बदलते मोहरे

लचर प्रदर्शन के कारण मुख्यमंत्री बदलने को मजबूर भाजपा

भाजपा अब तक कांग्रेस की सरकारों को गिराकर अपनी सरकारें बना रही थी। अब अपनी ही सरकारों में मुख्यमंत्रियों को ताश के पत्तों की तरह फेंट रही है। विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा की इस कसरत ने कांग्रेस, टीएमसी और बाक़ी विपक्ष को यह अवसर दे दिया है कि वह भाजपा के मुख्यमंत्रियों को बदले जाने की वजह उनकी नाकामी को बताये।

उधर भाजपा के भीतर नेताओं में अपने भविष्य को लेकर अस्थिरता की भावना पैदा हो चुकी है। वरिष्ठ नेताओं को लगने लगा है कि उन्हें भी आडवाणी, जोशी और अन्य की तरह मार्गदर्शक मण्डल में बैठा दिया जाएगा। भाजपा में अब ऐसे नेताओं का दायरा बढ़ता जा रहा है, जो यह महसूस करने लगे हैं कि उनकी हैसियत सिर्फ़ मोहरों की रह गयी है। भाजपा में इस उठा-पटक का क्या असर है?

यह केंद्रीय मंत्री और आरएसएस के नज़दीकी नितिन गडकरी के जयपुर वाले बयान से सहज ही समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा- ‘आज के हालात में हर कोई दु:खी है। कोई मंत्री न बनने से दु:खी है, तो मुख्यमंत्री। वे इसलिए दु:खी हैं कि पता नहीं कब हटा दिये जाएँगे।’ बात मज़ाक़ में कही गयी थी। लेकिन राजनीतिक तंज़ ऐसे ही मुहावरे बनाकर कसे जाते हैं।

इसी साल में अब तक भाजपा अपने चार मुख्यमंत्रियों को ठिकाने लगा चुकी है। जनता में सन्देश जा रहा है कि यह मुख्यमंत्री नाकाम हो चुके थे और पार्टी को चुनाव जिताने की स्थिति में नहीं थे, लिहाज़ा उन्हें बदल दिया गया। मुख्यमंत्रियों में अपनी कुर्सी बचाने की चिन्ता है। भाजपा अपने मुख्यमंत्रियों को किस तत्परता से फेंट रही है? इसका बड़ा उदहारण उत्तराखण्ड है, जहाँ पार्टी ने तीन महीने में ही दो मुख्यमंत्री बदल दिये। इससे भाजपा शासित राज्यों में विकास के कामों पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है और पार्टी के बीच ही अस्थिरता जैसी स्थिति बन चुकी है। कर्नाटक में जुलाई में ताक़तवर लिंगायत नेता बी.एस. येदियुरप्पा को कुर्सी छोडऩी पड़ी।

अपना नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा कि इन फ़ैसलों से पार्टी को नुक़सान उठाना पड़ सकता है। उनके मुताबिक, ऐसा करने से पार्टी नेतृत्व अपनी असुरक्षा की भावना को उजागर कर रहा है, जो उसके लिए घातक भी साबित हो सकता है। उधर इस विषय पर ‘तहलका’ से बातचीत में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन कुमार बंसल ने कहा- ‘यह साफ़ हो गया है कि राज्यों में भाजपा की सरकारें फ्लॉप (नाकाम) हैं। लोगों में उनकी नाकामी से निराशा है। लेकिन इसमें एक और बात भी है। केंद्र की भाजपा सरकार अपनी नाकामियाँ छिपाने का ठीकरा भी अपने मुख्यमंत्रियों पर ही फोड़ रही है, ताकि लोगों का उनसे ध्यान हटाया जा सके। केंद्रीय मंत्रिमण्डल के हाल के फेरबदल में भी यही किया गया था। यह सन्देश देने की कोशिश की गयी कि ख़राब प्रदर्शन वाले मंत्री हटा दिये गये। जबकि कोविड, महँगाई और अन्य मोर्चों पर सरकार की नाकामी की सीधी ज़िम्मेदारी तो प्रधानमंत्री (पीएमओ) की है, जहाँ से सब कुछ संचालित होता है।’

गुजरात में भाजपा ने जिस तरह भूपेंद्र यादव की नयी सरकार के गठन में विजय रूपाणी के मंत्रिमण्डल के सभी मंत्रियों की छुट्टी करने जैसा प्रयोग किया, उससे ज़ाहिर होता है कि मोदी-शाह के गृह राज्य में लोगों की पिछली सरकार और मंत्रियों से कितनी नाराज़गी रही होगी। अन्यथा ऐसा कभी नहीं होता कि नये मुख्यमंत्री को नया मंत्रिमण्डल देते हुए पुराने सभी मंत्रियों को बाहर कर दिया जाए। इससे तो यही संकेत जाता है कि इन सभी मंत्रियों का प्रदर्शन ख़राब रहा। लेकिन प्रदेशों में मुख्यमंत्री बदलने के पीछे भाजपा आलाकमान का एक और सन्देश भी अपने संगठन के लोगों को है। वह यह कि ‘पार्टी में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही सर्वशक्तिमान हैं।’

मुख्यमंत्री बदलने का संकेत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए भी है। बंगाल के विधानसभा चुनाव में मिली हार के तुरन्त बाद हुए उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में भाजपा की हार के बाद सर्वशक्तिमान नेतृत्व ने जिस मुख्यमंत्री को सबसे पहले बदलने की क़वायद की थी, वह योगी ही थे। यह क़वायद सफल होती, उससे पहले ही आरएसएस (संघ) का बयान आ गया कि उत्तर प्रदेश के अगले चुनाव भाजपा योगी के ही नेतृत्व में लड़ेगी। इस दौरान योगी भी दिल्ली में तलब किये गये या कहें कि ख़ुद चले गये थे और शीर्ष नेतृत्व से मिले। बहुत-से लोग कहते हैं कि यह कोई बहुत सम्मानजनक मुलाक़ातें नहीं थीं। लगभग उन्हीं दिनों में अपने प्रदेश के कुछ विकास विज्ञापनों और होर्डिंग्स में योगी सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फोटो लगाने से परहेज़ किया था। बहुतों को योगी सरकार का यह फ़ैसला दिलचस्प और कुछ को हैरानी भरा लगा था। कहते हैं भाजपा शीर्ष नेतृत्व में इसे लेकर भी योगी के प्रति बहुत नाराज़गी थी। योगी को बहुत सारे राजनीतिक जानकार नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री की कुर्सी को चुनौती मानते हैं; भले योगी एक प्रधानमंत्री और पार्टी के सर्वोच्च नेता के रूप में मोदी के प्रति पूरा सम्मान दिखाते हैं। राजनीतिक गलियारों में यह कहा जाने लगा है कि योगी की पार्टी के भीतर ही बहुत-सी दुश्वारियाँ हैं।

बहुत दिलचस्प बात तो यह है कि भाजपा के कट्टर हिन्दुत्व समर्थकों वाली टोलियों के बीच योगी भी मोदी की तरह ही लोकप्रिय हैं। कई लोग तो उन्हें मोदी से भी ज़्यादा पसन्द करते हैं। पार्टी के बीच योगी का एक अलग समर्थक वर्ग बन चुका है, जो उनके भाषणों के तरीक़े और धर्म आधारित कटाक्षों का दीवाना है।

यह वही वर्ग है, जो सोशल मीडिया पर अपने सन्देशों में जमकर धर्म आधारित ज़हर उगलता है और योगी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित करता है। इसमें एक सन्देश यह भी है- ‘देश का अगला प्रधानमंत्री मर्यादा पुरषोतम श्रीराम की जन्मभूमि से।’

ज़ाहिर है योगी के यह समर्थक प्रधानमंत्री के उत्तर प्रदेश के वाराणसी से चुनाव जीतकर सांसद बनने के बावजूद उन्हें राज्य का नहीं मानते। दिलचस्प बात यह भी है कि सोशल मीडिया का ही एक वर्ग योगी को भी बाहरी बताता है। इस वर्ग के सन्देश कहते हैं कि योगी तो उत्तराखण्ड के हैं। अब सोशल मीडिया के इस वर्ग के प्रचार के पीछे कौन है? यह तो राम ही जानें। लेकिन यह तय है कि दोनों की ही तरफ़दारी करने वाले भाजपा के ही लोग हैं। बीच में इसी सोशल मीडिया पर यह चर्चा भी ख़ूब चली कि केंद्र उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में विभाजित करना चाहता है। कहा जाता है कि यह प्रचार योगी को दबाव में लाने के लिए था। लब्बोलुआब यह है कि भाजपा के भीतर ही सौ लड़ाइयाँ और दाँव-पेच हैं। बाहर से भले कुछ भी दिखे, मगर भाजपा के भीतर भी एक छद्म युद्ध लड़ा जा रहा है, जिसका औज़ार में सोशल मीडिया है।