जीवन की पाठशाला

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दृश्य -1: कॉलेज के मेन गेट पर खड़ी एक लड़की. उम्र करीब 18-19 साल. कॉलेज की ड्रेस पहने यह लड़की हाथों में किताब लिए हुए है. बाहर से कोई दरवाजा खटखटाता है. वह गेट के झरोखे से आने वाले का परिचय और

कॉलेज आने का कारण पूछती है? जवाबों से संतुष्ट होने के बाद वह लोहे का विशाल गेट खोलती है. व्यक्ति कॉलेज में प्रवेश करता है. लड़की फिर गेट बंद करके पास में लगी हुई कुर्सी पर बैठ जाती है. उसकी आंखें फिर से किताब के पन्नों में डूब जाती हैं.

दृश्य -2: लड़कों के हॉस्टल के ठीक सामने स्थित तबेले में करीब 20 गाय-भैंसें हैं. शाम के छह बज रहे हैं. हॉस्टल से पांच लड़कों का समूह बाहर आता है. सबके हाथ में एक बाल्टी है. सब दूध देने वाली गायों और भैंसों को तबेले के दूसरे हिस्से में ले जाकर बांधते हैं. वहां बांधकर उनके सामने चारा डालते हैं. फिर अपनी-अपनी बाल्टियों में दूध दुहने की शुरुआत करते हैं.

दृश्य –3:  बीए तृतीय वर्ष की राजनीति विज्ञान की क्लास चल रही है. सिमरनजीत कौर तल्लीनता से सामने पढ़ा रही अपनी हमउम्र शिक्षक को सुन रही हैं. क्लास खत्म होने की घंटी बजती है. सिमरनजीत फटाफट कक्षा से बाहर निकलकर पास ही स्थित बीए द्वितीय वर्ष की क्लास में दाखिल होती हैं. वहां पहुंचते ही वे छात्रा से शिक्षिका बन जाती हैं. सामने बैठी लड़कियां उनके कहे अनुसार अपनी राजनीति विज्ञान की किताबें निकालती हैं. कौर उन्हें पढ़ाना शुरू कर देती हैं.

दृश्य -4: पिछले साल कक्षा 12 में पंजाब बोर्ड की मेरिट लिस्ट में आई बीए प्रथम वर्ष की छात्रा गगनदीप गिल आज कोई क्लास नहीं करेंगी. लेकिन हॉस्टल की अन्य लड़कियों की तरह ही वे अलसुबह उठ कर कॉलेज ड्रेस पहनकर तैयार हो चुकी हैं. गगन के साथ 11 और लड़कियां भी हैं. वे भी आज कोई क्लास नहीं लेंगी. आज उनकी खाना बनाने की ड्यूटी है. हॉस्टल में रहने वाले सभी विद्यार्थियों के लिए ये 12 छात्राएं सुबह के नाश्ते से लेकर रात तक का खाना बनाएंगी.

ये सारे दृश्य उस बड़ी तस्वीर का सिर्फ एक छोटा-सा हिस्सा भर हैं, जो पंजाब में गुरदासपुर जिले के तुगलवाला गांव स्थित बाबा आया सिंह रियाड़की कॉलेज में जाने पर दिखती है. एक ऐसे समय में जब शिक्षा कारोबार बनकर साधारण आदमी की पहुंच से दूर निकल गई है, यह एक ऐसा अनोखा शिक्षण संस्थान है जो बताता है कि शिक्षा कारोबार नहीं बल्कि सरोकार है जिसका उद्देश्य एक नया मनुष्य रचना है.

बाबा आया सिंह रियाड़की कॉलेज की कहानी 1975 से शुरू होती है. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूरे देश में आपातकाल लगा दिया था. संयोग देखिए कि जिस समय एक महिला प्रधानमंत्री ने देश में आपातकाल लगाया वह साल महिला वर्ष के रूप में मनाया जा रहा था. देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं पर केंद्रित कई कार्यक्रम हो रहे थे. एक ऐसा ही कार्यक्रम पंजाब के गुरदासपुर में भी हो रहा था. उस सभा में कई नेता मौजूद थे. उसी सभा के एक श्रोता स्वर्ण सिंह विर्क भी थे. वक्ताओं द्वारा महिलाओं के लिए ये करेंगे, वो करेंगे जैसे दावे किए जा रहे थे. अचानक विर्क की सहनशीलता जवाब दे गई. वे खड़े हुए और भरी सभा में नेताओं की तरफ इशारा करके कहा ‘ क्यों इतना झूठ बोल रहे हो. मुझे पता है तुम लोग कुछ नहीं करोगे. ’

उनका यह कहना था कि जवाब के रूप में उन पर तंज होने लगे जिनका लब्बोलुआब यह था कि अगर हम नहीं कर सकते तो तुम ही करके दिखाओ तो जानें. यही वह क्षण था जब विर्क ने एक ऐसा शिक्षण संस्थान बनाने की ठान ली जो आने वाले समय में पूरे देश के लिए एक आदर्श बनने वाला था.

लेकिन उस दौर में स्थितियां ऐसी थीं कि इलाके में कोई भी परिवार अपनी लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए आसानी से तैयार नहीं होता था. विर्क गांव-गांव घूमे. लड़कियों की शिक्षा क्यों परिवार और देश के भविष्य के लिए जरूरी है, यह बात उन्होंने घर-घर जाकर लोगों को समझानी शुरू की. सैकड़ों गांवों की खाक छानने के बाद मात्र 34 लड़कियों के परिवारवाले अपनी बेटी को स्कूल भेजने के लिए राजी हुए. विर्क ने इन लड़कियों को लेकर 1976 में उस स्कूल की शुरुआत की जहां पढ़ने की कोई फीस नहीं थी. लेकिन कुछ समय बाद ही 20 लड़कियों के परिवारवालों ने अपनी बेटियों को स्कूल जाने से रोक दिया. अब स्कूल में केवल 14 लड़कियां बची रह गई थीं. विर्क अकेले शिक्षक थे. उस साल बोर्ड की परीक्षा में ये सभी लड़कियां प्रथम श्रेणी में पास हुईं. सिलसिला आगे बढ़ता गया. जिस स्कूल की शुरुआत 14 लड़कियों के एडमिशन से हुई थी, आज उसमें 3,500 विद्यार्थी पढ़ते हैं. इनमें 2,500 लड़कियां हैं. बिना किसी फीस के शुरू हुए इस स्कूल में आज फीस तो ली जाती है लेकिन उतनी ही जिससे कॉलेज का जरूरी खर्च निकल आए. पहली से लेकर एमए तक की यहां पढ़ाई होती है. अधिकतम ट्यूशन फीस 1,000 रुपये सालाना है तो हॉस्टल की सालाना फीस अधिकतम 7,500 रु  है.

कॉलेज के प्रिंसिपल स्वर्ण सिंह विर्क कहते हैं, ‘ ‘हमने एक ऐसा सिस्टम अपने यहां विकसित कर रखा है जिसकी वजह से हमें पैसों की बेहद कम जरूरत पड़ती है. पढ़ाई से लेकर प्रशासन तक हम पूरी तरह से आत्मनिर्भर हैं.’

दरअसल 15 एकड़ में फैले इस कॉलेज का अनूठापन और उसकी शक्ति आत्मनिर्भरता में ही छिपी है. कॉलेज का सब काम कॉलेज की छात्राएं ही करती हैं. यहां शिक्षक लगभग न के बराबर हैं. जो छात्राएं हैं वे ही शिक्षिका भी हैं. व्यवस्था यह है कि जो सीनियर कक्षा के विद्यार्थी हैं वे अपने से निचली कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं. इस तरह बीए थर्ड ईयर की छात्रा बीए सेकंड ईयर वालों को पढ़ाती है. बीए सकेंड ईयर वाली बीए फर्स्ट ईयर वालों को. इस तरह यह व्यवस्था ऊपर से नीचे तक चलती जाती है. कॉलेज में ईच वन, टीच वन के नाम से एक और प्रयोग चलता है. इसके तहत हर छात्रा के ऊपर दूसरी छात्रा को पढ़ाने की जिम्मेदारी है. मान लीजिए एक लड़की अंग्रेजी में दूसरी लड़की से अच्छी है तो वह दूसरी लड़की की टीचर बन जाएगी और रोज एक घंटे उसे पढ़ाएगी.

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