ध्वंस

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मैं विवादित इमारत में कोई सौ गज दूर खड़ा था। सन्न और अवाक्! समझ नहीं आ रहा था कि मैं जो देख रहा हूं, वह हकीकत है या बुरा सपना। चारों तरफ बदला! प्रतिशोध!! प्रतिहिंसा का हुंकारा!!! सब कुछ अचानक हुआ। कारसेवक बाबरी ढांचे पर चढ़ चुके थे। पुलिस प्रशासन को काटो तो खून नहीं। किंकर्तव्यविमूढ़, बेबस और लाचार। मैंने पुलिसबलों का ऐसा गांधीवादी चेहरा पहली बार देखा। 46 एकड़ का पूरा इलाका ध्वंस के जुनून में था। समूचा दृश्य दिल दहलाने वाला था। कोई दो सौ कारसेवक विवादित इमारत के तीनों गुंबदों पर चढ़ लोहे के राड, गैंते और सरियों से चोट कर रहे थे। नीचे कोई एक लाख कारसेवकों ने इमारतों को घेर रखा था।

उस रोज मर्यादा पुरु षोत्तम के नाम पर हर कोई अमर्यादित था। एक-एक कर तीनों गुंबद टूटे और उखड़ गई हिंदू समाज की विश्वसनीयता, वचनबद्धता और उत्तरद्रायित्व की जड़ें।

एक तरफ ध्वंस के उन्माद में कारसेवक और दूसरी ओर हैरान, सन्न-अवाक् के विश्व हिंदू परिषद व वीजेपी नेता। बूझ नहीं पड़ा कि यह सब अचानक कैसे हुआ? कहीं यह पूर्व नियोजित तो नहीं। ध्वंस की धूल और उसके गुबार ने हमारी गंगा-जमुनी तहजीब को ढक लिया था। छह दिसंबर नफरत और धार्मिक हिंसा के इतिहास से जुड़ गया। मेरे सामने सिर्फ साढ़े चार सौ साल पुराना बाबरी ढाँचा नहीं टूट रहा था बल्कि विधाविका, न्यायपालिका और कार्यपालिका की मर्यादाएँ भी टूट रही थीं। छह दिसंबर को गीता जयंती थी। द्वापर मे इसी रोज महाभारत हुआ था। एक नया महाभारत मेरे सामने घट रहा था।

विश्व हिंदू परिषद का ऐलान था प्रतीकात्मक कारसेवा का। लेकिन वहां माहौल चीख-चीखकर कह रहा था कि कारसेवा के लिए रोज बदलते बयान, झूठे हलफनामे, कपटसंधि करती सरकारों के लिए भले यह सब अकस्मात् हो, लेकिन कारसेवक तो इसी खारित यहां आए थे। कारसेवकों को वही करने के लिए बुलाया गया, जो उन्होंने किया। ‘ढाँचे पर विजय पाने’ और ‘गुलामी के प्रतीक को मिटाने’ के लिए ही तो वे यहां लाए गए थे। दो सौ से दो हजार किलोमीटर दूर से जिन कारसेवकों को इस नारे के साथ लाया गया था कि ‘एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो।’ उन्हें आखिर यही तो करना था। वे कोई भजन-कीर्तन करने नहीं आए थे। उन्हें बंद कमरों में हुए समझौतों और राजनीति से भला क्या लेना? ढाई लाख कारसवेक अयोध्या में जमा थे। नफरत, उन्माद और जुनून से लैस। उन्हें जो ट्रेनिंग दी गई थी या जिस हिंसक भाषा में समझाया गया था, उसके चलते अब उन्हें पीछे हटने को कैसे कहा जा सकता था?

मुझे कारसेवकों की हिंसक प्रकृति सुबह साढ़े नौ बजे से दिखने लगी थी। हालांकि रात में ही तय हुआ था कि कारसेवा सिर्फ प्रतीकात्मक होगी। जुलाई की कारसेवा में विवादित स्थल से बाहर एक चबूतरा बना था। मुहूर्त के मुताबिक वहीं साढ़े ग्यारह बजे साधु-संत साफ-सफाई कर एक प्रतीकात्मक स्तंभ बनाने की शुरूआत करने वाले थे। कारसेवकों को बैरिकेडिंग के बाहर से इस स्थान पर अक्षत, फूल, पानी डाल प्रतीकात्मक कारसेवा करनी थी। 10 बजे के करीब कोई डेढ़ सौ साधु-संत ज़रूरी पूजन-सामग्री लेकर यहां विराजमान थे।

तभी लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल और मुरली मनोहर जोशी को साथ लेकर एडिशनल एस.पी, अंजू गुप्ता वहां पहुंची। आडवाणी जी को देखते ही कारसेवक उत्तेजित हो गए। उन्हें लगा, वे फिर से कारसेवा स्थगित कराने आए हैं। उत्तेजित कारसेवक बैरिकेडिंग तोड़कर चबूतरे पर पहुंचने की कोशिश करने लगे। भीड़ का दबाव देख पुलिस ने उन्हें खदेडऩा शुरू किया। तब तक बैरिकेंडिंग लाँघ कुछ कारसेवक चबूते पर पहुंच चुके थे। इन सबने आडवाणी और जोशी के साथ धक्का-मुक्की की। मौके पर मौजूद अशोक सिंघल ने बीच-बचाव करना चाहा, पर वहां कोई किसी को पहचान नहीं रहा था।

संघ के स्वयंसेवक और बजरंग दल के कार्यकर्ता इन तीनों नेताओं को किसी तरह बचाकर रामकथा कुंज के मंच पर ले गए। इसी मंच से नेताओं का भाषण होना था। रामकथा कुंज का मंच विवादित इमारत से तीन सौ मीटर की दूरी पर था। प्रतीकात्मक कारसेवा की जगह से आडवाणी, जोशी और सिंघल को हटाकर टूटी बैरिकेडिंग की मरम्मत की गई। बढ़ती भीड़ के कारण प्रशासन ने विवादित इमारत का मुख्य द्वार भी समय से पहले बंद कर दिया। वहां सुबह से रामलला के दर्शन चालू थे। लेकिन किसी को इस बात का आभास नहीं था कि रामलला की इस इमारत के कपाट आज अंतिम बार बंद हो रहे हैं।

विवादित इलाके से सटा और गर्भगृह के ठीक सामने मानस भावन था। यह एक धर्मशाला थी। इसकी छत से समूचा 65 एकड़ का इलाका साफ दिखाई देता था। पत्रकारों को यहीं बिठाने का काम विश्व हिंदू परिषद ने किया था। छत पर कोई दर्जन भर वीडियो कैमरे लगे थे। दूसरी मंजिल के कमरों में आई.बी. के कैमरे लगे थे। ऊपर से पूरा दृश्य केसरिया था। दूर-दूर तक जन-सैलाब दिख रहा था। पुलिस के साथ ही आरएसएस के गणवेशधारी स्वयंसेवक भीड़ को नियंत्रित करने में लगे थे।

मंदिर आंदोलन में यह पहला मौका था, जब मैंने देखा कि संघ ने आधिकारिक तौर पर इसमें हिस्सा लिया। संघ के तीन प्रमुख नेता एच.वी. शेषाद्रि, केएस सुदर्शन और मोरोपंत पिंगले 3 दिसंबर से ही अयोध्या में डेरा डाले हुए थे। आंदोलन के सारे सूत्र इन्हीं के पास थे।

सुपुप्त लावा ग्यारह बजते-बजते फूटने लगा। कारसेवकों का सैलाब सारी पाबंदियों नकार बैरिकेडिंग पर दबाव बनाने लगा। मानस भवन की छत, जहां हम खड़े थे, पर भी कारसेवकों ने कब्जा जमा लिया था। लगा छत बैठ जाएगी। इस डर से हम नीचे उतर आए और विवादित ढाँचे से कोई सौ गज दूर सीता रसाई की छत पर चले गए। इसी छत पर पुलिस कंट्रोलरूम था। मेरे लिए सबसे सुरक्षित स्थान था। यहां से सब दिख रहा था और सारी सूचनाएं भी यहां आ रही थीं। दिल्ली-लखनऊ का संपर्क भी यहीं से था। फिर पत्रकार के लिए इससे बेहतर जगह और क्या हो सकती थी। मुझे यह सुविधा इसलिए मिल गई कि नीचे से ही मुझे छत पर फैजाबाद के कमिश्नर सुरेंद्र पाल गौड़ और जोन के आईजी अशोक कांत सरन दिख गए थे। दोनों ने मुझे ऊपर बुला लिया। तब तक सब कुछ सामान्य था। इन अफसरों के चेहरे पर कोई तनाव नहीं था। एसएसपी  देवेंद्र बहादुर राय नीचे खड़े हो लोगों को ज़रूरी निर्देश दे रहे थे।

तभी वायरलेस पर सूचना आई कि जिलाधिकारी आरएन श्रीवास्वत सुप्रीम कोर्ट द्वारा तैनात पर्यवेक्षक तेजशंकर को लेकर यहीं आ रहे हैं। तेजशंकर मुरादाबाद के जिला जज थे। उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने अपना ‘ऑब्जर्वर’ बनाकर यह देखने के लिए भेजा था कि प्रतीकात्मक कारसेवा के बहाने मौके पर कोई स्थाई निर्माण तो नहीं हो रहा है या सुप्रीम कोर्ट से किए गए वादे के उलट तो कोई काम वहां नहीं हो रहा है।

हम सीता रसोई की छत पर थे। यहां से विवादित ढांचे के भीतर रामलला की जो पूजा-अर्चना चल रही थी, वह भी दिख रही थी। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का सुबह से कमिश्नर को हॉटलाइन पर दो बार फोन आ चुका था। उनकी जिज्ञासा थी, ‘सब ठीक है न? किसी गड़बड़ की आशंका तो नहीं है?’ वह मोबाइल का दौर नहीं था।

माहौल में इतना तनाव था कि कहीं कुछ हो नहीं रहा था, पर हर किसी को कुछ भी होने का डर सता रहा था। सुबह साढ़े सात बजे विनय कटियार के घर के फोन की घंटी बजती है। लाइन पर दूसरी तरफ भारत के प्रधानमंत्री पीवी सिंह नरसिंह राव थे। इससे पहले कि विनय कटियार कुछ कहते, प्रधानमंत्री ने पूछा, ‘किसी गड़बड़ की आशंका तो नहीं है। सब नियंत्रण में तो है?’ प्रधानमंत्री ने चिंता जताई कि कुछ कारसेवकों के उग्र होने की रिपोर्ट उनके पास आई है। विनय कटियार ने उन्हें भरोसा दिलाया, ‘सब काबू में है। मंच विवादित ढाँचे से कोई तीन सौ मीटर की दूरी पर बना है। कारसेवकों का जमावड़ा वहीं रहेगा। हम कोशिश कर रहे हैं कि कोई कारसेवक विवादित इमारत तक पहुंचे ही नहीं। ढाँचे से दूर चबूतरे पर ही प्रतीकात्मक कारसेवा कर लोग अपने घरों को लौटेंगे।’ यह विनय कटियार का प्रधानमंत्री को भरोसा था।

विनय कटियार के घर आडवाणी, जोशी और अशोक सिंघल नाश्ते पर कारसेवा की योजना पर विचार कर रहे थे। यहीं से तीनों रामकथा कुंज पहुंचे तो वहां कोई एक लाख लोग सार्वजनिक सभा के लिए इकट्ठा हो चुके थे। तीस हजार लोग तो रामकथा कुंज में लगे तंबुओं में ही रह रहे थे। कुंज में बीजेपी और विहिप के नेता भाषण शुरू कर चुके थे। सबकी लाइन प्रतीकात्मक कारसेवा की थी। लेकिन भाषणों में सबके आक्रोश का प्रतीक ढाँचा ही था। सारे नेता ढाँचे की ओर उँगली दिखा उसे गुलामी का प्रतीक बता रहे थे। बारह बजने से कुछ देर पहले जब आडवाणी भाषण दे रहे थे, उसी वक्त शेषावतार मंदिर की तरफ से भीड़ ने पुलिस बलों पर पथराव शुरू किया। पथराव से बचने के लिए पुलिस वालों के पास कोई आड़ नहीं थी। पीछे विवादित ढाँचा और सामने, बाएं-दाएं खुला मैदान। तभी कोई दो सौ लोग चबूतरे का घेरा तोड़ कर आगे बढ़े आए। देखते-देखते ये लोग राम जन्मभूमि परिसर में घुस गए।

ऐसा होते ही चौतरफा हड़कंप मचा। शेषावतार मंदिर की ओर से कुछ लोग ढाँचे पर पत्थर फेंकने लगे। ढाँचे के पीछे की तरफ से भी ऐसा ही हुआ। तेजी से भगदड़ मची और कोई एक हजार लोग जन्मभूमि परिसर में दाखिल हो गए। विवादित इमारत के सामने की ओर से रोकने की लाख कोशिशों के बावजूद कारसेवक कंटीली बाड़ फाँद ढाँचे की बाहरी दीवार और गुंबदों पर चढ़ गए। एकदम पूरा माहौल बदल गया। सुरक्षा बल जब तक कुछ समझते तब तक वहां जमा लाखों कारसेवकों का रु ख ढाँचे की तरफ हो गया था। समूची व्यवस्था फेल हो गई। कोई दो सौ लोग गुंबद के ऊपर थे और 25 हजार के आसपास विवादित परिसर में थे। लाखों कारसेवक, जो इधर-उधर रामकथा कुंज में भाषण सुन रहे थे, वे भी विवादित ढाँचे के चारों ओर गोलबंद होने लगे।

 सीआरपीएफ के डीआईजी, ओपीएस मलिक फौरन कूदते-फाँदते ढाँचे के भीतर पहुंचे। वे सादी वर्दी में थे। उनकी चार कंपनियों विवादित परिसर के भीतर तैनात थीं। इन बलों ने कारसेवकों को रोकने की कोशिश की। मेरे बगल में खड़े लखनऊ जोन के आईजी अशोक कांत सरन के चेहने की हवाइयां उड़ रही थीं। डीआईजी उनसे पूछ रहे थे कि क्या करना चाहिए? (बाद में ओपीएस मलिक भारत सरकार के डीजी, नारकोटिक्स और एके सरन उत्तराखंड सरकार के डीजीपी पद से रिटायर हुए।) जिलाधिकारी और एसएसपी अपना स्थान छोड़ इसी छत की तरफ भागे आ रहे थे। उनके साथ  सुप्रीम कोर्ट के पर्यवेक्षक तेजशंकर भी थे।

उधर रामकथा कुंज से लालकृष्ण आडवाणी की कारसेवकों से लौट आने की अपील लगातार प्रसारित हो रही थी। कारसेवकों के परिसर में घुसने के पंद्रह मिनट के भीतर ही सीआरपीएफ ओर पीएसी के जवान मौका छोड़ ढाँचे के बाहर आ गए थे। यानी बारह बजे तक परिसर पूरी तरह कारसेवकों के हवाले था। कारसेवकों ने घुसते ही सबसे पहले ढाँचे के भीतर की हॉटलाइन काटी। फिर आसपास उखड़ी पड़ी बैरिकेडिंग के लोहे के पाइपों से गुंबदों पर हमला बोला। ऊपर गुंबदों पर होने वाले प्रहार से चिनगारियां फूट रही थीं। नीचे कारसेवकों के आक्रोश की चिनगारियों का सामना पत्रकार और फोटोग्राफर कर रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट के पर्यवेक्षक तेजशंकर के होश उड़े हुए थे। वे यह देखने आए थे कि चबूतरे पर, जहां कारसेवा होनी थी, वहां हवन-सामग्री की जगह निर्माण-सामग्री तो नहीं रखी है। वहां तो नज़ारा ही अलग था। हवन सामग्री तहस-नहस थी। पूजा-सामग्री पैरों तले कुचली जा रही थी। साधु-संत अपने मठों-आश्रमों की तरफ लौट चुके थे। कारसेवक वहां ईटें रखने की जगह विवादित इमारत से ईटें निकाल रहे थे। जिलाधिकारी अब भी उन्हीं के साथ थे। उनकी अपनी मजबूरी थी। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का निर्देश था कि तेजश्ंाकर को हर हाल में खुश रखा जाए, वरना नाराज हो वे प्रतीकात्मक कारसेवा की जगह कहीं स्थायी निर्माण की रिपोर्ट कोर्ट को न भेज दें। तेजशंकर जल्दी-जल्दी कंट्रोलरूम की तरफ लगभग दौड़ते हुए आ रहे थे। दौड़ते-दौड़ते वे अपनी टाई भी उतार रहे थे, ताकि कारसेवकों में उनकी पहचान न हो सके। तेजशंकर की मुसीबत इसलिए भी बढ़ गई थी, क्योंकि वे अपने लड़के को भी मेला दिखाने साथ लाए थे।

पसीना-पसीना हम भी थे। दस बरस के पत्रकारीय जीवन में ऐसा उन्माद कभी देखा नहीं था। सुबह जब फैजाबाद के होटल से चले थे प्रतीकात्मक कारसेवा रिपोर्ट करने, तब भी इसकी कल्पना नहीं थी। पांच साल से अयोध्या को नियमित रिपोर्ट कर रहा था। रिपोर्टिग के लिए तब तक साठ से ज्य़ादा बार अयोध्या आ चुका था। पर आज अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था।

इस वक्त तक हालात इतने बिगड़ चुके थे कि बिना ढाल प्रयोग किए स्थिति को नियंत्रित करना संभव नहीं था। हजारों कारसेवकों से घिर जाने के बाद जो थोड़े-बहुत राज्य पुलिस के जवान और पीएसी मौके पर तैनात थी, वह भी किनारे हट गई। अब कोई फोर्स ढाँचे के पास या उसके अंदर नहीं थी। सभी सुरक्षा बल निष्क्रिय हो गए थे। कारसेवकों और पुलिस का रिश्ता बदल गया था। पुलिस का आहिंसक रवैया देख कारसेवकों से उनके रिश्ते मित्रवत् हो गए। ढाँचे के सामने वॉचटावर पर चढ़ एक गणवेशधारी सीटी बजा, झंडा दिखा लगातार कुछ निर्देश दे रहा था। यह वॉचटावर सुरक्षा बलों ने अपने लिए बनाया था। पर उस पर चढ़ कर वह गणवेशधारी ध्वंस का निर्देशन कर रहा था। तभी कारसेवकों के एक हजूम ने अयोध्या की सभी टेलीफोन लाइनें काट दीं। राम जन्मभूमि के अंदर बने कंट्रोलरूम के भी संचार उपकरण उखाड़ दिए। यह सब कुछ ढाँचे पर हमले के बीस मिनट के भीतर हो गया।

यकायक सामने मानस भवन की छत पर कुहराम मचा। कारसेवकों ने वहां पत्रकारों पर हमला कर दिया था। छत पर लगे सभी कैमरों को तोड़ दिया गया। डीएस और एसएसपी उधर दौड़े। दोनों अफसर जब मानस भवन की छत पर चढऩे लगे तो वहां मौजूद कारसेवकों ने इनका विरोध किया। उन्हें डर था कि पुलिस मानस भवन की छत पर नियंत्रण करके वहां से गुंंबद पर चढ़े कारसेवकों पर गोली चला सकती है। दोनों अफसर किसी तरह छत पर तो चढ़ गए वे न तो छत से कारसेवकों को उतारने में सफल हुए, न पत्रकारों की पिटाई रोक पाए। इस बीच गुंबद पर हमला जारी था। गुंबद में छेद कर उसमें एक एंकर फंसा रस्सी के जरिए कुछ और लोग ऊपर चढ़ गए। गुंंबद पर पांव टिकाने की कोई जगह नहीं थी। इसलिए हर थोड़ी देर में कोई कारसेवक गुंबद से टपकता था। पांच घंटे में कोई डेढ़ सौ से ज्य़ादा कारसेवक  गुंबद से गिरकर घायल हुए। विश्व हिंदू परिषद ने घायलों के इलाज के लिए एक टीम पहले से बना रखी थी। इस टीम के पास चारपाई और एंबुलेंस भी थी। यह टोली घायल कारसेवकों को चारपाई पर उठा एंबुलेंस के जरिए अस्पताल पहुंचा रही थी।

प्रशासन की नजर में स्थिति बेकाबू थी। कारसेवकों की नज़र में हालात काबू में थे। कुल मिलाकर स्थिति बेकाबू थी। कोई कुछ सुनने को तैयार नहीं था। रामकथा कुंज के मंच से आडवाणी कारसेवकों से लौटने की अपील कर रहे थे। वे कारसेवकों को डाँट भी रहे थे। उनकी अपील बेअसर देख माइक अशोक सिंघल ने संभाला। उन्होंने घोषणा की कि विवादित भवन मस्जिद नहीं मंदिर है। कारसेवक उसे नुकसान न पहुंचाएं। रामलला की उन्हें सौगंध है। वे नीचे उतर आएं। इसका भी कोई असर नहीं हुआ, तो अशोक सिंघल और महंत नृत्यगोपाल दास मंच से नीचे उतर ढाँचे की ओर बढ़े। नृत्यगोपाल दास का सभी सम्मान करते थे। पर पगलाई भीड़ ने उन दोनों के साथ बदसलूकी कर दी। एक के तो कपड़े फट गए। दोनों बिना किसी नतीजे के वापस आ गए। तभी किसी ने सूचना दी, जो कारसेवक चढ़े हैं, वे दक्षिण भारत के हैं। संघ के शीर्ष नेता एचवी शेषाद्रि ने माइक पर दक्षिण की चारों भाषाओं को तोडऩे का काम संघ और विहिप के कार्यक्रम में नहीं है। आप लोग नीचे उतरें। पर कोई उनकी भी सुनने को तैयार नहीं था। थोड़ी देर में मंच से आवाज़ भी आनी बंद हो गई। बाद में पता चला, किसी ने माइक का तार काट दिया था।

मेरी छत पर धीरे-धीरे डीआईजी रेंज, आईजी जोन, आईजी, पीएसी, सीआरपीएफ  के डीआईजी मलिक सब आ चुके थे। तोड़-फोड़ के डेढ़ घंटे गुजर चुके थे। कोई गुंबद गिरा नहीं था। प्रधानमंत्री नरसिंह राव के बेटे प्रभाकर राव का घरेलु नौकर भी कारसेवा में आया था। वह मलवे में दबकर मारा गया। दिल्ली से उसकी खबर ली जा रही थी। तभी गर्भगृह से पुजारी सत्येंद्र दास भी रामलला की मूर्ति लेकर बाहर आते दिखे। बाद में वह मूर्ति किसी ने गायब कर दी। एक बजकर 45 मिनट पर कंट्रोलरूम में लखनऊ से रेडियोग्राम पहुंचा। स्थिति को काबू में करने के लिए केंद्रीय बलों का इस्तेमाल किया जाए। पर यह भी सुनिश्चित किया जाए कि गोली न चले।

वह ऐतिहासिक वायरलेस इस प्रकार था – ‘सेवा में, आईजी जोन, डीआईजी, फैजाबाद एसएसपी फैजाबाद, प्रेषक, एटूडीजी, ‘मुझे कहने का निर्देश हुआ है, कि आप केंद्रीय पुलिस बलों के अधिकारियों से तुरंत संपर्क कर उनसे पूर्ण सहायता प्राप्त करें। लेकिन यह सुनिश्चित करें कि गोली न चले।’ संदेश मिलते ही जिलाधिकारी आरएन श्रीवास्वत ने वहीं मौजूद सीआरपीएफ के डीआईजी मलिक से लिखित अनुरोध किया कि 50 कंपनी सीआरपीएफ मौके पर तुरंत भेजी जाए। मलिक ने कहा, हम तैयार हैं। पर उनका कहना था कि केंद्रीय बल की हर कंपनी के साथ एक मजिस्ट्रेट और कंपनी के दोनों तरफ पीएसी के जवान सुरक्षा में चलें। इस बेढंगी मांग पर एसएसपी डीबी राय नाराज़ हो गए। उनकी दलील थी कि इतनी फोर्स होती तो हम केंद्रीय बल क्यों मांगते। राय ने कहा, ‘यह शायद दुनिया में पहली घटना होगी, जब दंगाइयों को काबू करने के लिए किसी पुलिस बल ने अपनी सुरक्षा में किसी और पुलिस बल की मांग की हो। मैं 50 राजपत्रित अफसर, 50 मजिस्ट्रेट्र 50 कंपनी पीएसी कहां से लाऊँ?’

इस जद्दोजहद के बाद 50 की जगह 18 कंपनी केंद्रीय सुरक्षा बल फैजाबाद से सिटी मजिस्ट्रेट और सीओ के साथ अयोध्या के लिए रवाना हुए, लेकिन मौके से कोई दो किमी. दूर साकेत डिग्री कॉलेज के पास उपद्रवियों ने इन्हें रोक दिया। वहां कारसेवकों ने रास्ता रोक रखा था। जो काम सुरक्षा बलों की पहले करना चाहिए था कारसेवकों को रोकने के लिए, वह काम कारसेवक सुरक्षा बलों को रोकने के लिए कर रहे थे। उनके पास बैरिकेड्स नहीं थे। इसलिए सड़क पर बाड़ और गुमटियां रख आग लगा दी थी, ताकि सुरक्षा बलों का कोई वाहन न आ सके। लेकिन अगर पुलिस थोड़ा संघर्ष करती तो उन्हें खदेड़ सकती थी। पर स्थानीय प्रशासन की मंशा नहीं थी, वहां केंद्रीय बलों को पहुंचाने की। इस रुकावट की आड़ में जिला प्रशासन ने केंद्रीय बलों को लौट जाने को कहा। नगर मजिस्ट्रेट सुधाकर अदीब ने डीआईजी सीआरपीएफ को हाथ से लिखकर एक आदेश दिया कि साकेत डिग्री कॉलेज पर आपकी जो टुकडिय़ां हैं, वे वहां मौजूद उग्र भीड़ की वजह से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं, इसलिए आप उन्हें वापस लौटने को कहें। एक बजकर 45 मिनट पर सिटी मजिस्ट्रेट ने सुरक्षा बलों को लौटने को कहा, दो बजकर 45 मिनट पर बाबरी ढाँचे का पहला गुंबद गिरा था। केंद्रीय बल वापस लौट गए। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सेना से लखनऊ  में हेलीकॉप्टर और जहाज का इंतजाम करने को कहा। इस बीच ध्वंस जारी था।  स्थानीय प्रशासन और पुलिस मूकदर्शक बने रहे। कारसेवा के दौरान पुलिस की मानसिकता और भक्ति को जाने बिना बात अधूरी रहेगी। कंट्रोलरूम के बाहर पुलिस के एक राजपत्रित अधिकारी उत्तेजना के चरम क्षणों को जी रहे थे।

वे आंखे बंद कर रामनाम जप रहे थे। बीच-बीच में उनकी आँखें खुलतीं तो ढाँचे को देख उनके मुँह से निकलता -‘अभी तो बहुत बाकी है।’ वे फिर आँखें बंद कर रामनाम का जाप शुरू कर देते। वे ढाँचा गिरने का बेसब्री का इंतजार कर रहे थे। फर्क सिर्फ इतना था कि ‘जय श्रीराम’  के नारे कारसेवक जोर से लगा रहे थे और सुरक्षा में लगे लोग मन-ही-मन जाप कर रहे थे। वातावरण राममय ही था।

इस बीच मानस भवन की छत पर पत्रकारों की पिटाई तेज हो गई थी। कारसेवक वहां से फोटोग्राफरों के कैमरे उछाल-उछालकर नीचे फेंक रहे थे। उस छत पर कोई ऐसा पत्रकार नहीं था, जिसका सिर न टूटा हो। ज्य़ादा खतरा गोरी चमड़ी वालों के लिए था। कारसेवक बीबीसी फोटोग्राफर और उसकी टीम को ढंूढ़ रहे थे। तीस से ज्य़ादा कैमरे तोड़े जा चुके थे। अमेरिकी टीवी का एक कैमरामैन लहूलुहान हालत में पुलिस कंट्रोलरूम की और दौड़ा। कारसेवक उसका पीछा कर रहे थे। अचानक चार-पाँच पत्थर आकर हमारी छत पर भी पड़े। हम नीचे बैठ गए, पुलिस के अफसर इस छत से जा चुके थे। ऊपर देखा तो कुछ महिलाएं बड़े-बड़े पत्थर उठाए खड़ी थीं। वे चीख रही थीं, फौरन छत से भागिए वरना पत्थर गिरा दूंगी। इनमें से एक महिला साधुओं वाला चिमटा बजा कारसेवकों में लगातार दम भर रही थी। हम छत से नीचे उतरना चाह रहे थे, तभी देखा तो नीचे पुलिस भागती आई। उन्हें कारसेवकों ने दौड़ाया था। अजीब दशा। नीचे पिटाई करते कारसेवक, ऊपर पत्थर लिये कारसेविकाएं। मैं सीढी पर खड़ा हो रामलला को याद करने लगा।

नीचे लुटे-पिटे पत्रकार मानस भवन की तरफ भागे। सभी पत्रकारों को वहां लोहे की ग्रिल वाले एक फाटक के अंदर बंद कर दिया गया, ताकि वे कारसेवकों की पहुंच से दूर रहें। दरअसल कारसेवक यह चाहते थे कि जब तक उनकी निर्णायक कारसेवा पूरी न हो जाए, तब तक बाकी दुनिया के लिए खबरों और फोटो को रोके रखा जाए। मैं अब नीचे खड़ा था। ‘सहारा’ अखबार के फोटोग्राफर राजेंद्र कुमार लहूलुहान हालत में वहां आए। कारसेवकों ने उनका कैमरा छीन लिया। उनके जबड़े तोड़ दिए। बीबीसी की जिलियन राइट के साथ भी अभ्रद व्यवहार हुआ। घायल साथियों को अस्पताल पहुंचाने के लिए हम गाडिय़ों की तरफ आए। गाडिय़ों के शीशे टूटे थे। टायरों की हवा निकाल दी गई थी। हमने गाड़ी पर लगा प्रेस पास फाड़ ‘जय श्रीराम’ का स्टीकर लगाया और घायल साथियों को फैजाबाद रवाना किया। कारसेवकों के लिए ‘जय श्रीराम’ शक्ति का स्रोत थे वही पत्रकारों के लिए सुरक्षा कवच बने। अब तक ढाँचे की बाहरी दीवार गिराई जा चुकी थी।

पाँच घंटे की कारसेवा में सबसे पहले ढाँचे की बाहरी और भीतरी दीवार गिराई गई। उसके बाद पौने तीन बजे ढाँचे का दाहिना गुंबद जमीन पर आ गया। इसमें दो कारसेवक दबकर मारे गए। पौने चार बजे विवादित ढाँचे का बायाँ गुंबद गिरा। बीच का मुख्य गुंबद, जिसे विहिप गर्भगृह कहती थी, वह 4 बजकर 40 मिनट पर नीचे आया। तब तक सभी महत्वपूर्ण नेता गायब हो गए थे, वे कहीं बैठक कर रहे थे। विहिप के साधु-संत, विनय कटियार, उमा-भारती, ऋतंभरा और आचार्य धर्मेद्र मंच से लगातार कारसेवकों को ललकार रहे थे। आचार्य धर्मेद्र रामकथा कुंज में बैठे कारसेवकों से अपील कर रहे थे कि जिन्होंने प्रसाद नहीं लिया है, वे प्रसाद ले लें। आचार्य धर्मेद्र ढाँचे की ईटों को प्रसाद कह रहे थे। उमा भारती ने कहा, ‘अभी पूरा काम नहीं हुआ है। आप तब तक परिसर न छोड़े, जब तक पूरा इलाका समतल न हो जाए।’ इस तमाशे में उमा भारती, ऋसंभरा और आचार्य धर्मेद्र की भूमिका सबसे अहम रही। उमा भारती ने भीड़ को दो नारे दिए- ‘राम राम सत्य है। बाबरी मस्जिद ध्वस्त है।’ और ‘एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो।’

 ये दो नारे कई घंटे तक उस परिसर में गूंजते रहे। उमा भारती ने भीड़ के सामने  मेरठ की शिव कुमारी को यह कहकर पेश किया कि ‘वे इस ढाँचे के गुंबद पर पहली महिला है।’ उमा भारती ने 2 नवंबर 1990 की कारसेवा में मारे गए दो भाइयों रामकुमार और शरद कोठारी के माता पिता को भी भीड़ के सामने पेश किया और कहा, ‘देखिए, कोठारी बंधुओं की माता की आँखों में खुशी के आंसू हैं। इनके बेटों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया है। उनकी हत्या का बदला ले लिया गया है।’ इसके बाद ऋतंभरा की बारी थी। उन्होंने कारसेवकों से अपील की कि वे इस शुभ और पवित्र काम में पूरी तरह लगे। इस बीच माइक से बाकी संत हनुमान चालीसा और हनुमानाष्टक का पाठ कर रहे थे।

जैसे ही पहला गुंबद गिरा, आडवाणी, अशोक सिंघल, डॉ. जोशी और विनय कटियार वहां से खिसक लिये, उनका अगला पड़ाव कटियार का घर बना। वहीं अगली रणनीति बनाने की मीटिंग हुई। इस दौरान प्रधानमंत्री का फोन कई दफा कटियार के पास आया। कटियार लाइन पर नहीं आए। उधर नाराज कल्याण सिंह ने फोन पर आडवाणी से कहा, वे इस्तीफा देने जा रहे हैं। आडवाणी ने उन्हें ऐसा करने से मना किया। कहा, अभी इस्तीफे से केंद्र का शासन लग जाएगा। केंद्रीय बल मोर्चा संभाल लेंगे। थोड़ा टाइम पास कीजिए। कल्याण सिंह उस वक्त तक इस बात से नाराज थे कि उनके पास धोखा हुआ है। अगर यह सब पूर्वनियोजित था तो उन्हें पहले से क्यों नहीं बताया गया। लेकिन इन सारे नेताओं की खिसकी हवा देख लग रहा था कि ध्वंस की कोई पूर्व योजना नहीं थी।

बार-बार प्रधानमंत्री के यहां से फोन आता देख अशोक सिंघल ने विनय कटियार से कहा कि वे प्रधानमंत्री से बात करें। कटियार का कहना था, किस मुंह से बात करूं। सुबह से भरोसा दिया था, सब ठीक होगा। सिंघल ने कहा, फिर भी बात कीजिए, उन्हें वस्तुस्थिति बताइए। कटियार ने फोन पर प्रधानमंत्री नरसिंह राव से बात की। प्रधानमंत्री बोले, ‘जो हुआ अच्छा नहीं हुआ, पर अब आप मदद कीजिए। अयोध्या को कारसेवकों से जल्दी खाली कराइए। मैं 16 विशेष रेलगाडिय़ां भेज रहा हूं। आप उनमें कारसेवकों को रवाना करें।’ प्रधानमंत्री ने कटियार से दक्षिण भारत के कारसेवकों को पहले निकालने को कहा। देश की स्थिति बिगड़ रही थी। ऐसे में कोई रक्तपात होता, इससे पहले प्रधानमंत्री कारसेवकों को अयोध्या से निकालना चाह रहे थे।

ढाँचा गिरते ही कारसेवकों की पूरी ताकत मलबे को समतल बनाने में लगी, ताकि वहां फिर से रामलला को जल्दी-से-जल्दी स्थापित किया जा सके।  पुलिस सुरक्षा बल, केंद्र सरकार और कल्याण सिंह की सरकार, तीनों इसी काम के पूरे होने का इंतजार कर रहे थे। इसी के बाद कोई कार्रवाई होनी थी। कारसेवकों ने ढाँचे का मलवा पीछे खाई में गिराया और जमीन समतल करने के काम में लगे। पंद्रह गुणा पंद्रह गज के टुकड़े पर जल्दी-जल्दी में पांच फीट की दीवार उठाई गई। नीचे से उस अस्थायी चबूतरे तक अठारह सीढिय़ां बनीं। उसी वक्त पता चला, रामलला की मूर्तियाँ गायब हैं। कारसेवकों के सामने एक तरफ केंद्र सरकार की संभावित मंदिर बनाने की अफरातफरी थी। केंद्र सरकार की ओर से अयोध्या का मामला केंद्रीय राज्यमंत्री पीआर कुमार मंगलम देख रहे थे। वे फोन पर कई बार जानकारी ले चुके थे कि अस्थायी मंदिर में मूर्तियाँ रखी गई या नहीं?

अयोध्या में ढाँचा ढहाए जाने के बाद अस्थायी मंदिर में रामलला की मूर्तियां स्थापित करने को लेकर संग्राम मचा हुआ था। केंद्र सरकार इस स्थापना की खातिर विशेष तौर पर सक्रिय थी। राव सरकार के मंत्री पीआर कुमार मंगलम राजा अयोध्या विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के संपर्क में थे। राजा साहब कांग्रेस पृष्ठभूमि के थे। अयोध्या में कफ्र्यू था। दुकानें बंद थीं। आनन-फानन में राजा अयोध्या ने अपने घर से रामलला की मूर्तियां भिजवाई, जो उनकी दादी ने इसी काम  के लिए अपने घर में एक अस्थायी मंदिर बनाकर उसमें रखी थीं। राजा अयोध्या ने मूर्तियों रखे जाने के बाद पीआर कुमार मंगलम को जानकारी दी। फौरन बाद नरसिंह राव ने कैबिनेट की बैठक बुला कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश की। यह भी अजीब  बात थी कि कल्याण सिंह तीन घंटे पहले ही इस्तीफा दे चुके थे। फिर भी उनकी बर्खास्तगी का नाटक रचा गया। कैबिनेट की सिफारिश गृहमंत्री एसबी चह्राण खुद लेकर राष्ट्रपति भवन गए और राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने हाथोहाथ राष्ट्रपति शासन की अधिसूचना जारी की। अयोध्या अब केंद्र सरकार के हवाले थी।

राम जन्मभूमि मंदिर में रामलला की मूर्ति की भी दिलचस्प कहानी है। जो मूर्ति ध्वंस के दौरान गायब हुई, वह रामलला की मूल मूर्ति नहीं थी। इस इमारत के बार-बार टूटते-बनते यहां मूर्तियां भी बदलती रहीं। जो मूर्ति कारसेवकों ने गायब की, वह 1949 की 22 दिसंबर की आधी रात को रखी गई थी। चार सौ  साल पहले जब मीर बाकी ने मंदिर तोड़ मस्जिद बनाई तो उस वक्त की विक्रमादित्य द्वारा स्थापित मूर्ति टीकमगढ़ के ओरछा राजमहल में चली गई। ओरछा की महारानी अयोध्या वह मूर्ति ले गई थीं। इसीलिए ओरछा में राम राजा का राज आज भी है और वहां के राम राजा धनुर्धर राम नहीं, रामलला हैं। आज भी ओरछा के मंदिर में रामलला को मध्य प्रदेश पुलिस सुबह-शाम सलामी देती है।

अयोध्या के इस ध्वंस में एक बड़ी कड़वी सच्चाई यह है कि जो लोग, खासकर कांग्रेसी नेता अयोध्या में त्वरित कार्रवाई चाहते थे, लोग चला ढाँचे को बचाना चाहते थे, वे सब उस वक्त बगलें झाँकने लगे, जब उनका कार्रवाई करने का वक्त आया। उस रात नौ बजे उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग जाता है। बावजूद उसके 36 घंटे बाद तक भारत सरकार अयोध्या में कोई कार्रवाई नहीं करती है? कारसेवकों से विवादित परिसर खाली नहीं करा पाती है? यह सब कुछ अनायास नहीं था। इसके पीछे हिंदुत्व की जमीन हथियाने की खातिर सोच थी, जिसने कांग्रेस के ऊपरी सेकुलर ताने-बाने को तार-तार किया। कांग्रेस को उसका चुनावी खामियाजा भी भुगतना पड़ा। बाद में 2014 के चुनाव में राहुल गांधी को इस ताने-बाने में तुरपाई करने के लिए कहना पड़ा कि बाबरी मस्जिद न गिरती, अगर नेहरू-गांधी परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता।

ढाँचा गिरने के बाद विवादित इमारत से ठीक पीछे की गलियों में मुसलमानों की बस्ती पर हमला हुआ। बाबरी मामले के पक्षकार मोहम्मद हाशिम के घर को आग के हवाले किया गया। अयोध्या में बेमियादी कफ्र्यू लगा दिया गया। लौटते कारसेवक घरों में आग लगाते जा रहे थे। हालांकि तनाव से ज्य़ादातर घर पहले से खाली थे। पूरे देश में सांप्रदायिक हालात तनावपूर्ण हो गए। सात राज्यों में सेना सतर्क की गई। इनमें आंध्र, असम, बिहार, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश शामिल थे। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद, लखनऊ, कानपुर, मेरठ, बनारस शहर कफ्र्यू के हवाले हुए। अगर हम उस रोज सुबह से घटनाओं के क्रम को जानें कि कितने बजे क्या हुआ तो तस्वीर और साफ हो जाएगी। राज्य और केंद्र सरकारों की नीयत व ईमानदारी का पता चलेगा। इस बात का भी अंदाजा लगेगा कि कौन-कौन लोग जान-बुझकर इस संकट की अनदेखी क्यों कर रहे थे?