दर दर भटकते रोहिंग्या शरणार्थी

0
423

rohingya-1

मानवीयता के आधार पर दुनिया म्यांमार के रोहिंग्या शरणार्थियों के साथ है। भारत में भाजपा सांसद वरूण गांधी ने भी उन्हें सहयोग देने की बात की है। हालांकि भारत सरकार अब भी उन्हें शरण देने से हिचक रही है। बांग्लादेश में रोहिंग्या शरणार्थियों की संख्या चार लाख से भी कहीं ज्यादा है। रोहिंग्या लोगों की हिफाजत का दावा करने वाले उनके छापामार संगठनों की हिंसा का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं लेकिन भूख, बीमारी और बेघर बूढ़े-बच्चे-लड़कियां बेहद लाचार और परेशान हैं।

तकरीबन 10 लाख रोहिंग्या म्यांमार में रहते थे,लेकिन वहां की सरकार ने उनके साथ भेदभाव की नीति अपनाई। उनके ऊपर ढेरों पाबंदियां लगाई। जिसके विरोध में रोहिंग्या लोगों ने अपना एक भूमिगत संगठन भी बनाया। लेकिन हथियारबंद सेनाओं के सामने वह टिका नहीं। इस दमन में सबसे ज़्यादा तकलीफें बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को हुई। गरीब रोहिंग्या इस दमन का शिकार होने लगे। वे सीमा पार कर बांग्लादेश और भारत में आने लगे।

आज हालात येे हंै कि तुर्की, ईरान, सऊदी अरब, खुल कर रोहिंग्या शरणार्थियों के पक्ष में आ गए हैं। वे बांग्लादेश सरकार की रसद, धन और अन्य वस्तुओं से सहयोग कर रहे हैं। भारत सरकार ने भी बांग्लादेश सरकार के अनुरोध पर एक विमान से रसद भिजवाई है। भारत सरकार ने फैसला लिया है कि अब रोहिंग्या शरणार्थियों को देश में नही आने देगें क्योंकि इससे देश की सुरक्षा को खतरा है। हालांकि देश में रह रहे मुसलिम नेता, संगठन बड़ी-बड़ी रैलियां निकाल कर सरकार से अनुरोध कर रहे हैं कि इन्हें शरण दी जाए। भारत सरकार को अंदेशा है कि शरणार्थियों में पाक घुसपैठिए और आईएसआई के एजेंट भी हो सकते हैं, इसलिए ऐसा जोखिम नहीं उठाया जा सकता । उधर संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव ने भारत के इस रवैए की निंदा की है।

रोहिंग्या दुनिया भर में सबसे बड़ा जातीय समुदाय है जो मुसलमान बिरादरी की ही एक धारा है। हालांकि इनमें रोहिंग्या हिंदू परिवार भी हैं। उनकी तादाद कुछ कम है। म्यांमार में उन्हें बाग्लादेश से आए शरणार्थी कहा जाता है। तकरीबन दस लाख की आबादी वाले रोहिंग्या आज म्यांमार से बाहर किए जा रहे हैं। भारत उन्हें लेने को तैयार नहीं है। बांग्लादेश में ये चार लाख से ऊपर हो चुके हैं।

रोहिंग्या लोगों का दावा है कि 15 वीं शताब्दी में वे बर्मा (म्यांमार) के राखिन क्षेत्र मेें बसाए गए थे, लेकिन वहां का शासक वर्ग ( जो बौद्ध है) उन्हीं लोगों को नागरिक का दर्जा देता है जो अपनी नागरिकता का सबूत 1823 के पहले दे सकें। यह ऐसा नियम है जिसे शायद ही कोई प्रमाणित कर पाए। सन 1823 को म्यांमार का शासक वर्ग ‘कट ऑफÓ वर्ष मानता है जिसके पीछे तर्क है कि तभी से लोग ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के विस्तारवादी योजना में आए होंगे, क्योंकि इसके बाद तब के राजा से 1826 में युद्ध हुआ जिसमें उसकी हार हुई।

बौद्ध हमेशा रोहिंग्या लोगों को बाहर से आया हुआ ही मानते हंै। हालांकि वहां के समाज सुधारक राजनीतिकों ने कई बार यह कोशिश की इन्हें देश की मुख्यधारा से जोड़ा जाए। एक बार तो उन्हें प्रतिनिधित्व भी देने की कोशिश हुई थी जिससे देश में उनकी मौजूदगी को मान्यता मिले। लेकिन तभी 2012 में एक बौद्ध महिला के साथ दुष्कर्म की वारदात हो गई। इस मामले में बताया गया कि दुष्कर्म में कथित तौर पर रोंिहंग्या समुदाय के लोगों कर हाथ है। इस मामले ने ऐसा तूल पकड़ा कि तब हुई व्यापक हिंसा के चलते पांच लाख रोहिंग्या शरणर्थियों ने बांग्लादेश में शरण ली। कई भारतीय सीमाओं पर रहे। कई साल बाद ज़्यादातर रोहिंग्या वापस लौट गए। लेकिन कुछ टिके रहे।

इसके बाद फिर हिंसा का व्यापक दौर 2015 में शुरू हुआ जब उन्हें लोकतांत्रिक जनमत में हिस्सेदारी नहीं मिली । यह देश का पहला चुनाव था। इससे विस्थापन फिर शुरू हुआ और उनकी अंतरराष्ट्रीय समुदाय में ‘बोट पीपुलÓ के तौर पर पहचान बनी।

इस हिंसा में म्यांमार की सेना ने भी बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने इन लोगों पर अनेक तरह की बंदिशें लगाई और सताना शुरू किया। इनकी आबादी पर बम धमाके और शारीरिक – मानसिक तनाव रोजमर्रा का दस्तूर बन गया। यह सब उन्हें म्यांमार से भगाने के लिए ही किया गया। फर्जी खबरों और अफवाहों का जबरदस्त सहारा लिया गया। इस समुदाय के लोगों पर शादी,परिवार नियोजन, रोजगार, शिक्षा, धार्मिक सहिष्णुता और आने-जाने की आजादी छीन ली गई। ज़्यादातर रोहिंग्या बेहद दारिद्रय और बेहद बुरी हालत में रहते हैं।

इस दशा को देख कर रोहिंग्या समुदाय के ही कुछ युवाओं ने हथियार हाथ में लिए जिससे समुदास की रक्षा हो और हालात कुछ बेहतर हों। लेकिन युवाओं के इस सपने को आतंकवाद की श्रेणी में म्यांमार शासन ने माना और हथियारबंद बौद्ध संगठनों और सेना ने रोहिंग्या समुदाय पर हमला आगजनी घर पकड़ और यातनाओं के जरिए उनकी कमर तोड़ दी।

म्यांमार की नेता को शांति का नोबल पुरस्कार मिला है। विश्व समुदाय ने इस व्यापक बर्बर हत्या कांड पर मांग की कि उनसे शांति का नोबल पुरस्कार वापस ले लिया जाए क्योंकि सत्ता में आज उनकी भागीदारी है पर वे न तो बौद्धों को रोक पा रही हंै और न सेना को। बड़ी तादाद में रोंिहंग्या शरणार्थी दूसरे देशों की सीमाओं पर शरण लेने के लिए बाध्य हैं।