नेतृत्व का इम्तिहान

FILE PHOTO: India's Prime Minister Narendra Modi removes his face mask to address a gathering before flagging off the "Dandi March", or Salt March, to celebrate the 75th anniversary of India's Independence, in Ahmedabad, India, March 12, 2021. REUTERS/Amit Dave

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने खड़ी हो चुकी हैं ढेरों चुनौतियाँ

कोरोना महामारी की दूसरी लहर में जनता को जिस मुसीबत से गुज़रना पड़ा, उसने देश की शीर्ष-सत्ता में बैठे लोगों की विश्वसनीयता को कमज़ोर किया है। ऑक्सीजन की कमी से तड़पते लोगों, गाँव-गाँव जलती अनेक चिताओं और नदियों में तैरते शवों ने एक नयी, लेकिन दु:ख भरे भारत की तस्वीर सामने रखी। ज़ाहिर है इस नाकामी का सबसे बड़ा नुक़सान शीर्ष-सत्ता में बैठे लोगों, ख़ासतौर पर प्रधानमंत्री मोदी को हुआ है। हाल के हफ़्तों में कई सर्वे रिपोट्र्स में भी प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता को बड़ा नुक़सान होता दिखाया गया है। ऐसे में ये कयास लगने लगे हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव तक मोदी को अपनी लोकप्रियता बनाये रखने के लिए बड़ी चुनौतियाँ झेलनी पड़ सकती हैं। एक नेता के रूप में मोदी के सामने महँगाई और मंदी से लेकर बेरोज़गारी तक बड़ी चुनौतियाँ हैं। इन्हीं हालात पर बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-

देश और देश के बाहर पिछले एक महीने में किये गये सर्वे बताते हैं कि पिछले सात साल की सत्ता के दौरान पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में जबरदस्त कमी आयी है। वह अभी भी देश में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय नेता हैं; लेकिन उनकी लोकप्रियता को ग्रहण लगाने वाली वर्तमान चुनौतियाँ आने वाले समय में राजनीतिक रूप से ज़्यादा विकराल हो सकती हैं। अगले साल छ: राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं, जिनमें पिछले दो लोकसभा चुनावों में भाजपा का मज़बूत $िकला बना उत्तर प्रदेश भी शामिल है; जिसमें हाल के स्थानीय निकाय के चुनावों में पार्टी की लोकप्रियता में बड़ी दरार पड़ी है। हाल की कुछ बड़ी असफलताओं ने प्रधानमंत्री की धार्मिक-राष्ट्रवादी वाली छवि से क़द्दावर हुई विश्वसनीयता को तो नुक़सान पहुँचाया ही है, कोरोना की दूसरी लहर के असाधारण दौर में देश भर में लोगों ने ऑक्सीजन के लिए तड़पते लोगों और जलती हज़ारों चिताओं को देखा, जिसने पहली बार जनता के मन के भीतर यह सन्देह पैदा किया है कि मोदी उनकी हर समस्या का हल नहीं हैं, जिससे उनकी छवि को बट्टा लगा है।

सरकार और भाजपा जानते हैं कि कोरोना प्रबन्धन में गम्भीर नाकामी से बड़ा नुक़सान हुआ है; लिहाज़ा इसकी भरपाई ‘धन्यवाद मोदी जी वाले भारी भरकम ख़र्च के द्वारा ‘मुफ्त कोरोना वैक्सीन जैसे विज्ञापनों से करने की कोशिश हुई है। सात साल में जो दूसरी बड़ी बात भाजपा में देखने को मिली है, वह प्रधानमंत्री मोदी और उत्तर प्रदेश के विख्यात मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच खटपट की बड़े स्तर पर हो रही चर्चा है। अब सवाल यह है कि क्या 2024 के लोकसभा चुनाव में अगले 24 महीनों में होने वाले घटनाक्रम मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री का चेहरा बनने में रोड़ा बन सकते हैं? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का क्या रोल रहेगा? यह भी बहुत महत्त्वपूर्व है, जो हाल में ‘दिल्ली के विरोधÓ के बावजूद योगी की ढाल बनकर खड़ा होता दिखा है।

भाजपा के भीतर हाल के महीनों में ऐसी कुछ चीज़ो हुई हैं, जो खुलकर बाहर नहीं आयी हैं। यह कहना नितांत ग़लत है कि भाजपा के भीतर एक नेता के तौर पर नरेंद्र मोदी का बिल्कुल भी विरोध नहीं है। सात साल के बाद भाजपा के भीतर हलचल है, जो बाहर आने के लिए ‘उचित समय और ‘खिड़की ढूँढ रही है। कुछ बड़े मंत्रियों से लेकर कुछ बड़े नेता शीर्ष नेतृत्व की शैली से असहमत हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रिश्तों को लेकर हाल के हफ़्तों में कुछ चीज़ो मीडिया में आयी हैं, जो पूरी तरह ग़लत नहीं हैं और इशारा करती हैं कि भाजपा के भीतर कुछ पक रहा है। ऐसा नहीं होता, तो हर दूसरे दिन उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बदले जाने की बातें सामने नहीं आतीं। यहाँ तक कि वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह तक का नाम गाहे-ब-गाहे उछलता रहता है। मोदी सरकार में वरिष्ठ मंत्री और आरएसएस के बहुत प्रिय नितिन गडकरी के प्रधानमंत्री बनने के नारे तो 23 जून को हिमाचल के कुल्लू में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की उपस्थिति में तब लग गये, जब गडकरी सूबे के दौरे पर आये हुए थे।

देश के इतिहास पर नज़र डालें, तो दोबारा सत्ता में आये कमोवेश हर प्रधानमंत्री, चाहे वह नेहरू हों या इंदिरा गाँधी हों या मनमोहन सिंह, 7-8 साल के बाद उनके सामने विश्वसनीयता की गम्भीर दिक़्कतें आनी शुरू हुईं। यह वो समय होता है, जब नाराज़ हो रही जनता विपक्ष के सरकार पर आरोपों के प्रति सहानुभूति दिखाने लगती है और उसे यह आरोप सही लगने लगते हैं। भले भाजपा स्वीकार न करे, मगर प्रधानमंत्री मोदी के साथ भी यह दिक़्क़त आती दिख रही है। देश में ज़रूरी चीज़ों की क़ीमतें आसमान छू रही हैं। पेट्रोल-डीजल की क़ीमतें आम आदमी के बस से बाहर जा चुकी हैं। अर्थ-व्यवस्था का बैंड बजा पड़ा है। जीडीपी माइनस में चल रही है। अनियोजित तालाबंदी (लॉकडाउन) के बाद बेरोज़गार हुए 10 करोड़ से ज़्यादा लोगों को दोबारा रोज़गार नहीं मिल पाया है, जिससे बेरोज़गारों की क़तार और लम्बी हो गयी है।

किसानों के प्रति मोदी सरकार ने लगभग असंवेदनशील अंदाज़ में काम किया है। किसान आन्दोलन आज भी जारी है और सरकार समर्थक मीडिया और शोशल मीडिया किसानों को आज भी ख़ालिस्तानी और पाकिस्तानी बता रहा है। अर्थ-व्यवस्था की हालत यह है कि हमारी तुलना बांग्लादेश से होनी लगी है और उसके आर्थिक प्रबन्धन को हमसे बेहतर बताया जा रहा है। मनमोहन सरकार को तो 2011 में स्वयंसेवी अन्ना हजारे के व्यापक प्रभाव वाले जन-आन्दोलन का सामना करना पड़ा था; मोदी ऐसे किसी भी आन्दोलन से बचे रहे हैं। विपक्ष भी सुस्त रहा है। दूसरे पिछले डेढ़ साल में कोरोना के कारण राजनीतिक गतिविधियाँ वैसे ही सीमित-सी हो गयी हैं। यदि ऐसा न होता, तो शायद मोदी सरकार के ख़िलाफ़ सड़कों पर आन्दोलन हो रहे होते।

इसके अलावा हाल के वर्षों में भारतीय लोकतंत्र को चोट पहुँचाने वाली जो सबसे बड़ी बात देखने को मिली है, वह केंद्र और ग़ैर-भाजपा राज्यों के बीच खाई का चौड़ा होना है। इन राज्यों के राजनीतिक नेतृत्व के मन में मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के प्रति तल्ख़ी बढ़ी है, जिसका विकास कार्यक्रमों पर उलटा असर पड़ा है। यह तल्ख़ी किस स्तर की है? इसका अनुमान दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के ‘हर समय झगड़ा ठीक नहींÓ वाले ट्वीट के बाद दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की उस टिप्पणी से लगाया जा सकता है, जिसमें उन्होंने मोदी को ‘झगड़ालू प्रधानमंत्री की संज्ञा दी है।

कोरोना वैक्सीन के वितरण को लेकर भी ग़ैर-भाजपा राज्यों के मुख्यमंत्री भेदभाव का आरोप लगाते रहे हैं। जीएसटी का राज्यों का हिस्सा उन्हें नहीं मिला है। उनकी योजनाओं में केंद्र के हस्तक्षेप से भी राज्य नाख़ुश हैं। पश्चिम बंगाल में टीएमसी के जबरदस्त बहुमत से जीतने की बाद भी वहाँ सरकार को गिराने की तमाम तिकड़में जारी हैं। यहाँ तक कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सामने आकर कहना पड़ा कि मोदी सरकार बंगाल को विभाजित करने पर तुली है। उन्होंने कहा कि भाजपा का एक वर्ग उत्तर बंगाल को केंद्र शासित प्रदेश बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन राज्य में किसी भी ‘फूट डालो और राज करोÓ की नीति को वह सफल नहीं होने देंगी।

विपक्ष की चुनी सरकारों को चुन-चुनकर गिराने की भाजपा की कोशिशें और इसमें वहाँ का राज्यपालों की भूमिका पर भी ढेरों सवाल उठे हैं। अरुणाचल प्रदेश से लेकर कर्नाटक और मध्य प्रदेश तक भाजपा ने कांग्रेस की सरकारों को गिराया है। आम जनता में इसका ग़लत सन्देश गया है और भाजपा की छवि ‘सत्ता की लालची पार्टीÓ की बन गयी है। देश में कोरोना की दूसरी लहर में इस महामारी के बड़े स्तर पर पाँव पसारने के बावजूद बंगाल में जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने अन्तिम समय तक भीड़ भरी जनसभाओं के साथ चुनाव प्रचार जारी रखा, उससे भी ग़लत सन्देश गया।

Chief Minister of Uttar Pradesh state Yogi Adityanath celebrates the party’s victory in Lucknow, India, Thursday, May 23, 2019. Indian Prime Minister Narendra Modi’s party claimed it had won reelection with a commanding lead in Thursday’s vote count, while the stock market soared in anticipation of another five-year term for the pro-business Hindu nationalist leader. (AP Photo/Rajesh Kumar Singh)

दिल्ली में चिन्ता

भले अभी ज्यादा बाहर नहीं आयी है; लेकिन भाजपा के भीतर निश्चित ही खटपट है। उत्तर प्रदेश में हाल के निकाय चुनाव में भाजपा को बड़ी मार पड़ी है। दिल्ली में भाजपा के भीतर इससे भय पसरा है; क्योंकि उत्तर प्रदेश नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए अगले चुनाव में फिर जीत का सबसे बड़ा आधार है और वहाँ भाजपा का कमज़ोर होना उनके सपने को तोड़ सकता है। वैसे भी यहाँ 2014 की 80 सीटों के मुक़ाबले सन् 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की 11 सीटें घटकर 69 रह गयी थीं। वह भी तब, जब वहाँ भाजपा की सरकार है। पार्टी के लिए सबसे बड़ी चिन्ता की बात यह रही है कि मई के शुरू में पंचायत चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में भाजपा की बुरी तरह हार हुई है। इस चुनाव में मोदी के वाराणसी संसदीय क्षेत्र के तहत कुल 40 सीटों में से भाजपा को सि$र्फ आठ सीटें मिलीं। इससे पहले अप्रैल में भी वाराणसी की संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्र चुनाव में भाजपा की छात्र इकाई एबीवीपी को बुरी तरह हराकर कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई ने सभी सीटें जीत ली थीं।

इन नतीजों से निश्चित ही दिल्ली में चिन्ता है। बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद जब भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने पार्टी की एक टीम लखनऊ भेजी, उसके बाद ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के बीच तनातनी की ख़बरें मीडिया में आनी शुरू हुईं। बिना आग के धुआँ नहीं उठता, लिहाज़ा इन्हें काफ़ी सु$िर्खयाँ मिलीं। अटकलें यह भी रहीं कि पार्टी उत्तर प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन या मंत्रिमंडल विस्तार की सोच रही है।
योगी को नाराज़ करने वाली एक और चर्चा राजनीतिक हलक़ों में गर्म हुई, वह यह कि दिल्ली एक साल बाद के विधानसभा चुनाव से पहले ही उत्तर प्रदेश का विभाजन करने की इच्छुक है। हालाँकि इतने कम समय में ऐसा करना बहुत आसान प्रतीत नहीं होता। अलग पूर्वांचल, बुंदेलखण्ड और हरित प्रदेश की माँग उत्तर प्रदेश में लम्बे समय से होती रही है। मायावती सरकार ने तो बाक़ायदा विधानसभा में इसका प्रस्ताव तक पास करवा लिया था। अलग पूर्वांचल बनता है, तो योगी का गढ़ गोरखपुर उसी के तहत आता है, जहाँ से वह पाँच बार सांसद रहे हैं। चर्चा के मुताबिक, प्रस्तावित पूर्वांचल में 125 विधानसभा सीटें और अधिकतम 25 ज़िले बनाये जा सकते हैं। कहते हैं कि योगी इसे लेकर बिल्कुल सहमत नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में कहावत है कि जिसने पूर्वांचल जीता, उसकी सरकार बनी। वैसे पूर्वांचल के मतदाता को लेकर कहा जाता है कि वह हर बार अपनी पसन्द बदल लेता है। वहाँ कई ऐसे ज़िले हैं, जहाँ भाजपा कमज़ोर है। वहाँ भाजपा की पैठ बढ़ाने के लिए ही योगी सरकार ने पूर्वांचल के विकास की योजना तैयार की थी और उसमें 28 ज़िलों को चुना था, जिन पर फोकस करना था।