परंपरा का पुन: प्रयोग

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किस्सा 17वीं शताब्दी का है. बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल के बेटे जगतराज को एक गड़े हुए खजाने की खबर मिली. जगतराज ने यह खजाना खुदवा कर निकाल लिया. छत्रसाल इस पर बहुत नाराज हुए और उन्होंने इस खजाने को जन हित में खर्च करने के आदेश दिए. जगतराज को आदेश मिला कि इस खजाने से पुराने तालाबों की मरम्मत की जाए और नए तालाब बनवाए जाएं. उस दौर में बनाए गए कई विशालकाय तालाब आज भी बुंदेलखंड में मौजूद हैं. सदियों तक ये तालाब किसानों के साथी रहे. कहा जाता है कि बुंदेलखंड में जातीय पंचायतें भी अपने किसी सदस्य को गलती करने पर दंड के रूप में तालाब बनाने को ही कहती थीं. सिंचाई से लेकर पानी की हर आवश्यकता को पूरा करने की जिम्मेदारी तालाबों की होती थी. तालाबों के रख-रखाव की जिम्मेदारी सभी की होती थी.

समय और शासन बदला तो खेती और सिंचाई के तरीके भी बदल गए. पानी की पूर्ति बांधों और नहरों से होने लगी. बुंदेलखंड के अधिकतर तालाब या तो सूख गए या फिर उन्हें भर कर निर्माण कार्य किए जाने लगे. किसान भी इस नई व्यवस्था पर आश्रित होते गए. तालाब बीते जमाने की बात हो गया.

लेकिन जहां तालाब हर क्षेत्र की जरूरतें पूरी करते थे वहीं बांधों और नहरों का दायरा सीमित था. इसलिए कई किसान सिर्फ बारिश के पानी पर निर्भर हो गए. जिन किसानों तक नहरों से पानी पहुंच रहा था, वे भी ज्यादा समय तक खुशहाल नहीं रहे. बांधों और नहरों में गाद भरने के कारण सिंचाई का दायरा सिकुड़ता गया और खेती का रकबा भी धीरे-धीरे कम होता गया. बुंदेलखंड के लगभग सभी किसान अब पूरी तरह से सिर्फ बरसात के भरोसे रह गए. लेकिन वह भी धोखा देने लगी. 1999 के बाद से यहां होने वाली वार्षिक बरसात के औसत दिन 52 से घटकर 21 रह गए. जिस क्षेत्र के लगभग 86 प्रतिशत लोग सीधे तौर से खेती पर और खेती के लिए सिर्फ बरसात पर निर्भर हों, उस क्षेत्र के लिए यह स्थिति भयावह साबित हुई. नतीजा यह हुआ कि पिछले दस साल के दौरान तीन हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या कर ली और लगभग 40 प्रतिशत किसान खेती और बुंदेलखंड छोड़ कर पलायन कर गए. गांव के गांव खाली पड़ने लगे. सैकड़ों एकड़ जमीन बंजर हो गई.

पानी की समस्या सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रही. यहां सूखे का ऐसा प्रभाव हुआ कि पीने और घर की अन्य जरूरतों के लिए भी पानी मिलना बंद हो गया. बुंदेलखंड के लोग पानी की समस्या के विकल्प तलाश रहे थे. तभी 2008 में यहां के स्थानीय अखबार में एक खबर छपी. इस खबर के अनुसार महोबा जिले के एक गांव की महिला को पानी के लिए अपनी आबरू का सौदा करना पड़ रहा था. ‘आबरू के मोल पानी’  नाम से छपी इस खबर ने सभी को झकझोर दिया. स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता पुष्पेंद्र भाई ने इस खबर के बाद अपने कुछ साथियों को जोड़ा और पानी की इस विकराल होती समस्या से निपटने की ठानी. 21 युवाओं ने मिलकर महोबा के सदियों पुराने तालाब को पुनर्जीवित करने का फैसला किया.

[box]फायदा सिर्फ खेती में नहीं हुआ. तालाब बनने से असिंचित जमीन सिंचित हो गई. उसके दाम बढ़ गए. पलायन पर रोक लग गई[/box]

लोगों से इस अभियान में शामिल होने की अपील की गई. ‘इत सूखत जल स्रोत सब, बूंद चली पाताल. पानी मोले आबरू उठो बुंदेली लाल’ का नारा दिया गया और लगभग चार हजार लोग फावड़ों और कुदालों के साथ खुद ही तालाब की सफाई के लिए कूद पड़े. इतने लोगों ने मिलकर सिर्फ दो घंटे में ही तालाब की अच्छी-खासी खुदाई कर डाली. यह देख कर सभी के हौसले और मजबूत हुए. पूरे 46 दिन तक काम चला जिसमें सैकड़ों लोग रोज शामिल हुए और आखिरकार लगभग हजार एकड़ का जयसागर तालाब फिर से जीवित हो उठा. इस पूरे अभियान में सिर्फ 30-35 हजार रु नकद खर्च हुए. यह खर्च स्थानीय नगर पालिका अध्यक्ष ने उठाया. इस पूरे काम का जब सरकारी आकलन किया गया तो पता चला कि लगभग 80 लाख रु का काम लोगों ने खुद ही कर दिया था.

इसके बाद बुंदेलखंड के लोग तालाबों की अहमियत समझने लगे थे. स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता इस पर विचार कर रहे थे कि कैसे जन-जन को तालाबों से जोड़ा जाए. बड़े तालाब बनाने के लिए बड़ी पूंजी की जरूरत थी और इसके लिए कोई सरकारी योजना भी नहीं थी.

फिर एक दिन उन्हें मध्य प्रदेश के देवास जिले में हुए एक सफल प्रयोग की जानकारी मिली. दरअसल मालवा क्षेत्र का देवास जिला भी एक समय में पानी की समस्या से त्रस्त था. 60 -70 के दशक से ही यहां नलकूपों और पानी खींचने की मोटरों के लिए लोन की व्यवस्था कर दी गई थी. इसके चलते देवास और आस-पास के सभी इलाकों में किसानों ने कई नलकूप खोद दिए. शुरुआती दौर में तो नलकूपों से मिले पानी के कारण खेती में बढ़ोतरी भी हुई लेकिन ज्यादा नलकूप लग जाने से कुछ ही सालों में पानी का स्तर बहुत नीचे चला गया. जहां पहले 60-70 फुट पर ही पानी मिल जाया करता था, वहीं अब पानी 400-500 फुट पर जा पहुंचा. इतने गहरे नलकूप खोदने पर पानी में खनिज आने लगे और खेती बर्बाद होने लगी. साथ ही इन नलकूपों का खर्च भी बहुत बढ़ गया और किसान लगातार कर्ज में डूबते चले गए. जलस्तर भी धीरे-धीरे इतना कम हो गया कि सात इंच के नलकूप में मुश्किल से एक इंच की धार का पानी निकलता था. इतने कम पानी से खेती संभव नहीं थी. लिहाजा कई किसान अपनी खेती छोड़ कर जमीन बेचने को मजबूर हो गए. 90 के दशक तक आते-आते स्थिति इतनी विकट हो गई कि देवास में पानी की पूर्ति के लिए ट्रेन लगानी पड़ी. पानी का स्थायी उपाय खोजने के बजाय यहां 25 अप्रैल, 1990 को पहली बार 50 टैंकर पानी लेकर इंदौर से ट्रेन आई. कई सालों तक देवास में इसी तरह से पानी पहुंचाया गया.

फिर 2006 में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी उमाकांत उमराव देवास के कलेक्टर नियुक्त हुए. उन्होंने यहां आते ही पानी की समस्या का हल तलाशने की कोशिशें शुरू कीं. पानी और बरसात के पिछले दस साल के रिकॉर्ड जांचकर उन्होंने पाया कि यहां इतना पानी तो हर साल बरसता है कि उसे संरक्षित करने पर पानी की समस्या खत्म की जा सकती है. उन्होंने एक बैठक बुलवाई और देवास के सहायक संचालक (कृषि) मोहम्मद अब्बास को जिले के बड़े किसानों की सूची बनाने को कहा. वे बताते हैं, ‘शुरुआत में बड़े किसानों को ही जोड़ने के दो कारण थे. छोटे किसान अक्सर बड़े किसानों की ही राह पर चलते हैं. अगर बड़े किसान तालाब बना लेते तो छोटे किसान भी देखा-देखी वही करते. बड़े किसान इतने संपन्न भी थे कि एक ऐसी योजना पर पैसा लगाने का जोखिम उठा सकें जिसके परिणाम अभी किसी ने नहीं देखे थे. दूसरा कारण यह था कि भूमिगत पानी का सबसे ज्यादा दोहन बड़े किसानों ने ही किया था जिस कारण जलस्तर इतना नीचे जा पहुंचा था इसलिए इसकी भरपाई भी उन्हीं को करनी थी.’

बड़े किसानों की सूची तैयार की गई. अधिकारियों ने उनके साथ एक सभा आयोजित की. इनमें से कुछ किसान ऐसे भी मिल गए जो पहले ही तालाब बना चुके थे और इसके लाभ जानते थे. इन्ही में से एक थे हरनावदा गांव के किसान रघुनाथ सिंह तोमर. तोमर 2005 में ही तालाब बना चुके थे. उमराव ऐसे ही किसी किसान की तलाश में थे जिसे उदाहरण के तौर पर पेश किया जा सके. किसान ही किसान को बेहतर तरीके से समझा सकते थे, इसलिए ऐसे ही कुछ अनुभवी किसानों को मास्टर ट्रेनर बनाया गया और अभियान की शुरुआत हुई. उमाकांत उमराव और मोहम्मद अब्बास जैसे अधिकारियों ने भी गांव-गांव जाकर लोगों को अपनी जमीन के दसवें हिस्से में तालाब बनाने के लाभ बताए. लेकिन किसानों के मन में अब भी यह संदेह था कि दसवें हिस्से में तालाब बनाने का मतलब है इतनी जमीन का कम हो जाना. किसानों के इस संदेह को दूर करने के लिए उमराव ने उनसे बस एक सवाल किया. यह सवाल था, ‘मान लो तुम्हारे पास कुल दस बीघा जमीन है.

तुम अपने बच्चों को ये दस बीघा असिंचित जमीन सौंपना पसंद करोगे या फिर नौ बीघा सिंचित जमीन?’ पानी के अर्थशास्त्र की यह बात किसानों को समझ में आ गई. उमराव ने खुद किसानों के खेत में तालाब खोदने के लिए फावड़ा चलाया. जहां आम तौर पर कलेक्टर से मिल पाना भी किसानों के लिए मुश्किल रहता हो, वहां एक कलेक्टर का किसान के खेत में फावड़ा चलाना उन्हें प्रेरित करने के लिए काफी था. कुछ ही महीनों में सैकड़ों तालाब बन कर तैयार हो गए. इन तालाबों को ‘रेवा सागर’ नाम दिया गया और तालाब बनाने वाले किसान को ‘भागीरथ कृषक’ कहा गया. 2007 में मध्य प्रदेश सरकार ने इस अभियान की सफलता को देखते हुए ‘बलराम तालाब योजना’ भी बना दी. इसके तहत किसानों को तालाब बनाने के लिए 80 हजार से एक लाख रु तक का अनुदान दिया जाता है. फिर तो देवास की किस्मत ही बदल गई .

आज देवास जिले में कुल दस हजार से भी ज्यादा तालाब बन चुके हैं. धतूरिया, टोंककला, गोरवा, हरनावदा और चिडावत जैसे कई गांव तो ऐसे हैं जहां 100 से भी ज्यादा तालाब हैं. लोगों ने कुछ साल पहले नलकूपों की अरथी निकलकर कभी नलकूप न खोदने का भी प्रण कर लिया है.

निपनिया गांव के पोप सिंह राजपूत को तालाब बनाने के लिए उमराव ने अपनी व्यक्तिगत गारंटी पर 14 लाख रु का लोन दिलवाया था. लोन मिलने के बाद पोप सिंह ने 10 बीघे का विशाल तालाब बनवाया. पोप सिंह बताते हैं, ‘पहले तो साल में बस एक ही फसल हो पाती थी. वो भी सोयाबीन जैसी जिसमें पानी कम लगता है. आज हम साल में दो फसल कर लेते हैं. तालाब का पानी नलकूपों की तुलना में ज्यादा उपजाऊ भी है, इसलिए फसल भी अच्छी होती है.’ बैंक से लिए गए लोन के बारे में वे बताते हैं, ‘लोन तो मैंने दो साल पहले ही चुका दिया है. उसके बाद तो मैं 10 बीघा जमीन और खरीद चुका हूं. जितनी जमीन पर मैंने तालाब बनाया था, उतनी ही जमीन मुझे इस तालाब ने कमाकर दे दी है.’

[box]‘जितनी जमीन पर मैंने तालाब बनाया था, उतनी ही जमीन मुझे इस तालाब ने कमाकर दे दी है[/box]

इस अभियान से शुरुआत से जुड़े रहे कृषि विभाग के मोहम्मद अब्बास बताते हैं कि तालाबों से किसानों को खेती के अलावा कई फायदे हुए. असिंचित जमीन अब सिंचित हो गई है और उसकी कीमत लगभग डेढ़ गुना तक बढ़ गई है. साथ ही यहां पलायन पर भी रोक लगी है.

टोंक कला में हमारी मुलाकात देवेंद्र सिंह खिंची से होती है.वे कुछ साल पहले इंदौर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके लौटे हैं और अब पूरा समय खेती को देते हैं. वे बताते हैं, ‘अगर अच्छा पानी मिले तो किसानी से बढ़कर कोई अन्य व्यवसाय हो ही नहीं सकता.’ देवेंद्र हमें अपना खूबसूरत तालाब दिखाते हैं. इस तालाब की पाल पर चारों तरफ पेड़ लगे हैं और कुछ ही दूरी पर कई गायें बंधी हैं. वे अपनी जैविक खेती के बारे में बताते हैं, ‘बरसात में खेतों की उपजाऊ मिट्टी पानी के साथ बह जाती है. यह सारा पानी बहकर तालाब में आता है तो तालाब उस मिट्टी को रोक लेते हैं. साथ ही हम इन गायों का गोबर भी तालाब में डाल देते हैं. इस कारण तालाब का पानी अपने आप में बहुत उपजाऊ हो जाता है और गोबर मछलियों के लिए चारे का काम करता है. इसके बाद जब फरवरी-मार्च में हम तालाब का सारा पानी निकाल लेते हैं तो इसकी सफाई करते हैं. इसमें जो खेतों से बहकर आई मिट्टी और गोबर जमा हुआ होता है उसे हम वापस खेतों में डाल देते हैं. यह जमीन के लिए बेहतरीन खाद का काम करता है.’ अब्बास कहते हैं, ‘यही हमारी सबसे बड़ी सफलता है कि आज किसान खुद आपको तालाबों के फायदे अपने अनुभव के साथ बता रहे हैं.’ देवेंद्र लगभग 75 बीघा जमीन पर खेती करते हैं. इसमें से काफी जमीन पर उन्होंने मिर्च की खेती की है जिसके बारे में वे बताते हैं कि इससे एक ही मौसम में लगभग डेढ़ लाख रु प्रति बीघे का मुनाफा हो जाता है. तालाबों में पाली गई मछलियों से भी देवेंद्र साल भर में लगभग दो लाख रु कमा रहे हैं.

अब हम चिड़ावद गांव की तरफ बढ़ते हैं. यहां हमारी मुलाकात विक्रम सिंह पटेल से होती है. उन्होंने अपने घर से लगभग चार सौ फुट दूर एक गोबर गैस प्लांट भी लगाया है. वे बताते हैं कि उनके परिवार को साल भर इसी प्लांट से गैस मिल जाता है और उन्हें बाजार से गैस नहीं खरीदना पड़ता. गोबर गैस अकसर सर्दियों में जम जाया करता है. लेकिन पटेल ने अपने प्लांट के ऊपर ही गोबर से खाद बनाने के लिए ‘चार-चकरी’ बनाई है. इस कारण नीचे प्लांट में इतनी गर्मी रहती है कि सर्दियों में भी गैस जमता नहीं.

देवास के हर गांव में आज सफलताओं की ऐसी कई छोटी-बड़ी कहानियां मौजूद हैं. पानी और चारा होने के कारण लोगों ने दोबारा गाय-भैंस पालना शुरू कर दिया है और अकेले धतूरिया गांव से ही एक हजार लीटर दूध प्रतिदिन बेचा जा रहा है. पर्यावरण पर भी इन तालाबों का सकारात्मक असर हुआ है. आज विदेशी पक्षियों और हिरनों के झुंड इन तालाबों के पास आसानी से देखे जा सकते हैं. किसानों ने भी पक्षियों की चिंता करते हुए अपने तालाबों के बीच में टापू बनाए हैं. इन टापुओं पर पक्षी अपने घोंसलें बनाते हैं और चारों तरफ से पानी से घिरे रहने के कारण अन्य जानवर इन घोंसलों को नुकसान भी नहीं पहुंचा पाते. यहां के विजयपुर गांव में तो एक किसान ने सेब के पेड़ तक उगाए हैं. सिर्फ ठंडी जगहों पर उगने वाले सेब के पेड़ को मालवा के इस क्षेत्र में हरा-भरा देखना किसी आश्चर्य से कम नहीं.

जो देवास कभी इसलिए चर्चित था कि वहां रोज ट्रेन से पानी पहुंचाया जाता है आज वही देवास पानी से सराबोर है और देश भर से लोग यहां पानी सहेजने के तरीके सीखने आ रहे हैं. यह सफल मॉडल अब महोबा में भी तैयार हो रहा है. इसकी शुरुआत तब हुई जब पुष्पेन्द्र भाई, इंडियावॉटरपोर्टल के सिराज केसर और गांधी शांति प्रतिष्ठान के प्रभात झा अपने कुछ अन्य साथियों के साथ मिलकर महोबा के जिलाधिकारी के पास पहुंचे. युवा जिलाधिकारी अनुज झा खुद भी पानी की समस्या का हल तलाश रहे थे. देवास के प्रयोग से उत्साहित झा ने इस काम में हर संभव मदद करने का वादा किया. इसके बाद उन्होंने किसानों का एक प्रतिनिधि मंडल महोबा से देवास भेजा. वहां से किसान बस इसी संकल्प के साथ लौटे कि कुछ ही सालों में महोबा को भी देवास बनाना है.

पुष्पेन्द्र भाई और उनके साथियों ने मिलकर जिलाधिकारी अनुज झा की सहायता से यहां एक कृषक गोष्ठी आयोजित की. देवास में तालाबों की नींव रखने वाले उमाकांत उमराव को बतौर मुख्य अतिथि बुलाया गया और महोबा में भी तालाब बनाने का अभियान चल पड़ा. एक ही महीने के भीतर महोबा में लगभग 40 तालाब बन चुके हैं. बरबई गांव के किसान देवेंद्र शुक्ला ने लगभग एक लाख रु से आधे बीघे का तालाब बनवाया है. तालाब को खोद कर निकाली गई मिट्टी बेचकर उन्हें 30 हजार रुपये तो तालाब बनने के दौरान ही वापस भी मिल गए हैं. महोबा के जिलाधिकारी कहते हैं, ‘अभी तो हम बहुत शुरुआती दौर में हैं. लेकिन देवास की सफलता देखते हुए हम निश्चिन्त हैं कि यह महज एक प्रयोग नहीं बल्कि पानी का सबसे सटीक उपाय है.’ बुंदेलखंड का जो महोबा जिला कभी किसान आत्महत्याओं का गढ़ बनता जा रहा था आज वहां उम्मीद और उत्साह की एक लहर दौड़ पड़ी है.

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