पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक का गिरफ़्तारी मामला न्यायालय से राहत, सरकार की आफ़त

पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक सुमेध सिंह सैनी की गिरफ़्तारी से सतर्कता ब्यूरो (विजिलैंस) की ही नहीं, बल्कि राज्य सरकार की भी किरकिरी हुई। गृह विभाग चूँकि मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के पास ही है, लिहाज़ा वह भी न्यायालय की विपरीत टिप्पणी की ज़द से बाहर नहीं हैं। विजिलैंस प्रमुख बी.के. उप्पल उन्हें पूरे घटनाक्रम की बराबर जानकारी देते रहे होंगे। हाई प्रोफाइल मामला मुख्यमंत्री के संज्ञान से बाहर जा नहीं सकता। गिरफ़्तारी से पहले उन्हें भरोसे में लिया होगा। वहाँ से हरी झण्डी मिलन के बाद ही कार्रवाई को अंजाम दिया होगा।

पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय ने पूछताछ के लिए बुलाये गये सैनी की सतर्कता ब्यूरो द्वारा की गिरफ़्तारी को ग़ैर-क़ानूनी बताते हुए तल्ख़ टिप्पणी की है। सैनी की जिस मामले में ब्यूरो ने गिरफ़्तारी की है, उसमें उन्हें उच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत दे रखी थी। ब्यूरो ने दूसरी दर्ज प्राथमिकी में गिरफ़्तारी को सही बताया। लेकिन पंजाब सरकार उच्च न्यायालय में अपनी बात को सही साबित नहीं कर सकी, लिहाज़ा उसे मुँह की खानी पड़ी।

सैनी को हिरासत से छोडऩे के आदेश के बाद राज्य के जेल और सहकारिता मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा ने एडवोकेट जनरल, गृह सचिव और विजिलैंस ब्यूरो चीफ को पद से हटाने की माँग कर डाली। जवाब में मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार से जुड़े किसी मंत्री या अन्य को सार्वजनिक तौर पर ऐसी आलोचना करने से पहले तथ्यों आदि पर विचार करना चाहिए। सीधा इशारा अपने ख़िलाफ़ चल रहे उन मंत्रियों पर है, जो उनके ख़िलाफ़ गुटबंदी कर रहे हैं।

उच्च न्यायालय के आदेश पर ही सैनी मोहाली में सतर्कता ब्यूरो दफ़्तर गये थे; लेकिन बजाय इसके उन्हें मामले में गहन पूछताछ की जाती, उन्हें हिरासत में ले लिया गया। इसके बाद मीडिया में उनकी गिरफ़्तारी और सलाख़ों के पीछे जाने की ख़बरें चलने लगीं। सैनी की पत्नी की शिकायत पर उच्च न्यायालय ने ब्यूरो की कार्रवाई को ग़लत बताते हुए न केवल फटकार लगायी, बल्कि भविष्य में सैनी को गिरफ़्तार करने से एक सप्ताह पहले उन्हें (न्यायालय) को अवगत कराने की अनिवार्यता का आदेश दिया। तो क्या सतर्कता ब्यूरो ने जल्दबाज़ी और हड़बड़ी में सैनी को गिरफ़्तार किया या फिर उनके पास दर्ज प्राथमिकी में कोई ठोस सुबूत थे? निश्चित तौर पर हड़बड़ी में और मुख्यमंत्री को यह दिखाने के लिए कि वह बहुत कुछ करने में सक्षम है।

न्यायालय के आदेश पर मुँह की खाने के बाद भी सरकार की सेहत पर कुछ ख़ास पड़ता नहीं दिख रहा। शिअद-भाजपा सरकार के दौरान बरगाड़ी और बहबलकलां गुरु ग्रंथ साहिब बेअदबी और गोलीकांड मामले में कांग्रेस सरकार की विशेष जाँच टीम की रिपोर्ट भी उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दी थी। रिपोर्ट में पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनके पुत्र सुखबीर सिंह बादल आदि को इन सबके लिए ज़िम्मेदार बताया गया था।

इसे एक पक्षीय बताते हुए रिपोर्ट पर ही सवालिया निशान लगा दिया था। अगर सब कुछ ठीक होता, तो राज्य सरकार इसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती देती; लेकिन अब तक इस दिशा में कोई प्रयास नज़र नहीं आता। हालाँकि सरकार ने नयी समिति गठित कर जाँच शुरू करा दी है। नैतिकता के आधार पर तत्कालीन आईजी कुँवर विजय प्रताप सिंह ने इस्तीफ़ा दे दिया था। बेअदबी से जुड़ा मामला कांग्रेस सरकार के लिए बहुत महत्त्व रखता है। तय समय में नयी समिति इसे अंजाम तक पहुँचा पाएगी, यह कहना फ़िलहाल मुश्किल है। सैनी ने न्यायालय से अपने मामलों की जाँच सीबीआई या किसी केंद्रीय स्वतंत्र एजेंसी से कराने की गुहार लगायी है। उन्हें लगता है कि पंजाब में कांग्रेस सरकार के दौरान वह किसी-न-किसी मामले में फँसते रहेंगे। वह राज्य सरकार के निशाने पर हैं। इसलिए उनके ख़िलाफ़ नये मामले दर्ज किये जा रहे हैं। सैनी के आरोप अपनी जगह ठीक हो सकते हैं; लेकिन विजिलैंस प्रमुख और पुलिस महानिदेशक रहते उन्होंने जो कुछ शिअद-भाजपा सरकार के लिए किया, वह तो जगज़ाहिर है।

सैनी तेज़ तर्रार पुलिस अधिकारी के तौर पर जाने जाते रहे हैं। एक बार किसी से ख़ुन्नस हो जाए, तो उसे जल्दी से भुला नहीं पाते। बेअदबी के मामलों में शिअद-भाजपा सरकार की आलोचना होने के बाद वह सरकार की नज़रों से उतर गये। तब शिअद का भाजपा के साथ गठजोड़ था। लिहाज़ा राज्य में आलोचना और केंद्र के दबाव के चलते सैनी को सन् 2015 में पद से हटाना पड़ा। उसके बाद से सैनी नैपथ्य में चले गये और उनके एक तरह से बुरे दिन शुरू हो गये। सन् 2018 में सेवानिवृत्ति के बाद से तो वह कांग्रेस सरकार विशेषकर कैप्टन अमरिंदर सिंह को किसी खलनायक की तरह लगने लगे हैं और कई मुसीबतों में घिर गये हैं।