पांच बार मुख्यमंत्री ही नहीं कवि और पत्रकार भी

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द्रविड़ राजनीति का यह दिग्गज खिलाड़ी राज्य सरकारों, राज्यों की स्वायत्तता और संघीय सोच का हिमायती था। उन्होंने ही यह आदेश जारी कराया था कि आज़ादी के दिन मुख्यमंत्री राज्य में झंडा फहरा सकेंगे।

तमिलनाडु में पांच बार मुख्यमंत्री बनने वाले द्रमुक अध्यक्ष राजनीति में पचास साल पूरे करने के बाद मंगलवार को शाम छह बजे चिरनिद्रा में लीन हो गए। मृत्यु के समय वे 94 साल के थे। इन्फेक्शन और वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों से तकरीबन 11 दिन तक वे कावेरी अस्पताल में जूझते रहे। उनकी मौत पर राष्ट्रीय झंडा झुकाया गया। एम करूणानिधि को प्यार से कलाईनर (कला विशेषज्ञ और लेखक) के रूप में याद किया जाता था। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विभिन्न दलों के नेताओं ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी। तमिलनाडु सरकार ने सात दिन के राजकीय शोक की घोषणा की।

हज़ारों की संख्या में लोग अस्पताल पर जुटे थे। बाद में अस्पताल से उनका शव शाम को उनके आवास गोपालपुरम ले जाया गया। जिससे लोग अपने प्रिय दिग्गज नेता को देख सकें। बाद में उनका शव अन्य सिलाई में राजाजी हाल ले जाया गया। जिससे लोग अंतिम दर्शन कर सकें।

द्रविड़ आंदोलन के दिग्गज नेताओं में एक करूणानिधि की पत्नियां हैं दयालु अम्मपल और राजथी अम्माल। इनके पहले पुत्र है एमके मुथु (उनकी पहली पत्नी पद्मावती से जन्मे), एमके अलागिरी, एनके स्टालिन, एमके तमिलारासु और बेटी (मां दयाजु अम्माल) और एम कनिमोजी (मां राजथी अम्माल). द्विड़ आंदोलन के अपने सभी सम सामयिको को पीछे छोडऩे वाले एम करूणानिधि को 28 जुलाई को ब्लड प्रेशर कम हो जाने पर अस्पताल में भरती कराया गया। तब से ही वे अस्पताल में थे। सोमवार से उनकी तबियत खराब होने लगी। उनके महत्वपूर्ण अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। मंगलवार की शाम साढ़े चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।

राज्य के वे अकेले मुख्यमंत्री थे जिनकी सरकार दो बार बर्खास्त हुई थी। एक बार आपातकाल में 1976 में और दूसरी बार 1991 में जब उन्होंने धारा 356 हटाई थी। 1957 से वे विधानसभा की तेरह सीटों पर विजयी होते रहे हैं। उन्होंने राज्य के लिए एक तमिल गीत भी चुना था जिसके कवि थे मैनम मानियम सुंदरनार। उनका गीत था ‘तमिल थाई वाज्झतुÓ संगीतज्ञों के परिवार में जन्मे एम करूणानिधि तंजवुर जि़ले के छोटे से गांव थिरूकुवलाई में पैदा हुए थे। उनके पिता मुथुवेलर नागस्वर के कलाकार थे। करूणानिधि से भी यह सीखने को कहा गया पर वे तैयार नहीं हुए। वे हिंदी भाषा लादे जाने के विरोधी थे। उन्होंने 1938 में इसके खिलाफ आंदोलन किया। शुरू के सालों में पूर्वी तंजवौर में उन्होंने कम्युनिस्टों की लोकप्रियता देखी। उनके मन में तमिल भाषा और सामाजिक न्याय के लिए ललक थी। वे जस्टिस पार्टी की विचारधारा की ओर आकृष्ट हुए। उस समय पेदीथार ईवी रामासामी और सी एन अन्नादोरई इसके जाने माने नेता थे और फिर डीएम में। दोनों ही जगह वे बढ़े। अन्नादुराई के जाने के बाद पार्टी को चलाने का जुमा उनमें था। पार्टी में उनका विकास और सरकार में उनके मुख्यमंत्री बनने के साथ ही उन लोगों का अता-पता नहीं चला जो पार्टी सुप्रीमो अन्नादुराई को हमेशा घेरे रहते थे। धीरे-धीरे पूरी पार्टी उनके साथ हो गई।

खुद एक अच्छे लेखक, भाषण में माहिर और पत्रकार होने के कारण उन्होंने पार्टी का मुख्य पत्र मुरासौली का प्रकाशन शुरू किया। आपातकाल के दौरान उन्होंने सेंसरशिप का मुकाबला किया उन्हें अनुमति नहीं थी कि वे उन लोगों के नाम छापे जो मेन्टिनेंस ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट (मीसा)  के तहत गिरफ्तार किए गए। उन्होंने उन लोगों के नाम छापे जो द्रमुक के संस्थापक अन्नादुराई को श्रद्धांजलि नहीं दे पाए। यह ऐसा संदेश था जिस पार्टी के लोग अच्छी तरह समझते थे। संवाद लेखन और स्क्रीन प्ले राइटर बतौर उन्होंने 77 फिल्मों में काम किया। उनके लिखे संवादों के चलते तमिल सिनेमा के तीन अभिनेता बतौर हीरो ज़रूर उभरे। उनकी पहली फिल्म थी राजकुमारी जिसके संवाद उनके लिखे थे। इसी फिल्म से हीरो बने थे एमजी रामचंद्रण। पाराशक्ति दूसरी फिल्म थी जिसके संवादों से शिवाजी गणेशन के फिल्म दुनिया में आने की मुनादी हुई। तीसरे अभिनेता थे एसएस राजेंद्रन। उन्हें अभाईउप्पन के लिए जाना जाता है। उसके लिए कभी मौका नहीं मिला। इसके भी संवाद लेखक एम करूणानिधि थे।

तमिल भाषा के हिमायती थे कलाईनर

प्राचीन भारतीय संस्कृति में तमिल भाषा काफी समृद्ध मानी जाती रही है। प्राचीन समाज साहित्य की जानकारी काफी हद तक संगम साहित्य में मिलती है। इसे छह हजार वर्ष पुराना माना जाता है। संगम साहित्य प्राचीन तमिल लिपि में ही है। कुछ सामग्री संस्कृत में भी मिलती है। इसके विद्वान लेखक- अनुवादकों की तादाद भी खासी कम हो चली है। जून 2010 में एम करूणानिधि ने विश्व क्लैसिक भाषाओं में से शास्त्रीय भाषा तमिल का आयोजन किया था। यह आयोजन पूरी तौर पर कामयाब हो इसके लिए वे प्राण-प्रण से जुटे । तमिलनाडु में राजनीति के हथियार के तौर पर भाषा का भी इस्तेमाल होता है। विधानसभा चुनाव 1967 में द्रमुक ने कांग्रेस को परास्त किया। वे फरवरी 1969 में मुख्यमंत्री हुए। उन्होंने तमिल के विकास के लिए काफी काम किया।  वे पांच बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। केंद्र सरकार ने अक्तूबर 2004 में तंिमल को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया। हालांकि तब वे मुख्यमंत्री नहीं थे। लेकिन भाषा के प्रति उनमें समर्पण भाव था। तब 2004 के लोकसभा चुनावों में युनाइटेड प्रोगेसिव एलायंस की सरकार सत्ता में आई। इसने सत्ता में आते ही पहले पुरानी मांग को तुंरत स्वीकार किया। इसलिए यूपीए को टिके रहना भी करूणानिधि के समर्थन के कारण था। चुनाव में द्रमुक नेतृत्व में बने गंठजोड़ ने 40 सीट जीती। तमिलनाडु के अलावा पुडुचेरी में भी इसकी जीत हुई। उस समय राष्ट्रपति थे एपीजे अब्दुल कलाम। वे खुद तमिल भाषी थे। उन्होंने भी तमिल को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया। मार्च 2006 में मैसूर में सेंट्रल इंस्टीच्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज के परिसर में शास्त्रीय तमिल भी पहुंची। जून 2010 में यह चेन्नई आ गई। जून 2010 में द्रमुक राज में कोयंबटूर में विश्व शास्त्रीय तमिल सम्मेलन आयोजित किया। इसमें भी करूणानिधि ने बहुत रूचि ली। कई मौकों पर उन्होंने थिरूवल्लुवर में नैतिकता पर लिखने वाले कवि थिरूक्कुराल के प्रति अपना प्रेम दिखाया। 1970 के मध्य में चेन्नई कोट्टम में स्मारक बना। कुछ सप्ताह बाद यह जनता के लिए खुला। लेकिन सरकार ही बर्खास्त हो गई। करूणानिधि जनवरी 1976 में सरकार से बाहर हो गए। फिर वे जनवरी 1989 में सत्ता में लौटे । उन्होंने विधानसभा चुनाव 1989 में जीत हासिल की। इसी मेमोरियल में उन्होंने शपथ ली। कन्याकुमारी में थिरूवल्लुवर की मूर्ति स्थापित करने का उनका सपना पूरा हुआ जब 133 फीट लंबी मूर्ति लगी । उन्होंने 1972 में ही अपनी सरकार के मुख्यमंत्री रहते हुए विद्वानों से पता लगा लिया था कि थिरूवल्लुवर पूर्व ईसा जनमें थे। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पुम्पुहार में शिल्प पड्डिकरम आर्ट गैलरी और तमिल भाषा के विकास का एक अलग विभाग खुलवाया। जब 2006 में वे मुख्यमंत्री हुए तो उन्होंने अध्यादेश जारी करके दसवीं कक्षा तक तमिल अनिवार्य भाषा की। उनके बाद जो दूसरी सरकार आई उसने भी कानून में बदलाव नहीं किया। करूणानिधि द्विभाषा कानून के पक्षधर थे लेकिन वे चाहते थे कि अंगे्रज़ी को शैक्षणिक संस्थानों में बतौर एक विषय पढ़ाया जाए।

द्रमुक के दिग्गज नेता की समाधि मैरीना बीच पर बनाने से सरकार का इंकार अदालत की अनुमति

तमिलनाडु सरकार ने ऐन मौके पर दिग्गज द्रमुक नेता एम करूणानिधि की समाधि मैरीना बीच पर बनाने की अनुमति देने से इंकार कर दिया। इससे परिवार और पार्टी के लोगों ने मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मद्रास हाईकोर्ट ने देर रात अनुमति दी कि मैरीना बीच पर बनी अन्ना समाधि के पास एम करूणानिधि की भी समाधि बनाई जाए।

करूणानिधि के निधन की घोषणा के पहले ही मंगलवार को द्रमुक नेता स्टालिन मुख्यमंत्री ईके पलानिस्वामी से मिले थे और मांग की थी कि उनके पिता की समाधि मैरीना बीच पर ही अन्ना समाधि के पास बनाने की इजाज़त दी जाए। मुख्यमंत्री ने अनुमति देने से इंकार कर दिया। स्टालिन के साथ उनके बड़े भाई एमके अलगिरी, सांसद बहन कनिमोजी और पार्टी के वरिष्ठ नेता गए थे। मुख्यमंत्री ने प्रस्ताव खारिज कर दिया और गांधी मंडपम् पर दो एकड़ की भूमि देने का प्रस्ताव किया।

मैरीना बीच एक तरह तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास की परत दर पतर खोलता है। यहां पर दिग्गज द्रविड नेताओं की समाधियां है। द्रविडों के आदि दिग्गज नेता सीएन अन्नादुरई, अभिनेता मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रम और पूर्व अभिनेत्री मुख्यमंत्री जे जयललिता की भी यहीं समाधियां है।

सरकार का कहना था कि मैरीना बीच पर इसलिए एम करूणानिधि की समाधि बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि उनकी मौत मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए नहीं हुई है। द्रमुक के एक वरिष्ठ नेता ने बताया करूणानिधि के परिवार के लोग राज्य की मुख्य सचिव गिरिजा वैद्यनाथ से मिले। लेकिन बात बनी नहीं। उनका कहना था कि मैरीना बीच की ज़मीन पर अदालत में ढेरों विवाद हंै।

इस विवाद को बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने बेतुका बताया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को दुख की इस घड़ी में इस बात को मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। अभिनेता और अब राजनीतिक कमल हसन ने भी कहा कि करूणानिधि की समाधि मैरीना बीच पर ही होनी चाहिए। कांगेे्रस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि विपदा के समय राज्य सरकार को सहानुभूतिपूर्वक इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए था। करूणानिधि भी तमिल जनता की आवाज़ थे। उन्हें वही स्थान दिया जाना चाहिए था। द्रमुक नेता सावन्ना ने कहा कि भाजपा-आरएसएस ने जानबूझ कर इस घड़ी में यह विवाद पैदा किया है।