ज्यों नावक के तीर

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इन कविताओं का रचनाकाल सन 1973 से 2012 तक यानी तकरीबन चार दशकों में फैला हुआ है. युवा पीढ़ी के लिए यह दुर्लभ अवसर है कि वह मदन कश्यप जैसे हस्तक्षेप करने वाले कवि के साथ इन चार दशकों में विचरण कर सकता है. पाठकों के समक्ष अवसर है कि वे एक ही संग्रह में एक ही कवि की उदारीकरण के पहले और उसके बाद रची गई रचनाओं का पाठ कर सकता है, उनके आस्वाद, उनकी प्रकृति में अंतर को रेखांकित कर सकता है.

संग्रह की एक और विशेषता यह है कि लेखक ने सभी  कविताओं को विषम पंक्तियों पर समाप्त किया है. इससे कविताओं में किसी तरह की लयकारी ढूंढ़े नहीं मिलती. ऐसा क्यों है यह तो लेखक ही बताएगा लेकिन जब परिस्थितियां इतनी विषम हैं तो कविता सम पर क्यों

समाप्त हो?

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