नकली शोर

आश्चर्य नहीं कि चैनलों को ध्यान में रखकर ही चुनावी रैलियों का दिन, समय और मंच तैयार हो रहा है. जाहिर है कि पार्टियों और नेताओं के साथ-साथ चैनलों के लिए भी दांव बहुत ऊंचे हैं. एक ओर दोनों बड़ी पार्टियां कांग्रेस व भाजपा और उनके प्रत्याशी पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं तो दूसरी ओर, चैनलों और अखबारों को यह मौजूदा आर्थिक मंदी से उबरने के एक लुभावने मौके की तरह दिखाई दे रहा है. हैरानी की बात नहीं है कि पेड न्यूज की शिकायतें फिर से आने लगी हैं. उन पर पक्षपात के भी आरोप लग रहे हैं.

खासकर भाजपा नेता नरेंद्र मोदी की रैलियों को जिस तरह की व्यापक और लाइव कवरेज दी जा रही है और उस पर ‘मुग्ध’ रिपोर्टर और स्टूडियो में बैठे ‘बावले’ एंकर और ‘ज्ञानी’ एक्सपर्ट जिस तरह का ‘स्पिन’ कर रहे हैं, वह चुनावी रिपोर्टिंग या चर्चा कम और ‘मीडिया प्रबंधन’ का एक और नमूना ज्यादा दिख रहा है. यही नहीं, चैनलों ने विधानसभा चुनावों को भी जिस तरह से ‘मोदी बनाम राहुल’ के बीच ‘व्यक्तित्वों की लड़ाई’ के खेल में बदल दिया है, उसमें आम लोगों के जमीनी मुद्दे और सवाल नेपथ्य में चले गए हैं और राजनीतिक विचारों, नीतियों और कार्यक्रमों की कहीं कोई बात नहीं हो रही है. गोया उनका कोई मतलब नहीं है और सभी मर्जों का इलाज इस या उस मसीहा को चुनने में है.

लेकिन चैनलों को कहां चिंता है कि छिछले आरोप-प्रत्यारोपों में उलझी व्यक्तित्वों की इस नकली लड़ाई के कानफोड़ू शोर-शराबे में जनतंत्र बहरा हुआ जा रहा है और आम लोग एक बार फिर ठगे जा रहे हैं.

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