दिखावे का बैर!

0
94

Mulayam_Singh

उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा प्रभाव रखने वाली समाजवादी पार्टी खुद को धर्मनिरपेक्ष और अल्पसंख्यकों का सबसे बड़ा हितैषी बताती है. एक समय यहां सबसे ज्यादा प्रभाव रखने वाली भारतीय जनता पार्टी को सपा धुर-सांप्रदायिक और अल्पसंख्यकों के साथ पूर्वाग्रह रखने वाली पार्टी मानती है. तहलका की खोजबीन में इस तरह के तमाम उदाहरण सामने आते हैं जो बताते हैं कि ये दोनों पार्टियां प्रदेश में कई स्तरों पर जैसे भी संभव हो एक-दूसरे का सहयोग करने को तैयार रहती हैं. यह सहयोग पार्टी की घोषित मूल विचारधारा के साथ समझौता करके भी किया जा सकता है. इस मिलीभगत का एक उदाहरण तहलका की हालिया तहकीकात में भी दिखा था. तहलका ने पिछले माह खुलासा किया था कि कैसे सपा ने भाजपा महासचिव वरुण गांधी को 2009 के लोकसभा चुनाव में दिए गए उनके भड़काऊ भाषण से संबंधित मामलों में बरी करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. खुद समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बयान देकर वरुण गांधी पर दर्ज तीनों मामले वापस लेने की बात कही थी.

हालांकि ऐसा हो नहीं सका क्योंकि जिन मुसलमानों के हित की राजनीति वे करते हैं उन्हें ही यह बात रास नहीं आई. इसके बाद उनकी पार्टी के एक नेता और उत्तर प्रदेश सरकार में खादी एवं ग्रामोद्योग मंत्री रियाज अहमद इस काम में लग गए. तहलका की तहकीकात में कुछ महत्वपूर्ण लोगों ने बताया कि रियाज अहमद ने वरुण गांधी के खिलाफ गवाही देने वाले मुसलिम गवाहों को मुकरने के लिए तैयार किया. ऐसा नहीं है कि सिर्फ सपा ही वरुण का साथ दे रही थी. 2012 के विधानसभा चुनावों के दौरान वरुण गांधी ने भी पीलीभीत से अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार सतपाल गंगवार को हराकर सपा के इन्हीं उम्मीदवार रियाज अहमद को जिताने के निर्देश दिए थे. इसकी पुष्टि करते ऑडियो टेप तहलका ने जारी किए थे. भड़काऊ भाषण से संबंधित मामलों में वरुण गांधी की रिहाई हो गई. सरकार इस मामले में वादी थी, मामला मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाने का था. इसके बावजूद खुद को मुसलमानों की हितैषी कहने वाली सपा सरकार ने आखिरी तारीख बीत जाने दी और ऊपरी अदालत में अपील नहीं की. तहलका की रिपोर्ट के बाद मचे शोर के दबाव में सरकार ने अब सेशन कोर्ट में अपील दायर की है. जीवविज्ञान का एक शब्द है सहजीवन. भिन्न-भिन्न जीव-जंतु या पेड़-पौधे अपनी जरूरतों के लिए एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं. सपा-भाजपा की आपसी निर्भरता इसी सहजीवन का आदर्श उदाहरण है. वरुण गांधी रिहाई का मामला इसे साबित करती अकेली कहानी नहीं है. तहलका की खोजबीन में इस तरह के तमाम उदाहरण सामने आए.

कहीं सपा ने भाजपा नेताओं को गैरवाजिब फायदे पहुंचाए तो कहीं भाजपा नेताओं के ऊपर दर्ज आपराधिक मामले वापस लेने की बात चली. भाजपा ने भी कई मौकों पर बड़ी दोस्ती निभाई जिसका एक उदाहरण कन्नौज लोकसभा उपचुनाव है. यहां उसने जान-बूझकर सपा के खिलाफ अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं किया. अब इसके एवज में सपा उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी के खिलाफ खुद के ही एक नेता द्वारा दर्ज मामला खत्म करवाना चाहती है. 2012 में कन्नौज के लोकसभा उपचुनाव में मुलायम सिंह यादव की बहू और अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव चुनाव मैदान में थीं. इस चुनाव की कुछ घटनाएं बेहद दिलचस्प हैं. बसपा और कांग्रेस ने इस चुनाव में कोई उम्मीदवार खड़ा ही नहीं किया था. भाजपा ने आखिरी वक्त में अपना उम्मीदवार घोषित किया जो तय समय पर नामांकन करने पहुंच ही नहीं सका. इस पर उसकी काफी छीछालेदर भी हुई थी. नतीजा यह हुआ कि डिंपल यादव कन्नौज लोकसभा से निर्विरोध जीत गईं. भाजपा यह आरोप लगाती रही कि सपा कार्यकर्ताओं ने उनके उम्मीदवार को नामांकन भरने ही नहीं दिया. लेकिन सच्चाई यह नहीं है. दरअसल भाजपा की उम्मीदवार खड़ा करने की योजना ही नहीं थी.

समाजवादी पार्टी के प्रदेश सचिव मेरठ निवासी अब्बास अहमद तहलका को बताते हैं, ‘लक्ष्मीकांत वाजपेयी जी इस समय भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं. 2012 में उन्होंने कन्नौज के लोकसभा चुनाव में हमारी नेता डिंपल जी के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था. इसलिए अब हम उनके खिलाफ मेरठ में दर्ज एक मामले को वापस ले रहे हैं.’ मगर यह मामला है क्या, पूछने पर अब्बास बताते हैं, ‘2005 में मेरठ के विक्टोरिया पार्क में अग्निकांड हो गया था. मुलायम सिंह जी उस समय मुख्यमंत्री थे. वे पीड़ितों से मिलने के लिए मेरठ आए हुए थे. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने अपने समर्थकों के साथ नेताजी का घेराव किया था. उन लोगों ने नेताजी के ऊपर हमला कर दिया. किसी तरह से सुरक्षा बल नेताजी को सुरक्षित निकाल कर ले गए. मैं भी नेताजी के साथ ही था. तब वाजपेयी जी ने अपने समर्थकों के साथ मेरे ऊपर हमला कर दिया. मुझे अस्पताल में भरती होना पड़ा. मैं मरते-मरते बचा. तब मैंने सिविल लाइन थाने में वाजपेयी जी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई थी. यह आठ साल पुरानी बात है. यही मामला अब वापस लेने की चिट्ठी मैंने एसएसपी को लिखी है.’ जब हम अब्बास अहमद से पूछते हैं कि क्या इस संबंध में उन्हें मुलायम सिंह या अखिलेश यादव से कोई निर्देश मिला है तो उनका जवाब आता है, ‘इस मामले में नेताजी से मेरी बात हुई थी. उन्होंने कहा कि राजनीति में कोई दुश्मन नहीं होता. आप मामला वापस ले लेंगे तो मुझे कोई परेशानी नहीं होगी.’

अब्बास अहमद ने छह महीने पहले ही लक्ष्मीकांत वाजपेयी के खिलाफ दर्ज मामला वापस लेने का पत्र स्थानीय प्रशासन को भेज दिया था. जल्द ही वे इस संबंध में एक और पत्र लिखने वाले हैं. अब्बास अहमद की यह स्वीकारोक्ति दोनों पार्टियों के बीच चल रहे अंदरूनी गठजोड़ की सच्चाई है. हाल ही की बात है वरिष्ठ सपा नेता आजम खान ने भाजपा विधानमंडल दल के नेता हुकुम सिंह से विधानसभा में मुखातिब होते हुए कहा, ‘हुकुम सिंह जी अब आप समाजवादी हो जाइए. कहां वहां फंसे हैं.’ हालांकि आजम खान ने तो यह बात मजाक में कही थी मगर हुकुम सिंह पर सपा मेहरबान है इसका भी एक उदाहरण है. हुकुम सिंह मुजफ्फरनगर जिले से आते हैं. वे अपने जिले के पुलिसवालों की मनमानी से परेशान चल रहे थे सो उन्होंने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से इस बात की शिकायत कर दी. इस शिकायत के जवाब में मुख्यमंत्री ने अगले ही दिन जिले के तीन थानाध्यक्षों का ट्रांसफर नहीं किया बल्कि उन्हें लाइन हाजिर कर दिया. काबिले गौर तथ्य यह भी है कि ये सारे के सारे थानाध्यक्ष यादव जाति के थे. मेलभाव की इस स्थिति का बयान एक पुराने भाजपा कार्यकर्ता बेहद दिलचस्प अंदाज में करते हैं, ‘पार्टी तो एक दशक से सत्ता से बाहर है, लेकिन जैसे ही सपा की सरकार बनती है प्रदेश के सारे बड़े भाजपा नेताओं की आंख में चमक आ जाती है. उनमें यह साबित करने की होड़ लग जाती है कि वे ही सपा के सबसे बड़े पिछलग्गू हैं.’ यह तंबुओं में शिविर लगाकर अधिवेशन करने वाली पार्टी का सुविधाभोगी चेहरा है.

जो बात भाजपा नेता नाम छिपाने की शर्त पर बताते हैं वह कई और रूपों में देखने को मिल जाती है. मसलन कलराज मिश्र पहली बार विधायक बने हैं, लेकिन सरकार ने उन्हें गौतम पल्ली के उस इलाके में शानदार बंगला दे दिया है जहां सिर्फ वरिष्ठ मंत्रियों और नौकशाहों के लिए बंगले देने का प्रावधान है. मुलायम सिंह के पुराने साथी और वर्तमान शत्रु के रूप में अवतरित हुए बेनी प्रसाद वर्मा ने भी हाल ही में इसी तरह का एक रहस्य उजागर किया था. उनके मुताबिक बाबरी मस्जिद के विध्वंस में मुलायम सिंह की भाजपा के साथ मिलीभगत थी. बेनी प्रसाद वर्मा से इस आरोप का आधार पूछने पर वे एक कहानी सुनाते हैं, ’30 अक्टूबर 1990 को कारसेवा वाले दिन मैं बाराबंकी में था. दोपहर बारह बजे मुलायम सिंह यादव ने मुझे फोन करके बताया कि उन लोगों ने तो मस्जिद गिरा दी है. तो मैंने पूछा अब क्या करें. इस पर मुलायम बोले कि अब जो होना था सो हो गया. देखते हैं आगे क्या हो सकता है. दस मिनट बाद मुख्य सचिव राज भार्गव का फोन आया कि साहब मसजिद सुरक्षित है. कुछ कारसेवक उग्र हो रहे हैं. लेकिन मस्जिद को कोई नुकसान नहीं हुआ है. बाद में जब कारसेवक और उग्र हो गए तो एसपी फैजाबाद ने गोली चलवा दी. तब मेरी समझ में आया कि मुलायम और आडवाणी के बीच मिलीभगत थी. वरना मुख्यमंत्री को इतनी गलत सूचना कैसे मिलती. इसका एक ही अर्थ था कि मुलायम सिंह को यह बात पता थी कि मसजिद गिराई जानी है. इसी आधार पर उन्होंने मुझे फोन किया था.’

अपनी बात के समर्थन में बेनी प्रसाद वर्मा आगे एक और वाकए का जिक्र करते हुए कहते हैं, ‘1999 में वाजपेयी जी की सरकार एक वोट से गिर गई थी. सोनिया गांधी वामपंथियों और सपा के समर्थन की चिट्ठी लेकर राष्ट्रपति के पास गई थीं. उसी रात आडवाणी ने दिल्ली की कैलाश कॉलोनी में मुलायम सिंह के साथ बैठक की और अगले दिन मुलायम ने सोनिया को समर्थन नहीं देने की घोषणा कर दी. इस बैठक का जिक्र खुद आडवाणी ने अपनी किताब माइ कंट्री माइ लाइफ में किया है. ये दोनों पार्टियां एक-दूसरे से मिली हुई हैं. इनकी कोई विचारधारा नहीं है.’ अतीत की कुछ और भी घटनाएं बेनी प्रसाद वर्मा के आरोपों की पुष्टि करती हैं. जैसे 2003 में बसपा-भाजपा गठबंधन टूट जाने के बाद अगले तीन सालों तक मुलायम सिंह की सरकार भाजपा की बैसाखी पर टिकी रही. 145 विधायकों वाली सपा को भाजपा ने सदन से वॉकआउट करके बहुमत सिद्ध करने का मौका दिया. बदले में मुलायम सिंह यादव ने भाजपा नेता केशरीनाथ त्रिपाठी को विधानसभा का अध्यक्ष बनाए रखा. सपा के एक महासचिव नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘राजनीति में चीजें इतनी सीधी-सादी नहीं होतीं. राजनीतिक हित के लिए दोनों दल छोट-मोटे समझौते करते रहते हैं. हमारे नेताजी बड़े दिल के आदमी है.

तमाम किस्से है जब उन्होंने अपने राजनीतिक दुश्मनों को माफ कर दिया.’ ­उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण सूबे में सहजीवन का यह फार्मूला दोनों ही पार्टियों के लिए महत्वपूर्ण है. भाजपा नेताओं को पता है कि प्रदेश में उनके लिए कोई बड़ी उम्मीद नहीं बची है. ले-देकर यही तीन-पांच वाली राजनीति उन्हें यहां प्रासंगिक बनाए हुए है. उधर, जानकारों की मानें तो मुलायम सिंह यादव और सपा के लिए इस खेल के मायने कहीं ज्यादा बड़े हैं. उनकी पार्टी क्षेत्रीय है. प्रदेश के बाहर उसकी कोई हैसियत नहीं है. यदि प्रदेश में कांग्रेस घुसपैठ करने में कामयाब होती है तो सपा के लिए अस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो सकता है. देखा जाए तो कांग्रेस और सपा की नीतियों और वोटबैंक में कोई बड़ा अंतर नहीं है. मुसलमान और पिछड़ा माइनस यादव की राजनीति कांग्रेस भी करती है. यदि भाजपा थोड़ी सी मजबूत होती है तो बदले में मुसलमानों का ध्रुवीकरण सपा के पक्ष में आसानी से हो सकता है. बीते कुछ सालों में भाजपा-सपा ने मिलकर कांग्रेस को यूपी से बाहर रखने का एक यह भी फॉर्मूला ईजाद किया है जो कि सहजीवन का आदर्श उदाहरण है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here