नई लीक गढ़ती तकनीक

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इंदौर के कारोबारी विनय वाधवानी ने कुछ समय पहले जब अचानक अपने पास मोबाइल फोन रखना बंद कर दिया तो उनके दोस्तों और रिश्तेदारों को थोड़ा आश्चर्य हुआ. वे समझ नहीं पाए कि शरीर के किसी हिस्से की तरह जरूरी बन चुकी इस चीज को वाधवानी ने आखिर क्यों छोड़ दिया. लेकिन उन्हें यह भी पता नहीं था कि यह फोन वाधवानी को मनोचिकित्सक यानी दिमागी बीमारियों के डॉक्टर का दरवाजा दिखा चुका है. दरअसल वाधवानी एक ऐसी परेशानी के शिकार हो चुके थे जिसका इससे पहले चिकित्सा विज्ञान ने नाम भी नहीं सुना था. उनको अपने मोबाइल फोन से डर लगने लगा था. फोन ने उनकी जिंदगी से निजता यानी प्राइवेसी को पूरी तरह खत्म कर दिया था. बेडरूम में, बाथरूम में, डाइनिंग टेबल पर, कार में…वह कभी भी और कहीं भी बज सकता था. हालत यह हो गई कि वाधवानी को वह फोन कम और टाइम बम ज्यादा लगने लगा. आखिरकार डॉक्टर की सलाह पर उन्होंने फोन का इस्तेमाल बंद कर दिया.

वाधवानी को फोन के कभी भी और कहीं भी बजने से डर लगता था तो दिल्ली के अजय कोहली की तकलीफ इसके उलट थी. दिन में कई बार उन्हें लगता कि उनके मोबाइल फोन की घंटी बज रही है, लेकिन जब वे जेब से फोन निकालकर देखते या दूसरे कमरे में पड़े अपने फोन तक पहुंचते तो पता चलता कि किसी का फोन नहीं आ रहा है. बाद में डॉक्टर ने ही उन्हें बताया कि यह भी एक बीमारी है जिसे फैंटम रिंगिंग कहा जाता है.

हाल ही में केंद्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर की दिल्ली स्थित एक होटल में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई. इसके बाद सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर की गई उनकी वे टिप्पणियां और भी महत्वपूर्ण हो गईं जो उन्होंने पिछले तीन-चार दिनों के दौरान की थीं और जिनकी वजह से वे देश-दुनिया में सुर्खियां बटोर रही थीं. संयोग की बात है कि पहले भी जब वे या उनके पति थरूर सुर्खियों या विवादों में आए तो इसमें अक्सर ट्विटर पर की गई उनकी टिप्पणियों की ही भूमिका रही थी. इसके पहले बीते दिसंबर में जब सामाजिक कार्यकर्ता खुर्शीद अनवर ने बलात्कार का आरोप लगने के बाद खुदकुशी कर ली तो यह चर्चा भी खूब हुई कि यह कदम उन्होंने फेसबुक पर अपने बारे में चल रही तरह-तरह की खबरों के बाद उठाया. यानी वे सोशल मीडिया का शिकार हुए.

पिछली सदी के पूर्वार्ध में मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कहा था कि तकनीक इंसान पर भारी पड़ने लगी है. यह हाल तब था जब मोबाइल और इंटरनेट जैसी सुविधाओं के आम इंसान तक पहुंचने में कई दशक बाकी थे. आज आइंस्टाइन होते तो क्या कहते?

कहते हैं कि पहले तकनीक इंसान की उंगली पकड़कर चलती है और फिर इंसान तकनीक की उंगली पकड़कर चलने लगता है. धीरे-धीरे निर्भरता बहुत ज्यादा हो जाए तो यह चलना आंख बंद करके होने लगता है. चलते चलते जब कभी उंगली छूट जाए और आंख खुले तो अचानक ही अहसास होता है कि हम किस हद तक तकनीक पर निर्भर हो चुके हैं. बीते एक दशक के दौरान मानव व्यवहार पर जिन दो चीजों ने सबसे अधिक असर डाला है वे हैं मोबाइल फोन और इंटरनेट. कुछ समय पहले तक इन माध्यमों के बारे में कहा जाता था कि ये बस एक सीमित वर्ग की नुमाइंदगी करते हैं- उस महानगरीय भारत की जिसके पास तकनीक की सुविधा और अंग्रेजी की समझ है- और इनके सरोकार उन्हीं सवालों तक सीमित हैं जिनका इनके जीवन से वास्ता है. लेकिन धीरे-धीरे नहीं बल्कि बहुत तेजी के साथ मोबाइल, कंप्यूटर और इंटरनेट की घुसपैठ भारतीय समाज में कहीं ज्यादा गहरी हुई है. अपने एक आलेख में वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन कहते हैं, ‘छोटे-छोटे कस्बों और शहरों के लोग, घरों में काम करने वाली महिलाएं और दूर-दूर रहकर अपनी सृजनात्मकता में लीन कलाकार या कार्यकर्ता इस माध्यम से महानगरों से, और मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं. देखा जाए तो यह एक मायने में औद्योगिक क्रांति के बाद की सबसे बड़ी क्रांति है जिसने पिछली सदी के बहुत सारे मानकों को पूरी तरह नहीं, तो बहुत दूर तक बदल डाला है.’  हमारे निजी से लेकर कामकाजी जीवन तक तकनीक से हुआ बदलाव हर तरफ दिखने लगा है. कभी-कभी तो इस हद तक कि उसके बिना जीवन की कल्पना मुश्किल हो जाती है. दिल्ली में बीकॉम की छात्रा विदुशी गुप्ता कहती हैं, ‘मोबाइल कहीं छूट जाए तो लगता है जैसे बाकी दुनिया से कट गए.’ नोएडा की एक आईटी कंपनी में काम कर रहे सुशील कुमार कहते हैं, ‘कभी कभी कोई काम करने के बाद भाए नहीं तो लगता है कि कंट्रोल जेड कर दें.’ खूबसूरत कलम से उकेरा गया सुलेख अब बीते जमाने की बात हो चुका है. कलम के सिपाही अब कीबोर्ड के हो चुके हैं. पिछले दस साल के दौरान कंप्यूटर और मोबाइल के लगातार बढ़ते इस्तेमाल का एक नतीजा यह भी हुआ है कि कंप्यूटर विजन सिंड्रोम, फैंटम रिंगिंग और इंटरनेट एडिक्शन जैसी पहले कभी न सुनी गईं बीमारियां हमारी जिंदगी में चली आई हैं.

दिल्ली में रहने वाली और पेशे से शिक्षिका कुसुम सिंह कहती हैं, ‘हमारी आने वाली पीढ़ियां इस बात पर अचरज करेंगी कि आखिर उनके दादा-दादी मोबाइल और इंटरनेट के बगैर कैसे रह लेते थे? आखिर हमें भी तो अपने बच्चों को यह समझाने में कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है कि हमारे बचपन में मोबाइल फोन और एसएमएस तो क्या कई बार तो बेसिक फोन भी नहीं हुआ करते थे.’ एक वक्त था जब घर पर बेसिक यानी लैंडलाइन फोन लगवाने के लिए सालों पहले वेटिंग लेनी पड़ती थी. गोरखपुर में रहने वाली सुमीता भारती कहती हैं, ‘उस खुशी को आज के युवा महसूस भी नहीं कर सकते. उनके लिए तो यह बात कल्पना से परे है कि पुराने जमाने में हम मीलों दूर अपने दोस्तों से मिलने बिना यह कन्फर्म किए चले जाते थे कि वह घर पर है भी अथवा नहीं.’

इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया की सात अरब आबादी में छह अरब से अधिक मोबाइल फोन हैं. अलग-अलग अनुमानों के मुताबिक हमारे देश में तकरीबन 90 करोड़ मोबाइल फोन हैं. इस उपकरण ने दूरियों को काफी हद तक नेस्तनाबूद कर दिया है. फिर मिलेंगे जैसे शब्दों का अहसास काफी कुछ बदल गया क्योंकि अब हम बिछड़ते ही नहीं.  कभी संदेश भेजने और उसका जवाब मिलने की प्रक्रिया में कई दिन लग जाते थे. एसएमएस यानी शार्ट मैसेज सर्विस के जरिये मोबाइल ने इसे पल भर का खेल बना दिया. एसएमएस के असर का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अकेले अमेरिका में पिछले वर्ष 20 खरब से ज्यादा मैसेज का आदान-प्रदान किया गया. एक औसत अमेरिकी युवा एक दिन में 50 से 100 एसएमएस भेजता है. व्हाट्सएप जैसे एप्लीकेशनों के चलते अब संदेश भेजने की सुविधा मुफ्त हो गई है तो यह आंकड़ा बढ़ेगा ही.

प्रियदर्शन कहते हैं, ‘आज एक मोबाइल सबकी जेब में है, एक नंबर सबकी मेमोरी में है और काम के लिए अपना घर छोड़ने वाले अमीर-गरीब सब आश्वस्त हैं कि उनके पास अपनी खोज-खबर देने का एक जरिया आ गया है. पहले आरा-छपरा से दिल्ली-मुंबई और सूरत काम करने निकला गरीब 6 दिन बाद पोस्टकार्ड भेजकर अपनी कुशल-क्षेम बताता था, अब वह ट्रेन पर बैठने से लेकर उतरने तक का हिसाब-किताब देता है. दस साल पहले तक दिल्ली की बसों में असुरक्षित-सा तना हुआ चेहरा लेकर बैठी दिखने वाली लड़कियां अब मोबाइल से चिपकी किसी और दुनिया में खोई दिखाई पड़ती हैं- आश्वस्त कि वे अकेली नहीं हैं और किसी संकट की घड़ी में अपनों को आवाज देने वाला एक यंत्र उनके हाथों में है.’ हमारी लोकतांत्रिक क्रांति ने वयस्क मताधिकार के जरिए जो राजनीतिक बराबरी सबको देने की कोशिश की उसे कहीं ज्यादा वास्तविक अर्थों में इसने संभव किया है.

लेकिन संवाद की इस सरलता ने हमें कुछ सुविधाएं दी हैं तो कुछ दुविधाएं भी पैदा की हैं. अब हम 24 घंटे दुनिया से जुड़े हुए हैं. लेकिन एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसे लगता है कि निरंतर जुड़ाव या कान्स्टेंट कनेक्टिविटी नाम की इस घटना ने हमारी निजता या जीवन के ठहराव का एक बड़ा हिस्सा हमसे छीन लिया है. मोबाइल के जरिये झट से पहुंच जाने वाले संदेश ने हमारा समय तो बहुत बचाया लेकिन ख्याल बुनने, उन्हें कागज पर उतारने और फिर पोस्ट करने वाली वह कड़ी खत्म कर दी जो इस कवायद को बहुत ही खास बनाती थी. पेशे से पत्रकार और जयपुर में रहने वाले कुशाल सिंह कहते हैं, ‘गांव से आने वाली मां की चिठ्ठी, किताब में छिपा महबूब का खत, या दोस्तों को लिखी शरारती चिठ्ठी….क्या एसएमएस कभी इनकी जगह ले पाएगा?’ और जैसे इतना ही काफी नहीं था, अब तो दुनिया के अलग-अलग कोनों से मोबाइल और एसएमएस पर ही तलाक देने की खबरें भी आने लगी हैं. बीते साल इंडोनेशिया के एक सरकारी अधिकारी ने अपनी दूसरी पत्नी को एसएमएस के जरिये तलाक दे डाला. एसएमएस ने और भी कई बदलाव किए हैं. एक वर्ग है जो मानता है कि इसने अंग्रेजी के परंपरागत व्याकरण की एक तरह से टांग तोड़ दी है. कई लोग हैं जो मानते हैं कि हर बार जब हम एसएमएस पर किसी शब्द का स्वरूप बिगाड़ते हैं तो हम दरअसल एक शब्द की हत्या कर रहे होते हैं. इतना ही नहीं, हमारी अभिव्यक्तियां भी नाइस, ऑसम, सैड जैसे शब्दों तक सिमटती जा रही हैं. शायद यही वजह है कि कई लोग मानते हैं कि एक समाज के रूप में हम अपनी भाषा खोते जा रहे हैं.

मोबाइल जब सुधर कर स्मार्टफोन हुआ तो जैसे यह अलादीन का चिराग ही हो गया. यह कुछ वैसा ही था जैसे इंटरनेट से लैस कंप्यूटर आपकी जेब में आ गया हो. नोकिया द्वारा 1996 में अपना पहला स्मार्ट फोन पेश किये जाने के बाद से अब तक इनकी संख्या बढ़कर एक अरब का आंकड़ा पार कर गई है. इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक इस समय देश में तकरीबन नौ करोड़ लोग अपने मोबाइल पर इंटरनेट का प्रयोग करते हैं और मार्च 2015 तक इनकी संख्या 16 करोड़ का आंकड़ा पार कर जाएगी.

इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन की वर्ष 2011 में आई रिपोर्ट के मुताबिक उस वक्त देश की 10 फीसदी आबादी यानी 12 करोड़ से अधिक लोग इंटरनेट पर सक्रिय थे जबकि इंटरनेट ऐंड मोबाइल ऐसोसिएशन ऑफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक इस वक्त देश में कुल मिलाकर 14 करोड़ से अधिक लोग इंटरनेट का प्रयोग कर रहे हैं. इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले देशों में भारत चीन व अमेरिका के बाद तीसरे नंबर पर है. चीन व अमेरिका में क्रमश: 52 करोड़ तथा 25 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं. इंटरनेट पर सुरक्षा मुहैया कराने वाली कंपनी नॉर्टन द्वारा कुछ समय पहले कराए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले भारतीय सप्ताह में औसतन 58 घंटे का समय इंटरनेट पर देते हैं.

दरअसल मोबाइल हो या कंप्यूटर, अपने मूल उद्देश्यों का विस्तार करके ये मशीनें अब बहुआयामी उपकरणों यानी मल्टीटॉस्किंग डिवाइसेज में बदल गई हैं. इन उपकरणों ने हमारी जिंदगी आसान कर दी है. ये कई काम एक साथ कर सकते हैं और वह भी बहुत जल्दी. अब ऑनलाइन बैंकिंग की मदद से मिनटों में देश के किसी भी कोने में स्थित किसी बैंक अकाउंट में पैसे ट्रांसफर किए जा सकते हैं. न छुट्टी की मुश्किल और न अपनी बारी का इंतजार करने की. और अगर अपनी बारी का इंतजार करने की नौबत आ ही जाए, जैसे कि किसी डॉक्टर के क्लीनिक में, तो भी कोई मुश्किल नहीं है. वहां भी आपका फोन या उसमें मौजूद इंटरनेट आपकी बोरियत को दूर कर सकता है. क्योंकि वह सिर्फ फोन नहीं बल्कि वीडियो गेम, कैमरा, म्यूजिक प्लेयर, ई बुक रीडर सब कुछ है. यानी अब ऊबने का कोई बहाना नहीं है. बीते साल मशहूर ब्रिटिश कंपनी ओटू ने एक सर्वे करवाया था. इसमें पता चला कि ब्रिटेन में स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर रहे लोग रोज औसतन करीब दो घंटे मोबाइल के साथ बिता रहे हैं. चौंकाने वाली बात यह थी कि इसमें सबसे ज्यादा समय (करीब 24 मिनट) वे इंटरनेट सर्फ करने में लगा रहे थे. इसके बाद सोशल नेटवर्क का नंबर था. फिर संगीत सुनने का और फिर गेम खेलने का. फोन और एसएमएस जैसी गतिविधियां, जो कभी फोन का बुनियादी उद्देश्य होती थीं, उनका नंबर इस सूची में पांचवें और छठें स्थान पर आया.

लेकिन ऊबने का अगर कोई बहाना नहीं है तो इसके चलते सब कुछ अच्छा ही हो रहा हो, ऐसा भी नहीं है.  इस दौर के बचपन में खेल की मौजूदगी घटती जा रही है. आज की पीढ़ी खेल के मैदानों को कंप्यूटर स्क्रीन के भीतर दाखिल कर चुकी है और हो सकता है कि अगली पीढ़ी के बच्चे बाजार हाट जैसी चीजों को भी केवल फिल्मों और किस्सों कहानियों में ही महसूस करने लगें. कम से कम तेजी से बढ़ते ऑनलाइन शॉपिंग कारोबार से तो यही संकेत मिलता है. एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में ऑनलाइन शॉपिंग कारोबार 10 खरब डॉलर का आंकड़ा पार कर चुका है. अमेजन, ईबे, फ्लिपकार्ट, ट्रेडस, जबॉन्ग, माइन्त्रा, मेकमाइट्रिप, यात्राडॉटकाम जैसी ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइटों की मदद से आज जूते, कपड़े, मोबाइल से लेकर बड़े-बड़े इलेक्ट्रॉनिक आइटम और रेल या हवाई यात्रा के टिकट तक खरीदे जा सकते हैं.

इंटरनेट की इस सर्व और सहजसुलभता के अपने खतरे भी हैं. आप इंटरनेट का फायदा उठा रहे हैं तो ठगों ने भी इसके जरिये आपसे फायदा उठाने की तरकीबें ईजाद कर ली हैं. कहीं लोग किसी बड़ी कंपनी की लॉटरी के नाम पर ठगे जा रहे हैं तो कहीं किसी और तरीके से. इंटरनेट पर पोर्न सामग्री प्रचुरता से और महज एक क्लिक की दूरी पर मौजूद है. बुरी बात यह है कि इस पर किसी तरह का फिल्टर भी नहीं है. कोई भी अपनी  उम्र 18 साल से अधिक बताकर पोर्न की काली रहस्यमय दुनिया में दाखिल हो सकता है. यानी बच्चों और किशोरों के लिए इसके खतरे ज्यादा हैं. सिडनी विश्वविद्यालय के एक हालिया शोध ने इंटरनेट पोर्न के बढ़ते खतरे को उजागर किया है. शोध में शामिल 800 से ज्यादा लोगों में से 43 फीसदी ने माना कि उन्होंने 11 से 13 साल की उम्र के बीच पोर्न देखना शुरू किया था. कहने की  जरूरत नहीं कि पोर्न तक उनकी आसान पहुंच इंटरनेट ने बनाई थी. शोध के नतीजों पर टिप्पणी करते हुए सैन फ्रांसिस्को के मनोविज्ञानी माइकल हालवर्ड का कहना था, ‘ पोर्न एडिक्शन के शिकार लोगों में से ज्यादातर इससे बचे रहते अगर यह इतनी आसानी से उपलब्ध नहीं होता.’ उन्होंने कहा कि सरल पहुंच वाला यह पोर्न लोगों में यौन कुंठा तथा यौन हिंसक व्यवहार को बढ़ावा दे रहा है. जाहिर है अगर माइक्रोसॉफ्ट के प्रमोटर बिल गेट्स अपने बच्चों के कंप्यूटर पर चाइल्ड लॉक लगाकर रखते थे तो यह उनकी कितनी बड़ी मजबूरी थी.

इंटरनेट की बात हो तो सबसे पहले गूगल का नाम मन में कौंधता है. हर पल दुनिया में लाखों लोग इस पॉवरफुल सर्च इंजिन का इस्तेमाल अपने लिए जरूरी जानकारी जुटाने में करते रहते हैं. इसने हमारी स्मृति को बहुत तगड़ी क्षति पहुंचाई है. लोग अब कुछ भी याद नहीं रखना चाहते क्योंकि उनको पता है कि गूगल क्षण भर में उनको सारी जानकारी दे देगा. लेकिन स्मृति पर हमला तो सिर्फ एक पहलू है. प्रियदर्शन कहते हैं, ‘ज्ञान की यह सर्वसुलभता एक सीमा के बाद ज्ञान के लिए ही घातक हुई जा रही है. चूंकि पहले से कुछ भी जानना जरूरी नहीं रह गया है, इसलिए सोचना और विचार करना, उद्वेलित होना और प्रश्न खड़े करना भी छूट गया है. अब बने-बनाए प्रश्न हैं जिनके बने-बनाए उत्तर हैं. ज्ञान अब दुस्साहसी अन्वेषकों की सत्य-साधना से नहीं आता, वह बोधि वृक्ष के नीचे बैठे किसी बुद्ध की सात साल की प्रतीक्षा से नहीं आता, वह वैज्ञानिकों की प्रयोगधर्मी चेतना का नतीजा नहीं होता, वह एक पेशेवर उद्यम और सोचे-समझे निवेश का नतीजा होता है जिसके खोले हुए विश्वविद्यालयों, संस्थानों और केंद्रों में पूंजी को माकूल पड़ने वाला ज्ञान गढ़ा और बांटा जाता है- ऐसा ज्ञान नए टीवी, फ्रिज और कंप्यूटर बनाने के काम आता है, नया दिमाग और नया मनुष्य बनाने के काम नहीं.’

सोशल नेटवर्क
एक अरब सदस्यों का आंकड़ा पार कर चुकी सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक ने लोगों के सामाजिक जीवन में क्रांति ला दी है. हालांकि इससे पहले ऑरकुट नामक वेबसाइट भी ऐसा प्रयास कर चुकी थी लेकिन उसे फेसबुक जैसी सफलता हासिल नहीं हो सकी थी. जैसे-जैसे सोशल नेटवर्क की लोकप्रियता बढ़ी, यह सवाल भी बढ़ता गया कि आखिर यह हमारे दिलोदिमाग पर क्या असर डालता है. तमाम अध्ययनों से यह बात साबित हो चुकी है कि सोशल नेटवर्क के अच्छे और बुरे दोनों तरह के प्रभाव हैं.

सकारात्मक असर की बात करें तो सोशल नेटवर्किंग नए दोस्त और संपर्क बनाने में मदद कर रहा है. स्कूल के दिनों में बिछड़े दोस्तों को दसियों साल बाद खोज पाना सोशल नेटवर्किंग साइटों की वजह से ही संभव हुआ. इसने लोगों को आपसी बातचीत बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है. सोशल नेटवर्क लोगों की कारोबारी संभावनाओं को भी मजबूत बना रहा है. वहां अनेक ऐसी एप्लीकेशन मौजूद हैं जो खास ब्रांडों को आगे बढ़ाने का काम कर रही हैं. सोशल मार्केटिंग दरअसल भविष्य की मार्केटिंग है.

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