नशे की गिरफ्त में फिर आया पंजाब

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पंजाब में नशे का मुद्दा फिर उभरा है। पिछले विधानसभा चुनाव में यह एक बड़ा चुनावी मुद्दा था। तब इस सीमाई राज्य के इतिहास में यह चुनावी मुद्दा खासा गंभीर था।

एक राजनीतिक के तौर पर कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 2015 में चुनावी रैली में पवित्र सिख पुस्तक (गुटका साहिब) की शपथ खाई थी कि यदि वे सत्ता में आए तो चार सप्ताह में नशे के इस व्यापार को खत्म कर देंगे। पंजाब की जनता ने कांग्रेस को 75 सीटें दिला कर कैप्टन की इच्छा पूरी की।

अपने चुनावी वायदे को ध्यान में रखते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने पंजाब की समस्या पर ध्यान दिया और वे कदम उठाए जो पिछली अकाली-भाजपा सरकार नहीं ले सकी थी। सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने भी खुलकर सहयोग करके आदर्श नशा निवारण केंद्रों का निर्माण किया और जो पुराने केंद्र थे उन्हेंं मजबूत किया। कुछ ऐसे लोग जो राज्य पुलिस में अच्छे पदों पर थे और जिन पर दवाओं के कारोबार में सहयोग देने का शक था, उनके भी सबूत जुटाए गए।

तकरीबन पंद्रह महीने यह मुद्दा दबा रहा। अचानक एक महीने में यह मामला उछला और विपक्षी-आप और अकाली-भाजपा गंठजोड़ ने सरकार पर हल्ला बोल दिया। मीडिया में राज्य में नशे के चलते तीस लोगों के मरने की बात कही। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ब्रहम मोहिंदर ने इस तादाद को चुनौती दी। उन्होंने बताया कि जीरा और नवांशहर इलाकों में चार लोगों की मौत होने की बात कही। संबंधित स्वास्थ्य क्षेत्र और पुलिस अधिकारियों को मौत की असल वजह पता करने के निर्देश दिए गए। मुख्यमंत्री ने इन सभी मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटने का निर्देश दिया।

आश्चर्य इस बात पर है कि इन मौतों को लेकर जो राजनीतिक तूफान मचा उस पर किसी ने भी यह सोचने की कोशिश नहीं की आस-पड़ोस, परिवार, पुलिस, स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता, और दूसरे लोग क्यों नहीं इस सच की छानबीन कर पाए कि जब ये जिंदा थे तो ये आतंक के साए में थे। शोर सिर्फ मृत देहों पर मचाया जा रहा था। सत्ता पार्टी और सरकार को जिम्मेदार बताने में कोई पीछे नहीं था।

आज जो मसला दिख रहा है उसकी जड़ें वैयक्तिक व्यवहार, सामाजिक संपर्क और आर्थिक हालात पर है। यानी बात समाज की जिम्मेदारी और सुशासन की इस की अपनी विविधता पर थी। इसकी जिम्मेदारी उस समाज पर थी जिससे सीधा मुकाबला संभव था। लेकिन राजनीति अगली कतार में होती है। जिसे मुकाबले में सीधे-सीधे उतरना ही है अभी हाल, अकाली दल ने एक मिली जुली रणनीति तैयार की थी जिसे सरकार ने पूरी तौर पर नकार दिया था। दूसरी ओर चुने हुए जन प्रतिनिधि नशा लेने की जांच खुद ही करा कर अपनी प्रशंसा खुद कर रहे है।

सामुदायिक भागीदारी ज़रूरी है इस तरह की खतरनाक समस्या पर जो आज भी बरकरार है। लुुधियाना में रह रहे अंतरराष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिक एसएस जोशी यही कहते हैं। वे उस सिविल सोसाइटी समूह से जुड़े हैं जिसने जुलाई के पहले सप्ताह में अभी हाल में हुई मौतों के खिलाफ प्रदर्शन भी किया था। हमारी भूमिका सरकार के साथ सहयोग की है। हम लोगों को प्रेरित कर रहे हैं, उत्साहित कर रहे हैं जिससे वे नशीले पदार्थों के खिलाफ आवाज उठाएं न कि सरकार के खिलाफ यह सरकार इसे खत्म कर सकती है। उन्होंने बताया एक चीज तो यह है कि पुलिस और विशेषज्ञ अब यह बता रहे हैं कि मौतें नशीले पदार्थों की सप्लाई पर रोक लगाने के बाद हुई। यह एसटीएफ की मुहिम की बदौलत हुआ जिससे विपक्ष की अपनी असहमतियां हैं। ज़मीनी स्तर पर लोग नशा विरोधी केंद्र और पुनर्वास केंद्रों का उपयोग कर रहे हैं। जो नई पहल हैं वह है ड्रग एब्यूज प्रिवेंशन ऑफिसर्स (डीएपीओ) और नेबरहुड बड़ी जिससे मरीज़ों को मनौवैज्ञानिक तौर पर नशीले पदार्थों से मुक्त होने में मदद मिलती है। जागरूकता फैलाने के लिए राज्य के शिक्षा संस्थाओं की जोड़ दिया गया है। फिर भी राजनीतिक उठापटक से जनहित को चोट पहुंचती है।

राजनीतिक उठापटक के दौर में विशेषज्ञ दीर्घकालिक समाधान ठहर जाते हैं। समस्या का कोई जल्द समाधान संभव नहीं है। क्योंकि यह समस्या रातों-रात नहीं उपजी है। तकरीबन तीस साल पहले पंजाब के गांव-गांव में अफीम का प्रचलन था वह भी रईस परिवारों में। पॉपी हस्क इसका एक सस्ता विकल्प होता है और इसे लेने वालों को कोई खास नुकसान भी नहीं होता।

नशीली पीढ़ी का दूसरा दौर तकरीबन बीस साल बाद शुरू होता है जब किशोर इलाज के बहाने नशा लेने लगते हंै। वे बड़ी मात्रा में खासी की दवा, और गोलियां लेने लगते है। जिसका उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

हैरोइन या सफेद पाउडर (चिट्टा) का निर्माण एक प्रयोगशाला में तकरीबन पंद्रह साल पहले हुआ। उस समय तक पंजाब में खेती से अच्छा पैसा आने लगा था और तभी यहां मकान, इमारतें बननी शुरू हुईं। खेती की ज़मीनों की कीमतें भी बढ़ीं। शहरों के पास की ज़मीनें और महंगी हो गई और कस्बों में भी अच्छी कीमत लगने लगी।

इसके चलते ‘चिट्टा’ एक महंगा नशीला पदार्थं बन गया। लेकिन समय गुजरा और बाज़ार ठहर गया। जो चिट्टा लेते हुए नशेड़ी बन गए थे उन्हें अब एक ग्राम और पांच ग्राम सें गुज़ारा करना पड़ता था। इन्हें बेचने वाले गांव-गांव फैल गए थे। पंजाब में करीब ऐसे 18,000 छोटे विक्रेताओं की गिरफ्तारी हुई।

विशेषज्ञ मानते हैं सरकार और समाज को यह देखना चाहिए कि नशा कोई आज की समस्या नहीं है बल्कि सनातन है। इसे रोकने का अब समय आ गया है। लेकिन नशीली वस्तुओं को लेने का समय और तरीका समय के अनुसार बदलना चाहिए।