‘बना कर फ़कीरों का हम भेस ग़ालिब तमाश-ए-अहल-ए करम देखते है’

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चलो भई चुनाव हो गए। एक काम खत्म हुआ। अब अगले पंाच साल तक वह जनता जिसने इन्हें भारी बहुमत से जिताया है, इनके खिलाफ सड़कों पर उतरेगी, किसान पेड़ों पर लटकेंगे, उच्च शिक्षा प्राप्त युवा पकौड़े तलने की तैयारी करेंगे। जिन्हें गैस दी गई है उनके सिलेंडर खाली रहेंगे। बैंक अकाउंट में एक-दो महीने आया 2000-2000 रुपया नहीं आएगा। ऐसा ही तो होता है हर बार जब सरकार चुनी जाती है। जनता अजीब है, पहले चुनती है फिर आलोचना करती है। चुनाव के दिन वे सारे राष्ट्रभक्त बन जाते हैं और उन्हें भूख-प्यास, बेरोजग़ारी, किसानों की मुसीबतें कुछ याद नहीं रहता। पर नतीजे आते ही लग जाते हैं अपने दुखों का बखान करने। तब उन्हें वे नेता और लोग याद आते हैं जिन्हें उन्होंने कभी वोट नहीं दी होती। इस राजनीतिक गणित के फार्मूले से यह बात साबित होती है कि नेता दो तरह के होते हैं। एक वोट लेने वाले नेता दूसरे आंदोलन चलाने वाले। वोट लेने वाले नेताओं में अच्छी भाषा, मर्यादा और सामान्य ज्ञान होना कोई ज़रूरी नहीं। व्यवहार में तो यह आया है कि जो जितना ‘अज्ञानी उतना बड़ा नेता।

देश का जीडीपी, ऊपर-से-ऊपर जा रहा है चारों ओर विकास ही विकास। ‘सनसेक्स रिकॅार्ड ऊँचाई पर, लेकिन हरिया के घर आटा नहीं, जुम्मन का बेटा एमए की डिग्री लिए सड़कों की खाक छान रहा है। गरीबू की बेटी के साथ जगीरदार लैहमर सिंह के बेटे और भतीजे ने बलात्कार कर दिया। प्रजातंत्र में सब चलता रहता है, पर कुछ नेताओं को यह तरक्की पसंद नहीं। अब जिसे तरक्की पसंद नहीं वह जाए किसी और मुल्क। हम तो उस मुल्क का नाम नहीं लेते। अब बताओ, जिन युवाओं पर ऐसे इलज़ाम लगाए गए वे बेचारे कहां जाए। कुछ को तो देश की जनता ने चुनाव जितवा दिया। पिछली बार इस प्रकार के 34 फीसद नेता जीते थे, इस बार यह आंकड़ा 43 फीसद पर पहुंच गया। कर दिया न कमाल। इसका अर्थ यह है कि इन लोगों पर लगे आरोप झूठे हैं। नहीं तो देश का प्रबुद्ध मतदाता उन्हें थोड़ा न चुनता। जो चुने गए वे तो चुने गए पर बेचारे उनका क्या जो न तो चुने गए और न ही कहीं जाने लायक रहे। खैर इनके सहयोगी खुद इन्हें संभाल लेंगे। ठीक ही तो कहा गया है कि ‘सांच को आंच नहीं।

आज़ादी से लेकर आज तक 17 चुनाव हो चुके हैं। पर यह पहला चुनाव है जो 1957 या 1962 के चुनावों में जीते नेताओं के कर्मों पर लड़ा गया। देश में जो भ्रष्टाचार है वह 1952 या 1957 में बनी सरकारों के कारण है। उन नेताओं के बाप-दादाओं में खोट था। उनके ‘जीन्स सही नहीं थे। उनमें देश प्रेम नहीं था। ऐसा अहसास होता है जैसे देश प्रेमी तो अभी पैदा होने शुरू हुए हैं। इसी कारण आज देश में सुख समृद्धि है। कहीं भ्रष्टाचार का नाम तक नहीं। अगले पांच साल में शिक्षा में व्यापक सुधार किए जाएंगे। विश्वविद्यालयों में देशप्रेमी कुलपति होंगे। छात्रों को नए तरह का इतिहास और साहित्य पढ़ाया जाएगा। ‘सूचना के अधिकार कानून में यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी को भी किसी की शैक्षणिक योग्यता की कोई जानकारी नहीं दी जाएगी। असल में यह बहुत ही संवेदनशील और देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला है। राष्ट्रीय सीक्रेट है। वैसे भी शैक्षणिक योग्यता करनी क्या है। आदमी वैसे योग्य होना चाहिए। फिर जिसे जनता ने बहुमत से जिता दिया उससे बड़ा योग्य व्यक्ति कौन हो सकता है। लोगों की बुद्धिमत्ता पर सवाल कैसा?

अब बात आती है बजट की, अजी बजट का क्या है बहुत आईएएस बैठे हैं उनके हाथों को भी काम मिल जाएगा। उन्होंने लिखना है आपने तो बस पढऩा है समझ आए न आए कुछ ने मेज़ थपथपाने हैं, कुछ ने आलोचना करनी है। यानी सभी की भूमिकाएं तय है।

जो भी हो चुनाव हो गए, सरकार बन गई हमें तो किसी ने मंत्री बनाना नहीं तो हम चिंतित क्यों हैं। हम तो जो हैं सो है। हम पर ही तो मिजऱ्ा ग़ालिब ने लिखा था:

‘बना कर फ़कीरों का हम भेस ग़ालिब

तमाशा-ए-अहल-ए करम देखते हैं।’