टेस्ट क्रिकेट को नया जीवन देने की कोशिश

हाल के वर्षों में कॉरपोरेट ने एक दिवसीय और 20-ट्वेंटी क्रिकेट को कुछ नये ही शिखर पर पहुँचा दिया है। इस चकाचौंध ने क्रिकेट की आत्मा कहीं जाने वाली टेस्ट क्रिकेट को तो मानो खत्म ही कर दिया और क्रिकेट का यह फॉर्मेट दर्शकों के लिए तरस गया। लेकिन सौरव गांगुली के बीसीसीआई अध्यक्ष बनने के बाद पिंक बाल और दिन-रात टेस्ट मैच ने इस फॉर्मेट के प्रति दर्शकों को फिर स्टेडियम की तरफ खींचा है। तो क्या टेस्ट क्रिकेट फिर दर्शकों का प्रिय फॉर्मेट बन पायेगा?

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करीब 142 साल पहले जब ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच 1877 में क्रिकेट इतिहास का पहला टेस्ट मैच हुआ था, तब लोग बिना स्टेडियम जैसी सुविधाएँ होते हुए भी खेल देखने बड़ी संख्या में आते थे। इसके बहुत साल बाद क्रिकेट में एक दिवसीय क्रिकेट आयी और फिर 20-ट्वेंटी। इसने टेस्ट क्रिकेट को मानो खत्म ही कर दिया। दर्शक एक दिवसीय और 20-ट्वेंटी की तरफ मुड़ गया और टेस्ट क्रिकेट दर्शकों के लिए तरस गयी। लेकिन सौरव गांगुली के बीसीसीआई अध्यक्ष बनते ही पिंक गेंद और खासकर डे-नाईट टेस्ट क्या शुरू हुआ, टेस्ट क्रिकेट के मैदान में फिर बहार आ गयी।

पिछले वर्षों में टेस्ट मैच के दौरान जिन मैदानों पर गिने-चुने दर्शक ही दिखते थे, बांग्लादेश के िखलाफ कोलकाता में पहले डे-नाईट टेस्ट मैच के पहले ही दिन स्टेडियम में तकरीबन 60,000 दर्शक पहुँच गये। यह किसी करिश्मे से कम नहीं। दिग्गज क्रिकेट िखलाड़ी राहुल द्रविड़ भी इससे बहुत उत्साहित दिखे। द्रविड़ ने कहा कि मैं बहुत खुश हूँ। इसने मेरी कुछ पुरानी यादें ताज़ा कर दी हैं। जब आपके सामने 45-50 हज़ार दर्शक होते हैं, तो आपको शानदार लगता है। इस तरह की भीड़ देखना अच्छा लगता है। इससे ज़्यादा आप और क्या चाह सकते हो? उम्मीद है कि हम ऐसा लगातार करते रहें।

क्रिकेट की माँ कहे जाने वाले टेस्ट क्रिकेट के दिन क्या अब सचमुच बहुरेंगे? भी कहना कठिन है; क्योंकि अभी तक डे-नाईट क्रिकेट सीमित रूप में ही सामने आया है। वैसे सौरव गांगुली हमेशा से पिंक बॉल और क्रिकेट में डे-नाईट क्रिकेट की वकालत करते रहे थे। जब 2016-17 में गांगुली तकनीकी समिति के सदस्य थे, तब उन्होंने घरेलू क्रिकेट में भी पिंक बॉल के उपयोग की सिफारिश की थी। साथ ही  गांगुली ने दिन-रात के मैच की वकालत भी की थी।

गांगुली ने पहले दिन-रात टेस्ट मैच करवाया भी अपने गृह मैदान कोलकाता में। जिसे फुटबाल और क्रिकेट दोनों का मक्का कहा जाता है। गांगुली वहाँ बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हैं, लिहाज़ा उनके सम्मान के लिए भी दर्शक मैच देखने आये होंगे। लिहाज़ा टेस्ट क्रिकेट के लिए मैदानों में दर्शकों को खींचना अभी भी एक बड़ी चुनौती होगी। हाँ, एक गम्भीर कोशिश पिंक बाल और दिन-रात की टेस्ट क्रिकेट से हो ज़रूर गयी है और दर्शकों ने इसे बहुत बेहतर रिस्पॉन्स भी दिया है।

आज दुनिया में क्रिकेट के जो दिग्गज हैं, उनमें से ज़्यादातर टेस्ट क्रिकेट की उपज हैं। आज भी क्रिकेट के तकनीकी रूप से बहुत मज़बूत िखलाड़ी टेस्ट क्रिकेट को ही क्रिकेट की माँ मानते हैं। लेकिन टेस्ट क्रिकेट के प्रति दर्शकों की उदासीनता से इसे बहुत नुक्सान हुआ है। कॉरपोरेट ने भी एक दिवसीय और 20-ट्वेंटी को ही प्रोत्साहित किया है। दर्शकों को क्रिकेट के इन नये फॉर्मेट में खींचने में कॉरपोरेट का बड़ा रोल रहा है।

सौरव गांगुली क्रिकेट में बतौर कप्तान भी प्रयोगधर्मी रहे हैं और जब वे बीसीसीआई की तकनीति समिति के सदस्य थे, तब भी वे कुछ नया करने के पक्ष में रहे थे। अब तो बीसीसीआई के अध्यक्ष बन गये हैं, तो बहुत-सी शक्तियाँ उनके हाथ में हैं और वे कई बेहतर ची•ों करने की स्थिति में हैं, जिन्हें वे अभी तक सोचते रहे हैं।

दुनिया के तमाम क्रिकेट दिग्गज टेस्ट क्रिकेट के प्रति दर्शकों की रुचि काम होने के प्रति चिंतित दिखते रहे हैं। ऐसे भी मौके आये, जब यह कहा गया कि टेस्ट क्रिकेट को सीमित कर देना चाहिए। यह भी कहा गया कि टेस्ट मैच के प्रति दर्शकों रुचि जगाने के लिए सीमित ओवर्स की दो-दो पारियाँ करवायी जाएँ। लेकिन बहुत से लोग इसके िखलाफ रहे और उनका कहना रहा है कि इससे तो टेस्ट क्रिकेट महज़ एक मज़ाक बन कर रह जाएगी और उसकी आत्मा तो मर ही जाएगी।

हो सकता है कि टेस्ट क्रिकेट को लोकप्रिय करने के लिए गांगुली कुछ और लुभावनी योजनाएँ सामने लेकर आएँ। आईसीसी ने भी टेस्ट क्रिकेट को जीवित रखने के लिए इसका विश्व कप शुरू किया है, जिसमें हरेक मैच के नतीजे के आधार पर देश को अंक दिये जाते हैं। िफलहाल भारत ही इन अंकों के आधार पर सबसे आगे चल रहा है।

एक दिवसीय और 20-ट्वेंटी ऐसी ही दर्शकों के प्रिय फॉर्मेट नहीं हो गये। एक तो जल्दी नतीजा, दूसरे कॉरपोरेट के हाथ में इन फॉर्मेट की कमान का आ जाना। कॉरपोरेट ने क्रिकेट को एक तरह का चकाचौंध वाला तमाशा बना दिया। रंगीन ड्रेस, चौक्कों-छक्कों पर मैदान के एक कोने में चीयर गल्र्स, दर्शकों को टी-शट्र्स बाँटना, सफेद गेंद का प्रयोग वगैरह-वगैरह। इसके विपरीत टेस्ट क्रिकेट के लिए ऐसा कुछ नहीं किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि एक दिवसीय और 20-ट्वेंटी की चकाचौंध के आगे टेस्ट क्रिकेट नीरस-सी दिखने लगी। धीरे-धीरे दर्शक टेस्ट मैदानों से दूर होते गये। गांगुली के बीसीसीआई का अध्यक्ष बनने के बाद बोर्ड का मानना है कि दिन-रात का टेस्ट मैच खेल के सबसे बड़े प्रारूप को उसकी खोयी हुई पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाएगा। बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड का भी इस मैच को सफल करने में योगदान रहा, क्योंकि उसने बहुत कम समय के बावजूद इस मैच के लिए हामी भरी। गांगुली का कहना है कि दिन-रात का टेस्ट मैच एक बहुत बड़ा कदम है और हमारा मानना है कि यह दर्शकों और युवा बच्चों को स्टेडियम तक लेकर आयेगा। मैं बेहद गर्व महसूस कर रहा हूँ कि ईडन गार्डन भारत में हुए पहले दिन-रात के टेस्ट मैच में इतनी बड़ी संख्या में दर्शक आये। गांगुली ने कहा कि यह भारतीय क्रिकेट में एक विशेष चीज़ की शुरुआत है। हम इस प्रारूप को फिर लोकप्रिय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। भारत और बांग्लादेश के बीच हुए ऐतिहासिक डे-नाईट टेस्ट मैच में कुछ ऐसी ची•ों देखने को मिलीं, जो अभी तक आईपीएल, एक दिवसीय और 20-ट्वेंटी में ही देखने को मिलती थी। तमाम दिग्गज कपिल देव, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ जैसे कई-कई दिग्गज छोटे वाहन मैं बैठकर मैदान के चक्कर लगा रहे थे और दर्शक तालियाँ बजा रहे थे। वैसे यहाँ पिंक गेंद को लेकर कुछ सवाल भी उठे हैं। दिग्गज द्रविड़ को लगता है कि लाल गेंद से खेले जाने वाले दिन के टेस्ट मैच में सुबह का सत्र बल्लेबाज़ों के लिए काफी मुश्किल होता है, वैसा ही गुलाबी गेंद से शाम का सत्र हो सकता है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेशी बल्लेबाज़ पहले दो घंटे संघर्ष करते हुए दिखाई दिये। टीम पहली पारी में 106 रन पर ही सिमट गयी। पहले (लाल गेंद) सुबह के सत्र में नई गेंद का प्रभाव होता था, जबकि अब आपके पास शाम के सत्र में है। बीसीसीआई ने 2015-16 के सीजन में दिलीप ट्रॉफी में पिंक गेंद का इस्तेमाल किया था। इसने दर्शकों को मैदान की तरफ खींचा भी। लेकिन कुछ क्रिकेटरों के पिंक गेंद को लेकर दिये बयान भी गौर करने लायक हैं। भारत में औंस एक बड़ा फैक्टर रहा है। इसकी वजह से ज़्यादातर बार दूसरी गेंदबाज़ी करने वाली टीम को भुगतना पड़ता है। गेंद सॉफ्ट होती जाती है और गेंदबाजों के लिए इसे सँभालना मुश्किल होता है। पिंक वॉल औंस में ज़्यादा खराब होती है। क्रिकेटर दिनेश कार्तिक कहते हैं कि पिंक गेंद को रात में ओस के समय सँभालना काफी मुश्किल हो जाता है।

चाइनामैन गेंदबाज़ कुलदीप यादव को भी पिंक गेंद के टर्न नहीं होने की शिकायत है। वे कहते हैं कि ये गेंद टर्न और रिवर्स स्विंग नहीं होगी, तो भारतीय उपमहाद्वीप वाला टेस्ट क्रिकेट के अंदाज़ धीरे-धीरे खत्म होता जाएगा। चेतेश्वर पुजारा का कहना है कि इस गेंद की ग्रिप को पकड़ पाना काफी मुश्किल है। स्पिनर्स की ग्रिप समझ नहीं आती है, जिससे परेशानी बढ़ जाती है। इसके बावजूद दिन-रात टेस्ट क्रिकेट ने दर्शकों को अपनी तरफ खींचा है। यह अच्छी शुरुआत है। शायद इसे देखकर दिग्गज डॉन ब्रैडमैन की आत्मा भी ऊपर कहीं सुकून महसूस कर रही होगी।

टेस्ट मैचों के वेन्यू का विस्तार ज़रूरी

दिन-रात्रि के मैच की शुरुआत सकारात्मक तरीके से हुई है। दर्शकों ने मैदान पर आकर इसे सफल बनाया है। लेकिन आने वाले समय में गांगुली की अध्यक्षता में टेस्ट मैचों के मैदानों का विस्तार हो सकता है। यह भी सही है कि सिर्फ पिंक बाल देखने दर्शक मैदान में नहीं आएँगे। टेस्ट क्रिकेट को छोटे शहरों तक ले जाना होगा। उसमें एक दिवसीय और 20-ट्वेंटी जैसे आकर्षण भी जोडऩे होंगे।

दिग्गज स्पिनर हरभजन सिंह का भी मानना है कि महज़ पिंक गेंद से टेस्ट मैच खेलने से फर्क  नहीं पड़ेगा। हरभजन कहते हैं कि सिर्फ गेंद का रंग बदलने से बात नहीं बनेगी। दर्शकों को क्रिकेट के बड़े फॉर्मेट को देखने मैदान पर लाने के लिए आपको बहुत कुछ करना होगा। मैं समझता हूँ कि छोटे शहरों में टेस्ट क्रिकेट करानी चाहिए। वहाँ के लोग क्रिकेट लेजेंड्स को पास से देख नहीं पाते। पंजाब के अमृतसर में मैच होता है, तो कहीं ज़्यादा दर्शक आपको मैदान में दिखेंगे।

अभी तक देखा जाए, तो टेस्ट क्रिकेट पुराने और परम्परागत मैदानों पर होती रही है। नये मैदानों को खोजने का प्रयोग नहीं हुआ। धर्मशाला और रांची को छोड़ दिया जाए, तो कुछ ज़्यादा नहीं हुआ है।

कैरी पैकर ने बदला क्रिकेट

यह 1976 की बात है। ऑस्ट्रेलिया के चैनल-9 के प्रमुख और व्यवसायी कैरी पैकर अपने लिए मैचों के प्रसारण के अधिकार चाहते थे; लेकिन ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड (एसीबी) ने इससे इन्कार कर दिया। कैरी पैकर इससे इतने खफा हुए कि उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड को सबक सिखाने की ठान ली। और जो उन्होंने किया उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। उन्होंने क्रिकेट का समांतर ऐसा ढाँचा खड़ा कर दिया, जिसने पूरी क्रिकेट की सूरत ही बदल दी। इसे कैरी पैकर सर्कस के नाम से भी जाना जाता है। पैसे के बल पर कैरी पैकर ने दुनिया-भर के नाम क्रिकेटरों के लिए इतने लुभावने प्रस्ताव पेश किये कि दिग्गज िखलाड़ी भी इसके मोह से बच नहीं पाये और कैरी पैकर से जुड़ते चले गये। उन्होंने शीर्ष क्रिकेटरों को अपने साथ जोड़कर परम्परागत क्रिकेट का ढाँचा ही तहस-नहस कर दिया। कैरी पैकर ने वल्र्ड सीरीज क्रिकेट शुरू की। इस क्रिकेट की खास बात यह थी कि इसमें रंगीन जर्सी खिलाडिय़ों को दी गयी और मैच भी दिन-रात के करवाने की शुरुआत हुई। टोनी ग्रेग और इयान चैपल जैसे दिग्गज खिलाड़ी कैरी पैकर की इस क्रिकेट के सूतरधार बने। यह दोनों उस समय क्रिकेट के बड़े नाम थे। लेकिन कैरी पैकर ने यह सब कुछ बहुत गुपचुप तरीके से किया। दुनिया को इसकी भनक तक नहीं लगने दी। एक साल बाद जब 1977 में वल्र्ड सीरीज क्रिकेट की घोषणा हुई, तो हर कोई हैरान रह गया। क्रिकेट का ढाँचा हिल गया और आधिकारिक क्रिकेट बोर्डों को टीम बनाने तक के लाले पड़ गये। वल्र्ड सीरीज क्रिकेट के लिए तीन टीमों का गठन किया गया। वेस्टइंडीज और ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी सबसे ज़्यादा थे, लिहाज़ा इनसे डब्ल्यूएससी, ऑस्ट्रेलिया इलेवन और वेस्टइंडीज इलेवन तैयार हो गयी। अन्य देशों के सभी खिलाडिय़ों को मिलाकर वल्र्ड इलेवन टीम बनायी गयी। इयान और ग्रेग चैपल, डेनिस लिली, रॉड मार्श, ज्योफ थॉमसन, क्लाइव लॉयड, विव रिचड्र्स, एंडी रॉबट्र्स, माइकल होल्डिंग, जियोल गार्नर, गार्डन ग्रीनिज, कोलिन क्रॉफ्ट, रोहन कन्हाई,  बैरी रिचड्र्स, माइक प्रॉक्टर, क्लाइव राइस,  रिचर्ड हेडली, एलन नॉट, डेनिस एमिस, बॉब वूल्मर, इमरान खान, जावेद मियांदाद, ज़हीर अब्बास, सरफराज नवाज़, माजिद खान, मुश्ताक मोहम्मद जैसे धुरंधर कैरी पैकर से जुड़ गये। हालाँकि कैरी पैकर की इस क्रिकेट से खेल में क्रांतिकारी सुधार आये। खिलाडिय़ों को बड़े पैमाने पर पैसा मिलना शुरू हुआ। रंगीन ड्रेस की शुरुआत हुई, जो बहुत आकर्षक दिखती थी। परम्परागत चेरी (लाल) गेंद की जगह कूकाबुरा की सफेद गेंद इस्तेमाल की गयी। दिन-रात के मुकाबले पहली बार दूधिया रौशनी में हुए, जो बाद में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में भी शुरू हुए। बोड्र्स की क्रिकेट जहाँ गिने-चुने ही कैमरे मैच में होते थे, कैरी पैकर ने मैदान के हर कोने में दर्जन-भर कैमरों से खेल अपने चैनल-9 पर दिखाया। हालाँकि कैरी पैकर के साथ जाने का यह असर यह हुआ कि टोनी ग्रेग से लेकर अन्य को विभिन्न देशों के क्रिकेट बोड्र्स ने बाहर कर दिया और उनपर प्रतिबन्ध लगा दिया। कैरी पैकर की लीग को आईसीसी ने अमान्य घोषित कर दिया। जब क्रिकेट बोर्डों ने अपने स्टेडियम कैरी पैकर को देने से इन्कार कर दिया, तो पैकर ने दूसरे खेल मैदानों में मैच करवा दिये। ज़्यादा दर्शक मैदान तक नहीं पहुँचे। लीग 1979 तक दो सत्र तक ही चल पायी। बागी, यानी कैरी पैकर के साथ गये खिलाडिय़ों को अपना करियर बचने के लिए बोड्र्स के आगे समर्पण करना पड़ा। काफी सुलह के बाद आिखर बािगयों की अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी हो पायी। भले कैरी पैकर को क्रिकेट को उस समय नष्ट करने वाला •िाद्दी व्यक्ति बताया गया हो और उसकी क्रिकेट को सर्कस का नाम दिया गया हो, जो कैरी पैकर ने किया बाद में धीरे-धीरे आधिकारिक क्रिकेट का हिस्सा बन गया। इस तरह यह कहा जा सकता है कि अपनी कल्पना से पैकर ने क्रिकेट को एक नया आयाम भी दिया, जो आज की क्रिकेट का सबसे अहम हिस्सा है।

खेल के पारम्परिक प्रारूप (टेस्ट क्रिकेट) में दिलचस्पी बढ़ाने के लिए कायाकल्प की ज़रूरत है। भारत ने घरेलू मैदान पर पहले दक्षिण अफ्रीका के साथ टेस्ट शृंखला खेली थी, जिसमें मैदान में दर्शकों की काफी कमी रही; लेकिन बांग्लादेश के साथ दिन-रात के टेस्ट मैच में पहले तीन दिन के टिकट एडवांस में ही बिक गये। आगे बढऩे का यही तरीका है। यह दुनिया भर में हो रहा है। कहीं से इसे शुरू करना ही था। भारत क्रिकेट के मामले में सबसे बड़ा देश है। मुझे लगता है कि यह बदलाव ज़रूरी है।  हालाँकि दिन रात्रि टेस्ट का आयोजन चुनौतीपूर्ण तो है। हमारे पास दर्शकों को मैदानों में लाने की चुनौती है। दुनिया के किसी भी कोने में भारत और पाकिस्तान के बीच खेले जाने वाले मैच का स्टेडियम खचाखच भर जाएगा। आप जैसे ही घोषणा करेंगे, दर्शक पहुँच जाएँगे।

सौरव गांगुली,

अध्यक्ष, बीसीसीआई।