बस्तर: मुश्किल चुनावी डगर

0
57
बस्तर के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां पहुंचने के लिए चुनावकर्मियों को दो से तीन दिन की पैदल यात्रा करनी पड़ती है. फोटो-ईशान तन्खा
बस्तर के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां पहुंचने के लिए चुनावकर्मियों को दो से तीन दिन की पैदल यात्रा करनी पड़ती है. फोटो-ईशान तन्खा
बस्तर के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां पहुंचने के लिए चुनावकर्मियों को दो से तीन दिन की पैदल यात्रा करनी पड़ती है. फोटो-ईशान तन्खा
बस्तर के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां पहुंचने के लिए चुनावकर्मियों को दो से तीन दिन की पैदल यात्रा करनी पड़ती है. फोटो-ईशान तन्खा

दक्षिण छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल अंदरूनी क्षेत्रों में चुनाव करवाना सुरक्षा और यहां तक कि चुनाव सामग्री पहुंचाने के लिहाज से हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है. हर बार माओवादियों का चुनाव विरोधी आक्रामक प्रचार मतदाताओं व चुनाव अधिकारियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उपस्थित होता है. बीते सालों में यहां हजारों मतदान केंद्र पुलिस स्टेशनों के नजदीक तथाकथित सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित किए गए हैं. 2008 के विधानसभा चुनाव में राज्य के ऐसे कई केंद्रों पर 90 फीसदी मतदान की खबरें आई थीं और इस आंकड़े की वजह से बड़े पैमाने पर फर्जी मतदान की आशंका जताई गई. हाल ही में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नवनियुक्त अध्यक्ष चरणदास महंत ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर मांग की है कि आगामी नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव के दौरान सभी मतदान केंद्रों पर छिपे हुए कैमरे से वीडियो रिकॉर्डिंग की जाए. कांग्रेस की मांग यह भी है कि चुनावकर्मियों को जीपीएस डिवाइसें दी जाएं जिससे उनकी लोकेशन का पता चलता रहे.

यहां जंगल के बीच ऐसे सुदूर क्षेत्रों में आबादी बसी हैं जहां पहुंचने के लिए लिए चुनावकर्मियों को चुनाव के कई दिन पहले निकलना पड़ता है. उनकी जिम्मेदारी सिर्फ वहां पहुंचने की नहीं होती बल्कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) और अन्य सामग्री को सुरक्षित उस जगह ले जाने की भी होती है. कई बार ऐसा हुआ है कि माओवादियों के कैडर ने इनसे ईवीएम और चुनाव सामग्री छीन ली और धमकी देकर उन्हें वापस लौटा दिया. कुछ क्षेत्रों में तो माओवादियों का प्रभाव इतना ज्यादा है कि उनसे होकर मतदान केंद्रों पर पहुंचना लगभग नामुमकिन होता है. ऐसे में हेलिकॉप्टर के जरिए चुनावकर्मियों को वहां पहुंचाया जाता है. खतरा यहां भी कम नहीं होता. नवंबर, 2008 में जब बीजापुर जिले के पेडिया गांव से चुनावकर्मियों को लेकर एक हेलिकॉप्टर वापस लौट रहा था तब माओवादियों ने उस पर फायरिंग की थी. इसमें एक फ्लाइट इंजीनियर की मौत हो गई थी.

इसी चुनाव की एक और घटना है. माओवादियों ने दंतेवाड़ा विधानसभा सीट के हांदावाड़ा मतदान केंद्र से ईवीएम मशीनें लूट ली थीं. इस केंद्र पर दोबारा मतदान की तारीख तय हुई. चुनावकर्मी 25 किमी का सफर तय करके यहां तक पहुंच गए. रातभर इन लोगों काे आसपास से माओवादियों की आवाजें और चुनाव बहिष्कार के गीत सुनने को मिले और वे डरते रहे. अगले दिन यहां बमुश्किल 19 फीसदी मतदान हो पाया. हालांकि कोंटा विधानसभा क्षेत्र के गौगुंडा बूथ पर पुनर्मतदान की कहानी बहुत अलग है. माओवादियों से डरे हुए चुनावकर्मी यहां पहुंचे ही नहीं और खुद ही तमाम पार्टियों की तरफ से एक निश्चित अनुपात में ईवीएम मशीनों में मत डालकर बीच रास्ते से वापस आ गए. बाद में यह बात उजागर हो गई और इन चुनावकर्मियों को जेल जाना पड़ा. एक राजनीतिक पार्टी का एजेंट जो इस टीम के साथ था, हमें बताता है, ‘माओवादी हमारे रास्ते के आस-पास ही थे. हम आगे बढ़ते तो हमारी हत्या कर दी जाती. हमारे साथ जो पुलिसवाला था वो खुद डरा हुआ था.

आखिर में हमने तय किया कि सभी पार्टियों के लिए हम खुद ही वोट डालेंगे. ‘बाद में यहां चुनाव के लिए एक और टीम भेजी गई और मतदान केंद्र एक गांव के नजदीक अपेक्षाकृत सुरक्षित जगह पर स्थानांतरित कर दिया गया. इसके बावजूद यहां सिर्फ 10 लोगों ने मत डाले जबकि 700 मतदाता यहां पंजीकृत हैं. बस्तर में अपेक्षाकृत सुरक्षित समझे जाने वाले ऐसे कई मतदान केंद्र बनाए जाते हैं लेकिन इसके बाद भी यहां पर्याप्त मतदान सुनिश्चित नहीं हो पाता. इसी चुनाव में राष्ट्रीय राजमार्ग (क्रमांक 30) के नजदीक बनाए गए गोरखा मतदान केंद्र से माओवादियों ने ईवीएम मशीनें लूट ली थीं, जबकि इससे 10 किमी दूर ही इंजारम में सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं का शिविर था. इस मतदान केंद्र पर जब पुनर्मतदान हुआ तो कहा जाता है कि चुनावकर्मी मतदान करवाने के लिए अपने साथ सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं को ले गए. इनमें से सिर्फ एक व्यक्ति का नाम उनकी मतदाता सूची में था. नतीजतन 938 मतदाता वाले केंद्र पर सिर्फ एक मत डाला गया.

माओवाद प्रभावित सुकमा जिले के एक पत्रकार लीलाधर राठी कहते हैं, ‘बस्तर में ठीक-ठाक चुनाव करवाना युद्ध लड़ने से कम नहीं है. इन इलाकों में आए चुनावकर्मियों के परिवारों के लिए ये दिन सबसे भारी चिंता वाले होते हैं.’ बीजापुर शहर के एक शिक्षक मोहम्मद जाकिर खान इस बात पर सहमति जताते हुए कहते हैं, ‘ जंगल जाने वाले चुनावकर्मियों का जाना ऐसा होता है जैसे वे परिवार से अंतिम विदा ले रहे हों और उन्होंने अपनी वसीयत तैयार कर दी हो. ‘ दंतेवाड़ा में तो यह परंपरा ही बन गई है कि कई चुनावकर्मी जंगल में जाने से पहले दंतेश्वरी मंदिर में जाकर पूजा करते हैं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here