पंजाब की चुनावी दौड़ में मुख्यमंत्री बनने की होड़

कांग्रेस में अब मुख्यमंत्री के नाम पर दुविधा नहीं रही। पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी ने चरणजीत सिंह चन्नी के नाम की घोषणा से मौज़ूदा अटकलों पर कुछ विराम तो लगेगा; लेकिन भविष्य में असन्तोष का संताप भी समानांतर चलेगा। नवजोत सिद्धू के तेवर से इसे बेहतर समझा जा सकता है। चन्नी के नाम की घोषणा के बाद सिद्धू ने प्रतिक्रिया में कहा कि वह पार्टी में (शो पीस) दिखावे के तौर पर नहीं रहने वाले। माना जा सकता है कि पार्टी में संकट अस्थायी ही है। अगर कांग्रेस सत्ता में वापसी करती है, तो चन्नी के लिए पाँच साल सरकर चलाना तलवार की धार पर चलने जैसा होगा।

आम आदमी पार्टी (आप) भी इससे अछूती नहीं रहेगी। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जनता का फ़ैसला बताकर भगवंत मान को भावी मुख्यमंत्री के तौर पर रखा है। लेकिन उनके लिए पार्टी में मुश्किलें कम नहीं हैं। कॉमेडियन से सांसद बने मान पंजाब के मुद्दों को शिद्दत से लोकसभा में उठाते रहे हैं। प्रदेश में आम आदमी पार्टी की जड़ें जमाने और इसे मज़बूती देने में उनकी भूमिका अहम रही है। गम्भीर मुद्दों को हँसी-मज़ाक़ में उड़ाने की वजह से आम लोगों में उनकी छवि मज़बूत नेतृत्व प्रदान करने वाली नहीं बन सकी है। एक आदत के आदी होने को लेकर को लेकर भगवंत काफ़ी चर्चा और विवादों में रहे हैं। फ़िलहाल पार्टी पर उनकी पकड़ दिखती है। वह लोगों की पसन्द के तौर पर आगे आये हैं। ऐसे में पार्टी की जीत की सारी ज़िम्मेदारी उनके कन्धों पर है।

रही बात शिरोमणि अकाली दल (शिअद) की, तो वहाँ फ़िलहाल कोई मुश्किल नहीं दिख रही। शिअद का बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबन्धन है; लेकिन उसका कोई विशेष आधार नहीं है। जिन्हें शिअद को परिवार की पार्टी बनाने की शिकायतें थीं, वह इससे किनारा कर चुके हैं। शिअद के अध्यक्ष सुखबीर बादल हैं। लेकिन कई बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके उनके पिता प्रकाश सिंह बादल भी मैदान में हैं। उम्र के इस दौर में वह राजनीति में ज़्यादा सक्रिय नहीं हैं। अगर शिअद सत्ता में आती है, तो मुख्यमंत्री पिता-पुत्र दोनों में कोई भी बन सकता है। चुनाव मैदान में पंजाब में सक्रिय किसान संगठन संयुक्त समाज पार्टी भी है। सीपीआई के साथ इसका सीटों का तालमेल है; लेकिन आधार बहुत ज़्यादा मज़बूत नहीं लग रही।

पंजाब में चुनाव लड़ रहे संगठनों से संयुक्त किसान मोर्चा ने किनारा कर लिया है, ऐसे में उनकी स्थिति और भी कमज़ोर हुई है। देखना यह है कि क्या कांग्रेस सत्ता में वापसी कर सकेगी? या आम आदमी पार्टी को पहली बार पंजाब में सत्ता में आने का अवसर मिलेगा है? या इसके इतर क्या मतदाता शिअद को एक बार फिर आजमाएँगे? राज्य में मुख्य तौर पर मुक़ाबला तीन दल (कांग्रेस, आप और शिअद) में माना जा रहा है। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पंजाब लोक कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल (संयुक्त) गठबन्धन भी खम ठोक रहा है।

गठबन्धन राजनीतिक समीकरण गड्डमड्ड (घालमेल) कर सकता है। गठबन्धन में मुख्यमंत्री के नाम पर अभी तक चर्चा तक नहीं हुई है। बहुमत के जादुई आँकड़े (59) के लिए गठबन्धन की भूमिका को कम नहीं आँका जा सकता। किसान आन्दोलन ख़त्म होने के बाद शहरी क्षेत्रों में भाजपा का आधार बना हुआ है। शिअद (संयुक्त) का कुछेक क्षेत्रों में असर है। अगर अमरिंदर सिंह की पार्टी कहे मुताबिक, प्रदर्शन कर जाती है, तो समीकरण कुछ भी बन सकते हैं।

कांग्रेस में मुख्यमंत्री के नाम की जल्द-से-जल्द घोषणा के लिए सबसे ज़्यादा उतावले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ही थे। क्योंकि उन्हें पता था कि फ़ैसला उनके और चन्नी के बीच होना है। दावेदारी तो पूर्व प्रदेशाध्यक्ष रह चुके सुनील जाखड़ की भी रही है; लेकिन उन्हें शीर्ष नेतृत्व का आशीर्वाद नहीं था। सिद्धू के मुक़ाबले चन्नी की दावेदारी ज़्यादा मज़बूत नहीं थी; लेकिन पिछले तीन माह के दौरान ऐसा बहुत कुछ घटा, जिससे सिद्धू कमज़ोर हुए।

चन्नी राहुल गाँधी के क़रीबी माने जाते हैं। उनकी वजह से ही चन्नी शिअद सरकार में विपक्ष के नेता और फिर कैप्टन के हटने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर आगे किया गया। भावी मुख्यमंत्री के तौर पर चन्नी के नाम की घोषणा से सिद्धू को निश्चित ही झटका तो लगा; लेकिन मानसिक तौर पर वह इसके लिए पहले से तैयार हो चुके थे। इसका आभास सिद्धू को पार्टी शीर्ष नेतृत्व की राजनीतिक गतिविधियों से भी हो गया था। उन्हें बाहरी राज्यों में स्टार प्रचार के तौर पर जगह नहीं देना इसका सुबूत है। वह अच्छे वक्ता है; लेकिन पार्टी को अन्य राज्यों में उनकी ख़ास ज़रूरत महसूस नहीं हो रही।

पार्टी नेतृत्व उन्हें वाक़र्इ मुख्यमंत्री के तौर पर पहली पसन्द मानती, तो कैप्टन अमरिंदर सिंह के बाद चरणजीत सिंह चन्नी की जगह उन्हें आगे लाया जाता। क्रिकेट की तर्ज पर मानें, तो पहले नाइट वॉचमैन के तौर पर सिद्धू को ही चन्नी की जगह ज़िम्मेदारी दी जाती, उसके बाद का रास्ता तो वह (सिद्धू) ख़ुद ही तय कर लेते। लेकिन पार्टी ने ऐसी किसी स्थिति की नौबत न आने देने की पहले से तैयारी कर ली थी।

कांग्रेस में पार्टी शीर्ष नेतृत्व फ़िलहाल गाँधी परिवार (सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी) तक ही सिमटा है। राहुल गाँधी तो फ़िलहाल पार्टी में किसी भी पद पर नहीं हैं। बावजूद इसके वह पार्टी के लिए मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा कर रहे हैं। सिद्धू इसी गाँधी परिवार की बदौलत सरकार में मंत्री रहते हुए मुख्यमंत्री को जरा भी भाव नहीं देते थे। वह स्थानीय स्वशासन मंत्री के तौर पर नायाब काम कर उदाहरण पेश करना चाहते थे; लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को उनके काम करने का तरीक़ा ही पसन्द नहीं आया। उन्हें दूसरा मंत्रालय देने पर राजी नहीं किया जा सका और तभी से सिद्धू और कैप्टन में 36 का आँकड़ा बना। पार्टी में रहते हुए सिद्धू अमरिंदर सिंह को अपना कैप्टन नहीं, बल्कि गाँधी परिवार को संयुक्त तौर पर कैप्टन मानते रहे हैं। मज़ेदार बात यह कि कैप्टन चाहते हुए भी सिद्धू के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं कर सके।

पंजाब में 32 फ़ीसदी दलित मतदाता हैं; जिसकी हार-जीत में सबसे अहम भूमिका है। ऐसे में चन्नी की दावेदारी पार्टी के लिए सशक्त हो जाती है। पार्टी नेतृत्व पहले ही दलित को मुख्यमंत्री बनाने का श्रेय लेकर अपनी पीठ थपथपा रहा है। अब उनकी जगह किसी जट्ट सिख की दावेदारी रखता, तो दलित मतदाताओं में इसका नकारात्मक असर होता और पार्टी की रणनीति ही गड़बड़ा जाती। चन्नी ने तीन माह के दौरान कई लोक-लुभावन घोषणाएँ ज़रूर कीं; लेकिन इससे पार्टी को कोई लाभ मिलने की सम्भावना कम ही है।

प्रमुख दलों में भावी मुख्यमंत्री के तौर पर नाम आ चुके हैं। तीनों प्रमुख दल स्पष्ट बहुमत मिलने के दावे ज़रूर करते हैं। लेकिन राज्य में फ़िलहाल किसी के पक्ष में हवा बह रही हो ऐसा कम-से-कम अभी तो आभास नहीं हो रहा। चुनावी सर्वे यहाँ बहुत बार ग़लत साबित होते रहे हैं। राज्य में एक पार्टी की सरकार और सशक्त मुख्यमंत्री की ज़रूरत है। राज्य में अस्थिर सरकार अन्य राज्यों के मुक़ाबले ठीक नहीं। पंजाब की सीमा पाकिस्तान के साथ लगती है। कमज़ोर सरकार और नेतृत्व से न केवल नशा और हथियारों की तस्करी बढ़ेगी, बल्कि आतंकवाद की काली छाया पडऩे की आशंका रहेगी।

“पंजाब के हितों की लड़ाई मैं अकेला नहीं लड़ सकता। इसके लिए पार्टी की एकजुटता ज़रूरी है। शीर्ष नेतृत्व ने मुझ पर भरोसा जताया, मैं उसे टूटने नहीं दूँगा। मैं आम आदमी हूँ और सभी को साथ लेकर चलूँगा। पार्टी में कोई गुटबाज़ी नहीं है। सिद्धू मेरे हमदर्द हैं और मुझे उनका पूरा सहयोग मिलता रहा है, और दोबारा सरकार बनने पर फिर निश्चित तौर पर मिलेगा।’’

चरणजीत सिंह चन्नी

मुख्यमंत्री, पंजाब