जो बली उसी की चली

जी-7 के बाकी नेताओं के साथ चर्चा करते हुए ओबामा

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सोमवार 24 मार्चः नीदरलैंड (हॉलैंड) की राजधानी हेग में जी-7 देशों का शिखर सम्मेलन. सप्ताह-भर पहले तक वह जी-8 कहलाता था. विश्व के सर्वप्रमुख औद्योगिक देशों की इस बिरादरी में 1998 से रूस भी बैठा करता था. इस बार उसे बाहर बिठा दिया गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा यही चाहते थे. सम्मेलन से पहले डच प्रधानमंत्री मार्क रुटे के साथ वे पास ही में एम्सटर्डम का ‘राइक्स म्यूजियम’ देखने पहुंचे. वहां 17 वीं सदी के प्रसिद्ध डच चित्रकार रेम्ब्रांट (डच उच्चारण रेम्ब्रोंत) की कृति ‘रात्रिप्रहरी’(द नाइट वॉच) के सामने ठहर गए. 1642 की इस पेंटिंग में रेम्ब्रांट ने स्पेनी आधिपत्य के विरुद्ध डच जनसेना के कूच को दर्शाया है. तस्वीर को देखते ही, हो सकता है, ओबामा यूक्रेन के बारे में सोचने लगे हों.

दिसंबर के बाद से यूक्रेन में बहुत कुछ बदल गया है. जनविद्रोह के कारण राष्ट्रपति विक्तोर यानुकोविच को अपना पद खोना पड़ा. बदले में यूक्रेन को अपने दक्षिणी स्वायत्तशासी प्रदेश क्रीमिया से हाथ धोना पड़ा. रूस को जी-8 की सदस्यता खोनी पड़ी. अब उसे तरह-तरह के दंडात्मक प्रतिबंध भी झेलने होंगे. उधर, प्रतिबंध लगाने वाले सोच में पड़ गये हैं कि रूस के साथ तनातनी बढ़ने से उन्हें खुद भी क्या कुछ खोना पड़ सकता है. फिलहाल तो वे रूसी भालू को अपना बाहुबल दिखाने पर अड़े हैं.

हेग में डच प्रधानमंत्री के निवास पर हुई वार्ताएं केवल डेढ़ घंटे चलीं. राष्ट्रपति ओबामा ने कहा, ‘क्रीमिया जब तक रूस की मुट्ठी में है, रूस को उसके ‘समावेशन की कीमत चुकानी होगी.’ ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन चाहते थे कि रूस को जी-8 से हमेशा के लिए बाहर कर दिया जाए. सभी सात शिखर नेता एकमत थे कि यूक्रेन से नाता तोड़ने का क्रीमियाई जनमतसंग्रह और रूसी संघ में क्रीमिया का विलय अंतराराष्ट्रीय कानून का सरासर उल्लंघन है.

कानून और हकीकत
अंतरराष्ट्रीय कानून, आम सहमति पर आधारित कुछ ऐसे मानकों के ढांचे जैसा है, जो सरकारों और देशों के बीच टिकाऊ किस्म के व्यवस्थित संबंधों का नियमन करते हैं. पहले से चल रही ऐसी परिपाटियां, देशों और सरकारों के बीच के ऐसे संधि-समझौते और सभा-सम्मेलनों के आधार पर सरकारी या गैर-सरकारी संस्थाओं-संगठनों के अंतरराष्ट्रीय महत्व के ऐसे निर्णय भी उसका स्रोत बन सकते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के मूलभूत सिद्धांतों संबंधी संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र से मेल खाते हैं. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के निर्णय और महासभा द्वारा पारित प्रस्ताव भी अंतरराष्ट्रीय कानून का रूप धारण कर सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय कानून किसी देश के संविधान या किसी दंडसंहिता के समान अनुच्छेद या धाराबद्ध नहीं है. केवल एक फ्रेम है, इसलिए उस में अस्पष्टता और मनपसंद अर्थ लगाने की गुंजाइश भी मिल ही जाती है.

अंतरराष्ट्रीय कानून के मूलभूत सिद्धांतों संबंधी 24 अक्टूबर 1970 के संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव नंबर 2625(XXV) में कहा गया हैः ‘हर राज्यसत्ता का यह कर्तव्य है कि अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में वह किसी दूसरे राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध ऐसी किसी धमकी या बलप्रयोग से परहेज करे या कोई ऐसा काम न करे, जो संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों के विरुद्ध है. अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के निपटारे के लिए ऐसी धमकी या बलप्रयोग अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र का उल्लंघन है और उसका कतई उपयोग नहीं होना चाहिये.’

लेकिन, सच्चाई यह है कि अमेरिका और उस के संगी-साथी अपने हितों के अनुसार बलप्रयोग से परहेज के इस नियम को हमेशा तोड़ते-मरोड़ते रहे हैं.

15 जुलाई 1974 के दिन भूमध्यसागरीय द्वीप-देश साइप्रस की सेना के एक हिस्से ने सत्ता हथिया ली. राष्ट्रपति आर्चबिशप मकारियोस को जान बचाने के लिए भागना पड़ा. साइप्रस के उत्तर-पूर्वी हिस्से में रहने वाले तुर्क समुदाय की रक्षा के नाम पर तुर्की ने पांच दिन बाद साइप्रस पर आक्रमण शुरू कर दिया. उसने एक महीने के भीतर साइप्रस के 40 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा कर लिया और 13 फरवरी 1975 को उसे एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया. साइप्रस तब से विभाजित है. तुर्की 1952 से अमेरिका वाले नाटो सैन्य-संगठन का सदस्य है, इसलिए उसका कोई बाल बांका नहीं हुआ. तुर्क सेना कुर्द-विद्रोहियों का पीछा करते हुए कई बार इराक में भी दूर तक घुस चुकी है. क्या भारतीय सेना भी घुसपैठियों का पीछा करते हुए कथित ‘आजाद कश्मीर’ में घुसने की कभी हिम्मत कर सकती है?

मात्र 91 हजार की जनसंख्या वाले कैरेबियाई द्वीप-देश ग्रेनाडा में 1983 में सेना ने सत्ता पलट दी. यह कहते हुए कि वहां सोवियत संघ और क्यूबा के कुछ लोग गड़बड़ कर रहे हैं और हमें अपने नागरिकों की रक्षा करनी है, अमेरिका ने 23 अक्टूबर 1983 को ग्रेनाडा पर बमबारी शुरू कर दी. उसने दो ही दिन में वहां कब्जा कर पुरानी सरकार को बहाल कर दिया. अमेरिकी वीटो के कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद कुछ नहीं कर सकी. केवल महासभा ने एक प्रस्ताव पास कर अमेरिकी आक्रमण की निंदा की.

सिलसिला यहीं नहीं रुकता. 1980 वाले दशक में पनामा के सत्ताधारी मानुएल नोरियेगा पर मादक द्रव्यों की तस्करी का आरोप लगाया गया. नोरियेगा को पकड़ने के लिए 20 दिसंबर 1989 को अमेरिकी वायुसेना ने आक्रमण शुरू कर दिया. 11 दिनों तक वैटिकन के पनामा स्थित दूतावास में छिपे रहने के बाद नोरियेगा ने तीन जनवरी 1990 को आत्मसमर्पण कर दिया. नोरियेगा पर अमेरिका में मुकदमा चला कर 10 जुलाई 1992 को उन्हें 40 साल के लिए जेल भेज दिया गया. नोरियेगा 10 साल तक सीआईए  एजेंट भी रह चुके थे. 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर अल कायदा के आतंकवादी हवाई हमलों के बाद अमेरिका ने जिन सच्चे-झूठे बहानों की आड़ लेकर अफगानिस्तान में तालिबान और इराक में सद्दाम हुसैन की सत्ता का सफाया किया, वह किन्हीं अन्य कारणों से उचित भले ही रहा हो, अंतरराष्ट्रीय कानून-सम्मत तो नहीं ही था.

आत्मनिर्णय का अधिकार
किसी देश का बंटवारा कैसे हो? कोई नया देश कैसे बने? या किसी देश का किसी दूसरे देश के साथ विलय कैसे हो? इस बारे में अंतरराष्ट्रीय कानून के मूलभूत सिद्धांतों वाली संयुक्त राष्ट्र घोषण को सबसे अधिक तोड़ा-मरोड़ा गया है. इस घोषणा का कहना हैः हर जनता के लिए आत्मनिर्णय के एकसमान अधिकार के सिद्धांत का पालन करते हुए… ‘अपने स्वंतत्र निर्णय के बल पर किसी जनता द्वारा अपने लिए एक स्वतंत्र, सार्वभौम राज्यसत्ता की सथापना, किसी अन्य स्वतंत्र राज्यसत्ता के साथ संयोजन या एकीकरण या कोई अन्य राजनीतिक स्वरूप ग्रहण करना, आत्मनिर्णय के उसके अधिकार को अमल में लाने के तरीके हो सकते हैं.’

जनता क्या चाहती है? उस का स्वतंत्र निर्णय क्या है?  इसे जानने का सर्वोत्तम तरीका है जनमतसंग्रह द्वारा जनता की राय पूछना. संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में हुए इसी तरह के जनमतसंग्रहों के आधार पर 1991 में अफ्रीकी देश इरिट्रिया इथियोपिया से और 2011 में दक्षिणी सूडान शेष सूडान से अलग हो कर स्वतंत्र देश बन गया. जनमतसंग्रह के आधार पर ही अमेरिका से 3700 किलोमीटर दूर का हवाई द्वीपसमूह, 21 अगस्त 1959 के दिन से, अमेरिका का 50वां राज्य कहलाता है, जबकि स्पेनी भूमि पर स्थित ब्रिटिश उपनिवेश जिब्राल्टर, स्पेन के सारे प्रयासों को ठेंगा दिखाते हुए, अब भी ब्रिटिश बना हुआ है. भारत से कहा जाता है वह कश्मीर में जनमतसंग्रह क्यों नहीं करवाता. लेकिन, यही मांग तिब्बत के प्रसंग में चीन से, बास्कलैंड के प्रसंग में स्पेन से या कोर्सिका के प्रसंग में फ्रांस से नहीं की जाती.

घर लौटा क्रीमिया
यूक्रेन में 21 फरवरी को हुए आकस्मिक सत्तापलट के बाद उसके दक्षिणी स्वायत्तशासी प्रदेश क्रीमिया की स्थानीय संसद और सरकार ने 16 मार्च को जब वहां जनमतसंग्रह कराया, तो पश्चिमी देशों ने आसमान सिर पर उठा लिया. 23 लाख जनसंख्या वाले क्रीमिया की 60 प्रतिशत जनता रूसी, 24 प्रतिशत यूक्रेनी और 12 प्रतिशत तातार जाति वाली इस्लामधर्मी है. बताया गया कि 80 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया जिनमें से 97 प्रतिशत ने रूस के साथ विलय का समर्थन किया. एक सप्ताह के भीतर विलय की कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर ली गयीं. उल्लेखनीय है कि स्टालिन की मृत्यु के बाद 1953 में सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता बने निकिता ख्रुश्चेव ने, 1954 में, क्रीमिया प्रायद्वीप, जो 200 वर्षों से रूस का हिस्सा था, यूक्रेन को उपहार में दे दिया था. उस वर्ष रूस में यूक्रेन के विलय की 300वीं जयंती मनाई जा रही थी. ख्रुश्चेव स्वयं भी यूक्रेनी थे. शायद सोच रहे थे, क्रीमिया यूक्रेनी हो या रूसी, अंततः रहेगा तो सोवियत संघ में ही. उन्हें क्या पता कि एक दिन सोवियत संघ खुद ही नहीं रह जायेगा.

लेकिन, हर समय आत्मनिर्णय और जनमतसंग्रह की गुहार लगाने वाले पश्चिमी नेता क्रीमिया के जनमतसंग्रह पर बिफर गए. कहने लगे, यूक्रेनी संविधान अलगाव के लिए जनमतसंग्रह की अनुमति नहीं देता इसलिए जनमत संग्रह अवैध है. स्वयं अमेरिका भी ब्रिटेन की सहमति से नहीं, उसके प्रति विद्रोह के द्वारा स्वतंत्र हुआ था. पहली बात, संसार के हर देश का संविधान क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा पर ही लक्षित होता है. दूसरी बात, किएव में तीन महीनों से तोड़-फोड़ व आगजनी कर रहे प्रदर्शनकारियों ने 21 फ़रवरी की शाम जर्मनी, फ्रांस और पोलैंड के विदेश मंत्रियों की नाक के नीचे जिस तरह सत्ता हथिया ली, यूक्रेनी संविधान उसकी भी अनुमति नहीं देता. और तीसरी बात, स्लोवेनिया और क्रोएशिया भी 1991 में अपने यहां एकतरफा जनमतसंग्रह करवा कर भूतपूर्व युगोस्लाविया से अलग हो गए थे. उस समय यूक्रेन ही क्रोएशिया को मान्यता देने वाला सबसे पहला देश था.

युगोस्लाविया का विघटन
युगोस्लाविया से अलग हुए दोनों नए देशों को मान्यता देने के लिए तत्पर जर्मनी ने युगोस्लाविया के अन्य गणतंत्रों को भी ऐसा ही करने के लिए उकसाया था. यहां तक कि स्लोवेनिया और क्रोएशिया को राजनयिक मान्यता टाल देने के 15 दिसंबर 1991 के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रस्ताव की अवहेलना करते हुए, एक ही सप्ताह बाद, जर्मनी की जिद पर पहले स्लोवेनिया को और फिर क्रोएशिया को यूरोपीय संघ के उस समय के सभी 12 देशों ने मान्यता देदी. इससे युगोस्लाविया के बोस्निया और मेसेडोनिया जैसे वे गणराज्य भी अलग होने के लिए छपटाने लगे, जो तब तक शांत थे. युगोस्लाविया में भीषण गृहयुद्ध छिड़ गया. भारी मारकाट हुई. यहां तक कि युगोस्लाविया के सर्बिया गणराज्य का मुस्लिम बहुल प्रदेश कोसोवो भी, जर्मनी की अगुआई में सर्बिया पर बमबारी की बलिहारी से, 2008 में एक स्वतंत्र देश बनने में सफल हो गया. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पहली बार जर्मन विमानों ने किसी दूसरे देश पर बम बरसाए थे– वह भी इसलिए कि वह खंडित हो जाए. तब जर्मनी के चांसलर रहे गेरहार्ड श्रोएडर अब इस बमबारी पर पछताते हैं. यूक्रेन के संदर्भ में उन पुराने दिनों को याद करते हुए जर्मन नगर हैम्बर्ग में गत 9 मार्च को अपने एक भाषण में श्रोएडर ने पश्चिमी देशों की दोहरी नैतिकता की आलोचना की. उन्होंने कहा कि ‘चांसलर रहते हुए युगोस्लाविया युद्ध के समय मैंने स्वयं अंतरराष्ट्रीय कानून तोड़ा है… हमने नाटो के साथ मिल कर सर्बिया पर बमबारी करने के लिए अपने विमान भेजे. सुरक्षा परिषद के किसी प्रस्ताव के बिना एक सार्वभौम देश पर बमबारी की.’ इस स्वीकारोक्ति के लिए उनकी सरहाना करने के बदले जर्मनी में उन्हें ‘पूतिन का यार’ बता कर उन की खिल्ली उड़ाई जा रही है. यूरोपीय संसद के जर्मन सांसद उन का मुंह बंद करने के लिए एक प्रस्ताव पास करवाना चाहते हैं.

पूर्व चांसलर श्रोएडर की ही तरह पिछले दशक में यूरोपीय आयोग में संघ के विस्तार संबंधी मामलों के आयुक्त रहे जर्मन राजनीतिज्ञ ग्युंटर फ़रहोएगन भी यूक्रेन के प्रति पश्चिम के अतिरंजित मोह से दुखी हैं. बीती 21 फ़रवरी को अत्यंत संदिग्ध परिस्थितियों में बनी यूक्रेन की अंतरिम सरकार को जर्मनी और यूरोपीय संघ ने जिस आनन-फ़ानन में मान्यता दे दी, उसकी आलोचना करते हुए एक रेडियो-इंटरव्यू में फ़रहोएगन ने कहा, ‘किएव में 21वीं सदी की ऐसी पहली सरकार बनी है, जिस में फासिस्ट बैठे हुए हैं… असंवैधानिक तरीकों से सत्ता में आई एक ऐसी सरकार को मान्यता देकर, उस के साथ सहयोग कर और उसे हर तरह की चीज़ें परोस कर यूरोपीय संघ स्थिति को और भी गंभीर बना रहा है. यह नहीं होना चाहिये था. विशेषकर जर्मनी को तो यह कभी नहीं करना चाहिये था.’

जब यानुकोविच भागे
जर्मनी, फ्रांस और पोलैंड के विदेशमंत्रियों के मध्यस्थता-प्रयासों से, 21 फरवरी के दिन, किएव में तत्कालीन राष्ट्रपति विक्तोर यानुकोविच और उनके विरोधी प्रदर्शनकारियों के बीच एक ऐसे समझैते पर हस्ताक्षर हुए थे, जिस में प्रदर्शनकारियों की सारी मुख्य मांगें मान ली गई थीं. तब भी, किएव के मैदान-चौक पर रात-दिन धरना दे रहे प्रदर्शनकारियों के सबसे उग्रवादी गुट ने समझौते को ठुकरा दिया और कहा कि अब वे राष्ट्रपति भवन और सरकारी मंत्रालयों पर कब्जा करेंगे. इससे राष्ट्रपति यानुकोविच को लगा कि अब जान खतरे में है, यहां से भाग निकलो. वे उसी शाम भूमिगत हो गए.

यानुकोविच के विरोधियों को जैसे ही भनक मिली कि किएव में सत्ता-शून्यता पैदा हो गई है, उन्होंने उसी रात अपनी एक अंतरिम सरकार बना कर सत्ता हथिया ली. समझौते पर हस्ताक्षर के केवल 10 घंटों के भीतर यह सब हो गया. यूरोपीय संघ वाले तीनों विदेशमंत्री तब तक किएव में ही थे. लेकिन, कुछ ही घंटे पहले के समझौते को उठा कर कूड़े पर फेंक देने की निन्दा करने के बदले तीनों देशों की सरकारों ने यह जानते हुए भी अंतरिम सरकार को मान्यता दे दी कि उस के कम से कम पांच मंत्री उग्र-दक्षिणपंथी और नव-नाजीवादी हैं. अंतरिम सरकार ने अपने पहले ही आदेश में रूसी भाषा को देश की दूसरी राजभाषा के पद से हटाते हुए यूक्रेनी को एकमात्र राजभाषा घोषित कर दिया. स्वाभाविक था कि इससे क्रीमिया और पूर्वी यूक्रेन के रूसी-भाषियों के बीच खलबली मच गई. वे सोचने लगे कि उनकी सुरक्षा इसी में है कि उनका भूभाग रूस का अंग बन जाए. क्रीमिया तो इस बीच रूस का अंग बन गया है, जबकि पूर्वी यूक्रेन में रूस के साथ विलय के लिए प्रदर्शन हो रहे हैं.

नेकनीयती में संदेह
रूस यूक्रेन की अंतरिम सरकार को मान्यता देने से मना कर रहा है. उसका कहना है कि वह सत्ता-पलट द्वारा, न कि किसी संवैधानिक प्रक्रिया द्वारा, सत्ता में आई है. अंतरराष्ट्रीय कानून भी संवैधानिक प्रक्रिया को ही प्राथमिकता देता है. अंतरिम सरकार ने 25 मई 2014 को संसद और राष्ट्रपति के चुनाव करवाने की घोषणा की है. यदि इरादा सचमुच ईमानदारी भरा है, तो जरूरी नहीं था का यूरोपीय संघ और अमेरिका एक कामचलाऊ अंतरिम सरकार को तुरंत मान्यता देते. ईमानदारी पर संदेह इसलिए भी होता है, क्योंकि होग में जी-7 शिखर सम्मेलन से एक सप्ताह पहले, 15 मार्च के दिन, ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ ओर यूक्रेन की अंतरिम सरकार ने उस अशुभ ‘साझेदारी समझौते पर’हस्ताक्षर कर ही दिये, जिस पर यानुकोविच द्वारा हस्ताक्षर करने से मना करने के बाद यह सारा झमेला खड़ा हुआ था.

यूरोपीय संघ ने हस्ताक्षर करने का पुरस्कार एक अरब डॉलर से बढ़ा कर 15 अरब डॉलर कर दिया है. इतनी उदारता और जनादेश प्राप्त किसी वैध सरकार के साथ हस्ताक्षर करने से बचने की इस उतावली के पीछे कोई नेक इरादा होना संभव नहीं लगता. यूरोपीय संघ के मन में कहीं न कहीं यह शंका है कि है कि चुनावों के बाद की यूक्रेनी सरकार भी यानुकोविच की तरह ही हस्ताक्षर करने से मना कर सकती है, इसलिए बेहतर है कि कामचलाऊ सरकार के हस्ताक्षर द्वारा नई सरकार को पहले से ही बांध लिया जाए. यदि रूस को नीचा नहीं दिखाना है तो यह तोड़-मरोड़, यह तिकड़मबाजी भला किसलिए?

घृणा की पराकाष्ठा
यूक्रेन में 2005 वाली ‘नारंगी क्रांति’ की नेत्री, क्रांति के बाद कुछ महीनों की प्रधानमंत्री, उस दौरान बन गई डॉलर-करोड़पति और अब राष्ट्रपति बनने की आकंक्षी यूलिया तिमोशेंको ने तो रूस के प्रति घृणा की पराकाष्ठा ही कर दी. मार्च के शुरू में वे बर्लिन के सबसे बड़े व नामी अस्पताल शारिते में भर्ती थीं. क्रीमिया में जनमतसंग्रह के बाद 18 मार्च वाले जिस दिन रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन ने रूस में क्रीमिया के विलय की संधि पर हस्ताक्षर किये, संभवतः उसी दिन तिमोशेंको ने यूक्रेन के एक सांसद नेस्तोर शुफ़्रिच से टेलीफोन पर बात की. इस बातचीत की रिकर्डिंग अब यूट्यूब पर तहलका मचा रही है. तिमोशेंको बड़े उत्तेजित स्वर में कहती हैं, ‘मैं खुद कलाश्निकोव (मशीनगन) उठा कर उस गंदे (पूतिन) के सिर में गोली मारने के लिए तैयार बैठी हूं…हद हो गई है… हमें हथियार उठा कर इन दुष्ट रूसियों और उनके नेताओं का काम तमाम कर देना चाहिये… काश! मैं वहां होती और खुद अगुआई कर सकती. वे क्रीमिया पाने के बदले… (लिखने के अयोग्य अपशब्द)… खा रहे होते….मैं कोई न कोई रास्ता निकाल लूंगी. मौका मिलते ही अपनी सारी जान-पहचान इस्तेमाल करते हुए सारी दुनिया को जगा दूंगी कि रूस जल कर खाक बन गया खेत भर रह जाए… कंबख्त! उन पर ऐटमबम पटक देना चाहिए.’

यूलिया तिमोशेंको ने इस टेलीफोन बातचीत की पुष्टि की है. उनकी सोच और शब्दों से पता चल जाना चाहिये कि यूक्रेन के नेताओं का दिमाग किस तरह दीवालिया हो गया है. इससे भी चिंताजनक बात यह है कि रात-दिन लोकतंत्र, स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय के अधिकार और मानवाधिकरों का ढिंढोरा पीटने वाले पश्चिम के लोकतंत्र खोखले आदर्शों वाले प्रचारतंत्र बनते जा रहे हैं. उनकी चली, तो 21 वीं सदी में भी भैंस उसी की होगी, जिस के पास लाठी होगी. क्योंकि उन्हीं की चलती है, इसलिए मिल-मिलाकर यही सबसे निर्णायक अंतरराष्ट्रीय कानून है.

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