पर खामोश नहीं हुई जिंदान की जुबां

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दिन में 10- 11 बजें के बीच सबसे पहले उसे लाठियों से पीटा गया। इतना पीटा गया कि वह बेहोश हो गया, फिर बेहोशी की हालत में उसे सड़क पर लिटा कर उस पर से ‘स्कार्पियो’ गाड़ी एक नहीं तीन बार चढ़ाई गई। यह सारी घटना बिहार या उत्तरप्रदेश की नहीं बल्कि ‘देवभूमि’ कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की है। शिलाई तहसील के बरकास गांव की यह घटना है। इस घटना स्थल के बिल्कुल सामने एक स्कूल और शिक्षा विभाग का एक दफ्तर है किसी ने उसे बचाने की कोशिश नहीं की, इतना ही नहीं कोई भी व्यक्ति इस मामले में बोलने तक को तैयार नहीं। दूरदराज के इस क्षेत्र में दबगों का एकछत्र साम्राज्य है। उनके डर से वहां कोई भी सामने आने की कोशिश नहीं करता। जिस आदमी की इतनी बेरहमी से हत्या की गई, वह एक दलित और आरटीआई कार्यकर्ता था। उसका नाम था केदार सिंह जिंदान। वह 43 साल का वकील था जो शिमला हाईकोर्ट में प्रैक्टिस भी करता था। उसके परिवार में उसकी पत्नी हेमलता और दो बेटियां हैं। उसकी एक बेटी 10वीं और दूसरी 12 वीं कक्षा में पढ़ती है। जिंदान ने अपनी जान दे दी पर दबंगों की धमकियों से खामोश नहीं हुआ।

जिंदान पिछले 10-15 सालों से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों के लिए लड़ता रहा था। वह उन लोगों की मदद भी करता था जो अंतरजातीय विवाह करना चाहते थे। उसने खुद भी अंतरजातीय विवाह किया था। वह खुद ‘कोली’ बिरादरी से था जबकि उसकी पत्नी रोहड़ू क्षेत्र की एक उच्च जाति से संबंध रखती है। इस बात से उसके क्षेत्र शिलाई के उच्च जाति के लोग खफा थे। फिर जब उसने आरटीआई को हथियार बना कर वहां पंचायत में चल रहे बीपीएल घोटाले को उजागर किया तो पंचायत के ही कई लोग उसके खिलाफ हो गए और उसे जान से मार देने की धमकियां देने लगे। इस कारण पंचायत का उपप्रधान जय प्रकाश खासतौर पर गुस्से में था क्योंकि उसने हेराफेरी करके अपने उन रिश्तेदारों के भी बीपीएल कार्ड बनवा दिए थे जो कि काफी समृद्ध थे। जिंदान के कारण उसे भारी नुकसान हो रहा था।

जानकारी के अनुसार हरिजनों और दलितों पर होने वाले अत्याचार के 168 मामलों में उसने दखल देकर पुलिस केस दर्ज करवाए थे। इसके अलावा उसने 32 अंतरजातीय विवाह करवाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इन तीन मुख्य कारणों से शिलाई इलाके के कुछ दबंग और उच्च जाति के लोग उसके खिलाफ थे। वे उसे रास्ते से हटाने के कई प्रयास कर चुके थे। उन्हें फोन पर बार-बार धमकी मिल रही थी। इसकी शिकायत उन्होंने राज्य के पुलिस प्रमुख से भी की थी। जबकि सिरमौर जि़ला एसपी रोहित मालपानी का कहना है कि उनके पास जिंदान की तरफ से पुलिस सुरक्षा की कोई औपचारिक अर्जी नहीं आई है। मतलब यह कि पुलिस की तरफ से उन्हें सुरक्षा नहीं दी गई।

इस बीच एक दिन शाम चार बजे सतौन बस अड्उे पर 50-60 लोगों की एक भीड़ ने उसे बस से बाहर खींच कर बुरी तरह पीटा। लोग लगभग आधा घंटे तक उसे पीटते रहे पर कोई न तो बचाने आया और न ही किसी ने पुलिस को सूचित किया। उस भीड़ ने जब समझा कि वह मर गया है तो उसे रेत के एक ढेर पर छोड़ कर चले गए। एक घंटे तक वह वहीं पड़ा रहा। कोई उसे उठाने तक नहीं आया। एक घंटे के बाद जब उसे होश आया तो वह पानी की गुहार लगाता रहा, पर किसी ने उसे पानी नहीं दिया। वह खून से तरबतर सड़क पर था, पर किसी वाहन ने उसे ‘लिफ्ट’ नहीं दी। काफी देर बाद पुलिस वहां पहुंची और उसे अपनी जीप में नाहन के अस्पताल ले गई।

जिंदान की पत्नी हेमलता का कहना है कि जिंदान ने 35 लोगों की एक सूची बना कर पुलिस को सौपी थी जिनसे उसे और हमारे परिवार को खतरा था, लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया। यदि पुलिस ने समय पर कार्रवाई की होती तो आज यह नौबत नहीं आती।

 इस प्रकार केदार सिंह जिंदान भी उन लोगों की सूची में शामिल हो गया जिन्होंने अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ उठाकर अपनी जान दे दी। गौरी लंकेश, एमएस कुलबर्गी, गोबिंद पनेसर और नरेंदर डाभोलकर के साथ अब केदार सिंह जिंदान का नाम भी जुड़ गया है। गौरी लंकेश ने दक्षिण पंथी हिंदुत्व की हमेशा खुलकर आलोचना की थी। यह बात कुछ कट्टरपंथी लोगों को पसंद नहीं आई और बंगलुरू में उनकी हत्या कर दी गई।

इसी कड़ी में 2014 में एक और प्रगतिशील सोच के सामाजिक कार्यकर्ता गोबिद पनेसर को कोहलापुर में गोली मार दी गई थी। वह सवेरे की सैर करके अपने घर लौट रहे थे, जब दो अनजान लोगों ने उन पर गोली चला दी। इस मामले में पुलिस ने सनातन संस्था के एक सक्रिय कार्यकर्ता समीर गायकवाड़ को गिरफ्तार किया था पर बाद में उसे ज़मानत मिल गई।

नरेंदर डाभोलकर को 20 अगस्त 2013 को गोली मारी गई। डाभोलकर रूढि़वादी सोच के सख्त खिलाफ थे। जून 2014 में यह केस सीबीआई को सौंपा गया और उसने पिछले साल सितंबर में दक्षिणपंथी संस्था सनातन संस्था के दो लोगों अकोलकर और पवार के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया।

इनके अलावा रंजन राजदियो जो कि एक दैनिक अखबार ‘हिंदुस्तान’ के सीवान (बिहार) ब्यूरो को देख रहे थे की हत्या पिछले साल मई में कर दी गई थी। मोटर साइकिल पर सवार दो लोगों ने बहुत करीब से उन पर गोली चलाई थी। उन दिनो रंजन ने श्रीकांत भारती के मामले को खूब उठाया था। भारती भाजपा के सांसद ओम प्रकाश का साथी था।

आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमलों की तादाद में महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और बिहार अग्रणी है। यदि सरकारी आंकड़ों पर नजऱ डालें तो महाराष्ट्र में छह, गुजरात में चार, राजस्थान में तीन झारखंड में तीन और बिहार में भी तीन आरटीआई कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं। ये सभी सरकारी आंकड़ें हैं जबकि असली गिनती इससे कहीं अलग हो सकती है। इनके अलावा छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, मुंबई, तमिलनाडु, हरियाणा, आंध्रपदेश, और पश्चिम बंगाल में भी आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई हैं। इस प्रकार कुल मिला कर देश भर में 30 से ज़्यादा आरटीआई कार्यकर्ता मारे जा चुके है। जो ऐसे हमलों में बच गए उनकी गिनती इनसे कहीं ज़्यादा है।

हिमाचल प्रदेश में हर मुद्दे पर एक दूसरे पर प्रहार करने वाले दो प्रमुख दल कांग्रेस और सत्ताधारी भाजपा का कोई नेता जिंदान की हत्या पर एक शब्द नहीं बोला। इस इलाके में जहां जिंदान रहता था और उसकी हत्या हुई, उस क्षेत्र के कांगे्रसी विधायक हर्षवर्धन सिंह का कोई बयान तक नहीं आया। वहां अगर किसी विधायक ने जा कर इस मामले को उठाया तो वह थे विधानसभा में माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के एकमात्र विधायक राकेश सिंघा। राकेश सिंघा मौके पर पहुंचे और इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की। उन्होंने जिंदान की अंतेष्टि में भी भाग लिया, जबंिक दबंगों की दहशत के कारण बहुत से गांव वासी भी वहां नहीं गए थे। इन दबगों ने सिंघा के खिलाफ भी नारेबाजी की। उन्होंने सिंघा से कहा कि वह तो खुद राजपूत हैं तो वह दलितों की हिमायत क्यों कर रहे हैं। लोगों के ऐसे विरोध के बावजूद सिंघा ने कहा की कि इस मामले को दबाने नहीं दिया जाएगा।