ताजपोशी के पीछे

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आलाकमान, प्रत्याशियों और उनके राजनीतिक गुरुओं के बीच कई दौर की वार्ताएं हुईं. इस बीच नाम वापसी का समय भी बीत गया और पर्यवेक्षक गोयल की बीमारी का बहाना बनाकर नाम वापसी की समयसीमा बढ़ा दी गई. सूत्रों के मुताबिक मान-मनौवल और आलाकमान की घुड़की के बाद दोनों प्रत्याशियों ने नाम वापस ले लिया. फिर लगभग तय हो गया था कि उत्तराखंड भाजपा के अगले अध्यक्ष की पारी भगत सिंह कोश्यारी खेलेंगे क्योंकि दिल्ली में भाजपा की कोर कमेटी उन पर मुहर लगा चुकी थी. हालांकि चतुर कोश्यारी ने चुनाव के दौरान और उसके बाद कभी भी प्रदेश अध्यक्ष बनने की इच्छा खुलकर जाहिर नहीं की थी, लेकिन उनके एक सहयोगी के शब्दों में वे इस पद के लिए चुनाव लड़ने के बजाय सर्वानुमति के रूप में आना चाहते थे.

इस बीच गडकरी के बदले राजनाथ सिंह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हो गए. कोश्यारी को राजनाथ का समर्थक माना जाता है. लेकिन बदली परिस्थितियों में भी तीरथ को समर्थन दे रही खंडूड़ी, निशंक और चुफाल की तिकड़ी ने हार नहीं मानी. सूत्रों के मुताबिक दिल्ली में आलाकमान के सामने शक्ति प्रदर्शन का दौर चला. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष चुफाल कहते हैं, ‘जीत लोकतंत्र की हुई और अधिक मतदाताओं के समर्थन वाले तीरथ को आलाकमान ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनोनीत कर दिया.

इस चुनाव में भाजपा के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के अक्सर बनने वाले गठबंधन ने फिर नया रूप ले लिया. कोश्यारी, खंडूड़ी और निशंक अपनी राजनीतिक मजबूरियों और नफे-नुकसान के हिसाब से कई बार गठबंधन बना चुके हैं. कई मौकों पर इन तीनों में से कोई दो हाथ मिलाकर तीसरे को धराशायी कर चुके हैं. पिछले विधानसभा चुनावों में कोश्यारी और खंडूड़ी एक हो गए थे. लाख कोशिशों के बावजूद तब राजनीतिक रूप से निस्तेज से हो चुके निशंक अपने इक्का-दुक्का समर्थकों को ही टिकट दिला पाए थे. उनके प्रभाव वाले गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र में कोश्यारी की मदद से खंडूड़ी ने सारे टिकट बांटे थे. चुनाव के नतीजे आने और खंडूड़ी के चुनाव हारने पर भितरघात के आरोप में भाजपा से जिन कई नेताओं का निष्कासन किया गया उनमें भी निशंक समर्थक अधिक थे. लेकिन चुनाव के बाद एक-दूसरे को फूटी आंख से न देखने वाले निशंक और खंडूड़ी पिछले सारे राग-द्वेष  भुलाकर कोश्यारी के खिलाफ एक हो गए.

जल्द ही राज्य में नगर पालिकाओं और उसके बाद पंचायत चुनाव होने हैं. मौजूदा हालात देखें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा बढ़त में दिख रही है, इसलिए हर खेमा अपने अंक बढ़ाना चाहता है. जानकार बताते हैं कि वैसे इन तीनों क्षत्रपों का लक्ष्य 2017 का विधानसभा चुनाव है.

सारे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा राजनीतिक चतुराई निशंक ने दिखाई. राजनीतिक और पारिवारिक कारणों के चलते भाजपा में अलग-थलग दिख रहे निशंक फिर राजनीति के केंद्र में आ गए. पिछली बार खंडूड़ी को मुख्यमंत्री पद से हटाने का अभियान शुरू करने के बाद वे ऐन मौके पर खंडूड़ी से मिलकर उनकी ही मदद से सीएम बनने में सफल हो गए थे. जानकारों के मुताबिक 2017 तक काफी उम्रदराज हो चुके खंडूड़ी से अधिक भाजपा नेताओं को उनमें ही संभावना नजर आएगी.

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