दोराहे पर घाटी

कश्मीरी पंडितों के पलायन से केंद्र की नीति पर सवाल

कश्मीर में हाल की घटनाओं, जिनमें कश्मीरी पंडितों का पलायन भी शामिल है; ने घाटी से लेकर दिल्ली तक चिन्ता पैदा की है। यह सब तब शुरू हुआ है, जब घाटी में जाने वाले पर्यटकों की संख्या हाल के वर्षों में सबसे अधिक है। चिह्नित हत्यायों के दौर से संकेत मिलता है कि आतंकी गुट अपनी रणनीति बदलकर काम कर रहे हैं। हाल में जम्मू-कश्मीर में हुए परिसीमन ने घाटी के लोगों के मन में आशंकाएँ भरी हैं। महसूस किया जा रहा है आतंक रोकने के लिए कि केंद्र सरकार के लिए यह ज़रूरी है कि वह सुरक्षा की नीति से इतर और उपायों पर भी विचार करे। श्रीनगर से रियाज़ वानी की ग्राउंड रिपोर्ट :-

घाटी में कश्मीरी पंडितों सहित आम नागरिकों की हत्याओं ने देश भर में कोहराम मचा दिया है। कई कश्मीरी पंडित जो प्रधानमंत्री पैकेज के तहत नौकरी करने के लिए कश्मीर लौटे थे, उन्होंने हाल की घटनाओं के बाद घाटी छोड़ दी है; जिससे केंद्र सरकार की उन्हें उनकी मातृभूमि में फिर से बसाने की योजना खटाई में पड़ गयी है।

हालाँकि केवल कश्मीरी पंडितों पर ही हमला नहीं किया गया है। आतंकवादियों ने कश्मीरी मुस्लिम नागरिकों, जम्मू और कश्मीर पुलिसकर्मियों, प्रवासी मज़दूरों और जम्मू और भारत के अन्य हिस्सों के हिन्दुओं को भी अपनी हिंसा का शिकार बनाया है।
ताज़ा घटनाओं में आतंकवादियों ने जम्मू सम्भाग के सांबा की एक स्कूल शिक्षक रजनी बाला और राजस्थान के विजय कुमार बेनीवाल, इलाकाई देहाती बैंक के प्रबंधक की हत्या की है। पिछले महीने एक कश्मीरी पंडित सहित लक्षित हमलों में आतंकवादियों ने नौ नागरिकों को मार डाला। वहीं सुरक्षा बल अब तक हत्यायों को रोकने में नाकाम रहे हैं। समझा भी जा सकता है कि उनके लिए घाटी में अल्पसंख्यक समुदाय के एक-एक सदस्य को सुरक्षित रखना आसान नहीं होगा।

जम्मू-कश्मीर सरकार के लिए चीज़ों को और कठिन बनाने वाली बात यह है कि एक विशेष पैकेज के तहत 4,000 पंडित कर्मचारियों की भर्ती की गयी है; लेकिन हाल की घटनाओं के बाद ये सभी नये सिरे से पलायन के कगार पर हैं। इसी तरह जम्मू सम्भाग के विभिन्न ज़िलों के क़रीब 8,000 कर्मचारी एक अन्तर-ज़िला स्थानांतरण नीति के तहत कश्मीर में काम कर रहे हैं और उनमें से अधिकांश ग़ैर-मुस्लिम हैं। भले सरकार ने उन्हें आश्वासन दिया है; लेकिन उन्हें इस पर भरोसा करने का कोई कारण नहीं मिल रहा है। पंडित कर्मचारी अब चाहते हैं कि सरकार उस बांड को रद्द कर दे, जो उन्हें अपने रोज़गार के दौरान घाटी में स्थायी रूप से रहने के लिए बाध्य करता है। वे चाहते हैं कि पद (पोस्ट) को हस्तांतरणीय बनाया जाए।

उत्तरी कश्मीर के बारामूला में एक हिन्दू कश्मीरी पंडित कॉलोनी के अध्यक्ष अवतार कृष्ण भट्ट ने मीडिया को बताया कि सुरक्षा की भावना के अभाव में पंडितों को भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने कहा- ‘कॉलोनी में रहने वाले 300 परिवारों में से लगभग आधे ने हाल ही में हुई हत्या की होड़ के बाद घाटी छोड़ दी थी।’ कश्मीरी पंडितों ने भी जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा और कश्मीर के बाहर पोस्टिंग की माँग को लेकर दिल्ली तक विरोध प्रदर्शन किये हैं।

प्रधानमंत्री का पैकेज
साल 2008 के आसपास तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने कश्मीरी पंडितों को घाटी में लौटने के एवज़ में नौकरी और वित्तीय सहायता की पेशकश की थी। पंडितों को प्रति परिवार 7.5 लाख रुपये की प्रारम्भिक वित्तीय सहायता दी गयी थी, जिसे बाद में घाटी में बसने वालों के लिए तीन किस्तों में बढ़ाकर 20 से 25 लाख रुपये कर दिया गया था।

सरकार ने घाटी के विभिन्न हिस्सों में लौटने वाले कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए सुरक्षित, अलग-अलग एन्क्लेव बनाये। योजना सफल साबित हुई। जो पंडित कार्यरत थे और उनके परिवारों ने इन परिक्षेत्रों में निवास किया, वे मुसलमानों के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में अपने-अपने धार्मिक / सामाजिक आयोजनों में भी शामिल हुए। लेकिन किसी ने उन्हें छुआ तक नहीं।

बाहरी लोगों और अल्पसंख्यकों की हत्याएँ नई दिल्ली के अनुच्छेद-370 को रद्द करने के बाद शुरू हुईं, जिसने जम्मू और कश्मीर को भारतीय संघ के भीतर एक अर्ध-स्वायत्त दर्जा दिया। पांच अगस्त, 2019 को विशेष संवैधानिक पद वापस लेने के दो महीने के भीतर आतंकवादियों ने सेब व्यापार से जुड़े तीन ग़ैर-स्थानीय लोगों को मार डाला। इसने अस्थायी रूप से घाटी के फल उद्योग को संकट में डाल दिया, जिसका सालाना कारोबार 10,000 करोड़ रुपये है; जिसे घाटी की अर्थ-व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। हत्याओं ने बाहर से यहाँ आकर काम कर रहे ट्रक ड्राइवरों और सेब व्यापारियों को पलायन के लिए मजबूर कर दिया और स्थिति को फिर सामान्य होने में समय लगा। तब ऐसी ख़बरें आयी थीं कि उग्रवादियों ने स्थानीय फल उत्पादकों को बाहरी लोगों को काम पर नहीं रखने के लिए कहा था।

हालाँकि बाद में हत्याएँ कम हो गयीं; लेकिन आतंकी जल्द ही बिहार और भारत के अन्य हिस्सों के मज़दूरों की हत्याओं के साथ फिर सक्रिय हो गये। स्थिति तब चिन्ताजनक हो गयी, जब 31 दिसंबर, 2020 को आतंकवादियों ने एक हिन्दू सुनार की हत्या कर दी। पिछले साल भी उन्होंने प्रसिद्ध कश्मीरी पंडित केमिस्ट माखन लाल बिंदू की गोली मारकर हत्या कर दी। कुल मिलाकर कश्मीरी मुसलमान पिछले तीन साल में मारे गये लोगों में सबसे ज़्यादा हैं। हालाँकि इस तरह की हत्याओं को आमतौर पर मीडिया में अलग ही जगह मिलती है।

सरकारी उपाय
अल्पसंख्यकों की हत्याओं में वृद्धि ने केंद्र सरकार को घाटी में कश्मीरी पंडितों और हिन्दू कर्मचारियों में भरोसा भरने के लिए क़दम उठाने को मजबूर किया है। केंद्रीय गृह मंत्री, अमित शाह ने 17 मई को एक उच्च स्तरीय बैठक की, जिसमें उप राज्यपाल मनोज सिन्हा, केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला और ख़ुफ़िया और सुरक्षा एजेंसियों के प्रमुखों ने मौज़ूदा स्थिति के लिए तैयारियों का जायज़ा लिया। घाटी और आगामी अमरनाथ यात्रा – जो दो साल बाद 30 जून से शुरू होने वाली है, पर भी चर्चा हुई। साल 2020 और 2021 में कोरोना वायरस में हुई तालाबंदी के कारण तीर्थयात्रा रद्द कर दी गयी थी। यात्रा में लगभग तीन लाख तीर्थ यात्रियों के भाग लेने की सम्भावना है, जो 11 अगस्त तक चलेगी। केंद्र सरकार अब यात्रा को सुरक्षित करने के लिए कम-से-कम 12,000 अर्धसैनिक बल के जवानों के साथ-साथ हज़ारों जम्मू-कश्मीर पुलिस जवानों को तैनात करने जा रही है।
कश्मीरी पंडितों को सुरक्षा की भावना भरने के व्यर्थ प्रयास में जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा ने यह भी कहा कि कश्मीरी पंडित राहुल भट्ट की हत्या के बाद पंडित कर्मचारियों को सुरक्षित ज़िलों में तैनात किया जाएगा, जो घाटी के बडगाम ज़िले में राजस्व विभाग में काम करते थे। शिक्षा विभाग द्वारा 177 कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के तबादले को सार्वजनिक किये जाने पर भी सरकार ने गम्भीरता से विचार किया। भाजपा की यह माँग थी। भगवा पार्टी ने कहा कि सरकार कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा के लिए गम्भीर क़दम उठा रही है; लेकिन कुछ अधिकारी उनकी पहचान करके खेल बिगाड़ रहे हैं। साथ ही जम्मू-कश्मीर सरकार ने कुछ सरकारी और निजी स्कूलों को स्थिति सामान्य होने तक अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाने का निर्देश दिया है। सरकारी और निजी स्कूलों के लिए शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा हाल में आधिकारिक निर्देश में कहा गया कि प्रत्येक विषय में छात्रों के सीखने के स्तर का आकलन वस्तुत: गूगल फॉर्म प्रश्नावली या किसी अन्य व्यवहार्य आभासी प्रारूप के माध्यम से किया जाना चाहिए और इसका रिकॉर्ड सीखने के स्तर के रजिस्टर में शामिल किया जाना चाहिए। जिला शिक्षा अधिकारियों ने स्कूल शिक्षकों को अपने पाठ्यक्रम के अनुसार ऑनलाइन शिक्षण और ई-सामग्री के लिए कार्य योजना तैयार करने का भी निर्देश दिया। इस देश में कहा गया है कि छात्रों की ऑनलाइन हाजिरी रजिस्टर में दर्ज की जाएगी।