नफ़रतों से नाश ही होगा

सन्तों ने कहा है कि मनुष्य जीवन बड़े भाग्य से मिला है, इसलिए इसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। यह कहकर सन्तों ने यह बताने की कोशिश की है कि इंसान को इस जन्म में जन्म-मरण से छुटकारा पाने की कोशिश करनी चाहिए। अर्थात् ईश्वर की प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए। साथ ही यह भी कहा है कि ईश्वर के लिए सभी प्राणी एक समान हैं। सभी मानव उसके पुत्र हैं। इंसानों के लिए ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग भी बताये। इसी के चलते समय-समय पर धर्मों (मज़हबों) की नींव पड़ती गयी और लोग बँटते गये। सभी मज़हबों में एक सीख समान है कि सभी से प्रेम करोगे, तो ईश्वर तुमसे प्रेम करेगा। लेकिन आज दुनिया के अधिकतर लोग आपस में इतनी घृणा और ईष्र्या से भर चुके हैं कि अब बिना स्वार्थ के किसी को प्रेम नहीं करते। चाहे वह कोई रिश्ता हो, बिना स्वार्थ के बहुत कम लोग ही निभाते हैं। ऐसे लोग दुनिया में इतने कम हैं कि अगर इन्हें एक जगह किया जाए, तो एक मुश्किल से इतने ही निकलेंगे कि एक छोटा देश भी नहीं बस सकेगा।

लेकिन क्या स्वार्थ ईश्वर के आगे चल सकेगा? जो चालाकियाँ लोग अपने जीने और ऊँचा बनाये रखने के लिए करते हैं, क्या वे उन चालाकियों से ईश्वर को चकमा दे सकेंगे? क्या ईश्वर के आगे माथा रगडऩे, हाथ जोड़कर खड़े होने, सिर झुकाकर प्रार्थना करने, मज़हबी किताबें पढऩे या दूसरों के सामने साधु, सन्त, सत्यवादी, सच्चरित्र वाला बनने से ईश्वर मिल सकेगा। ईश्वर को पाने के लिए तो बच्चों जैसी निश्छलता और पावनता मन में होनी चाहिए। उसके आगे होशियारी, चालाकी किसी काम की नहीं। ईश्वर को बाँटकर देखने और उसी की संरचना बिगाडऩे, उसी के बनाये दूसरे लोगों से घृणा करने से तो घृणा ही मिलेगी। प्रकृति से खिलवाड़ करने का नतीजा तो ख़ुद के बिगाड़ से ही ख़त्म होगा। जब तक दूसरों की पीड़ा महसूस नहीं करोगे, तब तक ईश्वर तुम्हारी पीड़ा महसूस नहीं करेगा। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने दूसरे प्राणियों की पीड़ा महसूस की। श्रीकृष्ण ने निर्बलों और सच पर चलने वालों की रक्षा की। आचार्य चाणक्य ने बिना भेदभाव के सत्य, न्याय और सामान्य-जनमानस की तरफ़ खड़े होकर पापियों, भोगियों और अधर्मियों का नाश कराया। इस्लाम के आख़िरी पैगम्बर मोहम्मद साहब ने नफ़रत और भेदभाव को ख़त्म करने का काम किया। ईसा मसीह ने अपने हत्यारों और नफ़रत करने वालों को माफ़ किया और दया करने की सीख दी। लेकिन क्या आज इन मज़हबों को मानने वाले लोग ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाने वाले इन अवतारों, सन्तों के बताये रास्तों पर चल रहे हैं?

आज दुनिया में दर्ज़नों धर्म हैं और सैकड़ों पन्थ। लेकिन कोई भी धर्म के रास्ते पर दिखायी नहीं देता। अब ये सब एक-दूसरे से तो घृणा करते ही हैं, अपने ही मज़हब और अपने ही पन्थ के लोगों से लोग नफ़रत करते हैं। पड़ोसियों से नफ़रत करते हैं। यहाँ तक कि अपने ही परिवार के लोगों से और कभी-कभी जिन माँ-बाप ने जीवन दिया, उन्हीं से नफ़रत करने लगते हैं। जिन भाई-बहिनों के साथ पले-बढ़े उन्हीं से दूरी बना लेते हैं। यहाँ तक कि सम्पत्ति के लिए उनका ख़ून तक कर देते हैं। मज़हबों और मूर्खतापूर्वक निर्मित जातियों की आड़ लेकर शुरू हुई नफ़रत अब घरों तक में घुस आयी है। इतने अन्दर तक घुस आयी है कि इससे अब बाहर निकालना बहुत मुश्किल है। अब इस नफ़रत को कोई मज़हब नहीं भगा सकता।

इस नफ़रत को ख़त्म करने के लिए आज हर इंसान को काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह पर क़ाबू पाने की ज़रूरत है। दूसरों से नि:स्वार्थ प्रेम करने की ज़रूरत है। सनातन धर्म में बताये गये इंसान के इन पाँच शत्रुओं पर जिसने भी पा ली, वही इंसान धर्म के मार्ग पर है और वही इंसान ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। तेरा अल्लाह, मेरा राम, उसका गॉड करने से कोई ईश्वर को कभी नहीं पा सकता। ईश्वर एक ऐसा सत्य है, जिससे आज दुनिया के 99 फ़ीसदी लोग मुँह फेरकर खड़े हैं। ख़ुद को धार्मिक मानने वाले और ज़्यादा मुँह फेरकर खड़े हैं और अपने-अपने मज़हबों के लोगों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। धर्म को आगे बढ़ाने वालों को धर्म गुरु कहा गया है। लेकिन यही गुरु अगर लोगों को नफ़रत सिखाएँगे, तो फिर लोगों में आपस में प्रेम कैसे रह सकता है? बहुत कम धर्म गुरु हैं, जो लोगों को सही रास्ता दिखा रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अधिकतर धर्म गुरु अपने पीछे चलने वालों को एक ऐसे अन्धे कुएँ में धकेल रहे हैं, जहाँ से वे प्रकाश अर्थात् सत्य को देख ही नही सकेंगे। वे नर्क की ओर ही बढ़ेंगे, और स्वर्ग यानी आत्मिक सुख की प्राप्ति उनके भाग्य में नहीं होगी। क्योंकि ये सब नफ़रत ही करेंगे और नफ़रत ही पाएँगे।