प्रेम, राजनीति और नेहरू-गांधी परिवार

कहते हैं, मेनका जब सिर्फ 17 साल की थीं तब बॉम्बे डाइंग के एक विज्ञापन में उन्हें देख संजय उनकी तरफ आकृष्ट हुए. महज एक साल बाद उन्होंने मेनका से शादी कर ली. संजय गांधी दुस्साहसी और महत्वाकांक्षी नौजवान थे जिन्होंने अपनी मां की सत्ता का भरपूर इस्तेमाल किया. एक दौर में संजय और मेनका देश के दो सबसे ताकतवर नौजवान थे जिनके इशारों पर सरकार चलती थी. इमरजेंसी के दौर की ज्यादतियों और इंदिरा गांधी के पतन के लिए भी संजय को जिम्मेदार बताया जाता रहा. हालांकि कई लोग 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी का श्रेय भी संजय को देते रहे. 23 जून 1980 को दिल्ली में एक विमान हादसे में संजय गांधी की मौत हो गई. कुछ ही समय के बाद मेनका अपनी सास से नाराज होकर अपने छोटे-से बेटे वरुण का हाथ थामे घर से निकल गईं. इसके बाद तो मेनका और वरुण जीवन और राजनीति की राहों पर इतने दूर और अलग हो चुके हैं कि यह याद करना अजीब-सा लगता है कि कभी यह परिवार इंदिरा और नेहरू-गांधी की विरासत संभालने का सबसे आक्रामक दावेदार था.

दूसरी तरफ इंदिरा और संजय गांधी के रहते राजीव गांधी विमान चलाकर खुश थे. 1965 में कैंब्रिज के एक रेस्टोरेंट में उनकी सोनिया गांधी से मुलाकात हुई थी. तीन साल बाद, 1968 में उन्होंने सोनिया से शादी कर ली. यह देखना भी कम दिलचस्प नहीं कि देश के सबसे ताकतवर घराने का सबसे बड़ा बेटा होते हुए भी राजीव की सत्ता में दिलचस्पी नहीं थी. उनकी पत्नी सोनिया भी खुद को इन सबसे दूर रखना चाहती थीं. जब 1977 में इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं तब यह अफवाह भी उड़ाई गई कि राजीव इटली जाकर बस सकते हैं. 1980 में संजय गांधी की मौत के बाद इंदिरा आखिरकार उन्हें राजनीति में ले आईं. सोनिया ने ख़ुद स्वीकार किया है कि वे इस फैसले के पूरी तरह खिलाफ थीं और नहीं चाहती थीं कि राजीव राजनीति में आएं. लेकिन आखिरकार उन्होंने महसूस किया कि नेहरू-गांधी परिवार में होने की कुछ क़ीमत तो उन्हें अदा करनी ही पड़ेगी.

और यह कीमत एक लिहाज से काफी महंगी साबित हुई. 1984 में इंदिरा गांधी की आकस्मिक मौत हो गई और राजनीति में नितांत अनुभवहीन राजीव गांधी ने देश की कमान संभाल ली. फिर 1991 में 21 मई का वह दिन भी आया जब श्रीपेरुंबदूर की एक सभा में मौत माला लिए आई, उनके पांव के पास झुकी और फट गई.

सोनिया गांधी इसके बाद बिल्कुल अकेली थीं- दो छोटे-छोटे बच्चों राहुल और प्रियंका का हाथ थामे. उन्होंने खुद को राजनीति से दूर रखने की कोशिश की. पूरे सात साल उन्होंने दस जनपथ का वह दरवाजा बंद रखा जो कांग्रेस मुख्यालय में खुलता है. लेकिन सोनिया घर के दरवाजे बंद कर सकती थीं, उस नियति और विरासत के नहीं जिसके साथ वे जाने-अनजाने जुड़ चुकी थीं.

इसके बाद का सफर भी कम नाटकीय नहीं है. उनके राजनीति में आने पर संदेह जताया गया, उनके विदेशी मूल पर सवाल उठे, उनकी हिंदी की खिल्ली उड़ाई गई,  उन्हें कमजोर बताया गया. लेकिन 2004 आते-आते तस्वीर बदल चुकी थी. 2004 में यूपीए को मिली चुनावी कामयाबी ने यह सुनिश्चित कर दिया कि वे देश की प्रधानमंत्री बनेंगी. उनके समर्थन में राष्ट्रपति को चिट्ठियां तक चली गईं. उनके विरोध में सुषमा स्वराज और उमा भारती जैसी नेत्रियों ने बाल मुंडाने तक के एलान कर दिए.

लेकिन इन सबके बीच बिल्कुल आखिरी लम्हे में सोनिया मुड़ीं, उन्होंने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री पद नहीं चाहिए. अब इस फैसले की बहुत तरह से व्याख्या होती है. चापलूस कांग्रेसी संस्कृति इसे सोनिया के त्याग और उनकी महानता के बहुत सतही और कभी-कभी भोंडे बखान में बदल डालती है. विरोधी इसे ऐसा चालाकी भरा कदम बताते हैं जिसके बाद सोनिया सुपर प्रधानमंत्री हो गईं.

लेकिन शायद वह झिलमिलाता हुआ लम्हा एक बहुत मानवीय लम्हा है. उस लम्हे में सोनिया गांधी को अपना पूरा भारतीय अतीत याद आया होगा, राजीव गांधी याद आए होंगे, सत्ता की ताकत और उसकी सीमाएं याद आई होंगी, इसका नशा और वह विडंबना भी याद आई होगी, जिसने एक ओर नेहरू-गांधी परिवार को देश का सबसे ताकतवर परिवार भी बनाया और दूसरी ओर सबसे वेध्य भी. शायद ये सारे धागे कहीं ज्यादा मजबूत साबित हुए- सत्ता का मोहपाश कम से कम उस घड़ी में सोनिया को नहीं बांध सका. इस एक फैसले से वे भारतीय राजनीति में सबसे बड़ी, सबसे ऊपर हो गईं. राजीव गांधी के प्रेम का इससे बड़ा प्रतिदान और क्या हो सकता है.

नेहरू-गांधी परिवार की यह प्रेम कहानी और आगे बढ़ चुकी है. प्रियंका ने रॉबर्ट वाड्रा से विवाह किया है. राहुल गांधी को लेकर तरह-तरह की अटकलें चलती रही हैं. लेकिन इन सबके बीच कम से कम दो-तीन बातें साफ हैं. एक तो यह कि जीवन अलग-अलग खानों में पूरी तरह बंट नहीं पाता. ऐसा संभव नहीं है कि प्रेम अपनी जगह रहे, राजनीति अपनी जगह. निजता अपनी जगह और सार्वजनिकता अपनी जगह. सब एक-दूसरे में घुसपैठ करते हैं- जीवन और रिश्तों का रसायन शायद बनता भी इसी तरह है. फिर जब आप एक ऐसे परिवार से हों जिस पर पूरे देश की निगाह रहती हो तो निजता बार-बार खंडित होती है, रिश्ते बार-बार कसौटी पर चढ़ाए जाते हैं और अकसर अलग-अलग ढंग से उनकी कीमत चुकानी पड़ती है. नेहरू-गांधी परिवार ने भी यह कीमत चुकाई- आपसी रिश्तों की चुभन से लेकर बाहरी चर्चाओं तक की छाया उनके प्रेम पर पड़ी.

लेकिन इसमें शक नहीं कि उन्होंने सरहदें तोड़ीं, प्रेम किए, जोखिम उठाए और अंततः अपनी शर्तों पर जीते रहे, जी रहे हैं.

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