जो बली उसी की चली

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जी-7 के बाकी नेताओं के साथ चर्चा करते हुए ओबामा

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सोमवार 24 मार्चः नीदरलैंड (हॉलैंड) की राजधानी हेग में जी-7 देशों का शिखर सम्मेलन. सप्ताह-भर पहले तक वह जी-8 कहलाता था. विश्व के सर्वप्रमुख औद्योगिक देशों की इस बिरादरी में 1998 से रूस भी बैठा करता था. इस बार उसे बाहर बिठा दिया गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा यही चाहते थे. सम्मेलन से पहले डच प्रधानमंत्री मार्क रुटे के साथ वे पास ही में एम्सटर्डम का ‘राइक्स म्यूजियम’ देखने पहुंचे. वहां 17 वीं सदी के प्रसिद्ध डच चित्रकार रेम्ब्रांट (डच उच्चारण रेम्ब्रोंत) की कृति ‘रात्रिप्रहरी’(द नाइट वॉच) के सामने ठहर गए. 1642 की इस पेंटिंग में रेम्ब्रांट ने स्पेनी आधिपत्य के विरुद्ध डच जनसेना के कूच को दर्शाया है. तस्वीर को देखते ही, हो सकता है, ओबामा यूक्रेन के बारे में सोचने लगे हों.

दिसंबर के बाद से यूक्रेन में बहुत कुछ बदल गया है. जनविद्रोह के कारण राष्ट्रपति विक्तोर यानुकोविच को अपना पद खोना पड़ा. बदले में यूक्रेन को अपने दक्षिणी स्वायत्तशासी प्रदेश क्रीमिया से हाथ धोना पड़ा. रूस को जी-8 की सदस्यता खोनी पड़ी. अब उसे तरह-तरह के दंडात्मक प्रतिबंध भी झेलने होंगे. उधर, प्रतिबंध लगाने वाले सोच में पड़ गये हैं कि रूस के साथ तनातनी बढ़ने से उन्हें खुद भी क्या कुछ खोना पड़ सकता है. फिलहाल तो वे रूसी भालू को अपना बाहुबल दिखाने पर अड़े हैं.

हेग में डच प्रधानमंत्री के निवास पर हुई वार्ताएं केवल डेढ़ घंटे चलीं. राष्ट्रपति ओबामा ने कहा, ‘क्रीमिया जब तक रूस की मुट्ठी में है, रूस को उसके ‘समावेशन की कीमत चुकानी होगी.’ ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन चाहते थे कि रूस को जी-8 से हमेशा के लिए बाहर कर दिया जाए. सभी सात शिखर नेता एकमत थे कि यूक्रेन से नाता तोड़ने का क्रीमियाई जनमतसंग्रह और रूसी संघ में क्रीमिया का विलय अंतराराष्ट्रीय कानून का सरासर उल्लंघन है.

कानून और हकीकत
अंतरराष्ट्रीय कानून, आम सहमति पर आधारित कुछ ऐसे मानकों के ढांचे जैसा है, जो सरकारों और देशों के बीच टिकाऊ किस्म के व्यवस्थित संबंधों का नियमन करते हैं. पहले से चल रही ऐसी परिपाटियां, देशों और सरकारों के बीच के ऐसे संधि-समझौते और सभा-सम्मेलनों के आधार पर सरकारी या गैर-सरकारी संस्थाओं-संगठनों के अंतरराष्ट्रीय महत्व के ऐसे निर्णय भी उसका स्रोत बन सकते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के मूलभूत सिद्धांतों संबंधी संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र से मेल खाते हैं. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के निर्णय और महासभा द्वारा पारित प्रस्ताव भी अंतरराष्ट्रीय कानून का रूप धारण कर सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय कानून किसी देश के संविधान या किसी दंडसंहिता के समान अनुच्छेद या धाराबद्ध नहीं है. केवल एक फ्रेम है, इसलिए उस में अस्पष्टता और मनपसंद अर्थ लगाने की गुंजाइश भी मिल ही जाती है.

अंतरराष्ट्रीय कानून के मूलभूत सिद्धांतों संबंधी 24 अक्टूबर 1970 के संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव नंबर 2625(XXV) में कहा गया हैः ‘हर राज्यसत्ता का यह कर्तव्य है कि अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में वह किसी दूसरे राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध ऐसी किसी धमकी या बलप्रयोग से परहेज करे या कोई ऐसा काम न करे, जो संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों के विरुद्ध है. अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के निपटारे के लिए ऐसी धमकी या बलप्रयोग अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र का उल्लंघन है और उसका कतई उपयोग नहीं होना चाहिये.’

लेकिन, सच्चाई यह है कि अमेरिका और उस के संगी-साथी अपने हितों के अनुसार बलप्रयोग से परहेज के इस नियम को हमेशा तोड़ते-मरोड़ते रहे हैं.

15 जुलाई 1974 के दिन भूमध्यसागरीय द्वीप-देश साइप्रस की सेना के एक हिस्से ने सत्ता हथिया ली. राष्ट्रपति आर्चबिशप मकारियोस को जान बचाने के लिए भागना पड़ा. साइप्रस के उत्तर-पूर्वी हिस्से में रहने वाले तुर्क समुदाय की रक्षा के नाम पर तुर्की ने पांच दिन बाद साइप्रस पर आक्रमण शुरू कर दिया. उसने एक महीने के भीतर साइप्रस के 40 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा कर लिया और 13 फरवरी 1975 को उसे एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया. साइप्रस तब से विभाजित है. तुर्की 1952 से अमेरिका वाले नाटो सैन्य-संगठन का सदस्य है, इसलिए उसका कोई बाल बांका नहीं हुआ. तुर्क सेना कुर्द-विद्रोहियों का पीछा करते हुए कई बार इराक में भी दूर तक घुस चुकी है. क्या भारतीय सेना भी घुसपैठियों का पीछा करते हुए कथित ‘आजाद कश्मीर’ में घुसने की कभी हिम्मत कर सकती है?

मात्र 91 हजार की जनसंख्या वाले कैरेबियाई द्वीप-देश ग्रेनाडा में 1983 में सेना ने सत्ता पलट दी. यह कहते हुए कि वहां सोवियत संघ और क्यूबा के कुछ लोग गड़बड़ कर रहे हैं और हमें अपने नागरिकों की रक्षा करनी है, अमेरिका ने 23 अक्टूबर 1983 को ग्रेनाडा पर बमबारी शुरू कर दी. उसने दो ही दिन में वहां कब्जा कर पुरानी सरकार को बहाल कर दिया. अमेरिकी वीटो के कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद कुछ नहीं कर सकी. केवल महासभा ने एक प्रस्ताव पास कर अमेरिकी आक्रमण की निंदा की.

सिलसिला यहीं नहीं रुकता. 1980 वाले दशक में पनामा के सत्ताधारी मानुएल नोरियेगा पर मादक द्रव्यों की तस्करी का आरोप लगाया गया. नोरियेगा को पकड़ने के लिए 20 दिसंबर 1989 को अमेरिकी वायुसेना ने आक्रमण शुरू कर दिया. 11 दिनों तक वैटिकन के पनामा स्थित दूतावास में छिपे रहने के बाद नोरियेगा ने तीन जनवरी 1990 को आत्मसमर्पण कर दिया. नोरियेगा पर अमेरिका में मुकदमा चला कर 10 जुलाई 1992 को उन्हें 40 साल के लिए जेल भेज दिया गया. नोरियेगा 10 साल तक सीआईए  एजेंट भी रह चुके थे. 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर अल कायदा के आतंकवादी हवाई हमलों के बाद अमेरिका ने जिन सच्चे-झूठे बहानों की आड़ लेकर अफगानिस्तान में तालिबान और इराक में सद्दाम हुसैन की सत्ता का सफाया किया, वह किन्हीं अन्य कारणों से उचित भले ही रहा हो, अंतरराष्ट्रीय कानून-सम्मत तो नहीं ही था.

आत्मनिर्णय का अधिकार
किसी देश का बंटवारा कैसे हो? कोई नया देश कैसे बने? या किसी देश का किसी दूसरे देश के साथ विलय कैसे हो? इस बारे में अंतरराष्ट्रीय कानून के मूलभूत सिद्धांतों वाली संयुक्त राष्ट्र घोषण को सबसे अधिक तोड़ा-मरोड़ा गया है. इस घोषणा का कहना हैः हर जनता के लिए आत्मनिर्णय के एकसमान अधिकार के सिद्धांत का पालन करते हुए… ‘अपने स्वंतत्र निर्णय के बल पर किसी जनता द्वारा अपने लिए एक स्वतंत्र, सार्वभौम राज्यसत्ता की सथापना, किसी अन्य स्वतंत्र राज्यसत्ता के साथ संयोजन या एकीकरण या कोई अन्य राजनीतिक स्वरूप ग्रहण करना, आत्मनिर्णय के उसके अधिकार को अमल में लाने के तरीके हो सकते हैं.’

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