लालू प्रसाद यादव: दौर बुरा, तौर वही

वर्षों तक लालू प्रसाद के संगी-साथी रहे रामबिहारी सिंह कहते हैं, ‘अब बूढ़ीपंथी पार्टियों के बड़े नेताओं को स्थिति को समझना चाहिए. आज नया जमाना है. नई चीज गढ़ने की तैयारी है. पुराने जमाने की बात कहकर जितने दिन लालू प्रसाद जैसे नेता अपना काम चला सकते थे, चला लिए. अब वह सब नहीं चलने वाला है.’ दूसरे शब्दों में कहें तो अब केंद्रीय राजनीति में लालू प्रसाद का करिश्मा नहीं चलने वाला है.

वर्षों तक पीएम बनने का ख्वाब देखते रहने वाले लालू प्रसाद यादव वैसे भी फिलहाल बेहद मुश्किल दौर में हैं, लेकिन उनके लिए एक धुंधली उम्मीद भी दिखती है. लालू प्रसाद खुद सजायाफ्ता हो चुके हैं, सांसदी जा चुकी है और आगे जितने वर्षों तक के लिए वे चुनाव लड़ने से वंचित हुए हैं, उतने वर्षों के बाद वे राजनीति में शायद ही चलने लायक सिक्के की तरह रहें. और रही बात केंद्रीय राजनीति में अब किंगमेकर बनने की तो लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं की प्राथमिकता अब किसी तरह बिहार में अपनी खोई हुई जमीन को वापस पाना है.

यह बात लालू प्रसाद भी जानते हैं और उनके दल के नेता भी, लेकिन अब भी वे उन दिनों को याद करके एक नए किस्म का यूटोपिया बनाए रखना चाहते हैं, जिन दिनों लालू प्रसाद देवगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाने में भूमिका निभा रहे थे या फिर यूपीए वन में रेल मंत्री बनकर देश-दुनिया में वाहवाही लूट रहे थे. राजद नेता प्रेम कुमार मणी कहते हैं, ‘राजनीति वर्षों पहले ही बदल चुकी है और समय के साथ बदलती रहती है. नेहरू के बाद इंदिरा युग अलग था. नेहरू समाजवादी ढांचेे से काम चलाते थे, लेकिन इंदिरा के समय में समाजवादी सरकार की ही चाहत जनता में जगी. 1990 के बाद राजनीति पूरी तरह बदल गई. पहचान की राजनीति का जमाना आ गया. अब उसका दौर भी समाप्त हो रहा है. दिल्ली में जो छोटी-सी घटना हुई वह नई आकांक्षाओं का जनतांत्रिक ज्वार है. बिहार की राजनीति का जो सबसे बड़ा लक्षण है, वह है कि 11 प्रतिशत शहरीकरण है ऐसे में अब जो नए तरीके से सोचेगा, वही यहां की जनता की उम्मीदों को वोटों में बदलने में कामयाब होगा.’ मणी आगे कहते हैं, ‘हां यह तय है कि बिहार में नरेंद्र मोदी या भाजपा का खुलकर विरोध करने और उसके खिलाफ वोटों का धुव्रीकरण करने में लालू प्रसाद ही सफल होंगे.’

कई बड़े नेताओं से बात होती है. राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं से भी और दूसरे दल के नेताओं से भी. कोई खुलकर नहीं कहता कि लालू प्रसाद या उनकी पार्टी के लिए केंद्र की राजनीति में करिश्माई भूमिका निभाने की संभावनाएं खत्म- सी हो गई हैं. राजद के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘नीतीश कुमार से बिहार में नाराजगी की एक लहर है. भाजपा से जदयू का अलगाव हो चुका है. लालू प्रसाद खुलकर और जमकर भाजपा अथवा नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोल सकेंगे. उसका फायदा मिलेगा. लेकिन इतना फायदा मिलेगा कि वे या उनकी पार्टी केंद्र मंे अहम भूमिका निभाने की स्थिति में आएगी, ऐसा फिलहाल संभव नहीं दिखता.’ लोक जनशक्ति पार्टी के बिहार के प्रवक्ता रोहित कुमार सिंह कहते हैं, ‘गठबंधन की राजनीति का दौर है. लालू प्रसाद एक समय में उस हैसियत वाले नेता रहे हैं. आगे क्या

होगा, इसका आज की राजनीति में पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता.’

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