बड़े बदलाव

आप को दिल्ली में मिली सफलता का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि पार्टी ने विविध मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बनाई है. एक तरफ पार्टी ग्रेटर कैलाश जैसे पॉश इलाके में विजयी हुई है तो दूसरी तरफ झुग्गी और पिछड़े इलाकों में भी उसे सफलता हासिल हुई है. अगर युवा पार्टी से बड़ी संख्या में जुड़े हुए हैं तो दूसरी तरफ वरिष्ठ नागरिकों की एक भारी तादाद भी उससे जुड़ी है. एक तरफ जहां पार्टी ने सोशल मीडिया का क्रांतिकारी प्रयोग करके राजनीति में सोशल मीडिया के महत्व को स्थापित किया है और उसकी देखादेखी बाकी दल भी सोशल मीडिया पर अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए लगातार जोर लगा रहे हैं तो वहीं पार्टी झुग्गी झोपड़ियों में भी अपना एक मजबूत नेटवर्क स्थापित कर चुकी है. दिल्ली के परिप्रक्ष्य में अगर हम देखें तो पाएंगे कि पार्टी ने समाज के हर वर्ग को खुद से जोड़ने की कोशिश की है.

आप ने जो चुनावी आगाज किया है वह ऐतिहासिक है.  1980 के दशक में आंध्र प्रदेश में उभरी टीडीपी को छोड़ दें तो देश ने शायद ही कोई ऐसी सियासी शुरुआत देखी है. जानकार मानते हैं कि आप ने खुद को विश्वसनीय विकल्प के रूप में उस जनता के सामने पेश किया जो भ्रष्टाचार, भ्रष्ट नेता-राजनीति और अत्यधिक महंगाई से तंग आ चुकी थी.

यह आप के लोकतंत्र और चुनावी राजनीति का प्रभाव ही कहा जाएगा कि उसकी वजह से दूसरी पार्टियों पर आचरण की शुचिता का दबाव बढ़ा. भाजपा जैसी पार्टी को चुनाव के ऐन पहले अपना मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बदलना पड़ा, 70 अलग-अलग विधानसभाओं के लिए अलग-अलग घोषणापत्र तैयार करने पड़े. देश में आम आदमी पार्टी पहली ऐसी पार्टी बनी जिसने सियासत में तकनीक के महत्व को रेखांकित किया. इंटरनेट पर उसके प्रभावी अभियान का नतीजा है कि दूसरे भी अब सोशल मीडिया को गंभीरता से ले रहे हैं.

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विचित्र किंतु सत्य

निर्दलीयों तथा अन्य दलों की जमीन सिमटी

इस बार के विधान सभा चुनाव कांग्रेस भाजपा तथा आम आदमी पार्टी के अलावा निर्दलीयों एवं अन्य दलों के लिए पिछले चुनाव के मुकाबले घाटे का सौदा रहे. दिल्ली में आम आदमी पार्टी को छोड़ दिया जाए तो शेष राज्यों में कोई भी अन्य दल ठीक-ठाक प्रदर्शन नहीं कर पाया. पिछले विधान सभा चुनावों के परिणामों पर गौर करें तो इन पांच राज्यों में चुनाव जीते निर्दलीयों तथा अन्यों की संख्या 52 थी जबकि इस बार यह आंकड़ा 29 पर सिमट गया.  इन परिणामों से एक निष्कर्ष यह भी निकाला जा सकता है कि ठोस विकल्प न होने की स्थिति में मतदाता बड़े राजनीतिक दलों पर ही भरोसा जताते हैं.

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आप ने देश की राजनीति को उसका चेहरा दिखाने का काम भी किया है जो पहचान, धर्म, जाति, चापलूसी, और काले धन आदि से घिरी हुई थी. उसने राजनीति दलों और नेताओं के सामने चुनावी खर्च का एक ऐसा मॉडल स्थापित किया है जो पारदर्शी और जनता से मिले दान पर आधारित था, जिसमें एक एक रुपये का हिसाब था, जिसे कोई भी देख जान सकता था. एक सीमित चंदे से चुनाव लड़कर और जीत कर उसने दिखाया. कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता कि ये सारे कारक राजनीति में कुछ सकारात्मक और स्थायी बदलावों के उत्प्रेरक बनेंगे.

कई जानकार ऐसा मानते हैं कि आप का आगाज भारत की राजनीतिक पार्टियों को एक चेतावनी है जो कहती है कि अब उन्हें अपने राजनीतिक तौर तरीके और संस्कृति में बदलाव लाना होगा. उन्हें आम जनता को और अधिक खुद से जोड़ना होगा. उसकी सुननी होगी क्योंकि उस आम जनता के पास अब एक और विकल्प है. सिर्फ ईमानदारी की बातों से काम नहीं चलेगा. ईमानदार होना भी पड़ेगा. पड़गांवकर कहते हैं, ‘जिस तरह की राजनीति पार्टी और नेता पहले किया करते थे उससे काम नहीं चले वाला. उन्हें बदलना होगा. युवा मतदाताओं की भूमिका निर्णायक होती जा रही है. उनकी महात्वाकांक्षाओं पर आपको ध्यान देना होगा. परंपरागत नेताओं और पार्टियों को नई राजनीतिक भाषा सीखनी होगी.’

दिल्ली विधानसभा परिणाम आने के दो दिन बाद जंतर मंतर पर पार्टी समर्थकों को संबोधित करते हुए योगेंद्र यादव का कहना था ‘ हम खेल (राजनीति) के नियम बदलेंगे.’ आने वाला समय ही बताएगा कि नियमों में यह बदलाव दीर्घकालिक होगा या फिर वह भी आखिरकार उन्हीं नियमों के शिकंजे में फंस जाएगी.

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