बलराज साहनी

वे अक्सर
पाकिस्तान में मौजूद
अपने घर के बारे में
सोचते थे
और एक बार गए भी वहां
लेकिन लौटकर
बंबई आना ही था

अपने आखिरी दिनों में वे
फिल्मों के आर्क लाइट से बचते
और ज्यादा से ज्यादा अपना समय
जुहू के तट पर
अकेले घूमते हुए बिताते

हजारों लोग हैं
सीमा के दोनों ओर
जो गहरे तनावों के बीच
जीते हैं
और एक
बहुत धीमी मौत
मरते हुए जाते हैं

श्याम बेनेगल की फिल्म
‘ममो’ में
बार-बार भागती है
और छुपती है ममो
वह भारत में ही रहना चाहती है
लेकिन अंततः
भारत की पुलिस उसे पकड़ लेती है
और वह धकेल दी जाती है
पाकिस्तान के नक्शे में
भारत के समाज में
और पाकिस्तान के समाज में
कितने-कितने लोग हैं
जिन्होंने आज तक कबूल नहीं किया
इस विभाजन को

कहते हैं कि
एक बार जब
सत्यजीत राय और ऋत्विक घटक
हवाई जहाज से
कलकत्ता से ढाका जा रहे थे
हवाई जहाज की खिड़की से नीचे देखा
ऋत्विक घटक ने
बहती हुई पद्मा को
डबडबाई आंखों और भारी गले से
उन्होंने कहा पास बैठे
सत्यजीत राय से
मार्णिक वह देखो
बह रही है
हमारी पद्मा
दोनों आगे कुछ बोल नहीं पाए
सिर्फ देखा दोनों ने
बहती पद्मा को
बंगाल के विभाजन को
कभी कबूल नहीं किया दोनों ने

स्वाधीनता की लड़ाई से
हमारी कौम ने जो हासिल किया
उसे विभाजन में कितना खोया
यह हिसाब
बेहद तकलीफदेह है
जो आज भी जारी है.

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