नशे में घुलता नये साल का जश्न

नया साल नये ज़माने में एक तरह से हमारी संस्कृति और सभ्यता के उलट ऐसे जश्न का अवसर बन गया है, जिसमें मानसिक आनंद के ज़रिये बदल गये हैं। युवा नशे को तर•ाीह देने लगे हैं। हिमाचल में नये साल पर रेव पार्टियों का आयोजन इसका गवाह है। इसी को रेखांकित करती यह रिपोर्ट।

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कश्मीर भले नये साल पर देश भर के सैलानियों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण रहा हो, इस बार वहाँ कुछ पाबंदियों और स्थिति के चलते बड़ी संख्या में सैलानियों ने हिमाचल का रुख गया है। हिमाचल में नये साल से पहले ही ज़्यादातर होटल में 70 फीसदी से ज़्यादा की बुकिंग हो चुकी है।

होटल इंडस्ट्री में इससे उपजी खुशी के बीच इस पहाड़ी राज्य के खास पर्यटन स्थलों राजधानी शिमला, मनाली और मैक्लोडगंज आदि में नये साल पर रेव पार्टियों के आयोजन की भी छिपकर तैयारियाँ हुई हैं। इन रेव पार्टियों में ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थों का जमकर इस्तेमाल किया जाता है। पिछले साल पुलिस ने इन्हें रोकने की अथक कोशिश की है; लेकिन इसके बावजूद इन पर आंशिक नियंत्रण ही लग पाया है।

तहलका संवाददाता द्वारा जुटाई जानकारी के मुताबिक, प्रदेश में इस साल नशीले पदार्थों के 1350 के करीब मामले दर्ज हुए हैं। इनमें से ज़्यादातर मामले अब अदालतों में हैं। चिन्ता की बात यह है कि हिमाचल में ‘चिट्टा’ के इस्तेमाल का चलन बढ़ रहा है। इस साल में यह रिपोर्ट लिखे जाने तक चिट्टा से जुड़े 295 मामले दर्ज हो चुके थे। इससे पहले पड़ोसी पंजाब में इसे लेकर खासी बहस हो चुकी है।

नये साल से पहले ही कुल्लू के कई इलाकों के अलावा धर्मशाला के पास मैक्लोडगंज जैसे स्थानों पर रेव पार्टियों के आयोजन की तैयारी शुरू हो जाती है। इन्हें किया चोरी-छिपे ही जाता है। पुलिस की नज़र इन पर रहती है, लेकिन इसके बावजूद बहुत-सी जगह इनका आयोजन होता है।

हिमाचल में मुख्यता चरस, अफीम, भुक्की, गाँजा, चिट्टा, हेरोइन, स्मैक, ब्राउन शुगर, कोकीन, पॉपी प्लांट्स आदि का इस्तेमाल होता है। प्रदेश सरकार समय-समय पर नशा विरोधी अभियान चलाती रही है, इसके बावजूद इस धन्धे से जुड़े स्थानीय विदेशियों और लोकल युवाओं को यह चीज़े उपलब्ध करवाते रहे हैं।

यह आश्चर्य ही है कि अपने सौंदर्य और सेबों के स्वाद के लिए प्रसिद्ध हिमाचल नशे के मामले में भी उतना ही बदनाम हुआ है। हिमाचल में नशे का कारोबार खतरनाक स्तर तक पहुँच गया है। एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि हिमाचल नशे के लिए दर्ज मामलों में तीसरे स्थान पर है। प्रति लाख आबादी के हिसाब से दर्ज घटनाओं का आँकड़ा 13.6 है, जो देश में तीसरा सबसे ज़्यादा है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश में एनडीपीएस अधिनियम 1985 में विशेष और स्थानीय कानूनों (एसएलएल) अपराधों के तहत संज्ञेय अपराधों के 700 से ज़्यादा मामले दर्ज किये गये हैं, जो एक डरावनी तस्वीर पेश करते हैं।

हिमाचल में नशे के व्यापार में पकड़े गये आरोपियों को सज़ा मिलने का आँकड़ा भी बहुत कमज़ोर रहा है। पिछले दो साल में प्रदेश में नशे से सात युवाओं की जान गयी है। सामाजिक कार्यों में जुटी उमंग फॉउण्डेशन के अध्यक्ष अजय श्रीवास्तव का कहना है कि प्रदेश में विभिन्न सरकारें नशे का कारोबार रोकने में नाकाम रही हैं। श्रीवास्तव ने बताया कि ‘यहाँ नशीले पदार्थों की धड़ल्ले से बिक्री होती है। स्कूलों के बाहर नशे की पूडिय़ाँ बिकती हैं और सरकारी तंत्र हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है।’

सरकारों के अभियान भी कागज़ी साबित हुए हैं। इनमें गम्भीरता और नीति की बेहद कमी दिखती है और लोगों का इसमें भागीदारी बहुत कम है। पिछले साल एक पूर्व विधायक का नाबालिग बेटा अपने तीन साथियों समेत चरस के साथ हिरासत में लिया गया था। इससे जागरूकता का सहज ही अंदाज़ालगाया जा सकता है।

सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, हिमाचल में पिछले 10 साल में एनडीपीएस मामले तीन गुना बढ़ गये हैं। हिमाचल में बढ़ते नशीले पदार्थों के व्यापार का सबसे बड़े केन्द्र कुल्लू, मनाली, मंडी, सिरमौर और शिमला हैं, जहाँ बड़ी संख्या में युवा इसकी जकड़ में हैं। चरस का व्यापार कुल्लू में एक भयानक आकार ग्रहण कर रहा है, जहाँ पर्यटकों की बड़ी संख्या रहती है। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, विदेशियों में ज़्यादातर इज़राइली नागरिक इस धन्धे से जुड़े हैं। नशे की खेती के ज़रिये स्थानीय किसानों को त्वरित कमायी के लिए प्रेरित किया जाता है।

कुल्लू ज़िलों में मनाली, कासोल, मालाणा अभी भी नशीले पदार्थों के व्यापार के केन्द्र हैं। विदेशी नागरिकों और स्थानीय निवासियों की तरफ से मलाणा और आसपास रेव पार्टियाँ आयोजित करना आम बात है। यहाँ तक आरोप हैं कि कुछ विदेशी नागरिक अवैध रूप (भारत सरकार से वैध अनुमति के बिना) मालाणा क्षेत्र में रह रहे हैं और वे स्थानीय लोगों की मदद से नशा व्यापार में शामिल हैं। पिछले सात साल में 97 से अधिक विदेशी नागरिक, मुख्य रूप से ब्रिटिश, इस्राइली, डच, जर्मन, जापानी और इटालियन राज्य में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंस (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत गिरफ्तार किये गये हैं।

छानबीन बताती है कि पंजाब और हरियाणा की सीमा के साथ लगते राज्य के क्षेत्र नशीली दवाओं के केन्द्र बन गये हैं। नशा व्यापार के खतरे ने धार्मिक तीर्थ केन्द्रों और पर्यटन स्थलों में भी खतरनाक अनुपात में अपने पाँव पसार लिए हैं। सेवानिवृत्त एडीजीपी केसी संयाल ने इस संवाददाता से बात करते हुए खुलासा किया कि हिमाचल प्रदेश में 58 प्रतिशत से ज़्यादा नशे का उत्पादन इज़रायल, इटली, हॉलैंड और कुछ अन्य यूरोपीय देशों में तस्करी के ज़रिये पहुँच रहा है। ‘बाकी नेपाल, गोवा, पंजाब और दिल्ली, नेपाल या अन्य भारतीय राज्यों में पहुँच जाता है।’

काँगड़ा ज़िले में मैक्लोडगंज और आसपास के इलाके भी अवैध नशीले पदार्थों के केन्द्र हैं। सड्याल ने कहा- ‘वैकल्पिक खेती (सब्ज़ियों और फूलों की खेती) ही अफीम और भाँग की खेती को नियंत्रित करने का एकमात्र तरीका है।’

राज्य पहले भाँग के लिए जाना जाता था, जो पहाडिय़ों में उगाया जाता था और विदेशियों द्वारा इस्तेमाल किया जाता था। हालाँकि, अब सिंथेटिक नशा दवाओं की उपलब्धता और कुख्यात चिट्टा (हेरोइन) आ चुके हैं। युवाओं में खाँसी सिरप, एंटी-ड्रिंपेंट्स और नींद वाली गोलियों का भी इस्तेमाल होता है, जो सस्ती हैं। ड्रग तस्करी अब राज्य में विदेशी, स्थानीय और देश के अन्य राज्यों के तस्करी करने वालों के रूप में राज्य में बहु-आयामी समस्या बन गयी है। यह अब रहस्य की बात नहीं रही, भाँग और हशीश दशकों से हिमाचल में उगाये जाती रहे हैं और उपभोग के अलावा तस्करी में इस्तेमाल की जाती रही है।

ज़्यादा पर्यटक आ रहे

कश्मीर में हालत के मद्देनज़र हिमाचल में पर्यटकों की संख्या बड़ी है। जल्दी बर्फबारी ने इस बार पर्यटकों को हिमाचल की तरफ दिसंबर के दूसरे हफ्ते में ही खींच लिया। अहमदाबाद से आये नवविवाहित जोड़े सुधीर और रागिनी पटेल ने शिमला के मॉल रोड पर इस संवाददाता को बताया कि वे हनीमून के लिए कश्मीर जाना चाहते थे; लेकिन परिवार वालों ने शिमला और मनाली जाने की सलाह दी। रागिनी ने कहा- ‘शिमला के बाद हम मनाली जाएँगे। शिमला-कुफरी हमें बहुत सुन्दर और शाँत लगे।’

उधर शिमला और मनाली के होटलों में 70 फीसदी से ज़्यादा एडवांस बुकिंग हो चुकी है। इससे होटल के रेट भी बड़े हैं। शिमला होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष संजय सूद के मुताबिक, बर्फबारी के कारण शिमला आने वाले पर्यटकों की तादाद में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई हैं। नये साल तक यह ऑक्यूपेंसी करीब 80 फीसदी पहुँच गयी। मनाली में इस बार जल्दी बर्फ पडी है। अभी भी कई जगह बर्फ जमी है। रोहतांग जाने वाले पर्यटकों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है।

सख्ती कर रही पुलिस

तमाम एसपी को निर्देश दिये गये हैं कि नये साल पर इस तरह के पार्टियों पर विशेष नज़र रखी जाये और ऐसा करने वालों पर सख्त कार्रवाई के जाए। शैक्षणिक संस्थानों के पास स्थित सभी दुकानों, ढाबों में सख्त निगरानी रखी जा रही है। पहले के मुकाबले प्रदेश में नशे से जुड़ी घटनाओं में बड़ी संख्या में कमी आयी है। नशे, खासकर भाँग की खेती के िखलाफ व्यापक अभियान राज्य के सभी ज़िलों में शुरू किया गया था। पुलिस, एनसीबी, एसएनसीबी, सीआईडी और वन, राजस्व, पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभागों जैसे प्रवर्तन एजेंसियों को शामिल करके ऐसी खेती को नष्ट करने के लिए एक संयुक्त अभियान हम चला रहे हैं। सभी एसपी, महिला मंडल, युवक मंडल और अन्य गैर सरकारी संगठन इससे जुड़े हैं। अफीम पोस्त और भाँग की फसलों का विनाश हम कर रहे हैं। ग्रामीण विकास विभाग के समन्वय में कृषि और बागवानी विभाग संयुक्त रूप से अफीम पोस्त और भाँग की खेती वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त वैकल्पिक नकद फसलों को अपनाने के प्रस्ताव पर काम शुरू हो चुका है। पीटीए और एसएमसी बैठकों के दौरान, छात्रों के माता-पिता भी इस मुद्दे पर चर्चा में शामिल किया गया है। स्कूलों में छात्रों को नशे से दूर रखने के लिए हमने जागरूकता अभियान शुरू किये हैं, जिनके अच्छे नतीजे आये हैं।

एसआर मरडी, हिमाचल पुलिस प्रमुख 

नशे का व्यापार

राजधानी शिमला में प्रदेश के सबसे बड़े स्वास्थ्य संस्थान,  इंदिरा गाँधी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (आईजीएमसी) की एक अध्ययन रिपोर्ट का हवाला देते हुए कुछ साल पहले न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की अध्यक्षता वाली हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने एक फैसले में कहा था कि राज्य में 40 प्रतिशत युवा नशीली दवाओं के जाल में फँसे हैं। यह दिलचस्प तथ्य है कि उच्च न्यायालय हाल के महीनों में इस मुद्दे पर राज्य सरकारों की खिंचाई कर चुका है। अदालत ने सरकार के भाँग उखाड़ो अभियान पर भी कहा था कि यह समस्या के हल के बहुत छोटा उपाय है और कागज़ों तक सीमित है। राज्य के करीब 380 गाँवों में भाँग की खेती होती हैं। राज्य सरकार के रिकॉर्ड के मुताबिक, अकेली कुल्लू घाटी में करीब 51,500 एकड़ ज़मीन में भाँग की खेती की जाती है और इस ज़िले में सालाना 1900 करोड़ रुपये के नशे का कारोबार होता है।

नशे की बुराई से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास करने की ज़रूरत है। नशे के दुष्प्रभावों के बारे जागरूकता लाने के लिए एक जन आन्दोलन शुरू किया जाना चाहिए। हमारी सरकार ने इस बुराई को मिटाने के लिए बहु-आयामी रणनीति तैयार की है। एक माह तक चलने वाला अभियान इस रणनीति का हिस्सा है। अभियान औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि इसके सकारात्मक परिणाम सामने आएँगे। सभी विभागों के बेहतर समन्वय के द्वारा इन प्रयासों को फलीभूत किया जा सकता है।

देश के पर्यटन निगमों के होटलों को भी प्रदेश में आने वाले पर्यटकों को नशे से दूर रहने के लिए जागरूक किया जाना चाहिए। हमने पिछले महीने ही शिमला में नशा मुक्ति केन्द्र और हिमाचल प्रदेश राज्य मनोरोग चिकित्सा प्राधिकरण की वेबसाइट शुरू की है।

जयराम ठाकुर, मुख्यमंत्री, हिमाचल