जेल के अंदर चलीं गोलियां बेटे ने लिया पिता की हत्या का बदला!

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बागपत जेल में इसी महीने एक कैदी मुन्ना बजरंगी को दूसरे कैदी सुनील राठी ने गोलियों से भून डाला। एक सप्ताह पहले उसकी पत्नी ने कहा था कि मुन्ना बजरंगी की जान को खतरा है। पुलिस ने अपराधी को तत्काल पुलिस हिरासत में ले लिया है। जेल में हुई इस हत्या को राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गंभीर बताया और उन्होंने जांच के आदेश भी जारी कर दिए। जेल के चार अधिकारी भी मुअतल किए गए हैं।

कहते हैं कथित हत्यारे ने अपने पिता की हत्या का बदला छह महीनों में ले लिया। उसके पिता नरेश राठी तब बागपत जिले की टीकरी नगर पंचायत  के अध्यक्ष थे जब दिसंबर 1999 में उसकी हत्या हुई। सुनील तब 21 साल का था। राठी पिछले साल की जुलाई 31 से बागपत जेल में था। गोलियों की आवाज़ पर मौका-मुआयने से .762 बोर के दस खाली खोखे और कुछ गोलियां मिलीं। इस पूरे मामले की तितरफा जांच हुई। एक तो जेल अधिकारियों द्वारा, एक मजिस्ट्रेट छानबीन और एक न्यायिक जांच। जेल के जिन अधिकारियों को सस्पेंड किया गया उनमें हैं – जेलर उदय प्रताप सिंह, उप जेलर शिवाजी यादव, हेड वार्डेन अरजिंदर सिंह और वार्डेन माधव कुमार।

मुन्ना बजरंगी की बागपत जेल में हत्या करने वाला सुनील राठी हत्या के दो मामलों में उम्रकैद की सज़ा काट रहा है। बागपत में एक हत्या उसने और दूसरी रूड़की में एक व्यापारी की थी। क्योंकि ये उसकी मांग पर रकम नहीं दे पा रहे थे। इनके अलावा दो और हत्याओं के आरोप उस पर है। उस पर गैंगस्टर एक्ट के तहत तीन मामले और चार एक्स्टारशन के मामले भी हैं। राठी को अब फर्रूखाबाद की सेंट्रल जेल में भेज दिया गया।

पुराने राग-द्वेष, हत्याओं के मामलों के चलते सुनील राठी ने बहुत करीब से गोलियां चला कर मुन्ना बजरंगी की हत्या की। एक जेल में हुई इस हत्या पर ढेरों सवाल उठ रहे हैं। यह हत्या जेल के अंदर एक दूसरे कैदी द्वारा की गई।

पूर्वाचल यानी उत्तरप्रदेश व बिहार के इलाकों में गरीबी, अविकास और बाहुबलियों के लिए ख्यात रहा है। जो लोग बाहुबली और धनपति होने के नाते राजनीति में अपनी आकांक्षाएं आजमाते हैं। उनकी छवि पहले तो अपने समुदाय के लोगों में उनके अपने सेवक के रूप में बनती है फिर यही उभरती है उन्हें अपने कंधों पर हमेशा रखने में। राजनेता बनने के पीछे इनका मूल मकसद होता है अपनी छवि सुधार कर समाज की मुख्यधारा में आना। वे चाहते हैं जो वर्दीधारी उन्हें गिरफ्तार करने या मार देने के लिए तैयार थे। वे ही अब उन्हें सेल्यूट करते भी दिखें।

जौनपुर पूर्वी उत्तरप्रदेश में बहुत ही पिछड़े, गरीबों और पुराने रईसों का मशहूर केंद्र रहा है। इसी जिले के पूरदयाल गांव का था प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी। उसमें बारूद को दागने की गजब पहचान थी। बचपन से ही उसे पिस्तौल और बंदूकों  का खेल भाता था। उम्र के साथ ही उसने निशाने पर गोली चलाना सीख लिया। इसके बाद या तो वह राजनेता बनता या पुलिस के हाथों मारा जाता। मुन्ना बजरंगी पुलिसिया तैनातगी के बावजूद जेल के अंदर मारा जाता। अपराध पैंतीस साल ही अपराध में उसकी सक्रियता के रहे। उस पर हत्या के दो दर्जन मामले और वसूली के ढेरों मामले थे।

एक गरीब किसान के घर में 1964 में जन्मे प्रेम सिंह का पढ़ाई-लिखाई में कभी मन नहीं लगा। वह बमुश्किल पांचवीं कक्षा तक पढ़ा फिर उसने पढऩा छोड़ दिया। उसकी दिलचस्पी कुश्ती लडऩे और दोस्तों के साथ घूमने में थी। बाद में  उसने कालीन के एक व्यापारी के यहां नौकरी कर ली। उसका अपराधी बनना 1982 से शुरू होता है। हाथा-पाई, मारपीट, लूट पाट और धमकी देने का सिलसिला पहले चला। इसी दौरान उसने अपना बकाया न पाने पर कालीन के व्यापारी की हत्या एक दिन कर दी। उसके बाद तो उसका अपराधी जीवन ही शुरू हो गया।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने उसे मुंबई से गिरफ्तार किया। तब वह एक खूंखार अपराधी बन चुका था। उत्तरप्रदेश पुलिस के अनुसार 90 के दशक में वाराणसी पहुंचा। उसका परिचय एक छात्र नेता अनिल ङ्क्षसह से हुआ जिस पर अनेक आपराधिक मामले थे। वह आगे चल कर वाराणसी में डिप्टी मेयर बना और मुन्ना बजरंगी उसका शैडो। धीरे-धीरे उसका परिचय कृपा चौधरी से हुआ। उन दिनों यह एक बड़ा नाम था और मुख्तार अंसारी उसी की देखरेख में अपराधी और राजनेता बन रहे थे। करीब दस साल ये सहयोगी रहे। एक दशक में वाराणसी-जौनपुर में इन्होंने न जाने कितनी हत्याएं की। अंसारी ने बजरंगी का इस्तेमाल अपने प्रतिद्वंद्वियों की हत्या कराने में कभी किया। अंसारी को रेलवे और सरकारी महकमों से कांट्रैक्ट दिलाने में भी बजरंगी ने खासी मदद की। स्थानीय व्यापारियों और कोयला बाज़ार से वसूली भी जारी रही।

बजरंगी ने 1995 में स्थानीय बाहुबली छोटे सिंह और बड़े सिंह को वाराणसी में मारा। अंसारी के साथ उसकी खटपट तब बढ़ी जब उसने सुपारी लेकर हत्या का काम शुरू किया। कथित तौर पर उसने भाजपा के राजनीतिक रामचंद्र सिंह को उनके बाडीगार्ड के साथ 1996 में मारा। उसकी खासियत थी वह दिन दिहाड़े भीड़ भरे बाज़ार में गोली चलाता था। वह घर में घुस कर भी लोगों की हत्या करता था।

उत्तरप्रदेश एसटीएफ और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के एक अभियान में 1998 में समयपुर बादली के पास हुई मुठभेड़ में बजरंगी को 17 गोलियां लगी थीं। जिनमें से ज्य़ादातर शरीर में जख्म बनाती बाहर निकल गई थीं। उसे पोस्टमार्टम के लिए ले जाया गया। जैसे ही डॉक्टर ने उसकी जांच की तो शरीर में जि़ंदगी थी। वह सांस ले रहा था। वह जेल गया । वहां से ही अपना धंधा चलाता था। बाद में उसे जमानत मिली। वह इसलिए भी रिहा हो जाता था क्योंकि गवाह उससे दहशत खाते थे।

इसी दौरान अपने बचपन के एक साथी की साली सीमा से उसका प्रेम प्रसंग चला और उसने शादी की। साल भर बाद उसका बच्चा जन्मा। उस समय वह भी दिल्ली के हिंदू राव अस्पताल में भर्ती था। वह एक मुठभेड़ में घायल होकर अस्पताल पहुंचा था। यहां से ठीक होने पर उसने फिर कई हत्याएं कीं।

उसने व्यापार में भी हाथ आजमाया। गंगा किनारे पुराने मकानों को खरीदने और उन्हें बाज़ार की कीमत पर बेचता। वह डाक्टरों से फिरौती भी लेता। कथित तौर पर उसने अंसारी के कहने पर मोहम्मदाबाद से कृष्णानंद राय की हत्या की। अंसारी और बजरंगी दोनों का नाम एफआईआर में था। अंसारी गिरफ्तार हुए। वे अभी भी बांदा जेल में हैं।

लेकिन उस हत्या के बाद बजरंगी भूमिगत हो गया। चार साल उसने अपराध नहीं किया। उसकी गिरफ्तारी 2009 में मुंबई में मलाड से हुई। उधर अंसारी जेल से चुनाव लड़ते और लगातार जीतते रहे। इस दौरान उनकी बजरंगी में रु चि भी कम हो गई। बजरंगी ने जौनपुर में मरीयाहू से अपना दल के टिकट पर 2012 में चुनाव लड़ा। वहां वह तीसरे नंबर पर रहा। उसकी पत्नी सीमा ने 2017 में चुनाव लड़ा। लेकिन वह भी हार गई। राजनीति में मुन्ना बजरंगी के कामयाब न होने की सबसे बड़ी वजह यह रही कि एक तो वह पढ़ा-लिखा नहीं था, दूसरे उसका दिमाग उतना तेज़ नहीं था जितना अंसारी का है और तीसरे उसका अपना कोई गॉडफादर नहीं था। उसे लगता था कि पैसा फेंकेंगे तो लोग वोट देंगे।