फसल बीमा से जेब भरतीं निजी बीमा कंपनियां

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योजना के शुभारंभ के दो वर्षों में सभी 18 कंपनियों ने मिलकर 15795 करोड़ रुपए का लाभ कमाया। ऐसा लगता है कि किसानों को राहत प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा शुरू की गई योजना के उद्देश्य को ही  खत्म कर दिया गया है।  पीएमएफबीवाई का उद्दश्ेय ” मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण किसानों को राहत प्रदान करना है। न्यूनतम पैदावार से 50 फीसद से कम उपज होने की स्थिति में बीमित किसानों को तत्काल राहत देने के लिए पीएमएफबीवाई अंतिम उपज के डेटा की प्रतीक्षा किए बिना लेखागत अंाशिक  भुगतान (संभावित दावों के 25 फीसद तक) के लिए व्यवस्था करना है।

साल 2017-18 के लिए भारतीय बीमा विनियामक और  विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष सुभाष सी खुंतिया ने वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग के सचिव को रिपोर्ट  भेजी भारत सरकार ने इसकी पुष्टि भी की। रिपोर्ट पत्र नबंर 1018आर एंड डी/एसडी/एआर/-2077-18/01/नवंबर-18 के द्वारा  28 नवंबर 2018 को सचिव को दी गई।

पूछताछ से पता चला है कि 2016-17 के दौरान 13 निजी कंपनियों का लाभ 3283 करोड़ रुपए था। साल 2017-18 में यह बढ़कर कुल 4863 करोड़ रुपए हो गया। इंश्योरेंस रेगुलेटरी  एंड डेवलमेंट ऑथरिटी ऑफ इंडिया की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार ‘निजी क्षेत्र’ की बीमा कंपनियों ने प्रीमियम के रूप में 11,905.89 करोड़ रुपए एकत्र किए। हालांकि इन बीमा कंपनियों ने किसानों को केवल 8831.78 करोड़ रुपए के दावों का भुगतान किया और तेजी से लाभ कमाया। आईआरडीआई का कहना है कि सरकार द्वारा प्रयोजित फसल बीमा योजनाओं में भारतीय फसल बीमा बाज़ार का बोलबाला है। भारत में सरकारी फसल बीमा कार्यक्रम 1985 में व्यापक फसल बीमा योजना (सीसीआईएस) को लागू करने के साथ शुरू हुआ। सीसीआईएस को  1999 में रबी की फसल के दौरान राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एनएआईएस) द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था जो 2015-16 तक जारी रहा। दोनों योजनाओं के तहत राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना और सीसीआईएस के अंतर्गत नियंत्रित प्रीमियम दर प्रभारित की गई तथा एकत्र प्रीमियम से अधिक दावा देयता को राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा साझा किया गया था।

साल 2016 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) को देश में आरम्भ किया गया। इसलिए 2016 में खरीफ की फसल से पीएमएफबीवाई ने मौजूदा योजनाओं को बदल दिया था। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना प्राथमिक रूप से एक क्षेत्र उपज सूचकांक आधारित योजना है। जहां एक अधिसूचित क्षेत्र के लिए हानियां सामान्य फसल अनुमान सर्वेक्षण के अंतर्गत आवश्यक संख्या में नमूना फसल कटाई प्रयोगों के आधार पर निर्धारित की जाती है। तथापि पीएमएफबीवाई के अंतर्गत आधारभूत जोखिम को कम करने के लिए स्थानीकृत हानियों  (ओलावृष्टि, भूस्खलन और बाढ़) और फसल के बाद की हानियों का आकंलन  (चक्रवात, बारिश और गैर-बारिश के कारण नुकसान) वैयक्तिक कृषि क्षेत्र के स्तरीय सर्वेक्षण के आधार पर  किया जाता है। पीएमएफबीवाई  कम वर्षा या प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों बुआई, रोपण से बीमित क्षेत्र के बाधित होने की स्थिति में किसानों को सरक्षण प्रदान करती है।

मौसम की प्रतिकूलता के मामले में न्यूनतम पैदावार से 50 फीसद कम होने की संभावना  में बीमित किसानो को तत्काल राहत प्रदान करने के लिए पीएमएफबीवाई उपज के अंतिम आंकड़ों की प्रतीक्षा किए बिना तत्काल आंशिक भुगतान (संभावित दावों का 25 फीसद तक)  की व्यवस्था करता है।  पीएमएफबीवाई सभी ऋणी किसानों के लिए अनिवार्य बीमा रक्षा को अधिदेशात्मक करता है और गैर-ऋणी किसानों को भी प्रोत्साहित करता है। बीमा योजना सभी खाद्य और तिलहन फसलों और वार्षिक वाणिज्यिक फसलों के लिए खुली है। बीमा की मुख्य ईकाई प्रमुख फसलों के लिए गांव/ ग्राम पंचायत है  और अन्य फसलों के लिए ईकाई का आकार इस स्तर से अधिक हो सकता है। जबकि बीमा कंपनिया निश्चित प्रीमियम लेती हैं। किसानों को खरीफ के लिए अधिकतम दो फीसद और रबी फसलों के लिए 1.5 फीसद और वाणिज्यिक और बागवानी फसलों के लिय पांच फीसद का भुगतान करना पड़ता है, किसानों द्वारा देय बीमा प्रीमियम दर और  बीमा शुल्क की दर के बीच के अंतर को सामान्य प्रीमियम सब्सिडी की दर के रूप में माना जाता है जिसे केंद्र और राज्य सरकार द्वारा समान रूप से साझा किया जाता है। हालांकि सरकारें अपने बजट से निर्धारित सब्सिडी से अधिक और अतिरिक्त सब्सिडी देने के लिए स्वतंत्र हैं।

आरटीआई अधिनियम  के तहत सूचना प्राप्त करने वाले रोपड़ के सक्रिय कार्यकर्ता दिनेश चड्ढा का कहना है कि ”केंद्र सरकार को योजना पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।’’ आंकडों से पता चला है कि निजी बीमा कंपनियों द्वारा कमाया गया 80 फीसद लाभ एचडीएफसी जैसी कंपनी को मिला जो 1816 करोड़ रुपए के लाभ के साथ शीर्ष स्थान पर रही। इसके बाद रिलांयस ने 1361 करोड़ रुपए, यूनिवर्सल सोमपो जनरल इंश्योरेंस कंपनी ने 1195 करोड़ रुपए, आईसीआईसीआई ने 1193 करोड़ रुपए, बजाज एलांइस ने 815 करोड़ रुपए, भारती- एक्सा ने 302 करोड़,चोलामंडलम एमएस 182 करोड़ रुपए, फ्यूचर जनरल इंडिया इंश्योरेंस कंपनी111 करोड़ रुपए और श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी ने 107 करोड़ रुपए कमाए।

थोड़ा संदेह है कि मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी फसल बीमा योजना किसानों की तुलना में बीमा कंपनियों के लिए एक जैकपोट साबित हुई हैं। कृषि मंत्रालय के आंकड़े इस ओर इशारा करते हैं जब वह कहता है कि 17 बीमा कंपनियों जिनमें पांच सार्वजनिक क्षेत्र और 12 निजी कंपनियों ने पीएमएफबीवाई के तहत 15029 करोड़ रुपए का लाभ दर्ज किया है और उन्होंने 17,706 करोड़ रुपए के प्रीमियम के खिलाफ 2,767 करोड़ रुपए के दावों का भुगतान किया है । इसे जोडऩे के लिए पीएमएफबीवाई को सेवा कर और जीएसटी से छूट दी गई।

सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनी के एक बीमाकर्ता सुभाष शर्मा ने तहलका को बताया कि निजी बीमा कंपनिया यह दावा करती हैं कि अच्छे मानसून के परिणाम स्वरूप अच्छे उत्पादन के कारण लाभ हुआ था। लेकिन सवाल यह है कि निजी ऑपरेटरों को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के मुकाबले अधिक व्यवसाय क्यों दिया गया। कृषि निकायों ने दावा करते हुए कहा कि महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में सूखे जैसे हालात हैं और अन्य भागों में बाढ़ जैसी स्थिति थी लेकिन इन बीमा कंपनियों ने फिर भी धन कमाया। यह इस नीति पर फिर से विचार करने का आहवान करता है क्योंकि पीएमएफबीवाई ने मुख्य रूप से किसानों की तुलना में बीमा कंपनियों  को अधिक लाभान्वित किया है। क्या किसानों के दावे व्यवस्थित नही थे?

जानकारी यह भी बताती है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना भी किसानों को उत्साहित करने  में असफल रही है। मध्यप्रदेश में लगभग 2.90 लाख किसानों ने, राजस्थान  में 31.25 लाख, महाराष्ट्र में 19.47 लाख और उत्तरप्रदेश में 14.69 लाख किसानों ने इस योजना को छोड़ा। साल 2016-17 में 5,72,17,159 लाख किसान इस योजना में शामिल हुए थे लेकिन अगले साल यानी 2017-18 में 84.47 लाख किसानों ने इसे छोड़ दिया। वास्तव में एक साल के बाद ही लगभग एक करोड़ किसानों ने इस योजना को छोड़ दिया था। क्या किसान इस बात के पक्षधर थे कि यह योजना केवल निजी कंपनियों के लिए धन बनाने वाली थी?  आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि इस योजना के तहत किसानों की संख्या में कमी आई है। लेकिन बीमा कंपनियों के लाभ में वृद्धि हुई है।

उदाहरण के लिए  उत्तरप्रदेश में 2016-17 में बीमित किसानों की संख्या 67.69 लाख थी लेकिन अगले साल 2017-18 में यह घट कर 53 लाख हो गई। हालांकि प्रीमियम और प्राप्त मुआवजों के बीच का अंतर कम होने के बजाए 2016-17 में 548.94 करोड़ रुपए से बढ़कर अगले साल 1046.81 करोड़ रुपए हो गया। ठीक यही हाल मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य राज्यों में है। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल में 2016-17 में फसल बीमा योजना के लिए पंजीकरण कराने वाले किसानों की संख्या 41.33 लाख थी जो 2017-18 में यह घटकर 39.09 लाख हो गई। लेकिन प्राप्त प्रीमियम और मुआवजे के बीच का अंतर 2016-17 में 321.26 करोड़ रुपए से बढ़कर 2017-18 में 547.87 करोड़ रुपए हो गया ।

इस मुद्दे पर एक श्रंृखला राज्यवार पत्रिका में आएगी। इसे प्रस्तुत करेंगी- कोमल अमित गेरा।