दागियों से दोस्ती

उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राज्य के बाहुवली नेता मुख्तार अंसारी और अभय सिंह के साथ
उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राज्य के बाहुवली नेता मुख्तार अंसारी और अभय सिंह के साथ
उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राज्य के बाहुवली नेता मुख्तार अंसारी और अभय सिंह के साथ
उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राज्य के बाहुवली नेता मुख्तार अंसारी और अभय सिंह के साथ

उत्तर प्रदेश में पूर्ववर्ती बसपा सरकार में मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा की पत्नी शिवकन्या व भाई शिवसरन कुशवाहा ने हाल ही में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया. कुशवाहा नेशनल रूरल हेल्थ मिशन में हुए सैकड़ों करोड़ रुपये के घोटाले के मुख्य आरोपी हैं और फिलहाल गाजियाबाद की डासना जेल में बंद हैं. कुशवाहा परिवार की ताजपोशी गुपचुप तरीके से नहीं बल्कि सपा के प्रदेश मुख्यालय में कार्यक्रम आयोजित करके की गई. इस पर विपक्ष ने पार्टी पर हमला बोल दिया लेकिन चुनावी साल में जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए सपा ने विपक्ष के हमलों को नजरंदाज कर दिया. दरअसल लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सपा ही नहीं बल्कि दूसरी पार्टियां भी दागी व आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को अपने पास बैठाने से परहेज नहीं कर रही हैं.

सबसे पहले बात सत्तासीन समाजवादी पार्टी की. करीब डेढ़ साल पहले 2012 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव हुए थे. उस समय वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की हैसियत से बाहुबली डीपी यादव सहित कई ऐसे लोगों का टिकट यह कहते हुए काट दिया था कि सपा में दागी व आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के लिए कोई जगह नहीं है. लेकिन डेढ़ साल का समय बीतते-बीतते ही लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी सब भूल गई. अब पार्टी में दागी और आपराधिक छवि वाले लोगों का स्वागत है. जब ऐसे लोगों ने सत्ता का दामन थामा है तो उनके उपर सत्ता का करम होना भी लाजिमी है. जेल में बंद बाबू सिंह कुशवाहा को ही लीजिए.

कुशवाहा की पत्नी शिवकन्या व भाई शिवसरन ने जैसे ही सत्ता का दामन थामा वैसे ही जेल प्रशासन ने उन्हें गाजियाबाद की डासना जेल से बाहर निकालकर उन्हें उपचार के लिए लखनऊ के पीजीआई में भर्ती करवा दिया. वे कार्डियालोजी विभाग के प्राइवेट वार्ड में भर्ती हुए. डाक्टरों ने जांच के बाद उनको स्वस्थ बताया और उन्हें अस्पताल छुट्टी दे दी. लेकिन कुशवाहा ने अपना प्राइवेट वार्ड नहीं छोड़ा. सूत्र बताते हैं कि पीजीआई के रवैये को देखते हुए शासन की ओर से मामले में हस्तक्षेप किया गया. कुछ घंटे में ही स्थितियां फिर से कुशवाहा के पक्ष में हो गईं और डाक्टरों ने उन्हें कार्डियालॉजी से यूरोलॉजी विभाग में कर दिया. सपा के कई नेता पीजीआई में कुशवाहा से मिलने भी गए. परिवार की सत्ता में घुसपैठ का लाभ यहीं नहीं थमा. सरकार की ओर से कुशवाहा के खिलाफ कथित घोटालों की जांच का जो शिकंजा लगातार कसता जा रहा था वह भी थोड़ा कमजोर हुआ है. पुलिस विभाग के एक बड़े अधिकारी बताते हैं, ‘कुशवाहा के खिलाफ झांसी व इलाहाबाद में दर्ज मामलों की जांच विजिलेंस से कराए जाने की मांग की गई थी जिसे अब वापस लेकर उन्हें कुछ राहत दी गई है.’

बसपा से निकाले जाने के बाद विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जब कुशवाहा ने भाजपा का दामन थामा तो इसी सपा ने काफी शोर-शराबा करते हुए इसे बड़ी डील करार दिया था. आखिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि उसी कुशवाहा के परिजनों को सपा ने अपना दामन ही नहीं पकड़ाया बल्कि बाबू सिंह की पत्नी शिवकन्या को पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसी जिले से टिकट देने की बात तक अंदर खाने चल रही है? दरअसल यह सारी कवायद एक दिन की नहीं है. तीन-चार माह पूर्व सपा के एक बड़े नेता ने डासना जेल जाकर कुशवाहा से भेंट की थी. उसके बाद से ही ये समीकरण बनने लगे थे. सपा के बड़े नेता की कुशवाहा से मुलाकात की बात जेल प्रशासन ने भी गोपनीय रखी. सवाल उठता है कि जब सपा दागियों व आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से चुनाव में दूरी की बात करती आ रही थी तो अचानक ऐसी कौन सी मजबूरी बन गई कि बाबू सिंह कुशवाहा के परिवार को पार्टी में शामिल किया गया. इस पर सपा के ही एक नेता कहते हैं, ‘जैसे बसपा ब्राह्मणों और दलितों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रही है उसी तरह सपा भी अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्ग के वोट बैंक में अपनी पैठ मजबूत करने के इरादे से ऐसा कर रही है. बाबू सिंह कुशवाहा अभी जेल में हैं, ऐसे में सपा के टिकट पर यदि उनकी पत्नी किसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ती हैं तो कुशवाहा की सिंपैथी में एक सीट निकलना कोई बड़ी बात नहीं है. क्योंकि लोकसभा चुनाव में एक-एक सीट काफी मायने रखती है.’

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