दिलदार और दुनियादार एक सरदार

खुशवंत सिंह
खुशवंत सिंह | 1915-2014
खुशवंत सिंह
खुशवंत सिंह | 1915-2014

मैं उनके निधन पर उतना ही दुखी हूं जितना उनके जीने पर था. खुशवंत सिंह का अकारण और अतार्किक हिंदी विरोध कइयों की तरह मुझे भी सालता था. सालता इसलिए था कि उन जैसा सुपठित, सुचिंतित और देसी ठसक वाला अंग्रेजी लेखक विरल है. वरना हिंदी समेत कई जायज मुद्दों का अंधा और काना विरोध तो कई लोग करते रहते हैं.

बेबाक, बिंदास और दूसरों सहित खुद की भी खाल खींचने वाले लेखन का सॉफ्टवेयर  खुशवंत ने उर्दू लेखक सआदत हसन मंटो से लिया था. दोनों समकालीन थे. खुशवंत हिंदी-उर्दू को चाहे जितना भी कोसते रहे हों, वे उर्दू खूब पढ़ते थे, और पुरातन से लेकर आधुनिक तक कई उर्दू शायरों के अशआर उन्हें कंठस्थ थे.

खुशवंत सिंह की सबसे बड़ी खूबी उनका खिलदंड़पन था. यह विशेषता उनके लेखन और व्यक्तित्व दोनों में थी. उनमें स्वयं का उपहास उड़ाने और खुद को बेनकाब करने का अद्भुत साहस था. तभी वे निर्भीक होकर दूसरे पर टूट पड़ते थे. इसके समर्थन में मैं अपने साथ उनकी पहली और अंतिम मुलाकात का जिक्र करना चाहूंगा. हम दोनों दिल्ली में एक पार्टी किस्म के समारोह से झूमते हुए बाहर निकले. दरअसल झूम तो मैं ही रहा था, खुशवंत सिंह मुझे अपनी वजह से ही लहराते दिखे होंगे. वे अपने शराबी होने का जितना ढिंढोरा पीटते थे, स्थिति उसके ठीक उलट थी. वे नियत समय पर, नियत मात्रा में नियत ब्रांड पीते थे. खैर, मैं अपनी बुलेट मोटर साइकिल से टिहरी से दिल्ली पहुंचा था, मैंने हिलते हुए अपनी बाइक स्टार्ट करते हुए उनका आह्वान किया कि मेरे साथ बुलेट पर घूम कर अपनी शाम को और मस्त बनाएं. उन्होंने हंसते हुए हाथ जोड़ कर कहा, ‘ओ तू तो कहीं मुझे ठोक देगा मेरे बाप.’ मैंने फिर बात आगे बढ़ाई, ‘कभी टिहरी मेरे घर पर आएं या मुझे अपने घर बुलवा लें.’ इस पर वे बोले, ‘तुम्हंे अंग्रेजी नहीं आती और मुझे हिंदी. हम दोनों एक दुसरे को बोर करने के सिवा क्या करेंगे?’

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