'पहाड़' के हाथ से खिसकी सत्ता! | Tehelka Hindi

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‘पहाड़’ के हाथ से खिसकी सत्ता!

ऊपरी और निचले हिमाचल का मुद्दा दशकों से इस पहाड़ी सूबे की राजनीति पर हावी रहा है। इस बार राजनीति ने ऐसा खेल खेला कि इतिहास में पहली बार ऊपरी हिमाचल केंद्रीय भूमिका से बाहर हो गया। न मुख्यमंत्री उसके हिस्से आया और न नेता प्रतिपक्ष। इससे माकपा को इस इलाके में अपनी जड़ें फैलाने का अवसर मिला है। आने वाले सालों में असर क्या होगा इस मुद्दे पर आलेख।

2018-01-31 , Issue 01&02 Volume 10

jairam sworing

हिमाचल में पहली बार यह हुआ है कि सत्ता के केंद्र में शिमला कहीं नहीं। मुख्यमंत्री से लेकर सत्ता पक्ष भाजपा और विपक्ष कांग्रेस दोनों के सत्ता केंद्र इस विधानसभा चुनाव के बाद निचले हिमाचल को हस्तांतरित हो गए हैं। पिछले चार दशक में ऐसा कभी नहीं हुआ। मुख्यमंत्री निचले हिमाचल के मंडी जि़ले से हैं तो हाल ही में कांग्रेस ने अपने विधायक दल का नेता जिन मुकेश अग्निहोत्री को चुना है वे भी निचले हिमाचल के ही ऊना जि़ले से हैं। यही नहीं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतपाल सत्ती भी ऊना के ही रहने वाले हैं जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंदर सुक्खू निचले ही हिमाचल में हमीरपुर के रहने वाले हैं।
कांग्रेस के अब तक के सभी तीन मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार, राम लाल और वीरभद्र सिंह ऊपरी हिमाचल के हैं जबकि भाजपा के दोनों मुख्यमंत्री शांता कुमार (काँगड़ा) और प्रेम कुमार धूमल (हमीरपुर) निचले हिमाचल से रहे हैं। सत्ता के अलावा विपक्ष की भूमिका भी निचले हिमाचल में चले जाने से आने वाले सालों में हिमाचल की राजनीति दिलचस्प होगी। वीरभद्र सिंह के पुत्र विक्रमादित्य सिंह पहली बार विधायक बने हैं। कांग्रेस की राजनीति की मुख्य भूमिका में आने में उन्हें अभी बक्त लगेगा। लिहाजा ऊपरी हिमाचल के लिए कांग्रेस में बड़ी भूमिका संभालने वाला कोई नहीं दिखता। भाजपा की राजनीति तो शुरू से ही निचले हिमाचल के इर्द-गिर्द रही है। ऐसे में आने वाले सालों में कांग्रेस की राजनीति भी निचले हिमाचल में चले जाने की पूरी सम्भावना है।
वीरभद्र सिंह को छोड़ दिया जाए तो वर्तमान राजनीति में माकपा के राकेश सिंघा को ही ऊपरी हिमाचल में ताकतवर नेता माना जा सकता है, भले विधानसभा में पार्टी के वे इकलौते विधायक होंगे। जिस हलके से वे जीते हैं वहां से आठ चुनाव जीत चुकीं विद्या स्टोक्स का इस बार नामांकन ही रद्द हो गया था। 90 साल की विद्या वैसे भी अब चुनाव राजनीति से संन्यास की बात कर चुकी हैं। कांग्रेस ही नहीं भाजपा में भी वीरभद्र सिंह के बाद ऊपरी हिमाचल का अब ऐसा कोई नेता नहीं जो उनके कद की बराबरी करता हो। लिहाजा सिंघा के पास मौका है अपने कद को देखते हुए पार्टी का इस क्षेत्र में विस्तार करें।
सत्ता का निचले क्षेत्र में हस्तांतरण होने से कांग्रेस के बीच निचले क्षेत्र से मुख्यमंत्री पद के दावेदारी की जंग शुरू होगी। चूँकि इस इलाके से पहले कभी कांग्रेस ने मुख्यमंत्री नहीं दिया, विधायक दल के नेता चुने गए मुकेश अग्निहोत्री के पास इन पांच सालों में खुद को बेहतर नेता साबित करने का अवसर है। विधायक दल का नेता होने के कारण वही विपक्ष के भी नेता होंगे लिहाजा इस दौरान एक नेता के तौर पर उनकी परीक्षा होगी। यदि वे इसमें सफल रहते हैं तो उनके लिए भविष्य में मुख्यमंत्री बनने की बहुत अधिक सम्भावना रहेगी।
मुकेश को पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का बेहद करीबी माना जाता है लिहाजा सिंह का समर्थन मिलने से उनकी ताकत विधायक दल में मजबूत रहेगी। हां, कांग्रेस संगठन में वीरभद्र सिंह विरोधी सुखविंदर सुक्खू के होने से ज़्यादा सम्भावना यही है कि पार्टी में पहले जैसी स्थिति बनी रहेगी। यानी विधायक दल एक तरफ और पार्टी संगठन एक तरफ। यह देखने वाली बात होगी कि 54 साल के मुकेश अग्निहोत्री संगठन से किस तरह का रिश्ता बना पाते हैं। फिलहाल संगठन के भीतर उनका अपना कोई गुट नहीं है लेकिन तय है कि वीरभद्र सिंह के तमाम समर्थक उनसे ही जुड़ेंगे।
वीरभद्र सिंह आज तक विधायक दल की ताकत के ही बूते कांग्रेस में सरताज रहे हैं। इस समय भी 21 में से 17 विधायक उनके ही समर्थक हैं और अग्निहोत्री को चुने जाने से पहले इन विधायकों ने बाकायदा दस्तखत करके आलाकमान से वीरभद्र सिंह को ही दल का नेता चुने जाने की मांग की थी। लेकिन आलाकमान ने 84 साल के वीरभद्र सिंह की जगह युवा मुकेश को इसलिए तरजीह दी क्योंकि भाजपा ने 73 साल के प्रेम कुमार धूमल की जगह 52 साल के जय राम ठाकुर को भविष्य के हिसाब से मुख्यमंत्री का जिम्मा सौंप दिया था। इसमें दो राय नहीं कि मुकेश को चुने जाने का पक्ष वीरभद्र सिंह ने ही लिया था, यह देखकर कि वे नहीं तो उनका कोई समर्थक ही विधायक दल का नेता बने।
साल 2012 में जब यह लग रहा था कौल सिंह मुख्यमंत्री बनने के करीब पहुँच रहे हैं वीरभद्र सिंह ने पास पलट दिया था। कोई ज़माना था जब कौल सिंह वीरभद्र सिंह के समर्थक थे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद उनके तेवर बदले और वे वीरभद्र सिंह विरोधी खेमे में जा खड़े हुए। दरअसल वे वीरभद्र की छाया से बाहर निकलकर प्रदेश अध्यक्ष के नाते अपनी अलग पहचान बनाना चाहते थे, लेकिन वीरभद्र सिंह ने इसे पसंद नहीं किया और कौल सिंह 2012 में कांग्रेस की सरकार बनने पर मुख्यमंत्री की जगह मंत्री ही बने क्योंकि चुनाव से ऐन पहले वे प्रदेश अध्यक्ष बन गए थे।
ऐसी स्थिति मुकेश के सामने भी आ सकती है। विधायक दल के नेता के नाते वे कुछ नया और अपने हिसाब से करना चाहेंगे। यदि वीरभद्र सिंह इस पर अलग राय रखते हैं और मुकेश को रोकने की कोशिश करते हैं तो मतभेद जैसी स्थिति भी पैदा हो सकती है। हालांकि मुकेश जिस मजबूती से हाल के सालों में वीरभद्र सिंह के साथ खड़े रहे हैं, उससे उनके वीरभद्र सिंह के विरोध की सम्भावना कम ही नजर आती है।

जयराम के सामने चुनौतियाँ
जहाँ तक नई सरकार और नए मुख्यमंत्री की बात है, उनके सामने चुनौतियों की कमी नहीं। इससे भी असुखद स्थिति जाहिर होती है कि मंत्रियों के विभागों का बंटवारा उन्हें आलाकमान के अनुसार करना पड़ा। भाजपा के बीच के लोगों का कहना है कि संघ और भाजपा आलाकमान के पूरे आशीर्वाद के बावजूद विधायकों में असंतोष है। कुछ मंत्री अपने महकमों से खुश नहीं जो मंत्री नहीं बन पाए वे अलग से नाखुश हैं। यह आम चर्चा रही है कि राजीव बिंदल, रमेश धवाला, नरेंद्र ब्रागटा जैसे सीनियर विधायक अपनी नज़रअंदाजी पर परोक्ष में नाराज़गी खुलकर जाहिर करते हैं।
जानकारों के मुताबिक भाजपा की टिकट पर हारे नेता इस बात का विरोध कर रहे हैं कि उनके हलकों में भाजपा का विरोध करके जो उम्मीदवार निर्दलीय जीते हैं उन्हें भाजपा में शामिल न किया जाए। देहरा से हारे वरिष्ठ नेता रविंद्र रवि भी इस तरह का विरोध करने वाले नेताओं में शामिल हैं जिन्हे हलके की भाजपा समिति का पूरा समर्थन है।
भाजपा में अब यह भी चर्चा है कि आलाकमान प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बदल सकती है। वर्तमान अध्यक्ष सतपाल सत्ती ऊना सीट से चुनाव हार गए थे। वैसे वे अपेक्षाकृत युवा हैं लेकिन हो सकता है कि संघ इस पद पर अपने किसी व्यक्ति बिठाना चाहे। इस बात की बहुत चर्चा है कि मुख्यमंत्री का चयन भाजपा अध्यक्ष की मजऱ्ी से ज्यादा संघ की मर्जी से हुआ है। यह सही है कि नए मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर की छवि साफ सुथरी है। बड़ा सवाल यह है कि क्या संघ के कन्धों पर सवार होकर वे अपनी चाल चल पाएंगे ?
अनुभव की दृष्टि से जयराम भले प्रेम कुमार धूमल के मुकाबले 19 हों, उनके सामने अफसरशाही को नियंत्रण में रखने की बड़ी चुनौती रहेगी। हरियाणा में संघ से सीधे मुख्य्मंत्री बिठाने का भाजपा का अनुभव उतना अच्छा नहीं रहा है। यह इस बात से साबित हो जाता है कि पिछले तीन साल में दर्जन बार मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को हटाने की चर्चा चल चुकी है। मंत्रियों से लेकर विधायक तक उनकी कार्यप्रणाली पर अपनी नाराज़गी छिपाते नहीं। जय राम के सामने आने वाले महीनों में इस तरह की दिक्कतें आ सकती हैं।
जय राम के सामने एक और बड़ी समस्या है। उन्हें दो पूर्व मुख्यमंत्रियों शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल को भी नाराज़ नहीं होने देना है। शांता की भले अब उतनी पकड़ न रही हो धूमल अभी भी प्रदेश की राजनीति में काफी वजन रखते हैं। साल 2019 के संसदीय चुनाव में प्रदेश में वे मुख्यमंत्री न होने के बावजूद जयराम के मुकाबले भाजपा के लिए ज्यादा मह्त्वपूर्ण रहेंगे। पार्टी और विधायकों पर तो धूमल की पकड़ जयराम और सत्ती के मुकाबले आज भी ज़्यादा है ही, जनता पर भी उनकी मज़बूत पकड़ है। यह बहुत दिलचस्प बात है कि धूमल के चुनाव हारने को लेकर अभी तक आम लोगों में यही धारणा है कि धूमल हारे नहीं थे, उन्हें हरवाया गया था। लोग यह भी खुले आम कहते हैं कि भाजपा ने धूमल को आगे न किया होता तो कांग्रेस की सरकार दुबारा बन गयी होती। जिस तरह जयराम ने मुख्यमंत्री बनने के बाद भी धूमल को महत्व दिया है उसी से जाहिर हो जाता है जयराम भी इस तथ्य को मानते हैं कि धूमल को नाराज़ करना महंगा पड़ सकता है।
इधर धूमल के राजनीतिक भविष्य को लेकर कयासबाजियों का दौर जारी है। मीडिया में उनके प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनने से लेकर केंद्र में मंत्री और राज्यपाल बनने की अटकलें लगातार लगती रहती हैं। खुद धूमल बार बार यह कह चुके हैं कि वे किसी पद के पीछे नहीं।
धूमल ने पिछले कुछ दिनों से उन्हें लेकर लगाए जा रहे क्यासों पर विराम लगाने के लिए स्वयं सामने आना ही उचित समझा। धूमल ने कहा है कि कुछ लोग हर रोज कोई न कोई भ्रामक और तथ्यहीन प्रचार करने में जुटे हैं। कभी मुझे राज्यपाल बनाकर तो कभी कुछ और पद देने जैसा प्रचार विभिन्न माध्यमों से करते रहते हैं। धूमल ने कहा कि कुछ पार्टी विचाराधारा के कट्टर विरोधी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी एक पवित्र संस्था को चुनावों में मेरे खिलाफ काम करने जैसा दुष-प्रचार करने में जुटे हुए हैं जोकि सर्वदा तथ्यों के विपरीत ही नहीं बल्कि पूरी तरह से निराधार और भ्रामक प्रचार है और पार्टी के खिलाफ जहर उगलने के समान है।
धूमल ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा राष्ट्र को सुदृढ़ और देश को दुनिया के मानचित्र पर शिखर पर देखने के सपने को साकार करने की दिशा में काम करता है। मुझे गर्व है कि संघ का आशीर्वाद तथा सहयोग सदा मुझे मिला है। मैं 1964-65 से भारतीय मजदूर संघ का कार्यकर्ता रहा हूं। धूमल ने कहा कि मुझे पार्टी ने बहुत कुछ दिया है आज मेरे पास जो भी मान-सम्मान है वह सब पार्टी का दिया हुआ है। मैं पार्टी की ओर से दिए गए सम्मान से पूरी तरह से संतुष्ट हूं। उन्होंने कहा है कि इस तरह की भ्रामक बातों से कार्यकर्ताओं और पार्टी समर्थकों ही नहीं जनता के बीच भी गलत सन्देश जाता है। उन्होंने कहा कि वे भाजपा के आम कार्यकर्ता की तरह हैं और इससे संतुष्ट हैं।

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 10 Issue 01&02, Dated 31 January 2018)

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