नमक में कुछ काला है !

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नमक हरामी, नमक हलाली,
 जले पर नमक छिड़कना, नमक बजाना जैसी बातें आपने खूब कही और सुनी हैं. अब इसी तर्ज पर मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार की नौकरशाही एक और नई इबारत-नमक से चूना लगाना, गढ़ने की राह पर है. इस मुहावरे का मूल प्रदेश के नागरिक आपूर्ति निगम की उस कवायद से निकलता है जिसके तहत उसने गरीबों के लिए नमक खरीद में कई तरह से हेराफेरी की पृष्ठभूमि तैयार कर दी है. फिलहाल यह मामला इस साल खरीद के पहले ही चर्चा में आ गया. लेकिन पिछले साल के आंकड़े बताते हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए नमक खरीद में हेराफेरी का यह खेल बीते सालों में भी खूब चला है.

इस मामले को समझने से पहले हम उस प्रक्रिया पर जाते हैं जिससे प्रदेश में नमक खरीदा जाता है. मध्य प्रदेश की सरकार भी बाकी राज्यों की तरह राशन की दुकानों के मार्फत गरीबों को रियायती दर पर नमक बांटती है. इसके लिए खरीद गुजरात के कच्छ (गांधीधाम) से होती है. प्रदेश का नागरिक आपूर्ति निगम निविदाओं के आधार पर कच्छ की किसी एक कंपनी  का चयन करता है और फिर उसे करोड़ों रुपये के नमक की आपूर्ति का ठेका दिया जाता है. कहने को यह संक्षिप्त और साफ-सुथरी प्रक्रिया लगती है लेकिन जब हम तथ्यों पर जाते हैं तो तुरंत ही निगम की कार्यप्रणाली संदिग्ध लगने लगती है.

पिछले साल के आंकड़े बताते हैं कि गुजरात ने जिस नमक को 3,300 रुपये प्रति मेट्रिक टन के भाव से खरीदा था वही नमक पड़ोसी राज्य मप्र ने 6,700 प्रति रुपये मेट्रिक टन में खरीदा. जबकि गुजरात से काफी दूर और पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश 5,600 रुपये मेट्रिक टन के भाव में नमक खरीदता है. और तो और, गुजरात से कई राज्यों को पार कर पहुंचने वाला नमक आंध्र प्रदेश में 5,900 रुपये मेट्रिक टन के भाव से खरीदा जाता है. जाहिर है कि बाकी राज्यों के मुकाबले मप्र ने नमक खरीदने के लिए हर मेट्रिक टन पर डेढ़ हजार रुपये से ज्यादा पैसा खर्च किया था. सरकारी अधिकारियों के मुताबिक यह कोई पहली बार नहीं है जब मध्य प्रदेश ने महंगा नमक खरीदा हो. ऐसे में आपूर्तिकर्ताओं से लेकर महकमे के अधिकारियों और मंत्री तक की ईमानदारी पर सवाल उठना लाजिमी है.

दरअसल इस गड़बड़झाले की बुनियाद उन नियमों में है जिनके तहत नमक खरीद होती है. आरोप है कि नमक खरीदने के लिए जारी निविदा सूचना में जानबूझकर ऐसे पेंच डाले गए हैं जिससे सिर्फ दो-तीन कंपनियां ही निविदा भरने के योग्य  रह पाती हैं. जैसे कि निगम की निविदा सूचना में यह शर्त जोड़ी गई है कि ठेका उसी कंपनी को दिया जाएगा जिसने सालाना दस हजार मेट्रिक टन नमक की आपूर्ति सरकार या बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए की हो. इस वजह से अच्छी उत्पादन क्षमता व बाजार में अच्छी साख रखने के बावजूद कई कंपनियां प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाती हैं.

काबिले गौर है कि इस साल मप्र सरकार सूबे के लगभग 72 लाख गरीब परिवारों के लिए लगभग एक लाख मेट्रिक टन नमक खरीदेगी. लेकिन आश्चर्य कि निगम की निविदा में नमक आपूर्ति का ठेका उन कंपनियों को भी देने की छूट दे दी गई है जिनकी उत्पादन क्षमता न्यूनतम 75 हजार मेट्रिक टन हो. सरकार हर साल एक ही कंपनी को नमक आपूर्ति का ठेका देती है. अब सवाल है कि जिन कंपनियों की उत्पादन क्षमता ही 75 हजार मेट्रिक टन होगी तो वे कैसे एक लाख मेट्रिक टन नमक की आपूर्ति करेंगी. गुजरात की आधा दर्जन नमक कंपनियां आरोप लगा रही हैं कि निगम के अधिकारियों की कुछ चहेती कंपनियों की उत्पादन क्षमता 75 हजार मेट्रिक टन से ज्यादा नहीं है इसीलिए निविदा में जान-बूझकर यह शर्त जोड़ी गई है.

निविदा की तीसरी बड़ी शर्त है कि नमक आपूर्ति का ठेका उसी कंपनी को मिल सकता है जिसका आईएसआई चिह्न वाले आयोडीनयुक्त नमक का सालाना टर्नओवर कम से कम 20 करोड़ रुपये है. नमक कारोबार से जुड़े गुजरात के कई व्यापारियों का कहना है कि निगम की यह शर्त व्यावहारिक नहीं है. नमक कारोबार करने वाली एक कंपनी कच्छ ब्राइन (अहमदाबाद) के मुख्य प्रबंधक राजीव गुप्ता के मुताबिक, ‘सरकार के पास इस बात की जांच का कोई तरीका या व्यवस्था नहीं है कि किसी कंपनी ने यदि 20 करोड़ रुपये का नमक बेचा है तो पूरे का पूरा नमक आईएसआई चिह्न वाला आयोडीनयुक्त नमक ही होगा.’ गुप्ता का आरोप है कि निगम ने सारा खेल इस ढंग से खेला है कि बीते सालों की तरह इस साल भी चुनी हुई दो-तीन कंपनियों को क्वालीफाई करवाकर उनमें से किसी एक को नमक आपूर्ति का ठेका दिया जा सके.

गुजरात के नमक कारोबारी बताते हैं कि हिमाचल या आंध्र प्रदेश जैसे दूसरे राज्यों की नमक खरीद निविदाओं में ऐसी शर्तें नहीं हैं. इसके चलते कहीं ज्यादा संख्या में कंपनियां वहां निविदा भर पाती हैं. जाहिर है जब मध्य प्रदेश में गिनी-चुनी कंपनियां ही स्पर्धा में रहेंगी तो सरकार को नमक के लिए ज्यादा दाम चुकाने पड़ेंगे और इस बात की संभावना भी ज्यादा होगी कि अधिकारी कंपनियों से सांठ-गांठ करके आसानी से हेराफेरी कर पाएं.
नमक आपूर्ति के टेंडर को लेकर नमक कंपनियों ने मप्र सरकार को अब अदालत में घसीटा है. बीती 5 मई को कच्छ ब्राइन सहित कई कंपनियों ने निगम की शर्तों के खिलाफ जबलपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की. और इसके एक दिन बाद यानी 7 मई को कोर्ट ने स्थगत आदेश देते हुए निगम के नमक आपूर्ति के वर्क ऑर्डर (कार्य आदेश) पर रोक लगा दी है.

दूसरी तरफ मप्र नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारी नाम न बताने की शर्त पर (चूंकि मामला न्यायालय में है) बात करते हुए कहते हैं, ‘निगम तो बीते कई सालों से महंगी कीमत पर नमक खरीदता रहा है लेकिन किसी कंपनी ने पहले आपत्ति नहीं की. इस साल पहले के मुकाबले तीन गुना अधिक नमक खरीदा जाना है इस वजह से हर कंपनी आपूर्ति का ठेका लेना चाहती है.’

इस चुनावी साल में राज्य की शिवराज सरकार ने लाखों गरीब परिवारों को एक रुपये में एक किलो नमक देने का वादा किया है. सरकारी अनुमान के मुताबिक सरकार इसके लिए तकरीबन 65 करोड़ रुपये खर्च करेगी. लिहाजा गुजरात की कई नमक कंपनियों के बीच प्रदेश में नमक आपूर्ति का ठेका लेने की होड़ लग गई है. और इसी के चलते निगम की कई अनियमितताएं भी अब बाहर आ रही हैं. वहीं सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे मामले में भाजपा के पूर्व विधायक और निगम के चेयरमैन रमेश शर्मा को अंधेरे में रखा गया है. तहलका से बातचीत में शर्मा कहते हैं, ‘मुझसे न तो टेंडर की स्वीकृति ली गई है और न ही किसी अधिकारी ने मुझे कुछ बताया है.’

गेहूं, बारदाने जैसी चीजों की खरीद से जुड़े घोटाले नए नहीं हैं. मगर नमक जैसी सस्ती चीज की खरीद में हेराफेरी का यह मामला दुर्लभ हो सकता है. कहानी सीधी है कि महंगाई के इस जमाने में भले ही गरीब लोग नमक-रोटी खाने के लिए तरस रहे हैं लेकिन नौकरशाही उनके लिए आए नमक के पैसे पर भी गिद्ध झपट्टा मारने से नहीं चूक रही.