बदले-बदले से‘सरकार…’

0
76

बात छह महीने पुरानी है. बीते 15 अगस्त की. स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह में झंडा फहराने के बाद हेमंत सोरेन बिना किसी पूर्व सूचना के राजधानी रांची के बड़ा तालाब इलाके में बने एक अनाथ आश्रम में पहुंच गए. सुरक्षाधिकारी चेताते रहे कि वहां जाने के लिए थोड़ा वक्त तो दें! लेकिन मुख्यमंत्री इसके मूड में नहीं थे. आंचल शिशु आश्रम नामक उस अनाथालय में उनके अचानक पहुंचने से बच्चे खुश थे और संचालक हैरत में. हेमंत वहां पहुंचते ही बच्चों से बात करने में खो गए. एक-एक कर सभी बच्चों से घंटों बतियाते रह गए. फिर उन्होंने आश्रम संचालक से पूछा कि क्या परेशानी है. बताया गया कि जगह कम है. बच्चों को रहने में परेशानी होती है. हेमंत ने कहा, ‘वादा नहीं करते हैं, कोशिश करेंगे.’ वर्षों से किसी तरह जुगाड़ तकनीक पर चलने वाले उस आश्रम को 20 दिन के अंदर एक नया भवन मिल गया. उसे नेत्रहीन विद्यालय के एक हिस्से में स्थानांतरित कर दिया गया. इस आश्रम से हेमंत का इतने तक का ही नाता नहीं रहा. कुछ दिनों बाद जब मुख्यमंत्री आवास में उनके बेटे के जन्मदिन पर छोटा-सा आयोजन हुआ तो उसमें शहर और राज्य के ‘गणमान्यों’ के बजाय आश्रम के ही बच्चों को प्राथमिकता के तौर पर बुलाया गया.

दूसरा वाकया सितंबर के पहले हफ्ते का है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दो-तीन दिन के लिए मुंबई गए हुए थे. मुंबई से लौटते ही वे एयरपोर्ट से सीधे अपने कार्यालय पहुंचे. उन्होंने तुरंत आदेश दिया कि किसी भी हाल में आठ सितंबर को गुवा गोलीकांड में शहीद हुए आंदोलनकारियों के परिजनों को नौकरी देनी है. गुवा गोलीकांड आठ सितंबर,1980 को हुआ था. उसमें 11 आंदोलनकारी मारे गए थे. उसे झारखंड का जालियांवाला कांड कहा जाता है. हेमंत के निर्देश पर आठ आंदोलनकारियों के परिजनों का पता लगाया गया और उन्हें नौकरी दे दी गई. यह एक ऐसा मसला था जिस पर झारखंड बनने के बाद से ही सभी सरकारों द्वारा बातें तो होती थीं लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पाती थी.

कहने-सुनने में ये दो घटनाएं सामान्य लग सकती हैं लेकिन कोई राजनेता बिना वोटबैंक मजबूत करने की मंशा से ऐसी कवायद करे तो इस पर हैरानी स्वाभाविक है. हैरान इस पर भी हुआ जा सकता है कि अपने निर्माण के समय से अक्सर गलत वजहों से चर्चा में आने वाले राज्य में पहली बार मुख्यमंत्री को कुछ ऐसे काम करते हुए भी देखा जा रहा है और चर्चित हो रहा है. झारखंड के 38 वर्षीय नौजवान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन राहुल गांधी, अखिलेश यादव जैसी राजनेताओं की उसी पीढ़ी से हैं जिसे राजनीति विरासत में मिली. लेकिन जैसा कि ऊपर की दो घटनाएं बताती हैं, कुछ मायनों में वे इस पीढ़ी से अलहदा भी दिख रहे हैं. सिर्फ यही नहीं. कभी-कभी तो प्रचलित राजनीति के लोकाचारों से विपरीत भी उनके कुछ काम अब चर्चा में आ रहे हैं. इसका एक और सटीक उदाहरण भी छह माह पहले का ही है. यह घटना उनके अपने क्षेत्र संथाल परगना की है. तब हेमंत सोरेन दुमका के मसलिया प्रखंड में बतौर मुख्यमंत्री एक अस्पताल भवन का उद्घाटन करने पहुंचे थे. वहां सारी तैयारियां पूरी थीं लेकिन मुख्यमंत्री ने वहां पहुंचकर भी अस्पताल भवन का उद्घाटन करने से मना कर दिया. अस्पताल भवन में भारी अनियमितता हुई थी. मुख्यमंत्री ने अस्पताल का उद्घाटन तो नहीं ही किया तुरंत वहां के उपायुक्त को संबंधित अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज करके कार्रवाई करने का आदेश दे दिया.

इस साल जुलाई में जब हेमंत सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री बने थे तो कहा जा रहा था कि अपने पिता शिबू सोरेन की विरासत की वजह से उन्हें कुर्सी मिली है और जैसे-तैसे सरकार चलाकर वे अपने मन की यह मुराद भी पूरी कर लेंगे. यदि छवि को राजनीति में सबसे बड़ी चुनौती मान लिया जाए तो हेमंत के लिए इसे बदलना सबसे बड़ा काम था. लेकिन बीते छह महीने में चाहे-अनचाहे उनकी कार्यशैली कुछ ऐसा जाहिर करती रही है कि अपनी, पार्टी की और राज्य की छवि बदलने के लिए वे कई स्तरों पर एक साथ काम कर रहे हैं. शायद उन्हें इस बात का अहसास है कि अगर बनी-बनाई लीक को वे तोड़ने में कामयाब नहीं हो सके तो फिर उनका आगे का राजनीतिक करियर भी भंवरजाल में फंस सकता है.

हेमंत कहते हैं, ‘ मैं जानता हूं कि मुझे कम समय मिला है और इतने दिनों में मैं कम से कम व्यवस्था में सुधार नहीं कर सका, कार्यसंस्कृति नहीं बदल सका तो फिर कोई मतलब नहीं होगा मेरे मुख्यमंत्री बनने का.’ हेमंत से हम उनकी प्राथमिकता के बारे में पूछते हैं तो उनका जवाब होता है, ‘ बिजली, सड़क, पानी को मैं सरकार की प्राथमिकता नहीं मानता. यह तो सरकारों का पहला काम है. मेरी प्राथमिकता है कि लोगों को अहसास हो कि झारखंड में सरकार भी काम कर सकती है और लोग अपनी बात सरकार के पास रख सकते हंै.’

हेमंत जब यह बात कह रहे होते हैं तो सिर्फ बड़ी-बड़ी बातों की तरह यह लगता भी नहीं क्योंकि छह माह के कार्यकाल में उन्होंने यह साबित करने की कोशिश भी की है. वे कभी पैदल ही बाहर निकल पड़ते हैं. कभी खुद गाड़ी चलाकर दफ्तर पहुंच जाते हैं और तो और अपनी ही सरकार में भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने में भी उन्हें कभी हिचक नहीं होती. मुख्यमंत्री सचिवालय से निकलते समय अपने प्रधान सचिव के दफ्तर में खुद पहुंचकर मीटिंग करने में भी उन्हें संकोच नहीं है. मुख्यमंत्री के साथ रहने वाले हिमांशु शेखर चौधरी बताते हैं, ‘ हेमंत यह सब सहज और स्वाभाविक रूप से करते हैं. पैदल चलने, अचानक कहीं जाने के पहले वे मीडिया को सूचित करने को कभी नहीं कहते. प्रचार की भूख नहीं है उनमें.’

हेमंत का ऐसा ही सहज व्यवहार उनसे बात-मुलाकात के दौरान भी दिखता है. हेमंत घंटों बतियाते हैं लेकिन जब तक राज्य के मसले पर बात होती है पूरी गंभीरता से जवाब देते हैं और जैसे ही सवाल-जवाब का सिलसिला खत्म होता है, चट हमसे कैमरा मांग हमारी ही तस्वीरें उतारने लगते हैं. चहकते हुए कहते हैं, ‘कैमरे का बहुत शौक है हमें.’  हम उनसे पूछते हैं और क्या-क्या शौक हंै. वे बताते हैं, ‘खुद से ड्राइव करने का. खाना बनाने का.’ पूछने का हमारा क्रम जारी रहता है और उनके बताने का भी,’ आगे नहीं बताऊंगा, आप सुनकर हंसेंगे.’ वे बोलने से रुकते नहीं, ‘कॉमिक्स पढ़ने का. समय एकदम नहीं मिलता लेकिन मौका मिलता है तो अपने बच्चों के कॉमिक्स को गायब कर पांच-दस मिनट में फटाफट एक निपटा देता हूं.’  इन्हीं बातों के बीच गंभीर होते हुए हेमंत बात आगे बढ़ाते हैं, ‘एकदम कॉमन मैन की तरह, स्वाभाविक अंदाज में रहने का मन करता है. जब जहां जी में आए, चला जाऊं. अगर कहीं जाने में देर हो रही हो तो खुद से गाड़ी निकालूं, चल दूं. बहुत कम दूरी पर जाना हो तो पैदल चल दूं…! हमेशा ही जनता की ओर से व्यवस्था के खिलाफ लड़ने की आदत रही है. अब खुद पर व्यवस्था बदलने की जिम्मेवारी है तो सोचता हूं कि जनता बनकर उनके ही नजरिये से चीजों को देखूं और बदलाव की कोशिश करूं.’

bap1

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here