पुरानी कहानी का पुनर्पाठ

शहर के शांत होने की वजह भी मुझे जल्द ही समझ में आ गई. शहर बोला, ‘मुझे ऐसी नजरों से मत देखो. इसमें मेरा कोई कसूर नहीं. अगर मुझे नींद से जगाना ही था, तो उस भूखे बच्चे को जोर से चीखना-चिल्लाना था न!’ शहर की सफाई सुनकर मैं सोच में पड़ गया. यह इसकी क्रूरता कही जाए या उसका भोलापन या कि हाजिरजवाबी! मैं अभी सोच रहा था कि शहर चलने को हुआ. शहर के पास इतना समय कहां! मैंने उसे रुकने का इशारा किया, मगर वह नहीं रुका. जाते हुए शहर को मैंने जोर से कहा, ‘लगता है कि तू संज्ञाशून्य हो गया है, तभी स्वत: संज्ञान को भूल गया है. अरे पगले, जोर लगाने के लिए भी तो जोर चाहिए. मैं समझ गया, तुझे सिसकियों की जगह शोर चाहिए.’

कह नहीं सकता शहर मेरी बात सुन पाया कि नहीं, क्योंकि मेरे देखते ही देखते शहर भागने लगा था. मित्रों, शहर की यह कहानी आज की नहीं, कल की नहीं बरसों पुरानी है. फुटपाथ पर भूख से व्याकुल बच्चा रोता है और शहर आराम से सोता है. मासूमों-मजलूमों की सिसकियां शहर के तेज खर्राटों में खो जाती हैं. अगली सुबह शहर जगता है, काम पर चलता है, दिन ढलता है, शाम होती है, रात आ जाती है और वही पुरानी कहानी एक बार फिर ताजा-तरीन होकर हमारे सामने आ जाती है. जानते हो कल रात शहर में क्या हुआ? कल रात भी भूख से व्याकुल बच्चा रोता रहा… रोता रहा… और शहर  सोता रहा… सोता रहा…
-अनूप मणि त्रिपाठी

1 COMMENT

  1. जब बचे पर बचा पैदा कर रहे थे तब नही सोचा ़े कहां रहेंगे कया खायेंगे कया पियेंगे परीणाम सामने आया तो रोते कयों हो
    होभुगतो अब इंदरागांधी ने चेतावनी दी थी समझे नही अब भारत दुनियां का सबसे बडा नरक बन चुका है जोलोग नरक मे विशवास नही करते वो टुरिसट बनकर यहां आयेंगे अछा धंधा चलेगा हम मालामाल होंगे

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