देशद्रोह की असंगत परिभाषा

देश के युवा सरकार की अग्निपथ योजना को लेकर काफ़ी आन्दोलित एवं आक्रोशित रहे। अग्निपथ योजना उचित है या अनुचित? इसका विश्लेषण लगातार चल रहा है। भारत हमेशा से प्रबुद्ध राष्ट्र रहा है। वह इस विमर्श को एक सही निर्णय तक लेकर जाएगा। किन्तु समर्थन एवं विरोध के संघर्ष के मध्य पिछले वर्षों में अनुत्तरित रहे एक मूल प्रश्न पर विचार करना ज़रूरी है। देश में एक नयी रवायत (नैरेटिव) चल पड़ी है। हर विरोध, जो वर्तमान सत्ताधारी दल के विरुद्ध है; उसे राष्ट्रद्रोह साबित करने का प्रयास किया जा रहा है। सत्ता से असहमति देशद्रोह नहीं हो सकता। कोई भी दल या सरकार राष्ट्र का पर्याय नहीं बन सकती।

वर्तमान सरकार के कई ऐसे कार्य हैं, जिनसे असहमति ही नहीं, बल्कि कड़ा प्रतिवाद दर्ज कराया जाना चाहिए। यहाँ अन्य मसलों को छोड़ सिर्फ़ रोज़गार की बातें करें, तो वर्ष 2021 में सरकारी सेवाओं में सभी स्तरों पर क़रीब 60 लाख रिक्तियाँ थीं। इसमें केंद्र सरकार के अंतर्गत नौ लाख से अधिक, पुलिस में 5.5 लाख, प्राथमिक विद्यालयों में 8.5 लाख, पीएसयू बैंकों में दो लाख से अधिक रिक्तियाँ होने का अनुमान था। लेकिन सरकार ने रोज़गार प्रदान करने को तरजीह नहीं दी। सरकार कोरोना प्रसार का तर्क दे सकती है; लेकिन तब भी चुनावों का तो निर्बाध संचालन होता रहा। वो क्यों नहीं रुके?

साथ ही सरकारी नियुक्तियों का स्वरूप भी दिनोंदिन संविदात्मक होता जा रहा है। सन् 2014 में संविदा कर्मचारी 43 फ़ीसदी थे, जिनका आँकड़ा 2018 तक 59 फ़ीसदी तक जा पहुँचा। पिछले छ: वर्षों में रेलवे में तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के 72,000 पद समाप्त कर दिये गये हैं। यही नहीं, अब एनसीआर जोन के 10,000 पदों के साथ ही देश भर के 50 फ़ीसदी ग़ैर-संरक्षा पदों को समाप्त करने की तैयारी है। अब रोज़गार से सम्बन्धित भ्रष्टाचार कों देखें। सन् 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने सपा सरकार में राज्य लोक सेवा आयोग की नियुक्तियों में होने वाले भ्रष्टाचार को ख़ूब ज़ोर-शोर से उछाला और इसकी सीबीआई जाँच कराने और दोषियों को दण्डित करने का वादा किया था। लेकिन पाँच वर्षों से अधिक समय बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला। न ही दोषियों की गिरफ़्तारियाँ हुईं, न ही धाँधली वाली नियुक्तियाँ रद्द की गयीं। बल्कि सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार ने लोकसेवा आयोग में पारदर्शिता को और कम किया है। सन् 2019 के बाद से परीक्षाओं की अन्तिम उत्तर कुंजी जारी करना रोक दिया गया है। ऐसे और भी गड़बड़झाले हैं, जिन पर एक लम्बी चर्चा की जा सकती है।

भाजपा के सिद्धांतों एवं कार्यों में बड़ा अन्तर दिखता है, जो पार्टी स्वदेशी तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नारे के साथ सत्ता में आयी वही प्राथमिक विद्यालयों में मातृभाषा को बढ़ावा देने के बजाय अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय खोलने में लगी है। सन् 2018 में प्रदेश में लगभग 5,000 अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों की शुरुआत हुई। एक तरफ़ा तो हिन्दी उद्धार की बातें चल रही हैं और दूसरी ओर प्राथमिक स्तर से बच्चों को विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा देना शुरू कर दिया है। यह विरोधाभास समझना कठिन है। सरकार का तर्क था कि अभिभावक अंग्रेजी भाषा में पढ़ाई चाहते हैं। लेकिन इसमें ग़लती माता-पिता की नहीं है। उन्हें पता है कि इस देश में सरकारी स्तर पर हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं को कितनी हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है।

इसका सबसे बेहतर उदाहरण संघ लोक सेवा आयोग है। एक समय देश के धुर देहाती क्षेत्रों के हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं में शिक्षित बच्चे इस प्रतिष्ठित परीक्षा में सफल होते थे। किन्तु आज परिस्थितियाँ एकदम विपरीत हैं। यूपीएससी 2015 और 2016 की परीक्षा में हिन्दी माध्यम वालों की सफलता-दर क़रीब 4-5 फ़ीसदी, 2017 और 2018 में 2-3 फ़ीसदी के बीच पहुँच गयी। सन् 2020 के परिणाम में चयनित हिन्दी माध्यम वालों की संख्या महज़ 25-30 के बीच थी। वहीं हिन्दी माध्यम का टॉपर को 200 से भी नीचे की रैंक पर रखा गया। इन सबकी शुरुआत सीसैट और मुख्य परीक्षा के पाठ्यक्रम में बदलाव के साथ हुई, जो आंग्ल भाषा में शिक्षित विद्यार्थियों के अनुकूल था। सन् 2014 में जब सीसैट के विरोध में परीक्षार्थी आन्दोलन कर रहे थे, तब भी नौकरशाहों एवं पत्रकारों का एक वर्ग उन्हें राष्ट्रशत्रु साबित करने में लगा था। उस आन्दोलन का हिस्सा होने के नाते मुझे याद है कि पुलिस ने अनावश्यक ही बर्बरता से छात्रों को पीटा था। कइयों पर विभिन्न धाराओं में मुक़दमे दर्ज किये गये थे; जबकि उस आन्दोलन के दौरान हमारा क़ुसूर सिर्फ़ इतना ही था कि हम सीसैट की समाप्ति और भारतीय भाषाओं के परीक्षार्थियों के विरुद्ध होने वाले अन्याय का विरोध कर रहे थे। सच्चाई यह है कि शिक्षा और भारतीय भाषाओं के विकास को प्रति उदासीन सत्ता में बैठे सम्भ्रांत वर्ग की अपने हितों के अनुकूल अंग्रेजियत के दबदबे के प्रसार में मौन सहमति है।

अब वर्तमान हिंसक प्रदर्शनों की ओर लौटें, तो दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से आन्दोलनरत युवाओं को कांग्रेस, सपा या पीएफआई का एजेंट एवं देशविरोधी बताया जा रहा है। यह तर्क कि हिंसा में गिरफ़्तार कई युवाओं की उम्र 25 के ऊपर है, अर्थात् वे सेना में भर्ती करने की आयु पार कर चुके हैं, निहायत ही मूर्खतापूर्ण हैं। सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन युवाओं का आन्दोलन माना जाता था; लेकिन उसका नेतृत्व 75 साल की आयु के जे.पी. ने किया था। जिन युवाओं के लिए अवसर सिकुड़ गये या जिनका भविष्य अधर में आ गया है, उनके माँ-बाप या भाई-बहिन अगर सड़कों पर आ जाएँ, तो आप यह गणना करेंगे कि चूँकि उनकी उम्र सेना भर्ती के योग्य नहीं है, इसलिए वे देशद्रोही है? अगर ऐसा कहें, तो इससे ज़्यादा मूर्खतापूर्ण तर्क और कोई हो ही नहीं सकता। राष्ट्रद्रोह जैसे शब्द को इतने ओछे तरीक़े से प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। किसी नेता या सरकार का विरोध राष्ट्रद्रोह नहीं हो सकता।
राष्ट्र एवं किसी व्यक्ति को समानार्थक सिद्ध करने का परिणाम यह देश आपातकाल के दौर में भुगत चुका है। अथवा यह कहने की कोशिश की जा रही हैं कि सरकार की योजनाओं की किसी योजना से जिस वर्ग का नुक़सान हो रहा हो, सिर्फ़ वही विरोध आन्दोलन में शामिल हो। अगर अग्निपथ विरोधी युवाओं को देशद्रोही कहा जा सकता है, तो अग्निवीरों को अपने ऑफिस में चौकीदार रखने जैसी असंवेदनशील बात करने वाले कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेताओं को समाजद्रोही तो कहा ही जा सकता है।

ऐसा नहीं है कि इन तर्कों को देश का आम जनमानस नहीं समझ रहा है, फिर भी वह इन आरोपों पर चुप्पी साध ले रहा है। इसकी वजह है सरकार एवं भाजपा विरोधी पक्ष का ग़ैर-ज़िम्मेदार वर्ग। देश में कई ऐसे नेता, तथाकथित बुद्धिजीवी, लेखक और पत्रकार हैं, जिन्होंने सरकार के अंधविरोध में आलोचना के लिए कई बार निर्धारित मानक भी ध्वस्त कर दिये हैं। इनमें से कई तो विदेशों में जाकर देश के ख़िलाफ़ा बोलकर उन्हें आतंरिक मसलों में हस्तक्षेप के लिए आमंत्रित कर रहे हैं।