अस्पताल वाले! फिर इस छोकरी का तो पति भी नई! कौन साइन करेगा, ये भी तो कम मुसीबत नई! पर अब मैं पीछू नई रह सकती! जाके बोली मरद को कि तुम बोलो कि जिम्मेदारी लोगे आने वाले बालक की! औ’ जो छोकरी आई तो भी! मेरा मरद तो तैयार न था, साले को दूसरा शादी बनाना मांगता न!

न जाने कहाँ से इत्ती हिम्मत आई मेरे अंदर! जाकर बोली कि जो भी होगा, मैं जिमेदारी लूंगी आने वाले बच्चे की! हाथ पैर सलामत तो भी मेरा जो न सलामत तो भी मेरा! मेरा मरद धमकी देके चला गया कि जो मैं ऐसा करी तो मेरेकू घर नई ले जाएगा। न लेजा, साला! मैं ये भी डिसाइड करी कि इस छोकरी को भी बच्चा नई दिखाएगी, कहीं मन बदल गया तो! माँ बनके न दिया बच्चा मेरेकू तो! डोक्टरनी बच्चा लाई तो मैं किसी को देखने न दी! बस पोटली में लिपटे बच्चे को लेके दौड़ गई! बीबीजी आवाज लगाती रह गई, पर मेरेकू कलेजे से लगे बच्चे को देखने की हिम्मत न हुई, जो मैं बदल गई तो! जो छोकरी ने बच्चा मांग लिया तो!

बस यई एक गलती कर बैठी मैं! बच्चा लेके भाग गई! अभी रेलवे स्टेशन पर बैठी हूूँ। दूर निकलके झाँका तो छोकरी के माफिक सुंदर एक छोकरी ही थी! लो राधा बाई, घर में छोटी राधाइच्च आ गई! पति मेरा आने नई देगा! मैडम के पास जा नई सकती,  मेरा मरद ढूूँढ लेगा तो मारेगा बहुत! और जो बच्ची को भी मारा तो! उस छोकरी की याद आ रई है! मैडम को चि_ी लिख दूँगी… पर ये सब बाद की बात! अभी तो मैं माँ बनी! दूधमुई छोकरी है मेरी गोद में! अब तुम्ही लोका बताओं… मैं गलत किया क्या किछु। जो गलत किया तो जो सजा काले चोर की सो मेरी…पर पेल्ले बच्ची को देख तो लूूँ मन भरके! जो तुम लोग देखना चाहो तो अपने अपने घर में देख लेना… मेरी बच्ची के माफिक बच्ची तुम्हारे आसपास भी होगी जरुर!

तुम्हारी

राधाबाई