बंगाल में भी होने लगी धर्म के बहाने हिंसा

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चुनाव और धर्म के बहाने बार-बार होने वाली हिंसक घटनाओं नेे पश्चिम बंगाल को गंभीर राजनीतिक उथल-पुथल का गवाह बना दिया है। विशेषकर पिछले कुछ महीनों में और हमें हिंदी की कहावत याद दिलाई है -”पाप से धरती फटी, अधर्म से आसमां, अत्याचार से कांपी मानवता, राज कर रहा हैवान’’। दूसरे शब्दों में इसका अर्थ है कि पाप के कारण पृथ्वी फट रही है, अनैतिकता ने आकाश में विस्फोट कर दिया है,विश्वासघात ने मानवता को कांपा दिया है और चारों तरफ राक्षस घूम रहे हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीतिक धरती पर अपनी जड़ें गहरी करने की दौड़ में भाजपा ने अपने नियंत्रण में मौजूद सभी साधन झोंक दिए है, जिसमें केंद्र सरकार की मशीनरी भी शामिल है। इसका प्रमुख लक्ष्य तृणमूल कांग्रेस की लोकतांत्रिक रूप से चुनी और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार को विस्थापित करना है।

निस्संदेह कभी-कभी तनाव और राजनीतिक पार्टियों के बीच राजनीतिक मतभेद होने के कारण हिंसा एक सामान्य घटना हो। फिर भी आम चुनाव से पहले इसने पश्चिम बंगाल में भयानक रूप ले लिया है। टीएमसी और भाजपा के बीच भ्रष्टाचार, केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के उपयोग और राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा सामाजिक कल्याण की योजनाओं की सफलता पर परस्पर विरोधी दावों को लेकर टीएमसी और भाजपा के बीच आरोपों का आदान -प्रदान हुआ है। कहा जाता है कि भाजपा और टीएमसी दोनों एक दूसरे पर हत्या, मारपीट, बर्बरता और पुलिस पर झूठे आरोप लगा रहे हैं। इस वर्ष जनवरी मे ंटीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा कथित तौर पर भाजपा की एक सार्वजनिक बैठक को बाधित करने के मद्देनजऱ भाजपा के कार्यकर्ताओं ने जवाबी कार्रवाई में टीएमसी के कार्यकर्ताओं की पिटाई की, उनके वाहनों को तोड़ दिया और उनके पार्टी कार्यालय को जला दिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार,” भाजपा के एक स्थानीय नेता ने पार्टी कार्यकर्ताओं को नसीहत दी,’खड़े होकर विरोध करो, तृणमूल कांग्रेस डर के मारे भाग जाएगी।’

पश्चिम बंगाल राज्य 42 लोकसभा सीटों के साथ, केंद्र में सरकार बनाने के लिए किसी भी राजनीतिक दल के लिए बहुत महत्व रखता है। वर्तमान लोकसभा में टीएमसी के 34, कांग्रेस के चार और भाजपा और माकपा के दो-दो सांसद हैं। 2014 से पहले चुनावी मैदान से बाहर होने के बाद, 2014 के आम चुनाव में दो सीटों पर बेहतर मतदान के साथ जीतने के बाद भाजपा राजनीतिक रूप से अधिक महत्वाकांक्षी बन गई है और स्थानीय पंचायत चुनावों में इसका अच्छा प्रदर्शन ने पार्टी का मनोबल बढ़ाने वाला साबित हुआ है। अचानक हिंदी हार्ट लैंड में इसके समपूर्ण सफाए के बाद 2019 के आम चुनाव में भाजपा पश्चिम बंगाल में उच्च दांव पर है।

 अलग -अलग राजनीति

पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति यूपी, बिहार, महाराष्ट्र, केरल या तमिलनाडु से भिन्न है। जहां सत्ताधारी दल या गठबंधन बार-बार बदलते हैं और लोकसभ की किस्मत नाटकीय रूप से बदलती रहती है। ऐसा कहा जाता है कि पश्चिम बंगाल में जाति आधारित राजनीति नहीं है और यही कारण है कि यहां बिहार, यूपी की राष्ट्रीय जनता दल(आरजेडी) समाजवादी पार्टी(सपा) और बहुजन समाज पार्टी(बसपा) जैसी जाति आधारित पार्टियों का विकास नहीं हो सका। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम बंगाल में कम से कम आठ जाति समूह हैं जिनमें ब्राहमणों के कम से कम 13 और वैद्य की चार किस्में शीर्ष पर हैं और सबसे नीचे 13किस्म के दलित हैं।

1970 के दशक के प्रारंभ में पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के शासनकाल में बरगा आंदोलन की शुरूआत छोटे और सीमांत किसानों को भूमि आवंटिक करने के लिए की गई थी। प्रत्येक ब्लाक में एक सलाहकार समिति थी जिसमें अन्य लोगों के अलावा ब्लॉक विकास अधिकारी और एक स्थानीय पार्टी प्रतिनिधि शामिल थे और इस समिति को कहा जाता था कि वे गांव और मुहल्ले के हर घर तक पहुंचे। इसके बाद पश्चिम बंगाल में वाम शासन के तहत जाति को पृष्ठभूमि में बदल दिया गया और केवल वर्ग को अर्थशास्त्र द्वारा परिभाषिक किया गया। वाम शासन के तहत इस समिति ने पारिवारिक विवादों सहित सभी मुद्दों को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी शुरू कर दी। चारे और उर्वरकों के वितरण सहित गांव के मामलों के प्रबंधन में गांव समिति की बढ़ी हुई शक्तियां, ग्रामीण राजनीति के लिए वामपंथी कैडरों को पूरा समर्थन देती हैं। ग्रामीण और शहरी सभ्रांत अभिजात वर्ग पार्टी के प्रति वफादारी के बदले प्रशासनिक और अन्य नौकरियों में लीन था। टीएमसी की पंचायतों के माध्यम से धीरे-धीरे प्रवेश की नीति और 2008 में पंचायत में इसकी जीत ने इसे 2011 में वामदलों से मुकाबला करने के लिए सक्षम बनायां

टीएमसी का सामरिक स्तर

2008 तक टीएमसी ने वामदलों से पंचायतों को जीतने में सफलता हासिल की और दुर्जेय गांव संगठनों पर अधिकार करना शुरू कर दिया और 2011 में टीएमसी के सत्ता में आने के बाद ”लेफ्ट कैडर’’ दीदी का साथी बन गया। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाल टीएमसी ने सिंगूर और नंदीग्राम के खिलाफ जन आंदोलन के दौरान, मां,माटी और मानुष के नारे के आधार पर सत्ता हासिल की थी। 2011 में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने कन्याश्री, जैसे कल्याणकारी उपायों, शिक्षा के माध्यम से बालिकाओं को सशक्त बनाने की योजना, और राज्य में 90 फीसद लोगों को खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दो रुपए में चावल उपलब्ध कराने की योजना शुरू की ।टीएमसी शासन की लोकप्रियता ने 2016 में राज्य विधानसभा में बढ़ती सीटों के साथ दूसरी बार सत्ता में रहने में मदद की। फिर भी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार टीएमसी सरकार रोजग़ार प्रदान करने के सवाल पर पीछे है। बड़ी संख्या में शिक्षित और अशिक्षित, कुशल और गैर-कुशल लोग रोजग़ार के लिए दूसरे राज्यों में चले जाते हैं।

भाजपा की गतिशीलता

2014 में दो लोकसभा सीटें जीतने के साथ-साथ अपने वोट शेयर में 2009 के नौ फीसद हिस्सेदारी के मुकाबले 17 फीसद की बढ़ोतरी के साथ बंगाल में भाजपा का परचम लहरा गया। हालांकि वोट की हिस्सेदारी की यह बढ़ोतरी अल्पकालिक साबित हुई क्योंकि 2016 के राज्य स्तरीय चुनावों में भाजपा का वोट शेयर 10 फीसद तक गिर गया। फिर भी पार्टी नेतृत्व ने पश्चिम बंगाल में अपनी ऊंची चुनावी उम्मीदों को कायम रखा।

उत्तर में हुए नुकसान की भरपाई करने की कोशिश में भाजपा नेतृत्व पश्चिम बंगाल में समर्थन पाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है और इस कोशिश मे ंमोदी-शाह की जोड़ी और पार्टी को ममता बनर्जी के साथ टकराव के रास्ते पर खड़ा कर दिया है।पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों में रैलियों को संबोधित करने की बढ़ती संख्या के साथ मोदी-शाह की जोड़ी ने भाजपा को प्रमुख विपक्षी दल के रूप में पेश करने की कोशिश की है, यहां तक की भाजपा के शीर्ष नेताओं ने भी वोटों के लिए भ्रदलोक के धार्मिक जुनून को भुनाने की कोशिश की है। कुछ विशषज्ञों के अनुसार भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के भाषणों ने अक्सर राज्य की हिंदू आबादी के बीच भावनात्मक स्पर्श का संकेत यह कह कर दिया कि पश्चिम बंगाल से बांग्लादेश में गायों की तस्करी नहीं की जाएगी। हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता कैसे मिलेगी। सीमापार बांग्लादेशियों की घुसपैठ कैसे रुकेगी। राजनीतिक-व्यपारिक सिंडिकेटस के लिए भुगतान आदि समाप्त हो जाएंगे।

कुछ विशषज्ञों के अनुसार भाजपा के शीर्ष नेता और खुद प्रधानमंत्री तीन भावनात्मक मुद्दों- नागरिकता (संशोधन) विधेयक, राष्ट्रीय रजिस्टर आयोग और बांग्ला देशी आव्रजन को रैलियों में अपने भाषण में मुख्य मुद्दा बनाकर मतदाताओं को प्रभावित कर रहे हैं। निस्संदेह ममता के खिलाफ भाजपा के मुख्य आरोपों में से एक उसकी तुष्टिकरण की राजनीति के बारे में हैं , फिर भ्ी कुल आबादी में मुस्लिम वोटिंग का 27 फीसद टीएमसी के लिए एक ठोस समर्थन आधार का गठन करता है। इसके अलावा ममता बनर्जी एनआरसी और नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध करने में सबसे आगे रही है ।

आर्थिक विकास को गति देने और किफायती आवास के साथ-साथ रोजग़ार प्रदान करने के अपने राष्ट्रीय एजेंडे पर ज़ोर देने के बजाए पश्चिम बंगाल में भाजपा टीएमसी पर भ्रष्टाचार और ममता बनर्जी पर तानाशाही का आरोप लगाने पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रही है। मीडिया ने बड़े पैमाने पर कहा है कि राज्य के भाजपा नेतृत्व ने खुलेआम कार्यकर्ताओं को कहा ह कि ”अगर गुंडे डंडे और बांसों से आप पर हमला करते हैं तो तुम भी उन्हें मारो।’ स्थानीय नेता आक्रामक भाषा बोल रहे हैं। 2017 के बाद 2019 की शुरूआत में ये गतिविधियां और अधिक स्पष्ट हो गई हैं।

प्रधानमंत्री मोदी का हालिया दावा कि टीएमसी के 40 विधायक उनके संपर्क में थे यह लोकतांत्रिक रूप से चुनी टीएमसी सरकार को अस्थिर करने का प्रयास और भाजपा की हताशा का संकेत है। भाजपा अध्यक्ष को उम्मीद है कि उनकी पार्टी 20 से अधिक लोकसभा सीटें जीत सकती है। हालांकि कई विशेषज्ञ इस मूल्यांकन को स्वीकार नहीं करते कि 2014 के भाजपा वोट हिस्सेदारी जो 17 फीसद था औा जो 2016 में 10 फीसद गिर गया था। इसके साथ पार्टी का उस जादुई संख्या तक पहुंचना एक बड़ा काम है। इन विश्लेषकों को कहना है कि अकेले जीतने के लिए भाजपा को न केवल प्रचार मंच बल्कि राजनीतिक बुनियादी ढांचे को भी उपयुक्त बनाने की आवश्यकता है। इसके अलावा सत्तारूढ टीएमसी को कड़ी टक्कर के बिना मैदान जीतने की उम्मीद नहीं की जा सकती। यह देखते हुए कि इस आम चुनाव में भाजपा का वोट शेयर बढ़ेगा फिर भी विश्लेषकों को मानना है कि भाजपा अधिकतम पांच सीटें ही जीत पाएगी।

न्यूज़ 24 के कार्यकारी संपादक और व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने विचार हैं।