देस हुआ बेगाना

[wzslider autoplay=”true” transition=”‘slide'”]

वैसे तो महज बेघर होना ही अपने आप में बहुत बड़ा अभिशाप है, लेकिन उन लाखों लोगों पर क्या बीतती होगी जिनको इस देश में तकरीबन आधी सदी रहने के बाद भी देश का नागरिक तक नहीं माना जाता. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और नेपाल की सीमा से लगे कई गांव हैं जिनमें रहने वाले लोग देखने में तो आम हिंदुस्तानियों जैसे ही लगते हैं लेकिन तकनीकी तौर पर वे अब भी देश के नागरिक नहीं हैं.

लाखों लोगों की जिंदगी से जुड़े इस मसले की जड़ें करीब 50 साल पीछे जाती हैं. 1963 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में उथल-पुथल मचनी शुरू हुई तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इन लोगों को भारत बुलाकर बसाने का सिलसिला शुरू किया. बांग्लादेश के खुलना, फरीदपुर, ढाका, चटगांव आदि जिलों से आकर हजारों परिवार उत्तर प्रदेश के पीलीभीत और उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर जिलों में बसे. लेकिन आज इन एक लाख से अधिक परिवारों में से बमुश्किल 15-20 हजार के पास ही भारतीय नागरिकता है.

नागरिकता न मिलने से इनकी जिंदगी में कई तरह के दुख हैं. बंगाली समुदाय के इन परिवारों के युवकों को न तो सरकारी नौकरी ही मिल पा रही है और न ही दूसरी अन्य सुविधाएं. हां, लोकसभा और विधानसभा चुनाव के वक्त अचानक नेताओं को इनका ध्यान आता है और उस दौरान इनकी नागरिकता के मुद्दे पर जमकर राजनीतिक रोटियां सेकी जाती हैं. कारण स्पष्ट है. इनके पास नागरिकता भले ही नहीं हो लेकिन मतदाता सूची में इनका नाम है. इनका मतदाता पहचान पत्र बना हुआ है. वैसे तो निर्वाचन आयोग का नियम है कि वही व्यक्ति चुनाव में हिस्सा ले सकता है जो भारत का नागरिक हो. लेकिन यहां यह नियम शायद लागू नहीं होता. लाखों की संख्या में मौजूद इन लोगों के पास भारत की नागरिकता तो नहीं है लेकिन वे चुनाव में वोट जरूर डालते हैं. उनका नाम वोटर लिस्ट में तो है ही, निर्वाचन आयोग की ओर से जारी किया गया पहचान पत्र भी उनके पास है. पूरे बंगाली समुदाय की यही चीज नेताओं व राजनीतिक पार्टियों को लुभाने का काम करती हैं. राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से लोग राशन कार्ड, वोटर आईडी और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे दस्तावेज बड़ी आसानी से बना लेते हैं.

[box]‘स्थानीय नेता बंगाली परिवारों का नागरिकता प्रमाण पत्र बनवाने के लिए भले ही तत्पर न दिखते हों पर वोटर कार्ड बनवाने में उनकी प्रमुख भूमिका होती है'[/box]

स्थानीय पत्रकार महबूब मियां बताते हैं, ‘स्थानीय नेता बंगाली परिवारों का नागरिकता प्रमाण पत्र बनवाने के लिए भले ही तत्पर न दिखते हों पर वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने से लेकर वोटर कार्ड बनवाने तक में उनकी प्रमुख भूमिका होती है. इसके लिए नेता अधिकारियों पर दबाव बनाने से लेकर सारे दूसरे हथकंडे तक अपनाते हैं. लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं नागरिकता और इनकी सुविधाओं व जरूरतों का मुद्दा नेताओं की प्राथमिकता से कोसों दूर चला जाता है.’

ऐसा भी नहीं है कि दुश्वारियां केवल उन्हीं परिवारों के लिए हैं जिनके पास नागरिकता नहीं है बल्कि सरकारी उपेक्षा के कारण वे परिवार भी परेशान हैं जिनके पास नागरिकता है. सरकार ने सन 1964 में पीलीभीत व ऊधमसिंह नगर की सीमा पर शारदा नदी के किनारे इन परिवारों को बसाना शुरू किया था. उस समय जिन परिवारों को भारत सरकार की ओर से नागरिकता दी गई थी उनमें से प्रत्येक परिवार को भरण-पोषण के लिए पांच-पांच एकड़ जमीन, एक जोड़ी बैल, खेती के लिए बीज, जंगल में रहने के कारण जान-माल की सुरक्षा के लिए बंदूकों के लाइसेंस सहित जरूरी राशन तक उपलब्ध कराया गया था. यह सिलसिला कुछ माह तक चला जब तक कि नागरिकता पाए परिवार खुद अपने खेतों में अनाज नहीं उगाने लगे. लेकिन इन परिवारों की खुशियां क्षणिक थीं. 1989 में शारदा नदी में आई भयंकर बाढ़ के कारण पीलीभीत जिले के रमनगरा, गभिया सहराई, कुतिया कबर सहित कई गांवों की खेती योग्य वह जमीन जो सरकार की ओर से आवंटित हुई थी, नदी में ही समा गई. इन गांवों की तो खेती गई लेकिन प्रकृति की सबसे अधिक मार गुन्हान गांव पर पड़ी. करीब 3000 की आबादी वाला यह गांव पूरा ही नदी में समा गया. गुन्हान के लोगों को शारदा नदी व शारदा बैराज के बीच स्थित सिंचाई विभाग की जमीन पर अस्थायी रूप से करीब 23 साल पूर्व बसाया गया था. ये आज भी वहीं रहने को मजबूर हैं. 80 साल के बुजुर्ग जगदीश कहते हैं, ‘अस्थायी रूप से जगह देते समय प्रशासन की ओर से कहा गया था कि कुछ समय बाद सबको स्थायी जगह रहने को दी जाएगी लेकिन वह दिन कभी नहीं आया.’

जिन लोगों के पास नागरिकता नहीं है, उनकी परेशानियों का तो कोई पारावार ही नहीं है. 70 साल के हरीपद मांझी तकरीबन 22 साल की उम्र में बांग्लादेश के खुलना जिले से आए थे. वहां के हालात ऐसे थे कि पत्नी व बच्चों की जान बचा कर खाली हाथ ही भागना पड़ा. वे बताते हैं, ‘सरकार ने सबसे पहले मध्य प्रदेश के माना कैंप में रखा. माना कैंप पहाड़ पर था जहां पर खेतीबाड़ी संभव नहीं थी. लिहाजा दो साल बाद परिवार सहित पश्चिम बंगाल के सुंदरबन चले गए. वहां  छह-सात महीने ही रहे थे कि समस्याएं शुरू हो गईं. स्थानीय लोगों ने वहां से हटने का दबाव बनाना शुरू कर दिया.’ वे आगे बताते हैं कि स्थानीय निवासियों का विरोध अभी शांत भी नहीं हो पाया था कि एक दिन पुलिसवालों ने आकर बंगाली समुदाय की झोपड़ियों में आग लगा दी. झोपड़ियां जलाने के बाद भी जब लोग नहीं हटे तो पुलिसवालों ने पिटाई करके सबको भगा दिया. मांझी कहते हैं, सुंदरबन से बेघर होने के बाद कई परिवार पीलीभीत आ गए. यहां आने के बाद भी विपत्तियों ने साथ नहीं छोड़ा. न तो परिवार पालने के लिए जमीन मिली और न ही वे सरकारी सुविधाएं जो उस समय सरकार दे रही थी.’ हरीपद मांझी के पास नागरिकता भले ही नहीं है लेकिन सरकारी कर्मचारियों ने उनका राशन कार्ड जरूर बना दिया है. घास-फूस की झोपड़ी में रहने वाले हरीपद का राशन कार्ड सरकारी कर्मचारियों ने बनाया भी तो गरीबी रेखा से ऊपर का. लिहाजा हरीपद के दो बेटे दिल्ली में सिलाई करके परिवार का पेट पाल रहे हैं.

[box]अपना सब कुछ छोड़कर एक बेहतर जिंदगी की आस में भारत आए ये परिवार एक बार फिर उसी स्थिति में पहुंच गए हैं जिसमें वे बांग्लादेश छोड़ते वक्त थे[/box]

वहीं ऊधमसिंह नगर के नारायण नगर में रहने वाले 61 साल के सुरेन हलधर बांग्लादेश के फरीदपुर जिले से अपने मां-बाप के साथ बेहतर जिंदगी की चाह लिए 1964 में हिंदुस्तान आए थे. लेकिन दिक्कतें खत्म होने के बजाय बढ़ती गईं. सुरेन हलधर के बेटे अधिर बताते हैं, ‘यहां आने के बाद सरकार की ओर से सबसे पहले पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में रोका गया. वहां कुछ दिन रहने के बाद सरकार की ओर से रुद्रपुर कैंप भेजा गया. ‘रुद्रपुर कैंप से जमीन देने की बात कह कर उन्हें नारायणनगर भेजा गया लेकिन यहां न तो जमीन मिली और न ही नागरिकता. उनके मुताबिक सरकार की ओर से बीपीएल कार्ड बनाया गया था लेकिन कुछ माह पूर्व कार्ड यह कहते हुए निरस्त कर दिया गया कि नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है. नागरिकता न होने के बावजूद बीपीएल कार्ड के आधार पर उन्हें सरकार की ओर से इंदिरा आवास आवंटित किया गया लेकिन उसके लिए भी महज 27 हजार रुपये ही अधिकारियों की ओर से दिए गए. परिवार का पेट पालने के लिए अधिर घर में ही एक छोटी-सी परचून की दुकान चलाते हैं. घर के पास स्थित वन विभाग की जमीन पर ही उनका पूरा मकान बना है. वे हमेशा इस डर में जीते हैं कि पता नहीं कब वन विभाग उन्हें बेघर कर दे. परिवार के छह लोगों का पेट पालने के लिए दुकान जब छोटी पड़ने लगी तो तीन बेटों ने मजदूरी करने के लिए गुजरात का रास्ता पकड़ लिया.

अपना सब कुछ बांग्लादेश में छोड़ कर एक बेहतर जिंदगी जीने की आस लगाए हिंदुस्तान आए ये परिवार एक बार फिर उसी स्थिति में पहुंच गए हैं जिसमें वे यहां आते वक्त थे. रमनगरा के भूदेव दास बताते हैं, ‘सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बाढ़ के बाद पानी जब कम हुआ तो नदी की कटान के कारण पूरी जमीन नदी में समा गई लेकिन कुछ साल बाद जब नदी ने अपना रास्ता फिर बदला तो जो खेत नदी में गए थे वो फिर से बाहर आ गए. किसान जब अपनी जमीनों पर दोबारा खेती करने गए तो वन विभाग ने उन्हें रोक दिया.’  वन विभाग का तर्क है कि जो जमीन नदी की कटान के बाद निकली है वह उसकी है. भूदेव कहते हैं, ‘जमीन होने के बावजूद सैकड़ों की संख्या में ये परिवार भूमिहीन होकर दरबदर की ठोकरें खा रहे हैं. जमीन जाने के बाद इन परिवारों के सामने सबसे बड़ी समस्या परिवार का पेट पालने की है. बच्चों का पेट पालने की जुगाड़ में कहीं बाहर प्राइवेट नौकरी करने जाते भी हैं तो जैसे ही लोगों को पता चलता है कि ये बांग्लादेश से हिंदुस्तान में रहने आए हैं तो इन्हें शक की निगाह से देखा जाता है.’

अब इन लोगों ने अपने हक की लड़ाई शुरू की है. जमीन की लड़ाई लड़ रहे स्थानीय युवक विवेक बताते हैं, ‘सिंचाई विभाग की 1,171 एकड़ जमीन यहां खाली पड़ी थी. काफी प्रयास के बाद यह जमीन राजस्व विभाग को स्थानांतरित हो गई ताकि उन परिवारों को दी जा सके जिनकी जमीनें नदी में समा गई हैं. राजस्व विभाग को मिली जमीन से बंगाली परिवारों को सरकार की ओर से पट्टों का आवंटन शुरू हुआ ही था कि तहसील का एक कर्मचारी आवंटन के खिलाफ कोर्ट चला गया.’ कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दे दिया, जिसके बाद से पूरा मामला कोर्ट में ही विचाराधीन है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here