बदलाव का वक़्त

बिन्नी पर भारतीय क्रिकेट का रोडमैप तय करने का ज़िम्मा

यह हमेशा होता है कि जब सवाल उठते हैं, तो उनके जवाब खोजने की पहल भी होती है। क्रिकेट में इस तरह की पहल सुझावों के ज़रिये सामने आ रही है। इन दिनों सवाल उठे हैं टी-20 विश्व कप में भारत की सेमीफाइनल में हार के बाद। देश के क्रिकेट प्रेमियों, जिनमें से अधिकतर का क्रिकेट प्रेम भारत की जीत तक सीमित होता है; से लेकर क्रिकेट के विशेषज्ञों तक में यह उत्सुकता है कि बीसीसीआई अब क्या फ़ैसला करता है? क्या तीनों फॉर्मेट के कप्तान अलग-अलग बनाये जाएँगे? ज़्यादातर की राय है कि यही किया जाना चाहिए।

बीसीसीआई में अनुभवी और स्वभाव से बेहद ईमानदार माने जाने वाले रोजर बिन्नी अध्यक्ष बने हैं, तो बहुतों को लगता है कि वह बेहतर फ़ैसले लेंगे। उनके आने के बाद चेतन शर्मा के नेतृत्व वाली चयन समिति भंग कर दी गयी है। हालाँकि इसके बाद चेतन ने आरोप लगाया है कि कुछ ख़ास खिलाडिय़ों को चुने जाने का दबाव अधिकारी समिति पर डालते थे। निश्चित ही यह गम्भीर आरोप हैं और इसकी तफ़्तीश होनी चाहिए।

सौरव गांगुली को रिस्क लेने और बदलाव करने वाला प्रशासक माना जाता था और उन्होंने अपने कार्यकाल में कुछ बेहतर निर्णय भी किये। कोरोना-काल में सफलतापूर्वक आईपीएल करवाना उनकी बड़ी उपलब्धि थी। इसके अलावा उनके कार्यकाल में प्रसारण अधिकार सर्वाधिक दाम पर बिके, भारत की अंडर-19 टीम ने विश्व कप जीता, महिला क्रिकेट टीम राष्ट्रमंडल खेलों में फाइनल में पहुँची कुछ और परिवर्तन गांगुली ने किये। अब नज़र रोजर बिन्नी पर है।

बिन्नी के पास अवसर है कि वह भारतीय क्रिकेट में तीनों फार्मेट में अलग-अलग कप्तान बनाकर एक ही खिलाड़ी पर कप्तानी के बोझ को ख़त्म करें। हाल में भारत से जो टीमें विदेश गयी हैं, उनमें यह प्रयोग किया गया है। मसलन, टी-20 में हार्दिक पांड्या को कप्तानी के लिए आजमाया गया है और एक दिवसीय में शिखर धवन कप्तान हैं। लेकिन यह प्रयोग सीनियर खिलाडिय़ों की अनुपस्थिति के कारण किये गये हैं। वह स्थायी कप्तान नहीं हैं। माँग यह हो रही है कि स्थायी रूप से तीनों फार्मेट की राष्ट्रीय टीमों के लिए अलग-अलग कप्तान बनाये जाएँ। यह सही है कि आईपीएल में कप्तानी करने और देश की टीम की कप्तानी करने में ज़मीन-आसमान का अन्तर है। हाल के मैचों में देखा गया है कि हार्दिक पांड्या ने भारत के लिए सीनियर खिलाडिय़ों की ग़ैर-मौज़ूदगी में बेहतर कप्तानी की है। नतीजे भी दिये हैं और फील्डिंग के दौरान उनकी गेंदबाज़ी के परिवर्तन में भी समझ दिखती है। हार्दिक अभी 29 साल के हैं। उन्हें स्थायी कप्तानी मिलती है और वह सफल रहते हैं, तो और कुछ साल तक यह ज़िम्मा ढो सकते हैं। वह ऑल राउंडर हैं और जीत का जबरदस्त जज़्बा रखते हैं। खिलाडिय़ों से सही तरीक़े से पेश आते हैं और ख़ुद अपने प्रदर्शन से टीम में प्रेरणा जगाते हैं। हाल में उन्होंने कप्तानी करते हुए साबित किया है कि वह दबाव में नहीं आते, जिससे निर्णय लेने में भी वह सहज ही रहते हैं।

यदि बिन्नी और चयन करता यह प्रयोग करते हैं, तो निश्चित ही पंड्या टी-20 की कप्तानी के सबसे मज़बूत दावेदार होंगे। न्यूजीलैंड के दौरे में एक दिवसीय मैच के शिखर धवन कप्तान रहे। लेकिन हैरानी यह है कि उन्हें सीनियर खिलाडिय़ों की उपस्थिति में कई बार तो टीम में ही शामिल नहीं किया जाता। ऐसा कैसे हो सकता है कि जिसे आप भारत का कप्तान बनने के योग्य मानते हैं, उसे टीम में ही शामिल न करें। हाल की कुछ एक दिवसीय शृंखलाएँ इसका उदाहरण हैं। शिखर धवन ने ओपनर के रूप में बल्ले से कोई ऐसा भी निराश नहीं किया है कि उन्हें सीनियर खिलाडिय़ों की उपस्थिति में टीम में जगह ही नहीं मिले।

शिखर ख़ुद सीनियर खिलाड़ी हैं और अभी 36 साल के हैं। कोई ज़्यादा साल उनके पास नहीं हैं। ऐसे में बेहतर होता कि किसी अन्य खिलाड़ी को आजमाया जाता। विराट कोहली भले कप्तानी छोड़ चुके हैं, अभी भी उपलब्ध खिलाडिय़ों में एक दिवसीय की कप्तानी के लिए वह सबसे बेहतर विकल्प हैं। क़रीब 34 साल के कोहली के पक्ष में उनकी फिटनेस है, जो यह ज़ाहिर करती है कि यदि वह सफल रहे, तो और चार साल तक आसानी से खेलेंगे।

अनुभव और जीत का जज़्बा दोनों उनके पक्ष में जाते हैं। बल्लेबाज़ी की फॉर्म फिर हासिल करने के बाद वह मैदान में जलवा दिखा रहे हैं। उनकी परफार्मेंस भारत की जीत की गारंटी बन जाती है। तीसरे नंबर पर कोहली और चौथे पर सूर्य कुमार यादव भारत के बल्लेबाज़ी क्रम को बहुत मज़बूत बना देते हैं। उनका अनुभव टीम को लाभ देता है और नये खिलाडिय़ों को प्रेरणा भी।