पाकिस्तान में सत्ता पलट

नयी शहबाज़ सरकार से भारत को बेहतर रिश्तों की उम्मीद

पाकिस्तान में थोड़े दिन चले राजनीतिक घटनाक्रम के बाद सत्ता पलट गयी और शहबाज़ शरीफ़ के नेतृत्व में विपक्ष की साझी सरकार सत्ता में आ गयी। पड़ोस में हुए इस राजनीतिक बदलाव के बाद भारत में द्विपक्षीय बातचीत की उम्मीद की जाने लगी है। इसका कारण है- नये प्रधानमंत्री शहबाज़ के बड़े भाई पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के साथ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहतर सम्बन्ध होना। जम्मू-कश्मीर में धारा-370 ख़त्म होने जैसे घटनाक्रमों के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि पाकिस्तान का नया नेतृत्व भारत के साथ रिश्तों को लेकर क्या रूख़ अपनाता है? इसकी सम्भावनाओं पर बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-

इमरान ख़ान जब सत्ता के आख़िरी हफ़्ते में थे और वहाँ जबरदस्त राजनीतिक हलचल थी, तो इस बीच उन्होंने वहाँ के सेना प्रमुख और कुख्यात सरकारी एजेंसी आईएसआई के प्रमुख को हटाने का इरादा बनाया था। भारत पाकिस्तान के घटनाओं पर नज़र रखे हुए था और हमारे देश के थिंक टैंक में यह आशंका उभरी थी कि इमरान की इस कोशिश के नाकाम होने पर कहीं सेना सत्ता न हथिया ले। हालाँकि ऐसा नहीं हुआ और विपक्ष के गठबंधन ने इमरान ख़ान को सत्ता से बाहर करके अपनी सरकार बना ली। नये प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के अब तक के राजनीतिक सफ़र को देखें, तो उनके बयान भारत को लेकर मिलेजुले रहे हैं। हालाँकि यह तय है कि शहबाज़ के राजकाज में उनके भाई पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ का दख़ल रहेगा। लिहाज़ा सम्भावना है कि सरकार के बाक़ी बचे डेढ़ साल में भारत से रिश्ते सुधारने की पहल हो। शरीफ़ भारत के पड़ोसी देशों के उन नेताओं में शामिल हैं, जो सन् 2014 में नरेंद्र मोदी के चुनाव जीतने पर उनके शपथ ग्रहण में ख़ासतौर पर शामिल हुए थे। बहुत कम लोगों को पता होगा कि शरीफ़ बंधुओं के पूर्वज भारतीय कश्मीर के अनंतनाग से ताल्लुक़ रखते थे। वैसे सत्ता में आने के बाद अपने पहले बयान में शहबाज़ ने कश्मीर राग छेड़ा है। लेकिन यह उनकी राजनीतिक मजबूरी हो सकती है; क्योंकि सेना कश्मीर के मसले पर राजनीतिक दबाव बनाकर रखती है। फिर भी उम्मीद की जानी चाहिए कि जम्मू-कश्मीर को लेकर शहबाज़ सकारात्मक पहल करेंगे।

पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन भारत के लिए इसलिए भी बहुत अहम है कि पड़ोस के अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत है और चीन के साथ भारत की तनातनी कम नहीं हुई है। यूक्रेन युद्ध के चलते वैश्विक राजनीतिक और कूटनीतिक स्थितियाँ बदली हैं और भारत भी इससे बड़े स्तर पर प्रभावित हुआ है। ऐसे में पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों को बेहतर करने की कोशिश होती है, तो यह बेहतर ही होगा।

शहबाज़ शरीफ़ के लिए आने वाला समय काफ़ी चुनौतीपूर्ण होगा, इसमें कोई दो-राय नहीं। उन पर आंतरिक और बाहरी दोनों ही दबाव रहेंगे। इमरान ख़ान ने जिस तरह जाते-जाते अमेरिका को कोसा है, उससे पाकिस्तान के राजनीतिक और ब्यूरोक्रेटिक हलक़ों में काफ़ी बेचैनी महसूस की गयी थी। भले पाकिस्तान की जनता अमेरिका को बहुत पसन्द न करती हो, वहाँ के हुक्मरान यह समझते हैं कि सीधे अमेरिका से पंगा लेना उनके देश को बहुत मुश्किल में डाल सकता है। यह माना जाता है कि इमरान ख़ान के अपने ख़िलाफ़ होने से अमेरिका सख़्त नाराज़ था और वह उन्हें सत्ता से बाहर करना चाहता था। ज़ाहिर है शहबाज़ शरीफ़ को उस मोर्चे पर भी काम करके अमेरिका से पाकिस्तान के रिश्तों को पटरी पर लाना होगा।

इमरान ख़ान ने भले ही जाते-जाते भारत का गुणगान किया हो; लेकिन यह कड़वा सच है कि उनके तीन साल के सत्ताकाल में भारत और पाकिस्तान के रिश्ते निम्न स्तर पर रहे। न कोई बातचीत हुई और न किसी तरह की पहल। उलटे कश्मीर को लेकर तल्ख़ियाँ और गहरी हुईं। दोनों देशों के बीच पहले से जो आदान-प्रदान था, वह भी पूरी तरह से बन्द हो गया। हालाँकि शहबाज़ शरीफ़ के आने से कुछ बेहतर होने की उम्मीद की जा सकती है; भले उनके पास अगले चुनाव से पहले बहुत कम वक़्त है। दूसरे जिस गठबंधन के वह नेता हैं, उसमें भारत के साथ रिश्तों को लेकर गम्भीर तरह की वैचारिक भिन्नता है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि शहबाज़ और नवाज़ अब भारत से कैसे रिश्ते रखते हैं? क्योंकि अब नवाज़ शरीफ़ के पाकिस्तान लौटने की सम्भावना है।

हालाँकि ज़्यादातर जानकार मानते हैं कि अब भारत की पहल ज़्यादा महत्त्वपूर्ण होगी, जो हमेशा से पाकिस्तान में वहाँ की सत्ता और सेना / आईएसआई के आतंकवाद को प्रश्रय देने का सख़्त विरोध करता रहा है और आज भी अपनी इस नीति पर कायम है। जम्मू-कश्मीर में स्थितियाँ पहले से काफ़ी बदल गयी हैं और वहाँ राज्य को विशेष दर्जा देने वाली धारा-370 को कब का ख़त्म किया जा चुका है। भारत की सरकार आने वाले महीनों में वहाँ विधानसभा के चुनाव कराने की सोच रखती है। लिहाज़ा पाकिस्तान से बातचीत की पहल सूबे में माहौल को बेहतर कराने में मददगार साबित हो सकती है। इससे चुनाव को शान्तिपूर्ण तरीके से निपटाने में भी मदद मिलेगी। भले ही वहाँ की अलहदगी पसन्द हुर्रियत कॉन्फ्रेंस और आतंकवादी तंज़ीमें चुनाव के बॉयकॉट की अपील हमेशा करती रही हैं और इस बार भी करेंगी।

 

इमरान और शहबाज़

इसमें कोई दो-राय नहीं कि इमरान ख़ान जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने, तो चीन की तरफ़ उनके देश का झुकाव ज़्यादा हुआ। इमरान ख़ान के अमेरिका विरोधी सुर काफ़ी पहले से महसूस किये जाने लगे थे। यहाँ तक कि पिछले एक साल में जब जो बाइडेन अमेरिका के राष्ट्रपति बने, तो एक बार भी उन्होंने इस्लामाबाद फोन नहीं किया, जबकि इस दौरान उनकी प्रधानमंत्री मोदी से कई बार बात हुई है। शायद इसका ही असर था कि इमरान ख़ान यूक्रेन युद्ध शुरू होने से ऐन पहले क्रेमलिन पहुँच गये और उन्होंने राष्ट्रपति पुतिन से मुलाक़ात की। माना जाता है कि इसके बाद ही इमरान ख़ान की सत्ता की उल्टी गिनती शुरू हो गयी।

भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में हाल के वर्षों में काफ़ी तल्ख़ी दिखी है। ख़ासकर पुलवामा और बालाकोट के समय ऐसा लगने लगा था कि कहीं युद्ध की नौबत ही न आ जाए। इमरान का स्टैंड भी भारत को लेकर इन ढाई-तीन साल में अलग ही दिखा है। पुलवामा के आतंकी हमले और बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में जो कड़वाहट आयी थी, वह लगातार बढ़ी है। इमरान कई मौक़े पर सीधे प्रधानमंत्री मोदी पर हमला करते रहे और उन्होंने आरएसएस को भी निशाने पर लिया। भले राजनयिक स्तर पर भारत और पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर एक-दूसरे से जुड़े रहे हों, दोनों में रिश्ते ख़राब होते गये हैं।

यह एक कड़वा सच है कि भारत और पाकिस्तान के बीच जब भी रिश्ते बेहतर करने की पहल होती है, वहाँ की एजेंसी आईएसआई उप पर मिट्टी डालने में कोई कसर नहीं छोड़ती। इसका कारण आईएसआई है। क्योंकि यदि भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बेहतर होते हैं, तो उनकी कोई क़ीमत नहीं रह जाएगी। लिहाज़ा रिश्ते पटरी पर लाने की राजनीतिक कोशिश इतनी आसान नहीं होगी।

पाकिस्तान की राजनीति के जानकार मानते हैं कि शहबाज़ के सेना के अच्छे सम्बन्ध रहे हैं। उनके मुताबिक, शहबाज़ के ताक़तवर फौज के साथ सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध हैं और जिस तरह सेना आज भी सुरक्षा और विदेश नीति के मामलों में अपना दख़ल रखती है, उसमें राजनीतिक सरकार के लिए स्वतंत्रता के साथ काम करने में दिक्क़त रहती ही है। लेकिन एक सच यह भी है कि हाल के कुछ वर्षों में पाकिस्तान की सेना की ताक़त कुछ कम हुई है।

कई जानकार मानते हैं कि पाकिस्तान में इमरान ख़ान बनाम विपक्ष की हाल में जो राजनीतिक जंग हुई, यदि सेना पुराने समय वाले तेवर दिखाती, तो सत्ता आज शहबाज़ के हाथ नहीं, सेना के हाथ होती। पाकिस्तानी जनरल बाजवा के समय भले सेना का विदेश और रक्षा मामलों में हस्तक्षेप रहा हो, यह उस स्तर का नहीं था जो जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के समय रहा था। उन्होंने सन् 1999 में सत्ता पर क़ब्ज़ा किया था। वैसे देखा जाए, तो पाकिस्तान में हुए अब तक के तख़्तापलट में यह आख़िरी था। उसके बाद पाकिस्तान में राजनीतिक सरकारें ही रहीं, भले वो पूरा समय न चल पायी हों। वैसे जनरल जिया-उल-हक़ तानाशाह के रूप में सबसे लम्बा शासन करने वाले फ़ौजी जनरल रहे, जिन्होंने क़रीब 11 साल सत्ता सँभाली। उनकी एक हेलीकॉप्टर हादसे में मौत हुई। इस हादसे को हमेशा संदिग्ध माना जाता रहा है।

इमरान ख़ान के जाने से दोनों देशों के सम्बन्धों में एक  ख़ालीपन तो आया है; लेकिन इमरान का जाना इस लिहाज़ से बेहतर हो सकता है कि उनके काल में बातचीत के स्तर पर कुछ नहीं हुआ। जाते-जाते भले इमरान ने भारत की विदेश नीति के क़सीदे पड़े; लेकिन यह उनकी आंतरिक राजनीति थी। उन्होंने बतौर प्रधानमंत्री भारत के ख़िलाफ़ काफ़ी ख़राब भाषा का इस्तेमाल किया था।

हालाँकि एक और सच यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी के शहबाज़ शरीफ़ के भाई पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से अच्छे ताल्लुक़ात रहे हैं। जानकार मानते हैं कि शहबाज़ सरकार पर नवाज़ शरीफ़ की सोच की छाप रहेगा और हस्तक्षेप भी। लिहाज़ा उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले कुछ महीनों में भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत का रास्ता खुले। हालाँकि इसमें एक पेच यह ज़रूर है कि पाकिस्तान में अक्टूबर, 2023 में अगले चुनाव होने हैं। लिहाज़ा शरीफ़ बंधुओं का ध्यान आंतरिक राजनीति पर ज़्यादा रहेगा।

लेकिन जानकार मानते हैं कि इस बात की काफ़ी सम्भावना है कि यदि कोई बड़ी (आतंकी) घटना नहीं होती है, तो शहबाज़ कुछ महीने में भारत के साथ पटरी से उतरे रिश्तों को सही करने की पहल कर सकते हैं। इसमें निश्चित ही नवाज़ शरीफ़ की बड़ी भूमिका होगी। नवाज़ शरीफ़ की पार्टी पीएमएल (एन) का रूख़ हमेशा से भारत से बातचीत की समर्थक पार्टी वाला माना जाता रहा है।

पुराने समय की याद करें, तो ज़ाहिर होता कि अटल बिहारी वाजपेई से लेकर नरेंद्र मोदी तक नवाज़ शरीफ़ के व्यक्तिगत रिश्ते ख़राब नहीं रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने शरीफ़ की माँ के लिए साड़ी भिजवायी, तो उधर से मोदी की माँ के लिए शरीफ़ की तरफ़ से ख़ास साड़ी आयी। अच्छी बात यह है कि तमाम तल्ख़ियों के बावजूद दोनों देशों के बीच सीमा तनाव के लिए युद्ध विराम अभी भी काम कर रहा है।

पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल बाजवा ने हाल में कहा था कि यदि भारत चाहे, तो पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे पर आगे बढ़ सकता है। इसे सकरात्मक रूप से देखा जाना चाहिए, क्योंकि हमेशा पाकिस्तान की सेना पर शक के आधार पर हमेशा अविश्वास नहीं किया जा सकता; क्योंकि वैश्विक स्तर पर हालत में काफ़ी बदलाव आया है। दूसरा महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि दक्षिण एशिया या बाहर अपने पड़ोसियों से भारत के सम्बन्धों में सुधार आया है। चाहे नेपाल हो, मालदीव हो या यूएई और सऊदी अरब हों। चीन को छोड़कर भारत ने इन देशों से रिश्तों को बेहतर किया है।

हंबनटोटा बंदरगाह पर चीन के श्रीलंका के साथ समझौते के बाद उसका जो झुकाव बीजिंग की तरफ़ था, उससे भारत में काफ़ी चिन्ता थी। लेकिन श्रीलंका के साथ बेहतर सम्बन्ध बनाने की जो कोशिश भारत ने की थी, वह श्रीलंका के हाल के आर्थिक संकट में भारत की मदद से और मज़बूत हुई है। अरब देशों के साथ भारत के रिश्ते और भी महत्त्वपूर्ण हैं। इसका दबाव पाकिस्तान पर भी पड़ता है। पाकिस्तान का नेतृत्व इसे समझता है। इमरान ख़ान के शासनकाल में अमेरिका के साथ पाकिस्तान के गड़बड़ हुए रिश्तों से पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व ही नहीं, सेना पर भी दबाव बना है।

पाकिस्तान को जानने वाले कहते हैं कि वहाँ सेना की राजनीतिक भूमिका धीरे-धीरे सीमित हो रही है। इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव के मामले में एक हफ़्ते की सियासी खींचतान के बाद पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय की तरफ़ से बड़ा फ़ैसला आना अपने आपमें अहम है। हाल के दशकों में किसी सरकार को हटाने में सेना की ही भूमिका रहती आयी है। लेकिन इस बार पाकिस्तान के राजनीतिक घटनाक्रम के बीच सेना अध्यक्ष बाजवा की तरफ़ से मात्र एक ही टिप्पणी आयी, जिसमें उन्होंने कहा कि यह एक राजनीतिक घटनाक्रम है और सेना का इससे कुछ लेना-देना नहीं। इसका श्रेय इमरान ख़ान को भी कुछ हद तक दिया जा सकता है, जिन्होंने अमेरिका की दादागिरी के ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत भी दिखायी।

कुछ जानकार इसे पाकिस्तान में लोकतंत्र मज़बूत होने के संकेत के रूप में देखते हैं। यदि हक़ीक़त में पाकिस्तान में लोकतंत्र मज़बूत होता है, तो इसे भारत ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया क्षेत्र के लिए शुभ माना जाएगा। यदि पाकिस्तान की विदेश नीति में सेना का हस्तक्षेप कम या ख़त्म होता है तो राजनीतिक संस्थान अपने हिसाब से भारत या दूसरे पड़ोसी देश से नीति तय कर पाएगा। नवाज़ शरीफ़ यूपीए सरकार के समय सन् 2013 में भारत आये थे। उस दौरान शहबाज़ पाकिस्तान हिस्से के पंजाब के मुख्यमंत्री थे। नवाज़ ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाक़ात के बाद पत्रकार वार्ता (प्रेस कॉन्फ्रेंस) में भारत के साथ मिलकर काम करने पर ज़ोर दिया था।

याद रहे 25 दिसंबर, 2015 में प्रधानमंत्री बनने के कुछ महीने बाद नरेंद्र मोदी ने रूस से लौटते हुए अचानक लाहौर में उतरकर सबको चौंका दिया था। ख़ुद पाकिस्तानी नवाज़ शरीफ़ ने हवाई अड्डे आकर उनकी अगुआई की थी। उस समय ऐसा लगा था कि यह दोनों देशों के रिश्तों में नया अध्याय लिखने की तैयारी है। हालाँकि इस मुलाक़ात के हफ़्ते भर बाद ही पठानकोट एयरबेस पर पाकिस्तानी आतंकियों ने हमला कर दिया। बहुत-से जानकार मानते हैं कि इस घटना के पीछे सेना और आईएसआई थे, जो नहीं चाहते थे कि दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व में दोस्ती हो और उनकी (सेना और आईएसआई की) अहमियत कम हो जाए।

 

अब क्या करेंगे इमरान?

सत्ता में आकर ‘नया पाकिस्तान’ बनाने का वादा करने वाले इमरान ख़ान सत्ता चले जाने के बाद अब देश में जनता के बीच जाकर ‘आज़ादी की नयी जंग’ लडऩे का ऐलान कर चुके हैं। बिलावल भुट्टो ने उनकी सरकार जाने के बाद कहा था कि ‘पुराना पाकिस्तान’ लौट आया है; लेकिन पीटीआई नेता इसे ‘लुटेरों का फिर सत्ता में आना’ बता रहे हैं। इमरान का एजेंडा साफ़ है कि जनता के बीच रहकर वर्तमान सत्तारूढ़ गठबंधन को भ्रष्ट बताते जाना। पाकिस्तान में भ्रष्टाचार की जड़ें काफ़ी गहरी हैं। इमरान हाल के दशकों में पाकिस्तान के शायद इकलौते नेता हैं, जिन पर तीन साल सत्ता में रहने के बावजूद भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा है। यही कारण है कि ख़स्ता हो चुकी आर्थिक हालत और जबरदस्त महँगाई के बावजूद विपक्ष पर तीखे आक्रमण कर रहे हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार सीधे रूप से जनता को प्रभावित करने वाला मुद्दा है।

इमरान ख़ान ने आने वाले डेढ़ साल तक जनता के बेच रहकर रैलियाँ करने का ऐलान किया है। बहुत-से जानकार मानते हैं कि संसद में सरकार हारने के बावजूद इमरान ख़ान की जनता में लोकप्रियता है और वह अगले चुनाव में पीएमएल-एन और पीपीपी को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में रहेंगे, बशर्ते इस दौरान कोई बड़ा राजनीतिक उलटफेर न हो। इमरान ख़ान की राजनीतिक स्थिति वैसी ही है, जैसी आज भारत में नरेंद्र मोदी की है। जैसे यहाँ एक तरफ़ मोदी और और दूसरी तरफ़ सारा विपक्ष है, वैसे पाकिस्तान में एक तरफ़ इमरान ख़ान और दूसरी तरफ़ सारा गठबंधन (अब सत्तारूढ़) है।

इमरान ख़ान को लगता है कि यह गठबंधन टिकाऊ नहीं है। क्योंकि उनके जो मतभेद हैं, वो बहुत गहरे हैं। लिहाज़ा उनका रैलियों के ज़रिये जनता में बने रहने का अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को निर्देश इसी रणनीति का हिस्सा है, ताकि अगले चुनाव में सत्ता में लौटने का रास्ता खुला रहे।

 

धारा-370 और पाकिस्तान

जम्मू-कश्मीर में धारा-370 ख़त्म किये जाने पर पाकिस्तान के सभी राजनीतिक दलों का स्टैंड कमोवेश एक-सा रहा है। इसके बाद दोनों पक्षों में और दूरी आयी है। पाकिस्तान के किसी भी राजनीतिक नेता के लिए धारा-370 ख़त्म होने के बावजूद बातचीत के मेज पर आना उतना आसान नहीं है, क्योंकि सेना और आईएसआई दोनों इसे भारत के ख़िलाफ़ प्रोपेगंडा के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। भले भारत ने इसे अपना अंदरूनी मामला बताया था; लेकिन पाकिस्तान और उसके समर्थक अंतरराष्ट्रीय संगठन इसे वैश्विक मंच पर कश्मीरियों पर ज़्यादती बताते हुए भारत के ख़िलाफ़ प्रचारित करते रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान के नए नेतृत्व के लिए भी यह पेच रहेगा ही।

शहबाज़ शरीफ़ के बारे में कहा जाता है कि उनकी छवि कठिन कार्यों में कोई कसर न छोडऩे वाली रही है। हाल में एक टीवी इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया था कि उनके नेतृत्व में अमेरिका से सम्बन्ध कैसे होंगे? तो उनका जवाब था- ‘भिखारी कभी चुनाव करने की स्थिति में नहीं होता।’ पीएमएल (एन) के सांसद और शहबाज़ के क़रीबी समीउल्लाह ख़ान ने हाल में कहा था कि उनके नेता (शहबाज़) भारत के साथ सम्बन्ध के लिए नयी नीति बनाएँगे। उनके मुताबिक, शहबाज़ के नेतृत्व में पाकिस्तान, भारत के लिए नयी नीति के साथ आएगा। मूल बात है कि इमरान ख़ान शासन के पास भारत को लेकर कोई नीति नहीं थी या कमज़ोर थी, जिसने भारत को कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करने की अनुमति दी और ख़ान केवल असहाय होकर देखते रह गये।

हालाँकि प्रमुख पाकिस्तानी राजनीतिक विश्लेषक हसन अस्करी का कहना है कि भारत और पाकिस्तान को सबसे पहले संवाद शुरू करना चाहिए, जो भारत की तरफ़ से सन् 2014 में तब स्थगित कर दिया गया था, जब पठानकोट आतंकी घटना हुई थी। उनके मुताबिक, बातचीत शुरू किये बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता। उनका यह भी कहना कि चूँकि भारत ने वार्ता स्थगित की है, इसलिए इसे बहाल करने की ज़िम्मेदारी भारत पर है। पाकिस्तान की किसी सरकार ने सार्थक संवाद का विरोध नहीं किया है। हालाँकि इमरान ख़ान की तरफ़ से ऐसी कोई पहल तीन साल में नहीं हुई। वैसे अस्करी मानते हैं कि इमरान ख़ान के सन् 2018 में सत्ता में आने पर उन्होंने तो पहल की थी; लेकिन पुलवामा आतंकी हमले ने खटास भर दी।

जानकार कहते हैं कि पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन भारत-पाकिस्तान के बीच सम्बन्धों को नये सिरे से शुरू करने का मौक़ा बन सकता है। नये प्रधानमंत्री शहबाज़ कह चुके हैं कि इमरान ख़ान ने पाकिस्तान की विदेश नीति को नष्ट कर दिया। निश्चित ही यह बात भारत से रिश्तों के मामले में भी लागू होती है। यह जगज़ाहिर है कि आज भी पीएमएल (एन) के सभी राजनीतिक फ़ैसले नवाज़ शरीफ़ ही लेते हैं। लिहाज़ा उनके भाई के नेतृत्व में पाकिस्तान में आयी सरकार को नवाज़ की तत्कालीन सरकार के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है। नवाज़ और प्रधानमंत्री मोदी के सम्बन्ध इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।