पुलवामा हादसे पर आक्रोश पर फिर भी ज़रूरी है बातचीत

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कश्मीर में पिछले तीन दशकों से जैसी घटनाएं होती रही हैं वैसा ही हुआ था 14 फरवरी को भी पुलवामा में सीआरपीएफ के 40 कर्मी मारे गए। लेकिन यह घटना कुछ इस तरह से उभारी गई मानों पांच साल में राज्य में हो रही गतिविधियों के खिलाफ यह बड़ी प्रतिक्रिया थी भाजपा के नेतृत्व में राज्य में पाकिस्तान के लिहाज से जो नीतियां अमल में आती रही । उसके चलते ऐसा होना ही था।

उन्हीं हालात के चलते यह हुआ कि राज्य के निवासी आदिल अहमद डार नाम के नौजवान ने विस्फोटकों से लदी अपनी गाड़ी सीआरपीएफ की गाडिय़ों के काफिले से टकरा दी। यह हादसा जहां हुआ वहां से महज दस किलोमीटर दूर ही वह रहता था। सात महीने पहले तक वह पड़ोस में लकड़ी चीरने की फैक्टरी में काम करता था। लेकिन जैसे कश्मीर में यह रोजमर्रा सा होता है। एक सुबह उसने घर छोड़ दिया और फिर नहीं लौटा।

परिवार ने उसके लापता होने की खबर पुलिस थाने में दी। लेकिन न कुछ होना था और कुछ हुआ भी नहीं। एक महीने बाद डार की एक तस्वीर सोशल मीडिया में कलाशनकोव राइफल ताने हुए दिखी। उस तस्वीर में उसे जैश-ए-मोहम्मद का एक सदस्य बताया गया था। उसे देखते ही पिता गुलाम अहमद डार ने उसकी पत्नी से कहा,‘उसे भूल जाओ। वह अब मर चुका है’।

अपने परिवार से दूर डार पिछले कई महीनों से एक फिदायी के तौर पर प्रशिक्षण हासिल करता रहा। फिदायी उर्दू का एक शब्द है जो आत्मघाती बमबर्षक के तौर इस्तेमाल होता है। हमले से पहले उसने एक वीडियो बनाया। इसमे उसने बताया कि जो कुछ वह कर रहा है उसकी वजह क्या है। और बड़े धमाके के बाद ही वह वीडियो जारी हो गया।

दो दिन बाद सेनाओं ने पास के पिंग्लिना में जैश उग्रवादी को मार गिराया। इनमें दो पाकिस्तानी थे। बताया गया कि ये लोग पुलवामा धमाके के खास लोग थे जिन्होंने इस योजना को अंतिम रूप दिया था।  इस ऑपरेशन में एक मेजर, एक सिपाही और एक नागरिक मारा गया।

इस पूरी घटना की जिम्मेदारी जैश ने खुलेआम ली। सरकार ने इसे अंजाम देने के लिए पाकिस्तान को जिम्म्ेदार ठहराया और कहा कि इसका बदला लिया जाएगा। राजनीतिकों और मीडिया के जोर-शोर से चले बहस-मुबाहिसे में पाकिस्तान को इसके लिए मजा चखाने तक की बात हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मामले में कोई अपवाद नहीं बरता। उन्होंने तो अपराधियों और उनके समर्थकों को चेतावनी देते हुए कहा,‘आंसू की हर बूंद का बदला लिया जाएगा’। इसके जवाब में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा, किसी भी भारतीय हमले का जवाब देने में उनका देश पीछे नहीं हटेगा। इससे अब अरूचिकर स्थिति बन गई है। दोनों देश अब एक ताजे संकट को जान-समझ रहे हैं।

हालांकि पाकिस्तान ने काफी उग्रता से इस बात से इंकार किया है कि इस मामले में उसकी कोई भागीदारी है। हालांकि जैश ने इस धमाके की जिम्मेदारी ली है वह अलबत्ता पाकिस्तानी पंजाब में है इसके कारण पड़ोसी झंझट में पड़ गया है। यह सब तब हुआ जब भारत में जल्द ही आम चुनाव होने को हैं। इससे विभिन्न विश्लेषक भी अचंभित हैं कि आखिर क्या मकसद था इस भयंकर धमाके का। चुनाव को प्रभावित करना या पाकिस्तान पर भारतीय सेनाओं का हमला।

‘ये सब महज ख्याली पुलाव हैं। लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होने की संभावना नहीं के बराबर है। लेकिन पुलवामा धमाके का असर आम चुनाव पर ज़रूर पड़ेगा।’ राजनीतिक विश्लेषक गुल मोहम्मद वानी का कहना है,‘इस हमले से विकास रूक गया है और भ्रष्टाचार पर जोर देने वाली चुनावी चर्चा अलबत्ता पिछड़ गई है। सुरक्षा, कश्मीर और पाकिस्तान आज बहस के मुख्य मुद्दे हैं। देखते हैं इन मुद्दों पर सामने क्या आता है।

वानी मानते हैं  कि मोदी अपनी कट्टर सोच के चलते पाकिस्तान और कश्मीर को अभी और आगे बढ़ाएंगे। ‘भाजपा अब तक दक्षतापूर्वक पुलवामा हमले पर बहस की बजाए अपनी कश्मीर नीति की असफलता पर बातचीत टालती रही है। इसने इस धमाके के बाद  अपनी नीति और संभावित कार्रवाई को और पुख्ता कर लिया है। यह अभी देखा जाना है कि जम्मू-कश्मीर में सरकार की अपनी जो खामियां रही हैं उन्हें विपक्ष कैसे उठाता है।

जो हो, पुलवामा धमाके का भावी चुनावों पर तो खासा असर पड़ेगा ही साथ ही एक लंबे समय के लिए भारत-पाक संबंधों में ठहराव आ जाएगा। साथ ही कश्मीर में बिगड़ रही स्थिति को संभालने में केंद्र की भूमिका भी तय हो जाएगी।

इसके साथ ही ‘कश्मीर की हालात को दुनिया किस नज़रिए से देखती है’ इससे भी पुलवामा की खासी भूमिका होगी।’ कहते हैं वानी।

जबकि सारी दुनिया कश्मीर में बढ़ रही हिंसा की निंदा कर रही है उसे इस बात की भी फिक्र होगी कि राज्य में हालात क्या रूप लेंगे और स्थानीय शांति के लिहाज से इसका असर क्या होगा।

भारत-पाक संबंध

धमाके के बाद से भारत-पाक संबंधों में खासी गिरावट आ गई है। भारत ने पाकिस्तान को मजा चखाने के लिए कई कदम भी उठा लिए हैं।  इसने ‘मोस्ट  फेवर्ड नेशन’ का दर्जा, जो पड़ोसी को दिया जाता है वह भी वापस ले लिया है। पाकिस्तान से आ रहे माल पर दो सौ फीसद टैक्स लगा दिया है। साथ ही यह तय किया है कि सिंधू जल  समझौते के तहत पाकिस्तान को दिए जाने वाले पानी को देना अब बंद कर देंगे। भारत अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पाकिस्तान को अलग-थलग करने की मुहिम छेडने को है।

प्र्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह भीचुके हैं कि अब इस्लामाबाद से बात करने का कोई औचित्य नहीं है।

अब देखना यह है कि क्या भारत पुलवामा धमाके के बाद अपने पड़ोसी देश पर सैनिक कार्रवाई करता है जिसकी ओर प्रधानमंत्री से लेकर उनके दूसरे वरिष्ठ मंत्री करते रहे हैं। यदि ऐसा  बेहद संगीन कदम वाकई उठाया भी जाता है तो चाहे वह सर्जिकल स्ट्राइक हो तो भी उससे देश के लोगों की नाराजगी दूर नहीं होगी। इसकी वजहें हैं- भारतीय सेना ने 2016 में सैनिक ठिकानों  पर बम बरसाए। लेकिन पाकिस्तान ने इसे खारिज किया और इसका असर भी सीमा पर कश्मीर में कोई खास नहीं दिखा। और तो और सुरक्षा लक्ष्य भी लगभग अछूते रह गए। यानी यदि पिछले पांच साल में यदि 488 सुरक्षा सैनिक मारे गए तो राज्य में आतंकवादी का अनुपात 1:2 था। ऐसे में पाकिस्तान के खिलाफ ताजी सैनिक कार्रवाई इतने बड़े पैमाने पर  होनी चाहिए कि वह नजऱ भी आए। यानी ऐसी कि नाराज़ जनता को सुबूत मिले और वह पाकिस्तानी सेना को खासा नुकसान भी पहुंचे। लेकिन यह जोड़-भाग अत्यंत अव्यवस्थित हो सकता है। क्योंकि तब पाकिस्तान भी मुकाबला करेगा। इमरान खान तो भारतीय हमले का मुंह तोड़ जवाब देने के लिए अपनी सेना को तैयार रहने को कह दिया है। पाकिस्तान की एक भी प्रतिक्रिया से बड़ी लड़ाई छिड़ सकती है। जो धीरे-धीरे पूरे युद्ध में बदल जाए और फिर दोनों देशों के ठिकानों का इस्तेमाल का अंदेशा बन सकता है। ‘कश्मीर ऑब्जर्वर’ के संपादकीय में है,‘यह विनाशकारी दृश्य होगा जिसे लेकर दुनिया में बेचैनी है और इस पूरे इलाके के लोगों को इस पर सोचना भी चाहिए’।

बहरहाल, सैनिक जवाब आएगा या न आए लेकिन पुलवामा धमाके ने ज़रूर चुनाव बाद भारत पाकिस्तान बातचीत को फिर शुरू होने की संभावनएं ज़रूर खारिज कर दी हैं।

मुंबई हमला 2008 में हुआ था। तब भारत-पाकिस्तान बातचीत से कश्मीर मसले का समाधान लगभग हो चला था। तब से दोनों देश बातचीत की तैयारी में जुटे रहे। कहते हैं, गौहर गिलानी।

‘अब पुलवामा धमाके के बाद दोनों देशों के लिए बातचीत फिर शुरू करना कठिन होगा। जब तक कि दोनों पक्ष इस बात पर एकमत होकर फैसला न ले कि मुद्दों का समाधान शांति से ही संभव है। न कि हिंसा और अस्थायित्व से।’

धूम धड़ाका और क्या

पुलवामा धमाके के बाद राजनीतिक और मीडिया के आख्यानों में कश्मीर की अनदेखी ही हुई। राज्य तो खबरों में तभी आया जब कश्मीरी छात्रों और व्यापारियों पर पूरे देश में हमले शुरू हो गए। यह आख्यान इस कदर पाकिस्तान और आतंकवाद को केंद्र में रख कर चलता है कि हमलों के पीछे के सवाल रह जाते हैं और इनके होने की जगह भी नजऱ अंदाज कर दी जाती है। खुफिया सूचना के भी समझने में खासी नाकामी रही है। बीस साल के कश्मीरी युवक ने वह धमाका किया। लेकिन किसी कश्मीरी नौजवान द्वारा किया गया यह पहला आत्मघाती धमका नहीं था। पहले भी कुछ कश्मीरी नौजवान फिदायीन हमलों में भाग लेते रहे हैं। लेकिन कश्मीर में ज़्यादातर विदेशी उग्रवादियों में आत्मघाती हमले किए हैं वे लश्कर या जैश से जुड़े रहे हैं।

लेकिन अब पुलवामा कांड से इस बात की पुष्टि हो गई है कि कश्मीरी आतंकवादी ने शायद रास्ता देख लिया है। हो सकता है कि जैश ने बाकी व्यवस्था मुहैया कराई हो। लेकिन यह एक स्थानीय युवक था जो स्थानीय भावनाओं और एक मकसद के नाम पर अपनी जान भी गंवा बैठा। यदि यह सिलसिला चल निकला तो कश्मीर आज की तुलना में खासी बड़ी रणभूमि में तबदील हो जाएगा।

यह कश्मीर में आज वाकई चिंता की बात है। लेकिन यह मुद्दा राष्ट्रीय  चर्चा से बाहर है। कहते हैं जम्मू एंड कश्मीर के शिक्षामंत्री नईम अख्तर। ‘इस पर बहुत कम बात होती है कि कैसे कश्मीर उस हालत में पहुंच गया है जहां एक नौजवान अपने शरीर को ही बम बना देता है और धधक उठता है।’

सच है, कश्मीर पांच साल में खासा बदला है । केंद्र में भाजपा नेतृत्व की गठबंधन सरकार और जम्मू-कश्मीर में पीडीपी की सरकार में तालमेल था। इस दौरान नए युग का आतंकवाद विकसित हुआ। इसमें स्थानीय युवक को स्थानीय पहचान बनाने के लिए एक दशक से भी ज़्यादा समय के बाद आतंकवाद को अपनाना पड़ा।

दरअसल 2015 से एक दशक में पहली बार स्थानीय आतंकवादियों की संख्या कश्मीर में विदेशियों से (बाहरी लोगों) से कहीं ज़्यादा हो गई। घाटी में कुल 182 सक्रिय आतंकवादियों में से 88 स्थानीय थे जबकि इसी तरह 2016 में आतंकवादियों की तादाद जो सरकार ने दी वह थी कि कुल 145 आतंकवादियों में 91 स्थानीय हैं जबकि बाहरी या विदेशी 54 हैं।

सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि कश्मीर में यह कैसा बदलाव आया है कि स्थानीय  युवक आतंकवाद की ओर जा रहा है, पूछते हैं गिलानी,‘लेकिन यह शुरू हुआ है जब से केंद्र में भाजपा के नेतृत्व की सरकार बनी। यह बात ही अपने आप में जवाब है सवाल का।

नई दिल्ली जिस तरह कश्मीर के मुद्दे को परखती है उसके लिए अधिकांश तौर पर भाजपा को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। इसने अपनी एक कट्टर नीति राज्य को दी। जिसका असर राज्य में मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक और सैनिक तौर पर पड़ा। मनोवैज्ञानिक तौर पर मोदी सरकार ने संविधान से धारा 35ए को हटा कर यहां की जनसंख्या संबंधी बदलाव लाने की कोशिश की जिसके तहत बाहरी लोगों को राज्य में बसने पर  रोक है। धारा 35ए की वैधता को चुनौती देती हुई छह याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल है। जब भी सुनवाई का वक्त आता है तो कश्मीर बेहद उद्विग्न हो उठता है और पूरा राज्य बंद रहता है।

राजनीतिक तौर पर राज्य की बहुसंख्यक समुदाय में राज्य के राजनीतिक खाने में अपनी भूमिका को हाशिए पर ही मान रखा है।

जबकि पीडीपी – भाजपा गठबंधन सरकार में भाजपा ने इस सोच को राज्य सरकार का एजेंडा तय करते हुए इस्तेमाल किया। जम्मू-कश्मीर के मौजूदा राज्यपाल सत्यपाल मलिक के बारे में यह कहा जाता है कि वह भाजपा के पुराने समय के एजेंडे  को ही अमल में लाने पर जुटे हैं। मलिक की यहां अपनी नियुक्ति के साथ ही बेहद जल्दबाजी में कानून बनाने जुटे हैं। वे ऐसे विवादास्पद आदेश जारी करते हैं जिन्हें किसी चुनी गई सरकार को ही आपस में समुचित राय-मश्विरे के बाद घोषित करना चाहिए।

ऐसा ही एक आदेश है लद्दाख को अलग डिवीजन का दर्जा देना जो अब तक कश्मीर घाटी का ही एक हिस्सा रहा है। हालांकि इसे डिवीजन बनाने की मांग अर्से से होती रही है । लेकिन ऐसी ही मांग तो जम्मू में पीर पंजाल और चिनाब घाटी में भी रही है। हालांकि प्रशासन ने उनकी मांगों पर कान नहीं दिया जब तक कि राज्य के राजनीतिक बोर्ड से सहमति नहीं मिले। लेकिन परिषद ने आदेश जारी भी कर दिया। उसकी इत्तला तक नहीं की।

यह कदम राज्य में इतनी समस्या खड़ी कर रहा है कि पीडीपी  नेता और जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस फैसले को गंभीर अपवाद माना।

‘आप (केंद्र) राज्य के मुस्लिम बहुलता की पहचान तोडऩेे की कोशिश कर रहा है। हम यह नहीं होने देंगे। यह बहुत ही खतरनाक होगा।’ उन्होंने लद्दाख को डिवीजन का दर्जा दिए जाने पर संवाददाता सम्मेलन में कहा। ‘ हम यह कहना चाहते हैं न केवल राज्यपाल से बल्कि भारत सरकार से भी कि आप आग से खेल रहे हैं। आप मुसलमानों को जम्मू और कश्मीर में कमज़ोर करना चाहते हैं। आप उन्हें अलग-अलग दर्जे में विभाजित कर रहे हैं मसलन शिया-सुन्नी, कश्मीरी-पंजाबी, गुज्जर और पहाड़ी।

बहरहाल यह नई दिल्ली की कठिन यु़द्धोत्सुक नज़रिया उस हालात के प्रति है जिससे कश्मीर में गुस्सा और अलगाव की भावना और बढ़ी है। यह पुलवामा धमाके में दिखा भी है। दक्षिण एशिया टेररिज्म पोर्टल के अनुसार  नागरिक, सुरक्षा दस्ते और आतंकवादी 2014 के बाद से खासे मारे गए हैं। जिनकी संख्या 1500 से भी ज़्यादा है। इनमें से 586 में 160 नागरिक, 267 कथित आतंकवादी और 159 सुरक्षा कर्मी  2018 में मारे गए। यह साल पूरे दशक में सबसे ज़्यादा मौतों का साल रहा।

इसी अवधि में कश्मीर में 2016 में बड़े पैमाने पर आक्रोश दिखा जब हिज्बुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी मारा गया। इस आक्रोश में 100 से ज़्यादा प्रदर्शनकारी मारे गए। कई सौ से ज़्यादा लोग बच्चे सुरक्षा दस्तों द्वारा इस्तेमाल की गई पेलैट्स गन के कारण अंधे हुए, घायल हुए। घाटी में प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के नाम पर लोगों की हत्याएं हुई। उन्हें अंधा कर दिया गया। इस कारण भी नई दिल्ली  के खिलाफ घाटी में नाराजग़ी बढ़ी है। जिसके कारण युवकों ने खुद को आतंकवादी बना लेना पसंद किया है।

‘सच्चाई यह है कि चार साल में कश्मीर घाटी में ऐसी  सैनिक कार्रवाई चल रही है जिसे पूरी तौर पर छूट है। कश्मीर में शांति के नाम पर हत्याएं हो रही हैं। इससे न केवल आतंकवादी मारे गए बल्कि जन प्रदर्शनकारी भी’ कहते हैं नसीर अहमद। नसीर स्थानीय निवासी है।’ पेलेटगन का इस्तेमाल हजारों कश्मीरियों को अंधा बनाने के तौर पर किया गया।

इससे घनघोर पीड़ा कश्मीरियों को हुई। लेकिन देश की मीडिया, सुरक्षा और राजनीतिक लोगों ने इस पर खुशियां मनाई। अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए टेलीविजन एंकरों ने बहते हुए कश्मीरी खून और कष्ट को खूब भुनाया। इस संघर्ष के चलते दोनों की ओर अमानुषिकता बढ़ी।

हम अब किस ओर

हालात अब बहुत ही अनिश्चित हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि भारत और पाकिस्तान ‘बहुत ही खतरनाक हालात’ से गुजऱ रहे हैं। भारत अब पाकिस्तान के खिलाफ जो भी बदले की कार्रवाई शुरू कर चुका है। उससे हालात और ज़्यादा बिगड़ गए हैं, सुधरने की बजाए और ज़्यादा नुकसान। भारत और पाकिस्तान में बातचीत की संभावना दूर-दूर तक नजऱ नहीं आती। बशर्ते नाटकीय तौर पर दोनों देशों के लिए कहीं कुछ बेहतर होता न दिखे। लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव और कश्मीर में हिंसा की वजहों के समाधान के लिए संवाद बहुत ज़रूरी है कहते हैं, ‘जम्मू और कश्मीर के इतिहासकार सिद्दीक वहीद अपने एक लेख में।’

तमाम शोर के बाद ही खामोशी के साथ ही संवाद भी ठहर गया है। कि कैसे दक्षिण एशिया इस मुकाम पर पहुंच गया और हमें अब क्या करना है। जो कुछ सुनाई दे रहा है वह यही है कि कश्मीरियों में राक्षसी प्रवृतियां हावी हैं और पाकिस्तान को ‘कुचल डालो।’ वाहिद लिखते हैं, ‘भले ही यह घिसा-पिटा ही लगे पर कश्मीर फसाद पर बातचीत होनी ही चाहिए क्योंकि इसका न होना बहुत खतरनाक है।’

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