धान से धनवान

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फोटो: प्रतुल दीक्षित

2014 की शुरुआत मध्य प्रदेश के उन किसानों के लिए खुशी का संदेश लेकर आई है जो बासमती धान की खेती करते हैं. उत्पादों की ‘भौगोलिक सीमा’ तय करने वाली राष्ट्रीय संस्था जियोग्राफिकल इंडीकेशन रजिस्ट्रार (जीआईआर) ने प्रदेश को भी बासमती धान उत्पादक राज्यों में शामिल करने का निर्देश दिया है. इससे राज्य के लाखों बासमती उत्पादकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार खुलेगा और उन्हें अपने बासमत का वाजिब दाम मिलेगा.

हालांकि यह कहानी अप्रैल, 2000 से शुरू होती है जब एक अमेरिकी कंपनी के बासमती धान की कई किस्मों पर पेटेंट के दावे के खिलाफ भारत ने मोर्चा खोला था. हुआ यह था कि राइसटेक नामक यह कंपनी सालों से कासमती और टैक्समती के नाम से चावल बेच रही थी. 1994 में इस कंपनी ने बासमती धान की बीस किस्मों का पेटेंट प्राप्त करने के लिए ‘संयुक्त राज्य पेटेंट एवं व्यापार संस्थान’ में आवेदन भी भेजा. 1997 में इसे ये सभी पेटेंट मिल भी गए. लेकिन इस मामले में भारत की सख्त आपत्ति के बाद अंततः राइसटेक ने बासमती की चार किस्मों के पेटेंट को तुरंत वापस ले लिया. बाद में उसे 11 और किस्मों के पेटेंट को वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा. भारत का दावा था कि बासमती धान हिमालय की तराई में उगाए जाने वाले लंबे और कोमल चावल की एक उत्कृष्ट किस्म है. इसी तरह, बासमती यानी ‘खुशबू वाला धान’ की किस्म का नाम भी यहीं प्रचलित है. यानी यह न तो दुनिया के किसी अन्य भाग में पैदा होता है और न ही किसी स्थान पर पैदा किया गया धान बासमती कहलाता है. भारत की इस दलील का नतीजा यह हुआ कि बासमती धान को भारतीय क्षेत्र में उत्पादित होनी वाली ‘भौगोलिक सूचक’ फसल की सूची में दर्ज कर लिया गया. इस निर्णय ने दुनिया के बाजार में बासमती के निर्यात का ऐसा दरवाजा खोला कि भारतीय किसानों के चेहरों पर चमक आ गई.

लेकिन यह चमक अधूरी थी. इसका कारण था एक पक्षपात. दरअसल केंद्र सरकार ने कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ाने के लिए अधिकृत संस्था एपीडा (कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण) को भारत में बासमती के क्षेत्र तय करने की जिम्मेदारी सौंपी थी. लेकिन एपीडा ने बासमती के ‘भौगोलिक सीमांकन’ के पंजीयन में उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों को ही मान्यता दी. यह मध्य प्रदेश जैसे राज्य के साथ नाइंसाफी थी जहां कई इलाकों में बड़े पैमाने पर बासमती धान की खेती होती है जिसके चलते यह उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा बासमती धान उगाने वाला क्षेत्र बनकर उभरा है. एपीडा ने अपने निर्णय से पहले इस पर गौर करना भी जरूरी नहीं समझा कि मध्य प्रदेश में पिछले 100 साल से बासमती धान उगाने के प्रमाण मौजूद हैं. इसकी मार प्रदेश में बासमती उगाने वाले किसानों पर पड़ी. 31 दिसंबर, 2013 को चेन्नई स्थित जीआईआर ने प्रदेश को भी बासमती धान उत्पादक राज्यों में शामिल करने का निर्देश दिया. बासमती उत्पादकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार खुलने और उन्हें वाजिब दाम मिलने के अलावा इससे और भी कई फायदे होंगे. बासमती धान का रकबा बढ़ने के साथ ही निर्यातकों की संख्या भी बढे़गी. इसके अलावा बासमती चावल प्रसंस्करण इकाइयां लगाने के लिए उद्योगपति प्रदेश का रुख करेंगे. राज्य के उद्योग विभाग का कहना है कि फिलहाल चावल प्रसंस्करण इकाइयां लगाने के लिए एक दर्जन से ज्यादा आवेदक आए हुए हैं. कृषि विशेषज्ञ केके तिवारी कहते हैं, ‘बासमती की अधिक पैदावार से राज्य को दोतरफा मुनाफा होगा. प्रसंस्करण की जितनी इकाइयां लगेंगी उतना ही ज्यादा लोगों को रोजगार मिलेगा.’

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